श्रीमद्भागवत महापुराण- स्कन्ध: 11 अध्याय: 4 & 5
राजा निमिने पूछा, "योगीश्वरो! अब कृपा करके उस कर्मयोगका उपदेश कीजिये, जिसके द्वारा मनुष्य शीघ्र शुद्ध होकर नैष्कर्म्य अर्थात् कर्तृत्व, कर्म और कर्मफलके बन्धनसे मुक्त करनेवाला ज्ञान प्राप्त कर सके। मैंने यही प्रश्न पहले सनकादि ऋषियोंसे भी किया था, किन्तु उन्होंने उत्तर नहीं दिया। इसका क्या कारण था?
इसपर छठे योगीश्वर आविर्होत्रजी राजा निमि को कर्म, अकर्म और विकर्म की परिभाषा तथा उन्हें समझने का आधार बताते हैं।
- कर्म (शास्त्रविहित कार्य) – वे कार्य जिन्हें धर्मग्रन्थों में करने की आज्ञा दी गई है। उदाहरण: यज्ञ, पूजा, दान, सत्य बोलना, माता-पिता की सेवा और निःस्वार्थ भाव से अपना कर्तव्य निभाना।
- विकर्म (वर्जित कार्य) – वे कार्य जिन्हें धर्मग्रन्थों में करने से मना किया गया है। ये मनुष्य का अहित करते हैं और उसके पतन का कारण बनते हैं। उदाहरण: झूठ बोलना, चोरी करना, हिंसा करना, छल-कपट करना, नशा करना, व्यभिचार और दूसरों का अधिकार छीनना।
- अकर्म- अकर्म ऐसे कर्म हैं जो फल की इच्छा के बिना, केवल भगवान को प्रसन्न करने के लिए किए जाते हैं। ऐसे कर्मों से कर्मफल का बन्धन नहीं होता और जीव संसार के बन्धन में नहीं फँसता।
आविर्होत्रजी कहते हैं कि मुख्य बात यह है कि कौन सा कर्म उचित है, कौन सा निषिद्ध है और कौन सा शास्त्रीय विधान का उल्लंघन है, इसका निर्णय केवल अपनी बुद्धि, समाज की प्रथा या सामान्य नैतिक सोच से नहीं किया जा सकता। इसका वास्तविक आधार वेद हैं।
फिर योगीश्वर कहते हैं कि समस्या यह है कि वेद अपौरुषेय हैं, अर्थात् किसी मनुष्य द्वारा रचित नहीं हैं; वे ईश्वरस्वरूप हैं। उनकी भाषा, विधि, निषेध, संकेत और गूढ़ तात्पर्य को ठीक ठीक समझना अत्यंत कठिन है। इसलिए बड़े बड़े विद्वान भी कभी कभी वेदों के वास्तविक अभिप्राय को समझने में भूल कर बैठते हैं। इसी कारण, जब तुम बचपन में थे, तब सनक आदि ऋषियों ने तुम्हें इस गहरे विषय का अधिकारी न समझकर तुम्हारे प्रश्न का उत्तर नहीं दिया था।
वेद मनुष्यको कर्ममें बाँधनेके लिये नहीं, अपितु धीरे-धीरे कर्मबन्धनसे मुक्त करनेके लिये कर्मका विधान करते हैं। जैसे बालकको मधुर वस्तुका लोभ देकर औषध दी जाती है, वैसे ही वे स्वर्गादि फलोंका वर्णन करके मनुष्यको पहले श्रेष्ठ कर्मोंमें प्रवृत्त करते हैं।
जिसका अज्ञान दूर नहीं हुआ और इन्द्रियाँ वशमें नहीं हैं, वह यदि मनमाने ढंगसे विहित कर्मोंका त्याग कर दे तो अधर्ममें पड़ता है। परन्तु जो फलकी इच्छा छोड़कर अपने समस्त वेदोक्त कर्म विश्वात्मा भगवान्को समर्पित करता है, वह धीरे-धीरे नैष्कर्म्य (बिना कर्म बंधन) को प्राप्त करता है।
राजन्! जो शीघ्र अपने हृदयकी ‘मैं’ और ‘मेरा’ रूपी गाँठ खोलना चाहता है, उसे सद्गुरुकी शरण लेकर उनसे उपासनाकी विधि सीखनी चाहिये और अपने प्रिय इष्टस्वरूपमें पुरुषोत्तम भगवान्की आराधना करनी चाहिये।
साधक बाह्य और आन्तरिक शुद्धिके साथ एकाग्रचित्त होकर भगवान्का ध्यान करे और श्रद्धापूर्वक उनके श्रीविग्रह अथवा हृदयस्थित स्वरूपकी पूजा करे। उपलब्ध सामग्रीसे पाद्य, अर्घ्य, स्नान, वस्त्र, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करे, स्तुति और प्रणाम करे तथा अन्तमें अपनेको भी भगवान्के चरणोंमें समर्पित कर दे। इस प्रकार जो अग्नि, सूर्य, जल, अतिथि, श्रीविग्रह और अपने हृदयमें विराजमान आत्मरूप श्रीहरिकी श्रद्धापूर्वक आराधना करता है, वह शीघ्र ही कर्मबन्धनसे मुक्त होकर परम सिद्धिको प्राप्त करता है।
भगवान् के विभिन्न अवतारों का वर्णन
राजा निमिने पूछा, "योगीश्वरो! भगवान् स्वतन्त्रतासे अपने भक्तोंकी भक्तिके वश होकर अनेकों प्रकारके अवतार ग्रहण करते हैं और अनेकों लीलाएँ करते हैं। आपलोग कृपा करके भगवान्की उन लीलाओंका वर्णन कीजिये, जो वे अबतक कर चुके हैं, कर रहे हैं या करेंगे ।"
सातवें योगीश्वर द्रुमिलजीने कहा की राजन्! भगवान् अनन्त हैं और उनके गुण भी अनन्त हैं। पृथ्वीके धूलिकणोंकी गणना भले ही सम्भव हो, परन्तु समस्त शक्तियोंके आश्रय भगवान्के गुणोंका पार पाना सम्भव नहीं।
भगवान्ने अपनेसे ही पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाशकी सृष्टि की। फिर इनसे विराट् ब्रह्माण्डकी रचना करके उसमें अन्तर्यामीरूपसे प्रवेश किया। यही आदिदेव नारायणका ‘पुरुष’ रूप और उनका प्रथम अवतार है। उसी विराट् पुरुषमें तीनों लोक स्थित हैं। उन्हींसे समस्त जीवोंकी इन्द्रियाँ, ज्ञान, प्राणशक्ति और कर्मशक्ति प्राप्त होती है। उन्हींके सत्त्व, रज और तम गुणोंके द्वारा जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय होते हैं।
सृष्टिके लिये वे रजोगुणके अंशसे ब्रह्मारूप, पालनके लिये सत्त्वगुणके अंशसे यज्ञपति विष्णुरूप और संहारके लिये तमोगुणके अंशसे रुद्ररूपमें प्रकट होते हैं। इस प्रकार एक ही आदिपुरुष नारायणसे सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और संहार होता है।
भगवान् नर-नारायण ने उर्वशी सहित अनेक अप्सराओं को किया प्रकट
दक्ष प्रजापतिकी पुत्री मूर्ति और धर्मके यहाँ भगवान्ने शान्तस्वरूप ऋषिश्रेष्ठ नर और नारायण के रूपमें अवतार लिया। उन्होंने भगवद् आराधन रूप उस कर्मका उपदेश और स्वयं आचरण किया, जो कर्मबन्धनसे मुक्त करके नैष्कर्म्य स्थितिको प्राप्त कराता है। वे आज भी बदरिकाश्रममें तपस्या करते हुए विराजमान हैं।
उनकी घोर तपस्यासे भयभीत होकर इन्द्रने कामदेवको वसन्त, मलय पवन और अप्सराओंके साथ उनका तप भंग करने भेजा। भगवान्की महिमासे अनजान कामदेवने अपने समस्त उपायोंसे उन्हें विचलित करनेका प्रयास किया, परन्तु असफल रहे।
नर नारायण ऋषि इन्द्रके इस प्रयोजनको समझ गये। तब उन्होंने भयभीत कामदेव और उसके साथियोंसे हँसकर कहा, “कामदेव! मलय पवन और देवांगनाओ! भय मत करो। हमारे अतिथि बनकर यहीं ठहरो और हमारा आतिथ्य स्वीकार करो।”
जब नर-नारायण ऋषिने उन्हें अभयदान देते हुए इस प्रकार कहा, तब कामदेव आदिके सिर लज्जासे झुक गये और उन्होंने दयालु भगवान् नर-नारायण की स्तुति किया।
कामदेव और उसके साथियोंकी स्तुति सुनकर सर्वशक्तिमान् भगवान् नारायणने अपने योगबलसे अनेक ऐसी दिव्य रमणियाँ प्रकट कर दीं, जिनका अद्भुत सौन्दर्य स्वर्गकी अप्सराओंको भी लज्जित करनेवाला था। उन्हें देखकर इन्द्रके अनुचर विस्मित और निस्तेज हो गये।
तब भगवान् नारायणने मुसकराकर कहा, “इनमेंसे जो तुम्हें प्रिय लगे, उसे स्वर्गकी शोभा बढ़ानेके लिये अपने साथ ले जाओ।”
भगवान्की आज्ञासे उन्होंने उन दिव्य रमणियोंमें श्रेष्ठ उर्वशीको चुना और उसे साथ लेकर स्वर्ग लौट गये। वहाँ उन्होंने देवसभामें नर नारायणके अतुलनीय बल और प्रभावका वर्णन किया, जिसे सुनकर इन्द्र अत्यन्त चकित और भयभीत हो गये।
भगवान विष्णु अपने स्वरूप में सदा एकरस रहते हैं, फिर भी पूरे जगत के कल्याण के लिए अनेक अवतार लेते हैं। उन्होंने हंस, दत्तात्रेय, सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार और हमारे पिता ऋषभदेव के रूप में अवतार लेकर आत्मसाक्षात्कार के साधनों का उपदेश दिया। उन्होंने हयग्रीव अवतार लेकर मधु और कैटभ नाम के असुरों का वध किया और उनके द्वारा चुराए गए वेदों को वापस प्राप्त किया।
प्रलय के समय भगवान ने मत्स्य अवतार लिया और भावी मनु सत्यव्रत, पृथ्वी तथा औषधियों और अन्न के बीजों की रक्षा की। फिर वराह अवतार लेकर उन्होंने पृथ्वी को रसातल से बाहर निकाला और हिरण्याक्ष का वध किया।
कूर्म अवतार में भगवान ने समुद्र मन्थन का कार्य पूरा करने के लिए अपनी पीठ पर मन्दराचल पर्वत को धारण किया। और उन्हीं भगवान विष्णु (अजीत) ने अपने दुःखी और शरणागत भक्त गजेन्द्र को ग्राह के मुँह से बचाया।
एक बार वालखिल्य ऋषि तपस्या करते-करते बहुत दुर्बल हो गए थे। वे कश्यप ऋषि के लिए यज्ञ की लकड़ियाँ ला रहे थे। थक जाने के कारण वे गाय के खुर से बने एक छोटे से गड्ढे में गिर पड़े और अपनी दुर्बलता के कारण उससे बाहर नहीं निकल सके। जब उन्होंने भगवान की स्तुति की, तब भगवान ने अवतार लेकर उनका उद्धार किया।
जब वृत्रासुर का वध करने के कारण इन्द्र को ब्रह्महत्या का पाप लगा और वे उसके भय से छिप गए, तब भगवान ने उनकी रक्षा की। इसी प्रकार जब असुरों ने असहाय देवांगनाओं को बंदी बना लिया, तब भगवान ने उन्हें भी असुरों के बन्धन से छुड़ाया।
जब हिरण्यकशिपु के कारण प्रह्लाद और अन्य संतों पर संकट आने लगा, तब उन्हें निर्भय करने के लिए भगवान ने नृसिंह अवतार लिया और हिरण्यकशिपु का वध किया। देवताओं की रक्षा के लिए भगवान ने देवासुर संग्रामों में अनेक दैत्यराजों का वध किया। अलग-अलग मन्वन्तरों में उन्होंने अनेक कलावतार लेकर तीनों लोकों की रक्षा की।
फिर भगवान ने वामन अवतार लिया। तीन पग भूमि माँगने के बहाने उन्होंने दैत्यराज बलि से पृथ्वी ले ली और उसे अदिति के पुत्र देवताओं को लौटा दिया। परशुराम अवतार में भगवान ने पृथ्वी को इक्कीस बार अत्याचारी क्षत्रियों से मुक्त किया। हैहय वंश का अन्त करने के लिए वे मानो भृगुवंश में अग्नि के रूप में प्रकट हुए थे।
फिर भगवान ने राम अवतार लेकर समुद्र पर सेतु बनाया और रावण का वध करके उसकी लंका का विनाश किया। भगवान राम की पवित्र कीर्ति संसार के पापों को नष्ट करने वाली है। सीतापति भगवान राम सदा और सर्वत्र विजयी हैं। भगवान जन्मरहित हैं, फिर भी पृथ्वी का भार कम करने के लिए वे यदुवंश में भगवान श्रीकृष्ण के रूप में प्रकट होंगे और ऐसे अद्भुत कार्य करेंगे, जिन्हें बड़े-बड़े देवता भी नहीं कर सकते।
आगे चलकर भगवान बुद्ध के रूप में प्रकट होंगे और जो लोग यज्ञ करने के अधिकारी नहीं हैं, फिर भी यज्ञों के नाम पर अनुचित कर्म करेंगे, उन्हें अनेक प्रकार के तर्क देकर यज्ञों से दूर करेंगे। कलियुग के अन्त में भगवान कल्कि अवतार लेंगे और अधर्मी राजाओं का नाश करेंगे। भगवान की महिमा और कीर्ति अनन्त है। महात्माओं ने जगत के स्वामी भगवान के ऐसे असंख्य अवतारों और उनके दिव्य कर्मों का बार-बार गुणगान किया है।
भगवान् का भजन न करने वाले की क्या गति होती है?
राजा निमिने पूछा, "योगीश्वरो! आप श्रेष्ठ आत्मज्ञानी और भगवान्के परम भक्त हैं। कृपा करके बताइये कि जिनकी भोगकामनाएँ शान्त नहीं हुईं, मन और इन्द्रियाँ वशमें नहीं हैं तथा जो प्रायः भगवान्का भजन भी नहीं करते, ऐसे मनुष्योंकी क्या गति होती है?"
आठवें योगीश्वर चमसजीने कहा की राजन्! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र तथा ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास- इन सबके जन्मदाता, स्वामी और अन्तरात्मा स्वयं भगवान् हैं। अतः जो मनुष्य अपने वर्ण और आश्रममें रहकर भी भगवान्का भजन नहीं करता, बल्कि उनका अनादर करता है, उसका अधःपतन होता है।
जो लोग भगवान्की कथा और नामकीर्तनसे दूर हैं, वे भगवद्भक्तोंकी विशेष दयाके पात्र हैं। संतोंको चाहिये कि उन्हें भगवत्कथा और भजनका अवसर देकर उनके कल्याणका मार्ग प्रशस्त करें।
राजन्! अनेक लोग वेदाध्ययन और संस्कारोंसे सम्पन्न होकर भी वेदोंका वास्तविक तात्पर्य नहीं समझते। वे अपनेको ज्ञानी मानते हैं, परन्तु कामना, क्रोध, दम्भ और अभिमानमें डूबे रहते हैं तथा भगवत्प्रेमी संतोंका उपहास करते हैं। धन, कुल, विद्या, सौन्दर्य और बलका अभिमान उन्हें इतना अन्धा कर देता है कि वे अपने हृदयमें स्थित भगवान्को भी नहीं पहचानते।
वेदोंका उद्देश्य मनुष्यकी विषयप्रवृत्तिको बढ़ाना नहीं, बल्कि उसे मर्यादित करके धीरे-धीरे निवृत्त करना है। विवाह, यज्ञ आदि विधानोंका तात्पर्य भोग और हिंसामें प्रवृत्त करना नहीं, बल्कि उच्छृंखल कामनाओंको धर्मकी सीमामें लाकर अन्ततः उनसे ऊपर उठाना है।
धनका श्रेष्ठ उपयोग धर्ममें है, धर्मका फल परम तत्त्वका ज्ञान है और तत्त्वज्ञानसे परम शान्ति प्राप्त होती है। परन्तु जो मनुष्य धन और जीवनको केवल भोगमें नष्ट करता है, वह इस सत्यको भूल जाता है कि शरीर नश्वर है और मृत्यु अवश्यंभावी।
जो नश्वर शरीर और उसके सम्बन्धोंमें आसक्त होकर समस्त प्राणियोंके अन्तरात्मा भगवान्से विमुख रहते हैं, उनका अधःपतन निश्चित है। न वे आत्मज्ञान प्राप्त करते हैं, न विषयोंसे तृप्त होते हैं; वे धर्म, अर्थ और कामकी उलझनोंमें भटकते रहते हैं।
ऐसे अज्ञानग्रस्त मनुष्य अपने ही कर्मोंसे स्वयंको बाँधते हैं। काल उनके समस्त मनोरथोंको बार-बार नष्ट करता रहता है, फिर भी उनकी कामनाएँ और कर्मोंकी परम्परा समाप्त नहीं होती। इसीलिये उन्हें कभी वास्तविक शान्ति प्राप्त नहीं होती।
जो लोग अन्तर्यामी भगवान् श्रीकृष्णसे विमुख हैं, वे अत्यन्त परिश्रम करके गृह, पुत्र, मित्र और धन-सम्पत्ति इकट्ठी करते हैं; परन्तु उन्हें अन्तमें सब कुछ छोड़ देना पड़ता है और न चाहनेपर भी विवश होकर घोर नरकमें जाना पड़ता है। भगवान्का भजन न करनेवाले विषयी पुरुषोंकी यही गति होती है।
भगवान् के युगावतारों का वर्णन
राजा निमिने पूछा की योगीश्वरो! आपलोग कृपा करके यह बतलाइये कि भगवान् किस समय किस रंगका, कौन-सा आकार स्वीकार करते हैं और मनुष्य किन नामों और विधियोंसे उनकी उपासना करते हैं?
नवें योगीश्वर करभाजनजीने कहा की राजन्! सत्य, त्रेता, द्वापर और कलि इन चारों युगोंमें भगवान् भिन्न वर्ण, नाम और रूप धारण करते हैं तथा युगानुसार विभिन्न विधियोंसे उनकी आराधना की जाती है।
- सत्ययुगमें भगवान् श्वेतवर्ण, चतुर्भुज और तपस्वी स्वरूपमें प्रकट होते हैं। उस युगके शान्त, समदर्शी और संयमी मनुष्य ध्यान तथा तपस्याके द्वारा परमात्माकी आराधना करते हैं।
- त्रेतायुगमें भगवान् रक्तवर्ण और यज्ञस्वरूप होते हैं। उस युगके धर्मनिष्ठ मनुष्य वेदत्रयी और यज्ञोंके द्वारा सर्वदेवस्वरूप श्रीहरिकी उपासना करते हैं।
- द्वापरयुगमें भगवान् श्यामवर्ण, पीताम्बरधारी तथा शंख, चक्र और गदासे सुशोभित होते हैं। उस युगमें मनुष्य वैदिक और तान्त्रिक विधियोंसे भगवान् वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्धकी आराधना करते हैं।
- कलियुगमें बुद्धिमान् पुरुष नाम, गुण और लीलाके संकीर्तनप्रधान यज्ञोंसे भगवान्की उपासना करते हैं। वे उन शरणागतवत्सल भगवान्के चरणकमलोंकी वन्दना करते हैं, जो समस्त दुःखोंका नाश करनेवाले और संसारसागरसे पार उतारनेवाले हैं।
राजन्! प्रत्येक युगमें भगवान्की आराधनाका स्वरूप भिन्न है, किन्तु समस्त पुरुषार्थोंके एकमात्र स्वामी श्रीहरि ही हैं। कलियुगकी विशेष महिमा यह है कि केवल भगवन्नाम संकीर्तनसे ही जीवका परम कल्याण हो सकता है। इसीलिये सारग्राही महापुरुष इस युगकी प्रशंसा करते हैं।अनादिकालसे संसारचक्रमें भटकते जीवके लिये भगवान्के नाम, गुण और लीलाओंके कीर्तनसे बढ़कर कोई लाभ नहीं। इससे चित्त शुद्ध होता है, संसारबन्धन मिटता है और परम शान्ति प्राप्त होती है।
जो मनुष्य समस्त कर्मवासनाओं और भेदबुद्धिका त्याग करके सर्वात्मभावसे भगवान् मुकुन्दकी शरण ग्रहण करता है, वह समस्त ऋणों और बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है। जो प्रेमपूर्वक भगवान्के चरणकमलोंका अनन्य भजन करता है, उसके हृदयमें स्वयं श्रीहरि विराजकर उसके समस्त दोषोंको दूर कर देते हैं।
नारदजीने कहा, "हे वसुदेवजी! नौ योगीश्वरोंसे इस प्रकार भागवत धर्मका उपदेश सुनकर राजा निमि अत्यन्त आनन्दित हुए। उन्होंने ऋत्विजों और आचार्योंके साथ उन महात्माओंकी पूजा की। तत्पश्चात् नवयोगीश्वर सबके देखते-देखते अन्तर्धान हो गये। राजा निमिने उनसे सुने हुए भागवत धर्मका श्रद्धापूर्वक आचरण किया और परम गति प्राप्त की।
"हे वसुदेवजी! तुम भी श्रद्धासे इन भागवत धर्मोंका पालन करो। इससे समस्त आसक्तियोंसे मुक्त होकर भगवान्का परम पद प्राप्त करोगे। तुम और देवकी परम भाग्यवान् हो, क्योंकि स्वयं सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीकृष्ण तुम्हारे पुत्ररूपमें प्रकट हुए हैं। उनके दर्शन, स्पर्श, आलिंगन, वार्तालाप और वात्सल्यपूर्ण सेवासे तुम दोनोंका जीवन पवित्र हो चुका है। जिन शिशुपाल आदि राजाओंने वैरभावसे भी निरन्तर श्रीकृष्णका स्मरण किया, वे भी उनकी गति प्राप्त कर गये; फिर जो प्रेम और अनुरागसे उनका चिन्तन करते हैं, उनकी प्राप्तिमें क्या सन्देह है?
"वसुदेवजी! श्रीकृष्णको केवल अपना पुत्र मत समझो। वे सर्वात्मा, सर्वेश्वर, अविनाशी और समस्त कारणोंसे परे हैं। उन्होंने अपनी दिव्य महिमा छिपाकर लीलाके लिये मनुष्यरूप धारण किया है। वे पृथ्वीका भार उतारने, अधर्मका नाश करने, संतोंकी रक्षा करने और जीवोंको परम शान्ति प्रदान करनेके लिये अवतीर्ण हुए हैं।"
श्रीशुकदेवजीने परीक्षित् को कहा की नारदजीके मुखसे यह उपदेश सुनकर वसुदेवजी और देवकीजी अत्यन्त विस्मित हुए और उनका शेष मोह भी दूर हो गया। यह परम पवित्र इतिहास जो एकाग्रचित्त होकर श्रवण और मनन करता है, वह शोक और मोहसे मुक्त होकर परम पद प्राप्त करता है।
सारांश: JKYog India Online Class- श्रीमद् भागवत कथा [हिन्दी]- 10.07.2026