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123- भृगुजी द्वारा त्रिदेवों की परीक्षा, श्रीकृष्ण और अर्जुन की ब्रह्माण्ड के पार अद्भुत यात्रा तथा सर्वव्यापक परम पुरुषोत्तम भगवान् के दिव्य दर्शन

Jun 28th, 2026 | 11 Min Read
Blog Thumnail

Category: Bhagavat Purana

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Language: Hindi

श्रीमद्भागवत महापुराण- स्कन्ध: 10 अध्याय: 89-90

श्रीशुकदेवजीने परीक्षित् से कहा की एक बार सरस्वतीके पावन तटपर यज्ञके लिये एकत्रित ऋषि-मुनियोंमें यह विचार उठा कि ब्रह्मा, शिव और विष्णुमें सर्वश्रेष्ठ कौन हैं। इसका निर्णय करनेके लिये उन्होंने ब्रह्माजीके पुत्र महर्षि भृगुको तीनोंकी परीक्षा लेने भेजा।

महर्षि भृगु पहले ब्रह्माजीके पास गये। उन्होंने न प्रणाम किया, न स्तुति। इससे ब्रह्माजीको क्रोध तो आया, परन्तु पुत्र जानकर उन्होंने विवेकपूर्वक उसे रोक लिया। 

वहाँसे वे कैलास पहुँचे। भगवान् शंकर उन्हें देखकर प्रेमपूर्वक आलिंगन करने उठे, किन्तु भृगुजीने उन्हें अस्वीकार कर दिया और वेदमर्यादाके उल्लंघनका दोष लगाया। यह सुनकर भगवान् शंकर अत्यन्त क्रोधित हुए और त्रिशूल उठा लिया। उसी समय भगवती सतीने उन्हें शान्त कर दिया। 

इसके बाद महर्षि भृगु भगवान् विष्णुके धाम वैकुण्ठ पहुँचे। उस समय भगवान् विष्णु लक्ष्मीजीकी गोदमें शयन कर रहे थे। महर्षि भृगुने उनके वक्षःस्थलपर पैर मारा। भक्तवत्सल भगवान् तुरन्त उठ खड़े हुए, मुनिको प्रणाम किया और विनयपूर्वक बोले, “ब्रह्मन्! आपका स्वागत है। आपके आगमनका मुझे पता न था, इसलिये आपकी सेवा न कर सका। कृपाकर मेरा अपराध क्षमा कीजिये।”

ऐसा कहकर भगवान् उनके चरण सहलाने लगे और बोले, “महर्षे! आपके कोमल चरणोंको मेरे कठोर वक्षसे कष्ट पहुँचा होगा। आपके चरणोदकसे तीर्थ भी पवित्र होते हैं। आज आपके चरणचिह्नोंसे मेरा वक्ष पवित्र हो गया है; इसी कारण अब लक्ष्मीजी यहाँ सदा निवास करेंगी।”

भगवान्की ऐसी गम्भीर, विनयपूर्ण वाणी सुनकर महर्षि भृगुका हृदय भक्तिभावसे भर गया। उनका कण्ठ अवरुद्ध हो गया, नेत्रोंसे प्रेमाश्रु बहने लगे और वे कुछ भी न कह सके। वहाँसे लौटकर ब्रह्मवादी मुनियोंके सत्संगमें आये और उन्हें ब्रह्मा, शिव और विष्णु भगवान्के यहाँ जो कुछ अनुभव हुआ था, वह सब कह सुनाया ।

महर्षि भृगुका अनुभव सुनकर सभी ऋषियोंका सन्देह दूर हो गया। उन्होंने भगवान् विष्णुको ही शान्ति, अभय, धर्म, ज्ञान, वैराग्य और समस्त ऐश्वर्यका परम आश्रय स्वीकार किया। श्रीशुकदेवजी परीक्षित् से कहते हैं कि सरस्वती-तटके ऋषियोंने यह परीक्षा अपने लिये नहीं, अपितु लोकका संशय दूर करनेके लिये की थी।

द्वारका के ब्राह्मण के पुत्रों की रहस्यमयी मृत्यु और अर्जुन की प्रतिज्ञा

इसके पश्चात शुकदेवजी परिक्षित को भगवान् श्रीकृष्ण की दूसरी लीला सुनाने लगते हैं। 
एक बार द्वारका में एक ब्राह्मण के यहाँ पुत्र पैदा हुआ, लेकिन जन्म लेते ही उसकी मृत्यु हो गई। दुःख से व्याकुल ब्राह्मण अपने पुत्र का शरीर लेकर राजमहल के द्वार पर पहुँचा और उसे वहाँ रखकर विलाप करने लगा।

वह कहने लगा, “यह सब उस राजा के दोष का परिणाम है, जो धर्म का पालन नहीं करता और विषय-भोगों में डूबा हुआ है। जिस राज्य का राजा अधर्मी होता है, वहाँ की प्रजा को हमेशा दुःख उठाना पड़ता है।”

इसके बाद उसके दूसरे और तीसरे पुत्र भी जन्म लेते ही मर गए। हर बार वह उनके शरीर को राजमहल के द्वार पर लाता, वहाँ रखता और यही कहकर विलाप करता रहता।
नवें पुत्रके जन्म लेते ही मर जानेपर जब वह ब्राह्मण राजद्वारपर विलाप कर रहा था, उस समय भगवान् श्रीकृष्णके साथ अर्जुन भी उपस्थित थे। 

ब्राह्मणकी व्यथा सुनकर अर्जुन बोले, “ब्रह्मन्! क्या द्वारकामें कोई सच्चा क्षत्रिय नहीं है? जहाँ ब्राह्मणको ऐसी पीड़ा सहनी पड़े, वहाँका क्षत्रिय अपने धर्मसे विमुख है। मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि आपके अगले पुत्रकी रक्षा करूँगा। यदि ऐसा न कर सका तो अग्निमें प्रवेश कर अपने प्राण त्याग दूँगा।”

ब्राह्मणने कहा, “जब बलराम, श्रीकृष्ण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध भी मेरे पुत्रोंकी रक्षा नहीं कर सके, तब तुम कैसे सफल होगे? मुझे तुम्हारी प्रतिज्ञापर विश्वास नहीं है।”

अर्जुनने उत्तर दिया, “ब्रह्मन्! मैं गाण्डीवधारी अर्जुन हूँ। अपने पराक्रमसे भगवान् शंकरको भी प्रसन्न कर चुका हूँ। आप मेरे बलका तिरस्कार न करें। मैं मृत्युसे भी आपके पुत्रको वापस ले आऊँगा।”

अर्जुनके दृढ़ आश्वासनसे सन्तुष्ट होकर वह ब्राह्मण प्रसन्नतापूर्वक अपने घर लौट गया। प्रसवकासमय निकट आनेपर ब्राह्मण आतुर होकर अर्जुनके पास आया और कहने लगा, “इस बार तुम मेरे बच्चेको मृत्युसे बचा लो।”

यह सुनकर अर्जुन ने शुद्ध जल से आचमन किया, शिव जी को प्रणाम किया, दिव्य अस्त्रों का स्मरण किया और अपने गाण्डीव धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाकर उसे हाथ में ले लिया। फिर अर्जुन ने अपने बाणों को विभिन्न दिव्य अस्त्र-मन्त्रों से अभिमन्त्रित किया और पूरे प्रसवगृह को चारों ओर से बाणों से घेर दिया। ऊपर, नीचे और चारों दिशाओं में उन्होंने बाणों का ऐसा घेरा बना दिया कि कोई भीतर आ या बाहर जा न सके।

कुछ समय बाद ब्राह्मणी ने एक पुत्र को जन्म दिया। वह बालक जन्म लेते ही रोने लगा, लेकिन देखते ही देखते वह अपने शरीर सहित आकाश में अदृश्य हो गया।

तब वह ब्राह्मण भगवान श्रीकृष्ण के सामने ही अर्जुन की निन्दा करने लगा। वह बोला, “मेरी मूर्खता देखो! मैंने इस नपुंसक की बड़ी-बड़ी बातों पर विश्वास कर लिया। जिस बालक की रक्षा प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, यहाँ तक कि बलराम और स्वयं भगवान श्रीकृष्ण भी नहीं कर सके, उसकी रक्षा और कौन कर सकता है?

“ऐसे झूठी डींगें मारने वाले अर्जुन को धिक्कार है! उसके गाण्डीव धनुष को भी धिक्कार है! इसकी बुद्धि तो देखो! यह मूर्खता में उस बालक को वापस लाने की बात करता है, जिसे प्रारब्ध हमसे छीन चुका है।”

ब्राह्मण के पुत्रों को वापस लाने के लिए अर्जुन का लोक-लोकान्तर में भ्रमण और पराजय

जब वह ब्राह्मण इस प्रकार अर्जुन को बार-बार बुरा-भला कहने लगा, तब अर्जुन अपने योगबल से तुरंत संयमनीपुरी पहुँच गए, जहाँ यमराज निवास करते हैं। लेकिन वहाँ भी उन्हें ब्राह्मण का पुत्र नहीं मिला। इसके बाद वे अपने दिव्य अस्त्रों के साथ क्रमशः इन्द्र, अग्नि, निर्ऋति, सोम, वायु और वरुण आदि देवताओं के लोकों में गए। फिर वे अतल आदि नीचे के लोकों में, स्वर्ग से ऊपर स्थित महर्लोक आदि ऊँचे लोकों में और अनेक अन्य स्थानों पर भी खोजते रहे। लेकिन कहीं भी उन्हें ब्राह्मण का पुत्र नहीं मिला। जब उनकी प्रतिज्ञा पूरी न हो सकी, तब उन्होंने अग्नि में प्रवेश करके अपने प्राण त्यागने का निश्चय कर लिया।

लेकिन भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को ऐसा करने से रोकते हुए कहा, “भाई अर्जुन! अपने आप को दोष मत दो। मैं तुम्हें अभी उस ब्राह्मण के सभी पुत्र दिखा देता हूँ। आज जो लोग तुम्हारी निन्दा कर रहे हैं, वही आगे चलकर हमारी निर्मल कीर्ति का गुणगान करेंगे।”

श्रीकृष्ण के साथ अर्जुन की ब्रह्माण्ड के पार दिव्य यात्रा

इसके बाद सर्वशक्तिमान भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाकर अपने दिव्य रथ पर उनके साथ बैठ गए और पश्चिम दिशा की ओर चल पड़े। वे सात-सात पर्वतों वाले सातों द्वीपों, सातों समुद्रों और लोकालोक पर्वत को पार करते हुए घोर अन्धकार वाले क्षेत्र में पहुँचे।
वह अन्धकार इतना गहरा था कि रथ के चारों घोड़े (शैब्य, सुग्रीव, मेघपुष्प और बलाहक) रास्ता भूल गए। उन्हें कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था और वे इधर-उधर भटकने लगे।

जब योगेश्वरों के भी स्वामी भगवान श्रीकृष्ण ने घोड़ों की यह स्थिति देखी, तब उन्होंने अपने सुदर्शन चक्र को आगे चलने की आज्ञा दी। उसका तेज हजारों सूर्यों के समान चमक रहा था।
सुदर्शन चक्र अपने दिव्य प्रकाश से उस घने अन्धकार को चीरता हुआ मन की गति के समान तेज़ी से आगे बढ़ने लगा। उस समय वह ऐसा दिखाई दे रहा था, जैसे भगवान राम का बाण धनुष से छूटकर राक्षसों की सेना में प्रवेश कर रहा हो।

इस प्रकार सुदर्शन चक्र के दिखाए हुए मार्ग पर चलते-चलते रथ उस घोर अन्धकार की अंतिम सीमा तक पहुँच गया। उस अन्धकार के पार एक अनन्त, असीम और सर्वश्रेष्ठ दिव्य प्रकाश फैला हुआ था। उस परम ज्योति को देखकर अर्जुन की आँखें चौंधिया गईं और उन्होंने विवश होकर अपनी आँखें बंद कर लीं।

श्रीकृष्ण और अर्जुन को सर्वव्यापक परम पुरुषोत्तम भगवान् का दिव्य साक्षात्कार

इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण का रथ एक दिव्य जलराशि में प्रवेश कर गया। वहाँ तेज़ आँधी चल रही थी, जिससे जल में विशाल और सुन्दर तरंगें उठ रही थीं। उस दिव्य जल के बीच एक अत्यन्त सुन्दर महल था, जिसके हजारों मणिमय स्तम्भ चारों ओर प्रकाश फैला रहे थे।

उसी महल में शेष भगवान विराजमान थे। उनका स्वरूप अद्भुत और अत्यन्त विशाल था। उनके एक हजार फण थे और प्रत्येक फण पर चमकती हुई दिव्य मणियाँ सुशोभित थीं। हर फण में दो-दो नेत्र थे। उनका सम्पूर्ण शरीर कैलास पर्वत की तरह उज्ज्वल श्वेत था, जबकि उनका गला और जीभ नीले रंग की थी।

अर्जुन ने देखा कि शेषभगवान की सुखमयी शय्या पर स्वयं परम पुरुषोत्तम भगवान विराजमान हैं। उनका शरीर वर्षा ऋतु के मेघ के समान श्याम था। उन्होंने अत्यन्त सुन्दर पीताम्बर धारण किया हुआ था। उनके मुख पर मधुर मुस्कान थी और उनके बड़े-बड़े नेत्र अत्यन्त मनोहर लग रहे थे।

उनके सिर पर बहुमूल्य रत्नों से जड़ा मुकुट था। चमकते हुए कुण्डलों की आभा उनकी घुँघराली अलकों पर पड़ रही थी। उनकी आठ लम्बी और सुन्दर भुजाएँ थीं। उनके गले में कौस्तुभ मणि, वक्षःस्थल पर श्रीवत्स का चिन्ह और घुटनों तक पहुँचने वाली वनमाला सुशोभित थी।

अर्जुन ने देखा कि नन्द, सुनन्द आदि पार्षद, सुदर्शन चक्र आदि भगवान के साकार दिव्य आयुध, तथा पुष्टि, श्री, कीर्ति और अजा नाम की चारों दिव्य शक्तियाँ, और अन्य सभी दिव्य विभूतियाँ उस परम भगवान की सेवा में लगी हुई थीं। वे भगवान ब्रह्मा आदि सभी लोकपालों के भी स्वामी हैं।

हे परीक्षित! भगवान श्रीकृष्ण ने अपने ही स्वरूप अनन्त भगवान को प्रणाम किया। अर्जुन उनके दिव्य स्वरूप को देखकर कुछ विस्मित और भयमिश्रित श्रद्धा से भर गए। श्रीकृष्ण के बाद उन्होंने भी उन्हें प्रणाम किया और दोनों हाथ जोड़कर विनम्र भाव से खड़े हो गए।

तब ब्रह्मादि लोकपालोंके अधीश्वर परम पुरुषने मधुर वाणीमें कहा, “हे श्रीकृष्ण! हे अर्जुन! मैंने तुम दोनोंके दर्शनकी इच्छासे ही ब्राह्मणके बालकोंको यहाँ लाया था। तुम दोनों नर और नारायणरूपसे धर्मकी स्थापना तथा पृथ्वीके भारहरणके लिये अवतीर्ण हुए हो। अपना कार्य पूर्ण करके पुनः मेरे धामको लौट आओ और लोकसंग्रहके लिये धर्मका आचरण करते रहो।”

भगवान्की आज्ञा स्वीकार करके श्रीकृष्ण और अर्जुन ब्राह्मणके समस्त पुत्रोंको साथ लेकर द्वारका लौट आये और उन्हें उनके पिताको सौंप दिया। उस परमधामके दर्शनसे अर्जुन विस्मित हो गये। उन्होंने अनुभव किया कि जीवका समस्त बल और पराक्रम भगवान् श्रीकृष्णकी कृपासे ही प्राप्त होता है।

भगवान् श्रीकृष्ण के रानियों के साथ लीला-विहार का वर्णन

श्रीशुकदेवजीने कहा की द्वारकापुरी परम ऐश्वर्य, सौन्दर्य और समृद्धिसे सम्पन्न थी। उसकी सड़कोंपर हाथी, घोड़े, रथ और वीर यदुवंशियोंका सतत आवागमन रहता था। चारों ओर हरे-भरे उपवन, पुष्पोंसे लदे वृक्ष और पक्षियोंका मधुर कलरव उसकी शोभा बढ़ाते थे।

भगवान् श्रीकृष्ण अपनी सोलह हजारसे अधिक रानियोंके एकमात्र प्रियतम थे। प्रत्येक रानीके लिये अलग दिव्य महल था और भगवान् अपनी योगमायासे अनेक रूप धारण करके सबके साथ एक साथ निवास करते थे।

उन महलोंके रमणीय सरोवरोंमें भगवान् अपनी रानियोंके साथ जलविहार करते। उस समय गन्धर्व उनका यशगान करते और सूत, मागध तथा वन्दीजन विविध वाद्योंके साथ उत्सव मनाते। विहारके पश्चात् भगवान् और उनकी रानियाँ अपने वस्त्राभूषण गायकों और कलाकारोंको दान कर देते।

भगवान् श्रीकृष्णके मधुर व्यवहार, प्रेमपूर्ण हास-विलास और स्नेहमयी लीलाओंसे उनकी रानियोंका चित्त सदा उन्हींमें अनुरक्त रहता था। उन्हें भगवान्के अतिरिक्त किसी अन्य वस्तुका स्मरण नहीं रहता था।

भगवान् श्रीकृष्ण ही रानियोंके जीवन और प्राणोंके एकमात्र आश्रय थे। उनके चिन्तनमें वे इतनी तन्मय रहतीं कि कभी मौन हो जातीं, तो कभी प्रेमोन्मादमें पक्षियों, पर्वतों, नदियों, मेघों, चन्द्रमा, पवन और समुद्रसे बातें करने लगतीं। भगवान् उनके सम्मुख रहते हुए भी उन्हें विरहका अनुभव होता और वे प्रेमविह्वल होकर कहतीं-

“अरी कुररी! क्या तू भी हमारी ही भाँति कमलनयन श्यामसुन्दरके विरहमें रातभर जागती रहती है?

“अरी चकवी! क्या तू भी अपने प्रियसे बिछुड़कर हमारी ही तरह व्याकुल है?

“हे समुद्र! क्या घनश्यामने तुम्हारा धैर्य भी हर लिया है, जो तुम हमारी भाँति निरन्तर व्याकुल हो?

“हे चन्द्र! क्या प्रियतमकी स्मृतिने तुम्हें भी क्षीण और मौन बना दिया है?

“हे मलयानिल! हमारे हृदयको और क्यों व्यथित करता है? वह तो पहले ही श्यामसुन्दरकी चितवनसे घायल है।

“हे मेघ! तुम्हारा श्यामवर्ण देखकर ऐसा लगता है मानो तुम भी हमारे प्रियतमके विरहमें अश्रु बहा रहे हो।

“हे कोयल! अपने मधुर स्वरसे हमारे प्रियतमकी कोई बात सुनाओ।

“हे पर्वत! क्या तुम भी भगवान्के चरणकमलोंको अपने शिखरोंपर धारण करनेकी अभिलाषासे मौन खड़े हो?

“हे नदियो! क्या तुम भी अपने प्रिय समुद्रसे वियुक्त होकर हमारी ही भाँति क्षीण हो गयी हो? और हे हंस! यदि तुम हमारे प्रियतमके दूत हो तो बताओ, क्या उन्हें अपनी दासियोंका स्मरण है? यदि वे आना चाहें तो अकेले ही आयें; हमें केवल उनके दर्शन और सन्देशकी अभिलाषा है।”

भगवान् श्रीकृष्णकी रानियाँ योगेश्वरेश्वर भगवान्में ऐसा अनन्य प्रेम रखती थीं कि उसीके प्रभावसे उन्होंने परम पद प्राप्त किया। भगवान्की लीलाएँ इतनी मधुर और मनोहर हैं कि उनका श्रवणमात्र ही जीवके चित्तको उनकी ओर आकर्षित कर लेता है। फिर जिन भाग्यवती रानियोंको स्वयं उनकी सेवा, सान्निध्य और चरणसेवाका सौभाग्य प्राप्त हुआ, उनके प्रेम और तपस्याका वर्णन कैसे किया जा सकता है?

श्रीकृष्ण के पुत्र और पौत्रों का वर्णन

शुकदेवजी कहते हैं कि भगवान् श्रीकृष्णकी कुल सोलह हजार एक सौ आठ रानियाँ थीं। उनमें रुक्मिणी आदि आठ पटरानियों तथा उनके पुत्रोंका वर्णन मैं पहले ही कर चुका हूँ। अन्य प्रत्येक रानीसे भी भगवान्ने दस-दस पराक्रमी पुत्र उत्पन्न किये। उनके अनेक पुत्रोंमें अठारह महारथी ऐसे थे, जिनका यश सम्पूर्ण पृथ्वीपर विख्यात था। अब उनके नाम सुनो।

प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, दीप्तिमान्, भानु, साम्ब, मधु, बृहद्भानु, चित्रभानु, वृक, अरुण, पुष्कर, वेदबाहु, श्रुतदेव, सुनन्दन, चित्रबाहु, विरूप, कवि और न्यग्रोध।

श्रीकृष्णकी सोलह हजार एक सौ आठ रानियोंमें प्रद्युम्न सर्वश्रेष्ठ थे। जिनसे अनिरुद्धका जन्म हुआ। अनिरुद्धके पुत्र वज्र हुए, जो यदुवंशके विनाशके पश्चात् जीवित रहे। वज्रसे प्रतिबाहु, प्रतिबाहुसे सुबाहु, सुबाहुसे शान्तसेन और शान्तसेनसे शतसेनका जन्म हुआ।

यदुवंशमें कोई भी पुरुष अल्पायु, निर्बल, निर्धन अथवा सन्तानहीन नहीं था। वे सभी पराक्रमी, यशस्वी और ब्राह्मणभक्त थे। उनकी संख्या और महिमाका वर्णन करना भी कठिन है। अकेले महाराज उग्रसेनके साथ ही एक नील (१०००००००००००००) के लगभग सैनिक रहते।

देवासुर-संग्राममें मारे गये असुरोंके पृथ्वीपर उत्पन्न होकर अत्याचार करनेपर भगवान्की आज्ञासे देवताओंने यदुवंशमें अवतार लेकर उनके विनाशमें भगवान् श्रीकृष्णकी सहायता की। यदुवंशियोंका चित्त सदा भगवान् श्रीकृष्णमें ही लीन रहता था। वे प्रत्येक कार्य करते हुए भी निरन्तर उनका ही चिन्तन करते थे। 

भगवान् श्रीकृष्णने धर्मकी रक्षाके लिये दिव्य अवतार ग्रहण किया, अधर्मका विनाश किया और अपनी लीलाओंसे समस्त जगत्का कल्याण किया। उनकी प्रत्येक लीला कर्मबन्धनोंका नाश करनेवाली है। अतः जो उनके चरणकमलोंकी सेवा और परमधामकी प्राप्ति चाहता है, उसे श्रद्धापूर्वक उनकी लीलाओंका श्रवण, कीर्तन और चिन्तन करना चाहिये। यही भक्ति जीवको कालसे परे भगवान्के नित्य धामतक पहुँचा देती है।

सारांश: JKYog India Online Class- श्रीमद् भागवत कथा [हिन्दी]- 26.06.2026