श्रीमद्भागवत महापुराण- स्कन्ध: 11 अध्याय: 6 & 7
श्रीशुकदेवजीने परीक्षितसे कहा की देवर्षि नारदके प्रस्थानके पश्चात् ब्रह्माजी, भगवान् शंकर, देवराज इन्द्र तथा अनेक देवता, ऋषि, सिद्ध, गन्धर्व, नाग, पितर और अन्य दिव्य लोकवासी भगवान् श्रीकृष्णके दर्शनके लिये द्वारका आये। उन्होंने दिव्य पुष्पोंकी वर्षा की और भगवान्की स्तुति किया।
पश्चात ब्रह्माजीने कहा, "हे सर्वात्मन्! हमारी प्रार्थनापर आपने अवतार लेकर पृथ्वीका भार उतार दिया, धर्मकी पुनः स्थापना की और अपनी दिव्य लीलाओंसे समस्त दिशाओंमें ऐसी कीर्ति फैलाई। कलियुगमें जो मनुष्य इन लीलाओंका श्रद्धापूर्वक श्रवण और कीर्तन करेंगे, वे सहज ही अज्ञानरूपी अन्धकारसे पार हो जायेंगे।
हे पुरुषोत्तम! आपके अवतारको एक सौ पचीस वर्ष पूर्ण हो चुके हैं। हमारा उद्देश्य सिद्ध हो चुका है और ब्राह्मणोंके शापसे यदुवंशके अन्तका समय भी आ पहुँचा है। अतः यदि आपकी इच्छा हो तो अब अपने परमधाम पधारकर अपने सेवक लोकपालों तथा समस्त लोकोंका पालन कीजिये।"
भगवान् श्रीकृष्णने ब्रह्माजी को कहा, "जैसा आप कहते हैं, वैसा निश्चय मैं पहले ही कर चुका हूँ। मैंने पृथ्वीका भार उतारकर आप सबका कार्य पूर्ण कर दिया है। किन्तु अभी एक कार्य शेष है। यदुवंशी अपने बल, पराक्रम और ऐश्वर्यके मदमें उन्मत्त हो गये हैं। जैसे समुद्र तटसे बँधा रहता है, वैसे ही अबतक मैंने उन्हें मर्यादामें रखा है। यदि उनके विनाशसे पूर्व मैं प्रस्थान करूँ, तो वे समस्त लोकोंमें उपद्रव मचा देंगे। ब्राह्मणोंके शापसे उनके विनाशका समय आ पहुँचा है। यदुवंशका अन्त होनेपर मैं भी अपने परमधामको प्रस्थान करूँगा।"
जब श्रीकृष्णने इस प्रकार कहा, तब ब्रह्माजीने उन्हें प्रणाम किया और देवताओंके साथ वे अपने धामको चले गये। ब्रह्माजीके प्रस्थानके बाद द्वारकामें अनेक अपशकुन और उत्पात प्रकट होने लगे। उन्हें देखकर यदुवंशके गुरुजन भगवान् श्रीकृष्णके पास आये।
भगवान् श्रीकृष्णने कहा की द्वारकामें दिखाई देनेवाले ये अपशकुन बताते हैं कि ब्राह्मणोंका शाप अब फलित होनेका समय आ गया है। अतः अब हमें विलम्ब नहीं करना चाहिये। आज ही परम पवित्र प्रभासक्षेत्रके लिये प्रस्थान करें।
प्रभासक्षेत्र महापुण्यमय है। वहीं चन्द्रदेवने स्नान करके दक्षके शापसे उत्पन्न राजयक्ष्मासे (टीबी या क्षय रोग)मुक्ति पायी थी। हम भी वहाँ स्नान करेंगे, देवताओं और पितरोंका तर्पण करेंगे, ब्राह्मणोंको श्रद्धापूर्वक भोजन कराकर दान-दक्षिणा देंगे। इस प्रकार उनके आशीर्वादसे हम अपने संकटोंसे पार हो सकेंगे। भगवान्की आज्ञा सुनकर सभी यदुवंशियोंने एकमत होकर प्रभासक्षेत्र जानेका निश्चय किया और प्रस्थानकी तैयारी करने लगे।
भगवान् श्रीकृष्णके वियोगकी आशंकासे व्याकुल होकर उद्धवजीका उनके पास जाना
उद्धवजी ने जब यदुवंशियोंको प्रभासक्षेत्र जानेकी तैयारी करते और द्वारकामें प्रकट अपशकुनोंको देखा, तब वे एकान्तमें भगवान्के पास गये। उनके चरणोंमें प्रणाम करके हाथ जोड़कर बोले, "हे योगेश्वर! आप सर्वशक्तिमान् हैं। यदि चाहते तो ब्राह्मणोंके शापको भी टाल सकते थे। इससे मैं समझ गया हूँ कि अब आप यदुवंशकी लीला समाप्त करके इस पृथ्वीसे प्रस्थान करनेवाले हैं।
"प्रभो! मैं आधे क्षणके लिये भी आपके चरणोंसे वियोगकी कल्पना नहीं कर सकता। आप मेरे जीवन, मेरे स्वामी और मेरे आत्मा हैं। कृपा करके मुझे भी अपने परमधाममें साथ ले चलिये।
"हे कृष्ण! आपकी लीलाओंका एक बार रसास्वादन करनेके बाद संसारकी कोई वस्तु आकर्षक नहीं रह जाती। हमने आपके साथ रहकर जीवनके प्रत्येक क्षणको धन्य बनाया है। ऐसी स्थितिमें आपके प्रेमी भक्त आपके वियोगको कैसे सह सकते हैं?
“हम आपके प्रसादसे ही जीवनयापन करनेवाले सेवक हैं। हमें आपकी मायाका भय नहीं, केवल आपके वियोगकी चिन्ता है। यद्यपि आपकी माया दुस्तर है, तथापि हम आपके भक्तोंके संग आपके नाम, गुण और लीलाओंका निरन्तर श्रवण, कीर्तन और स्मरण करते हुए उसे सहज ही पार कर लेंगे। अतः प्रभो! हमें अपनेसे पृथक् न कीजिये।”
श्रीकृष्णद्वारा उद्धवजीको मोहत्याग, आत्मज्ञान और समदृष्टिका उपदेश
श्रीशुकदेवजी कहते हैं कि अपने अनन्य प्रेमी सखा और सेवक उद्धवकी यह करुण प्रार्थना सुनकर भगवान् श्रीकृष्ण उनसे बोले, "प्रिय उद्धव! देवताओंका कार्य पूर्ण हो चुका है। ब्रह्माजीकी प्रार्थनापर मैं बलरामजीके साथ पृथ्वीका भार उतारनेके लिये अवतीर्ण हुआ था और अब वह कार्य सम्पन्न हो गया है। ब्राह्मणोंके शापके कारण यदुवंश शीघ्र ही पारस्परिक संघर्षसे नष्ट हो जायेगा। आज से सातवें दिन समुद्र द्वारकाको भी अपने भीतर समा लेगा। मेरे पृथ्वीसे प्रस्थान करते ही कलियुगका प्रभाव बढ़ने लगेगा। अतः मेरे जानेके बाद तुम यहाँ मत रहना।
"उद्धव! अब स्वजनोंके मोहका त्याग करके अपना मन अनन्य भावसे मुझमें लगा लो और समदृष्टिसे पृथ्वीपर विचरण करो। यह सम्पूर्ण दृश्य जगत् मनकी कल्पनासे प्रकट होनेवाला, नश्वर और मायामय है। गुण-दोष, कर्ता-कर्म और कर्मफलके समस्त भेद भी इसी अज्ञानसे उत्पन्न होते हैं। इसलिये पहले इन्द्रियों और मनको वशमें करो। फिर यह अनुभव करो कि सम्पूर्ण जगत् अपने आत्मामें स्थित है और आत्मा मुझ सर्वव्यापक ब्रह्मसे अभिन्न है।
“जब ज्ञान और अनुभूतिके द्वारा तुम वेदोंके तात्पर्यको प्रत्यक्ष जान लोगे, तब आत्मानन्दमें स्थित होकर सब प्राणियोंमें अपना ही स्वरूप देखोगे। उस अवस्थामें न कोई विघ्न तुम्हें विचलित कर सकेगा, न जन्म-मृत्युका बन्धन शेष रहेगा। गुण-दोषसे परे स्थित ज्ञानी समस्त जगत्को मेरा ही स्वरूप देखता है और परम शान्तिको प्राप्त होता है।"
उद्धवजी का आध्यात्मिक रूपान्तरण: शुष्क ब्रह्म-ज्ञानी (आँखें मूंदकर समाधि में खोने वाले) → सगुण प्रेमी भक्त (ब्रज से आकर सगुण कृष्ण का प्रेमी भक्त) → परम रसिक गोपी-भाव (विरह में आँखें खोलकर हर कण में प्रियतम को देखने वाले )
विवेकद्वारा आत्मोद्धार और मनुष्यजीवनका महत्त्व
भगवान्का यह उपदेश सुनकर उद्धवजीने कहा की आपने मेरे परम कल्याणके लिये संन्यास और त्यागका उपदेश दिया है। किन्तु जो मनुष्य विषयोंमें आसक्त है और देह तथा संसारको ही अपना सर्वस्व मानता है, उसके लिये विषयवासना और ममताका त्याग अत्यन्त कठिन है। जो आपसे विमुख हैं, उनके लिये तो यह और भी दुष्कर है।
प्रभो! मैं भी आपकी मायासे मोहित होकर देह और संसारमें आसक्त हूँ। कृपा करके मुझे ऐसा ज्ञान और साधन प्रदान कीजिये, जिससे मैं आपकी शरण प्राप्त कर सकूँ। आपके अतिरिक्त मुझे आत्मतत्त्वका उपदेश देनेवाला कोई नहीं है।
भगवान् श्रीकृष्णने कहा की हे उद्धव! इस संसार में जो मनुष्य संसार के तत्त्वों को गहराई से जानने में चतुर हैं, वे प्रायः अपने मन को संसार के अशुभ विचारों (वासनाओं और दोषों) से खुद ही अपने विवेक द्वारा निकाल लेते हैं। विशेषकर मनुष्यका आत्मा ही उसका गुरु है; क्योंकि वह प्रत्यक्ष अनुभव और विचारके द्वारा अपने हित और अहितका निर्णय कर सकता है।
और जब वही बुद्धिमान पुरुष सांख्य और योग (ज्ञान और भक्ति) में निपुण हो जाते हैं, तब वे इस मनुष्य शरीर के भीतर ही मुझ (परमात्मा) को मेरी समस्त अनंत शक्तियों के सहित साक्षात् प्रकट रूप में देख लेते हैं।
अपनी बुद्धि से यह सोचना कि "संसार दुःखरूप है, यहाँ कोई मेरा नहीं है"। ह मनुष्य को खुद अपने मन को समझानी पड़ती है। संसार से मन को हटाने के लिए अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करो क्योंकि तुम्हारे मन को तुम्हारे अलावा कोई और वश में नहीं कर सकता।
भगवान कहते हैं कि मैंने एक पैरवाले, दो पैरवाले, तीन पैरवाले, चार पैरवाले, चारसे अधिक पैरवाले और बिना पैरके-इत्यादि अनेक प्रकारके शरीरोंका निर्माण किया है। उनमें मुझे सबसे अधिक प्रिय मनुष्यका ही शरीर है । इस मनुष्य शरीर में लोग सावधान होकर, इंद्रियों द्वारा ग्रहण किए जाने वाले गुणों और लक्षणों के माध्यम से, अनुमान के द्वारा, मुझ अगोचर (इंद्रियों की पकड़ से बाहर) परमेश्वर का साक्षात् और निश्चित रूप से अन्वेषण करते हैं (यानी मुझे खोज लेते हैं)।
भावार्थ: हम अपनी आँखों से देखते हैं कि सूर्य समय पर उगता है, पृथ्वी पूरी व्यवस्था से घूम रही है, हर जीव की रचना में एक अद्भुत बुद्धिमत्ता छिपी है। इस सुव्यवस्थित संसार (Effect) को देखकर हमारी बुद्धि यह 'अनुमान' लगाती है कि इसका कोई न कोई परम बुद्धिमान रचयिता (Cause) अवश्य है। इसी cause and effect के माध्यम से मनुष्य प्रमेश्वर का खोज करता है। यात्रा 'अनुमान' से शुरू होती है, लेकिन खत्म 'साक्षात् अनुभव' पर होती है।
दत्तात्रेयके चौबीस गुरु
भगवान् श्रीकृष्णने उद्धव से इस विषयमें एक प्राचीन इतिहास के बारे में बताया। एक बार धर्मज्ञ महाराज यदुने निर्भय भावसे विचरण करते हुए परम तेजस्वी अवधूत दत्तात्रेयजीको देखा और उनसे पूछा, "ब्रह्मन्! आप सांसारिक कर्मोंमें प्रवृत्त नहीं होते, फिर भी आपकी बुद्धि अत्यन्त निर्मल और गम्भीर है। आप परम ज्ञानी होकर भी बालकके समान निष्कपट और निस्पृह भावसे विचरण करते हैं। संसारमें लोग आयु, यश, धन, भोग या मोक्षकी इच्छासे कर्म करते हैं, परन्तु आप समर्थ, विद्वान् और गुणसम्पन्न होकर भी किसी वस्तुकी इच्छा नहीं रखते। आपकी वाणी अमृतमयी है, फिर भी आप जड़ अथवा उन्मत्तके समान निर्लिप्त रहते हैं। जहाँ संसारके लोग काम और लोभसे संतप्त हैं, वहीं आप उनसे सर्वथा अछूते और सदैव प्रसन्न दिखाई देते हैं। आप पुत्र, धन और संसारकी आसक्तिसे रहित होकर अपने आत्मस्वरूपमें ही स्थित हैं। कृपा करके बताइये कि आपको यह आत्मानन्द किस प्रकार प्राप्त हुआ?"
महाराज यदु के प्रश्न करने पर अवधूत दत्तात्रेयजीने उन्हें उत्तर देना आरम्भ किया। दत्तात्रेयजीने कहा की राजन्! मैंने अनेक गुरुओंसे शिक्षा ग्रहण की है। उनके उपदेश और आचरणसे ही मैं इस संसारमें मुक्तभावसे विचरण करता हूँ। अब तुम उन गुरुओंके नाम और उनसे प्राप्त शिक्षाका सार सुनो।
मेरे चौबीस गुरु हैं: (1) पृथ्वी, (2) वायु, (3) आकाश, (4) जल, (5) अग्नि, (6) चन्द्रमा, (7) सूर्य, (8) कबूतर, (9) अजगर, (10) समुद्र, (11) पतंग, (12) मधुमक्खी, (13) हाथी, (14) मधुहा, (15) हरिण, (16) मछली, (17) पिङ्गला, (18) कुरर पक्षी, (19) बालक, (20) कुँआरी कन्या, (21) बाण बनानेवाला, (22) सर्प, (23) मकड़ी और (24) भृंगी कीट।
सारांश: JKYog India Online Class- श्रीमद् भागवत कथा [हिन्दी]- 13.07.2026