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122- मन और वाणी से परे निर्गुण ब्रह्म का श्रुतियाँ कैसे करती हैं प्रतिपादन, शिव-नारायण की कृपा का रहस्य और वृकासुर से महादेव की रक्षा

Jun 25th, 2026 | 11 Min Read
Blog Thumnail

Category: Bhagavat Purana

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Language: Hindi

श्रीमद्भागवत महापुराण- स्कन्ध: 10 अध्याय: 87-88

राजा परीक्षित ने प्रश्न किया कि जब परब्रह्म सत्त्व, रज, तम आदि गुणों से परे, मन और वाणी की पहुँच से बाहर तथा निर्गुण है, तो फिर श्रुतियाँ उसका वर्णन कैसे करती हैं, जबकि वे सामान्यतः गुण, क्रिया और रूप का ही वर्णन करती हैं।

श्रीशुकदेवजी ने परीक्षित के प्रश्नों का उत्तर देते हुए एक प्राचीन संवाद के बारेमे बताया। 

एक समय देवर्षि नारद भगवान् नारायणके दर्शनके लिये बदरिकाश्रम पहुँचे। उस समय भगवान् नारायण कलापग्रामके सिद्ध ऋषियोंकी सभामें विराजमान थे और लोककल्याण तथा परम निःश्रेयसके लिये तप, धर्म और ज्ञानमें स्थित थे। 

नारदजीने उन्हें प्रणाम करके वही प्रश्न पूछा, जो आज आपने मुझसे पूछा है की मन और वाणीसे परे, निर्गुण ब्रह्मका प्रतिपादन श्रुतियाँ किस प्रकार करती हैं?

तब भगवान् नारायणने कहा की हे नारद! यही प्रश्न प्राचीन कालमें जनलोकके एक महान् ब्रह्मसत्रमें भी उठा था। उस समय ब्रह्माजीके मानसपुत्र सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार आदि नैष्ठिक ब्रह्मचारी परमर्षि वेदोंके तात्पर्य और परब्रह्मके स्वरूपपर विचार-विमर्श कर रहे थे।

उसी सभामें यह गूढ़ जिज्ञासा उपस्थित हुई थी कि जिस परब्रह्म तक मन और वाणीकी पहुँच नहीं है, जिसका श्रुतियाँ भी प्रत्यक्ष वर्णन नहीं कर सकतीं, उसका बोध वे किस प्रकार कराती हैं। उस समय तुम मेरी श्वेतद्वीपाधिपति अनिरुद्ध-मूर्तिका दर्शन करनेके लिये श्वेतद्वीप चले गये थे। उहाँ जो दिव्य संवाद हुआ, वही अब मैं तुम्हें सुनाता हूँ।

सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार- ये चारों भाई शास्त्रीय ज्ञान, तपस्या और शील-स्वभावमें समान हैं। उन लोगोंकी दृष्टिमें शत्रु, मित्र और उदासीन एक से हैं। फिर भी उन्होंने अपनेमेंसे सनन्दनको तो वक्ता बना लिया और शेष भाई सुननेके इच्छुक बनकर बैठ गये ।

सनन्दनजीने कहा की जिस प्रकार प्रातःकाल होनेपर सोते हुए सम्राटको जगानेके लिये वंदीजन उसके पास आते हैं और सम्राट्के पराक्रम तथा सुयशका गान करके उसे जगाते हैं, वैसे ही जब परमात्मा अपने बनाये हुए सम्पूर्ण जगत्को अपने में लीन करके अपनी शक्तियोंके सहित सोये रहते हैं; तब प्रलयके अन्तमें श्रतियाँ उनका प्रतिपादन करनेवाले वचनोंसे उन्हें इस प्रकार जगाती हैं।

श्रुतियाँ कहती हैं, “हे अजित! आपकी जय हो। आप ही समस्त शक्तियोंके आश्रय हैं। आपकी मायाने जीवके स्वाभाविक ज्ञान और आनन्दको ढककर उसे संसारमें बाँध रखा है। इस मायाका नाश केवल आपकी कृपासे ही हो सकता है। यद्यपि हमारा सामर्थ्य आपके निर्गुण स्वरूपका पूर्ण वर्णन करनेमें नहीं है, तथापि जब आप सृष्टि, पालन, संहार अथवा अपनी दिव्य लीलाओंके द्वारा प्रकट होते हैं, तब हम आपका यथाशक्ति वर्णन करती हैं।

“हे प्रभो! सम्पूर्ण जगत् आपसे ही प्रकट होता है और अन्तमें आपमें ही लीन हो जाता है। जैसे मिट्टीसे बने अनेक पात्र वास्तवमें मिट्टी ही हैं, वैसे ही यह सम्पूर्ण विश्व आपका ही स्वरूप है। इसीलिये हम चाहे किसी देवता, किसी नाम अथवा किसी रूपका वर्णन करें, अन्ततः वह आपका ही वर्णन है।

“विवेकी पुरुष त्रिगुणमयी मायाके विविध भावोंमें नहीं उलझते। वे आपकी लीलाकथाओंका श्रवण करके अपने समस्त पाप और क्लेशोंका नाश कर लेते हैं। आत्मज्ञानी महापुरुष अन्तःकरणके समस्त दोषोंसे मुक्त होकर आपके अखण्ड आनन्दस्वरूपमें स्थित रहते हैं।
जीवनकी सफलता आपके भजन और आपकी आज्ञाके पालनमें ही है। जो ऐसा नहीं करते, उनका जीवन धौंकनीके समान केवल श्वास लेने-छोड़नेमें ही व्यतीत हो जाता है। अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय से बना पंचकोशोंमें चेतनारूपसे आप ही विराजमान हैं; फिर भी उनसे सर्वथा असंग हैं। समस्त कार्य-कारणके निषेधके पश्चात् भी जो शेष रहता है, वह आप ही हैं।

“कुछ साधक विभिन्न मार्गोंसे आपकी उपासना करते हैं, किन्तु जो आपके प्रकाशमय मार्गको प्राप्त कर लेते हैं, वे पुनः जन्म-मृत्युके चक्रमें नहीं पड़ते। संतजन कर्मफलकी आसक्तिका त्याग करके सर्वत्र आपके एकरस सत्यस्वरूपका दर्शन करते हैं।

“हे प्रभो! आपका तत्त्व अत्यन्त दुर्गम है। इसी कारण आप विविध अवतार धारण करके ऐसी मधुर लीलाएँ करते हैं कि उनका श्रवण करनेवाले भक्त संसारके समस्त दुःख भूल जाते हैं। अनेक भक्त तो आपकी कथाओंके आनन्दके सामने मोक्षकी भी इच्छा नहीं करते।

“आप जीवके सच्चे आत्मा, हितैषी और प्रियतम हैं; तथापि मोहवश लोग आपको छोड़कर नश्वर शरीर और उसके सम्बन्धोंमें आसक्त हो जाते हैं और जन्म-मृत्युके चक्रमें भटकते रहते हैं।

“आश्चर्य है कि योगी कठोर साधनाओंसे जिस परम पदको प्राप्त करते हैं, उसीको आपके शत्रु भी निरन्तर स्मरणके कारण प्राप्त कर लेते हैं। क्योंकि आप समदर्शी हैं और भावकी दृढ़ताको देखते हैं।

“हे अनन्त! आपका यथार्थ स्वरूप बुद्धि और वाणीकी पहुँचसे परे है। सृष्टिके पूर्व केवल आप ही थे, प्रलयके पश्चात् भी केवल आप ही रहते हैं। इसलिये आपको जाननेका सर्वोत्तम उपाय तर्क नहीं, अपितु आपकी शरणागति और भक्ति है।

“यह जगत् आपकी सत्तासे प्रकाशित होकर सत्य-सा प्रतीत होता है, किन्तु वास्तवमें नाम-रूपमात्र है। आत्मज्ञानी पुरुष सम्पूर्ण जगत्में आपके ही स्वरूपका दर्शन करते हैं और मृत्युको भी जीत लेते हैं। इसके विपरीत जो आपसे विमुख रहते हैं, वे ज्ञान और कर्ममें लगे रहनेपर भी बन्धनसे मुक्त नहीं हो पाते।
“आप इन्द्रियोंसे रहित होते हुए भी समस्त इन्द्रियोंकी शक्ति हैं। देवता और ब्रह्मा आदि भी आपकी आज्ञाके अधीन रहकर अपना-अपना कार्य करते हैं। आपके संकल्पमात्रसे सृष्टि प्रकट होती है और आपके ही आश्रयसे उसका संचालन होता है।

“सभी जीव आपकी मायासे मोहित होकर अपनेको आपसे पृथक् मानते हैं और जन्म-मृत्युका चक्र भोगते हैं। परन्तु बुद्धिमान् पुरुष आपकी शरण ग्रहण करके इस भयसे मुक्त हो जाते हैं। गुरुकी कृपाके बिना मनको वशमें करना अत्यन्त कठिन है; अतः साधकको सदैव सद्गुरुका आश्रय लेना चाहिये।

“जो संत ऐश्वर्य, विद्या और कुलका अभिमान छोड़ चुके हैं, वे चलती-फिरती तीर्थभूमियाँ हैं; क्योंकि उनके हृदयमें आपके चरणकमल सदैव विराजमान रहते हैं। जो एक बार भी अपना मन आपको समर्पित कर देता है, वह पुनः संसारके बन्धनोंमें नहीं फँसता।

“हे प्रभो! जब जीव अविद्याके वशीभूत होकर शरीरको ही अपना स्वरूप मान लेता है, तब वह जन्म-मृत्युके दुःख भोगता है। किन्तु आप सदा मायासे अतीत और अनन्त ऐश्वर्योंसे सम्पन्न हैं। जो आपके स्वरूपको जान लेता है अथवा प्रेमपूर्वक आपकी लीलाओंका श्रवण-कीर्तन करता है, वह सुख-दुःख, पाप-पुण्य तथा समस्त बन्धनोंसे परे होकर आपकी परम गति प्राप्त कर लेता है।

“हे अनन्त भगवान्! ब्रह्मा, इन्द्र और महान् ऋषि भी आपकी सीमा नहीं पा सके। हम श्रुतियाँ भी अन्ततः आपके अतिरिक्त सबका निषेध करके स्वयं आपमें ही लीन हो जाती हैं। यही हमारा परम फल और परम सिद्धि है।”

भगवान् नारायणने कहा, “हे देवर्षि! इस प्रकार सनकादि ऋषियोंने उस ब्रह्मविद्याका श्रवण करके अपने आत्मस्वरूपका साक्षात्कार किया। यद्यपि वे नित्यसिद्ध थे, तथापि इस उपदेशसे कृतकृत्य होकर उन्होंने सनन्दनजीका सम्मान किया।

“हे नारद! सनकादि कुमार सृष्टिके आदि महापुरुष हैं। उन आकाशचारी महात्माओंने वेद, उपनिषद् और पुराणोंके सारका मन्थन करके इस परम तत्त्वका निरूपण किया है। यह समस्त शास्त्रोंका सार है।

“तुम भी ब्रह्माजीके मानसपुत्र और उन्हीं महात्माओंकी ज्ञान-परम्पराके अधिकारी हो। अतः श्रद्धापूर्वक इस ब्रह्मात्मविद्याको धारण करो और लोकमंगलके लिये पृथ्वीपर विचरण करो। यह दिव्य विद्या समस्त वासनाओंका नाश करके जीवको परम कल्याणकी ओर ले जाती है।”

श्रीशुकदेवजी परीक्षित् को कहते हैं की भगवान् नारायणके उपदेशको देवर्षि नारदजीने श्रद्धापूर्वक ग्रहण किया और उन्हें श्रीकृष्ण तथा समस्त प्राणियोंके कल्याण और मोक्षके लिये अवतार लेनेवाले भगवान् कहकर प्रणाम किया। इसके बाद वे वेदव्यासजीके आश्रम गये और वहाँ भगवान् नारायणसे सुनी हुई सम्पूर्ण ब्रह्मविद्या उन्हें सुनायी।

श्रुतियाँ ब्रह्म का प्रत्यक्ष वर्णन नहीं करतीं, बल्कि तात्पर्य, संकेत और ‘नेति-नेति’ के माध्यम से उसका बोध कराती हैं। वे पहले जगत्, गुणों और नाम-रूप का वर्णन करती हैं, फिर यह दिखाती हैं कि इन सबका आधार, अधिष्ठान और अन्तिम सत्य केवल ब्रह्म ही है। सभी उपाधियों का निषेध हो जाने पर जो एकमात्र, निर्विकार, सच्चिदानन्द स्वरूप सत्य शेष रह जाता है, वही निर्गुण ब्रह्म है।

वैरागी शिव के भक्तों को ऐश्वर्य और लक्ष्मीपति नारायण के भक्तों को वैराग्य क्यों मिलता है?

राजा परीक्षित् ने पूछा की यह एक आश्चर्य की बात है कि स्वयं भगवान् शंकर अत्यन्त त्यागी और वैरागी हैं, फिर भी उनके उपासक प्रायः धन, ऐश्वर्य और भोग प्राप्त करते हैं। दूसरी ओर, भगवान् विष्णु स्वयं लक्ष्मीपति हैं, फिर भी उनके भक्त प्रायः सांसारिक धन-वैभव से सम्पन्न नहीं दिखते। इसलिए मेरे मन में यह सन्देह है कि त्यागमूर्ति शिव की उपासना से भोग और ऐश्वर्य, तथा लक्ष्मीपति विष्णु की उपासना से वैराग्य और त्याग क्यों प्राप्त होता है? यही रहस्य मैं जानना चाहता हूँ।

श्रीशुकदेवजी कहते हैं, "परीक्षित्! शिवजी सदा अपनी शक्तिसे युक्त रहते हैं। वे सत्त्व आदि गुणोंसे युक्त तथा अहंकारके अधिष्ठाता हैं। अहंकारके तीन भेद हैं—वैकारिक, तैजस और तामस। त्रिविध अहंकारसे सोलह विकार हुए-दस इन्द्रियाँ, पाँच महाभूत और एक मन। अतः इन सबके अधिष्ठात-देवताओंमेंसे किसी एककी उपासना करनेपर समस्त ऐश्वर्योंकी प्राप्ति हो जाती है।"

अहंकार= मन, इन्द्रियाँ, पंचमहाभूत आदि → इनके अधिष्ठाता देवता। इन सब देवताओं के अधिष्ठात-देवता= शिव (देवों के देव महादेव)
प्रकृति से अहंकार और अहंकार से मन, इन्द्रियाँ तथा पंचमहाभूतों की उत्पत्ति- यह सांख्य का सृष्टि-विज्ञान है। इन तत्त्वों के अधिष्ठाता भगवान् शिव हैं, जो चतुर्व्यूह के संकर्षण-तत्त्व से सम्बद्ध माने जाते हैं। अतः उनकी उपासना से भौतिक प्रकृति के भीतर स्थित ऐश्वर्य और सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। किन्तु भगवान् श्रीहरि वासुदेव-तत्त्व रूप से प्रकृति और त्रिगुणों से सर्वथा परे हैं; इसलिए उनकी भक्ति साधक को गुणातीत बनाकर परम मुक्ति तक पहुँचाती है।

परन्तु भगवान् श्रीहरि तो प्रकृतिसे परे स्वयं पुरुषोत्तम एवं प्राकत गुणरहित हैं। वे सर्वज्ञ तथा सबके अन्तःकरणोंके साक्षी हैं। जो उनका भजन करता है, वह स्वयं भी गुणातीत हो जाता है।

प्रकृति से क्या-क्या प्रकट होता है?
प्रकृति → महत् → अहंकार → मन, इन्द्रियाँ, पंचमहाभूत → सम्पूर्ण भौतिक जगत

श्रीशुकदेवजी कहते हैं की परीक्षित् यही प्रश्न पहले धर्मराज युधिष्ठिरने भी भगवान् श्रीकृष्णसे पूछा था। तब भगवान् ने उत्तर दिया कि जिसपर मैं विशेष कृपा करता हूँ, उसका धन और सांसारिक आसरे धीरे-धीरे छीन लेता हूँ। जब वह संसारसे निराश और वैराग्ययुक्त हो जाता है, तब वह संतोंका संग ग्रहण करता है और मेरी शरणमें आता है। तब मैं उसे अपना अहैतुक अनुग्रह देकर परम सच्चिदानन्दस्वरूप परब्रह्मकी प्राप्ति कराता हूँ।

इसके विपरीत, अन्य देवता शीघ्र प्रसन्न होकर अपने भक्तोंको धन, ऐश्वर्य और भोग प्रदान कर देते हैं। परन्तु उस ऐश्वर्यको पाकर लोग प्रायः उन्मत्त होकर भगवान् और अपने उपास्य देवताको भी भूल जाते हैं।

इसलिए विष्णु-भक्ति का फल मुख्यतः वैराग्य, भगवत्प्राप्ति और मोक्ष है, जबकि अन्य देवताओंकी उपासना प्रायः सांसारिक ऐश्वर्य और भोग प्रदान करती है।

वृकासुर को महादेव ने वरदान देकर बनाया भस्मासुर

श्रीशुकदेवजी कहते हैं की परीक्षित्! इस विषयमें महात्मालोग एक प्राचीन इतिहास कहा करते हैं। भगवान् शंकर एक बार वृकासुरको वर देकर संकटमें पड़ गये थे। वृकासूर शकुनिका (हिरण्याक्ष का पुत्र) पुत्र था। उसकी बुद्धि बहुत बिगड़ी हई थी। एक दिन कहीं जाते समय उसने देवर्षि नारदको देख लिया और उनसे पूछा कि ‘तीनों देवताओंमें झटपट प्रसन्न होनेवाला कौन है?’ 

देवर्षि नारदने कहा, “तुम भगवान् शंकरकी आराधना करो। इससे तुम्हारा मनोरथ बहुत जल्दी पूरा हो जायगा। वे थोड़े ही गुणोंसे शीघ्र-से-शीघ्र प्रसन्न और थोड़े ही अपराधसे तरन्त क्रोध कर बैठते हैं। रावण और बाणासुरने केवल वंदीजनोंके समान शंकरजीकी कुछ स्तुतियाँ की थीं। इसीसे वे उनपर प्रसन्न हो गये और उन्हें अतुलनीय ऐश्वर्य दे दिया। बादमें रावणके कैलास उठाने और बाणासुरके नगरकी रक्षाका भार लेनेसे वे उनके लिये संकटमें भी पड़ गये थे।”

देवर्षि नारदके कहने पर वृकासुर केदार क्षेत्र गया और भगवान् शंकरको प्रसन्न करनेके लिये कठोर तप करने लगा। वह अपने शरीरका मांस काट-काटकर अग्निमें आहुति देता रहा। छः दिन बीत जानेपर भी जब भगवान् शंकर प्रकट नहीं हुए, तो सातवें दिन उसने अपना सिर काटकर बलिदान देनेका निश्चय कर लिया।

परम दयालु भगवान् शंकर उसके आत्मघातसे पहले ही अग्निकुण्डसे प्रकट हो गये। उन्होंने उसके हाथ पकड़कर उसे रोक लिया और अपने स्पर्शसे उसके शरीरको पहले जैसा पूर्ण बना दिया। फिर करुणापूर्वक कहा, “बस करो वृकासुर! मैं तुमसे प्रसन्न हूँ। मुँहमाँगा वर माँग लो। मैं तो केवल जल चढ़ानेसे ही प्रसन्न हो जाता हूँ, फिर तुम अपने शरीरको व्यर्थ कष्ट क्यों दे रहे हो?”

अत्यन्त पापी वृकासुरने समस्त प्राणियोंको भयभीत करनेवाला यह वर माँगा कि “मैं जिसके सिरपर हाथ रख दूँ, वही मर जाय।”

उसकी यह याचना सुनकर भगवान् रुद्र पहले तो कुछ अनमने-से हो गये, फिर हँसकर कह दिया, “अच्छा, ऐसा ही हो।” ऐसा वर देकर उन्होंने मानो साँपको अमृत पिला दिया। भस्म कर देने का वरदान प्राप्त करने के बाद वृकासुर ‘भस्मासुर’ नाम से कुख्यात हो गया।

वृकासुर को वरदान देकर स्वयं संकट में पड़ गए महादेव

वरदान प्राप्त करनेके बाद वृकासुरके मनमें पार्वतीजीको प्राप्त करनेकी इच्छा जागी। अपने वरदानकी परीक्षा करनेके लिये वह स्वयं भगवान् शंकरके सिरपर हाथ रखने दौड़ा। अपने ही दिये हुए वरदानके कारण भगवान् शंकर संकटमें पड़ गये और भयभीत होकर उससे बचनेके लिये भागने लगे।

वृकासुर उनका पीछा करता रहा। भगवान् शंकर पृथ्वी, स्वर्ग और दिशाओंके अन्ततक गये, परन्तु उससे पीछा न छूटा। जब कोई भी देवता इस संकटका उपाय न कर सका, तब अन्तमें भगवान् शंकर सहायता के लिये परम प्रकाशमय वैकुण्ठलोक पहुँचे।

महादेव का संकट मोचन करने के लिए भगवान् नारायण ने धारण किया ब्रह्मचारी का रूप

भगवान् शंकरको संकटमें देखकर वैकुण्ठवासी भगवान् नारायणने अपनी योगमायासे तेजस्वी ब्रह्मचारीका रूप धारण किया और वृकासुरके पास पहुँचे। उन्होंने मेखला, मृगचर्म, दण्ड, रुद्राक्षमाला और हाथमें कुश धारण कर रखे थे तथा उनके शरीरसे अग्निके समान दिव्य तेज निकल रहा था। वृकासुरके पास पहुँचकर उन्होंने अत्यन्त विनम्रतासे उसे प्रणाम किया।

फिर मधुर वाणीमें बोले, “हे शकुनिपुत्र वृकासुर! आप बहुत थके हुए लगते हैं। पहले थोड़ा विश्राम कीजिये, क्योंकि यह शरीर ही सभी इच्छाओंकी पूर्तिका साधन है, इसे व्यर्थ कष्ट नहीं देना चाहिये। आप क्या करना चाहते हैं? यदि उचित समझें तो मुझे बताइये, क्योंकि कई कार्य योग्य सहायकोंकी सहायता से सरलतापूर्वक सिद्ध हो जाते हैं।”

भगवान् ब्रह्मचारीके मधुर और अमृतमय वचनोंसे प्रभावित होकर वृकासुरने अपनी तपस्या, प्राप्त वरदान और भगवान् शंकरका पीछा करनेका पूरा वृत्तान्त सुना दिया।

तब भगवान् नारायणने चतुराईसे उसके मनमें सन्देह उत्पन्न करते हुए कहा, “मैं शंकरकी बातपर विश्वास नहीं करता। वे तो दक्षके शापसे पिशाचभावको प्राप्त हो चुके हैं। यदि तुम्हें उनके वरदानपर विश्वास है, तो पहले अपने ही सिरपर हाथ रखकर उसकी परीक्षा कर लो। यदि वरदान असत्य निकले, तो उस असत्यवादीको दण्ड देना।”

भगवान्की मोहिनी और मधुर वाणीसे वृकासुरकी विवेक-बुद्धि नष्ट हो गयी और उसने भूलवश अपने ही सिरपर हाथ रख लिया। जैसे ही वृकासुरने अपने सिरपर हाथ रखा, उसका सिर फट गया और वह बिजली से आहत वृक्षकी भाँति धरतीपर गिरकर मर गया। इस प्रकार भगवान् शंकर उस भयंकर संकटसे मुक्त हो गये।

तब भगवान् नारायणने शंकरजीसे कहा कि यह दुष्ट अपने ही पापोंके कारण नष्ट हुआ, क्योंकि महापुरुषोंका, विशेषकर जगद्गुरु भगवान् शंकरका अपराध करके कोई भी प्राणी सुखपूर्वक नहीं रह सकता।

सारांश: JKYog India Online Class- श्रीमद् भागवत कथा [हिन्दी]- 22.06.2026