श्रीमद्भागवत महापुराण- स्कन्ध: 11 अध्याय: 1-2
श्रीमद् भागवत महापुराण के ग्यारवें सकन्ध के शुरुवात में श्रीशुकदेवजी बताते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण ने बलरामजी और यदुवंशियों के साथ मिलकर अनेक दैत्यों का नाश किया और कौरव-पाण्डवों के युद्ध के माध्यम से पृथ्वी का भार कम किया। कौरवों के अन्याय से पाण्डवों में क्रोध उत्पन्न हुआ और उसी के द्वारा अनेक राजाओं का विनाश हुआ।
इसके बाद भी यदुवंश बहुत शक्तिशाली होने के कारण पृथ्वी पर भार बना रहा। तब भगवान श्रीकृष्ण ने निश्चय किया कि आपस के कलह के द्वारा ही यदुवंश का अंत होगा। ब्राह्मणों के शाप को कारण बनाकर उन्होंने अपने ही वंश का संहार कराया और सबको अपने धाम ले गए।
भगवान श्रीकृष्ण का रूप, वाणी और लीला इतनी आकर्षक और मधुर थी कि जो भी उन्हें देखता या सुनता, उसका मन उन्हीं में लग जाता। उन्होंने अपनी कीर्ति इस संसार में फैला दी, ताकि लोग उसका स्मरण करके अज्ञान से पार हो सकें। अंत में भगवान श्रीकृष्ण अपने धाम को लौट गए।
राजा परीक्षित प्रश्न करते हैं, “हे भगवन्! यदुवंशी तो ब्राह्मणों का सम्मान करने वाले, उदार और बड़ों की सेवा करने वाले थे। उनका मन भी सदा भगवान श्रीकृष्ण में लगा रहता था। फिर उनसे ऐसा कौन-सा अपराध हुआ कि ब्राह्मणों ने उन्हें शाप दे दिया?
“उस शाप का कारण क्या था और वह कैसा था? जब यदुवंशी भगवान श्रीकृष्ण को ही अपना सब कुछ मानते थे, तो उनके बीच आपस में कलह कैसे हुआ? और जो लोग ज्ञानी और एकता का ज्ञान रखने वाले थे, उनमें भेदभाव कैसे आ गया? कृपा करके यह सब विस्तार से बताइये।”
श्रीशुकदेवजी कहते हैं की भगवान श्रीकृष्ण ने ऐसा दिव्य शरीर धारण किया था, जिसमें सभी सुन्दर गुण समाए हुए थे। उनकी आँखें हिरन जैसी कोमल थीं, कन्धे सिंह जैसे मजबूत थे, भुजाएँ हाथी की सूँड जैसी बलशाली थीं, और चरण कमल जैसे कोमल व सुन्दर थे। ऐसे रूप को धारण करके उन्होंने पृथ्वी पर मंगल और कल्याण करने वाले कर्म किए।
वे पूर्णकाम प्रभु द्वारकाधाम में रहते हुए आनन्दपूर्वक क्रीड़ा करते रहे और अपनी महान कीर्ति फैलाते रहे। अंत में, भगवान श्रीहरि ने अपने ही कुल के अंत का संकल्प किया, क्योंकि पृथ्वी का भार कम करने के लिए अब यही कार्य शेष रह गया था।
भगवान श्रीकृष्ण ने ऐसे पवित्र और मंगलकारी कर्म किए, जिनका गान करने से लोगों के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। उस समय भगवान श्रीकृष्ण, महाराज उग्रसेन की राजधानी द्वारका में, वसुदेवजी के घर में, यादवों के विनाश के लिए कालरूप में ही निवास कर रहे थे।
जब भगवान ने उन महान ऋषियों को विदा किया, तब विश्वामित्र, असित, कण्व, दुर्वासा, भृगु, अंगिरा, कश्यप, वामदेव, अत्रि, वसिष्ठ और नारद जैसे बड़े-बड़े ऋषि द्वारका के पास स्थित पिण्डारक क्षेत्र में जाकर रहने लगे।
साम्ब और अन्य यदु कुमारों के करण ऋषियों ने दिया यदुकुल विनाश का शाप
एक दिन यदुवंश के कुछ उद्दण्ड कुमार खेलते-खेलते ऋषियों के पास पहुँच गए। उन्होंने झूठी नम्रता दिखाकर उनके चरणों में प्रणाम किया और प्रश्न पूछा। उन्होंने जाम्बवती के पुत्र साम्ब को स्त्री के रूप में सजा दिया और ऋषियों से कहा, “हे ब्राह्मणो! यह सुन्दर, कजरारी आँखों वाली स्त्री गर्भवती है। यह आपसे कुछ पूछना चाहती है, पर संकोच कर रही है। आप सब तो सब कुछ जानने वाले हैं। इसे पुत्र की बहुत इच्छा है और प्रसव का समय भी पास है। कृपया बताइए, यह पुत्र को जन्म देगी या पुत्री को?”
जब उन कुमारों ने इस तरह ऋषि-मुनियों को धोखा देने की कोशिश की, तब वे भगवान की प्रेरणा से क्रोधित हो गए। उन्होंने कहा, “मूर्खों! यह स्त्री एक लोहे का मूसल जन्म देगी, जो तुम्हारे पूरे कुल का नाश करेगा।”
मुनियों की यह बात सुनकर वे सब लड़के बहुत डर गए। उन्होंने तुरंत साम्ब का पेट खोला, तो सचमुच उसमें एक लोहे का मूसल मिला। अब वे सब पछताने लगे और कहने लगे, “हम बड़े दुर्भाग्यशाली हैं। हमने यह क्या अनर्थ कर दिया? अब लोग हमारे बारे में क्या कहेंगे?” इस प्रकार वे बहुत घबरा गए और उस मूसल को लेकर अपने घर लौट आए।
उनके चेहरे फीके पड़ गए थे, मुख मुरझा गए थे। वे उस मूसल को सभा में ले गए और सभी यादवों के सामने रख दिया। फिर उन्होंने राजा उग्रसेन को पूरी घटना बता दी। जब सब लोगों ने ब्राह्मणों के शाप की बात सुनी और अपनी आँखों से उस मूसल को देखा, तब सभी द्वारकावासी आश्चर्य में पड़ गए और डर गए। वे जानते थे कि ब्राह्मणों का शाप कभी असत्य नहीं होता।
तब यदुराज उग्रसेन ने उस मूसल को पिसवाकर चूरा-चूरा कर दिया और उस चूरे के साथ जो थोड़ा सा लोहे का टुकड़ा बचा था, उसे समुद्र में फेंकवा दिया। यह सब उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण से पूछे बिना ही किया, ऐसा ही उनके मन में विचार आया।
उस लोहे के टुकड़े को एक मछली ने निगल लिया, और जो चूरा था, वह समुद्र की लहरों के साथ बहकर किनारे आ गया। कुछ ही दिनों में वही चूरा एरक नाम की बिना गाँठ वाली घास के रूप में उग आया। मछुआरों ने समुद्र में अन्य मछलियों के साथ उस मछली को भी पकड़ लिया। उसके पेट में जो लोहे का टुकड़ा था, उसे जरा नाम के एक व्याध ने निकालकर अपने बाण की नोक बना लिया।
भगवान श्रीकृष्ण सब कुछ जानते थे। वे चाहें तो इस शाप को बदल सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा करना उचित नहीं समझा। काल के रूप में स्थित प्रभु ने ब्राह्मणों के शाप को स्वीकार ही किया।
नारदजी आय द्वारका वाउडेवजी से मिलने
श्रीशुकदेवजी कहते हैं की देवर्षि नारदके मनमें भगवान् श्रीकृष्णकी सन्निधिमें रहनेकी बड़ी लालसा थी। इसलिये वे श्रीकृष्णसे सुरक्षित द्वारकामें, जहाँ दक्ष आदिके शापका कोई भय नहीं था, विदा कर देनेपर भी पुनः-पुनः आकर प्रायः रहा ही करते थे।
एक दिन नारद जी, वसुदेवजी के घर आए। वसुदेवजी ने उनका आदर किया, उन्हें बैठाया, विधि से पूजा की, फिर प्रणाम करके उनसे बोले, “आपके शुभ आगमन और दर्शन से हम पहले ही धन्य हो गए हैं, फिर भी हम आपसे धर्म के उन साधनों के बारे में पूछते हैं, जिन्हें श्रद्धा से सुन लेने पर ही मनुष्य इस भय से भरे संसार से मुक्त हो सकता है। पहले जन्म में मैंने भगवान की पूजा की थी, लेकिन मुक्ति पाने के लिए नहीं। मेरी इच्छा थी कि भगवान मुझे पुत्र के रूप में मिलें।
"अब आप मुझे ऐसा उपदेश दीजिए, जिससे मैं इस जन्म-मृत्यु से भरे, डरावने संसार से आसानी से पार हो जाऊँ, जहाँ दुःख भी कई बार सुख जैसा दिखकर मन को बाँध लेते हैं।”
श्रीशुकदेवजी कहते हैं की देवर्षि नारद जी उनका प्रश्न सुनकर भगवान के असीम और अद्भुत गुणों का स्मरण करने लगे। वे प्रेम और आनन्द से भर गए और वसुदेवजी से बोले।
नारदजी ने कहा, “तुम्हारा यह विचार बहुत ही अच्छा है, क्योंकि यह भागवत धर्म से जुड़ा है। यह धर्म पूरे संसार को जीवन देने वाला और सबको पवित्र करने वाला है। यह भागवत धर्म ऐसा है कि इसे केवल कानों से सुनने से, वाणी से बोलने से, मन में स्मरण करने से, हृदय से अपनाने से, या कोई इसका पालन कर रहा हो तो उसका समर्थन करने से भी मनुष्य उसी समय पवित्र हो जाता है, चाहे वह पहले भगवान और संसार का विरोधी ही क्यों न रहा हो। जिन भगवान के गुण, लीला और नाम का श्रवण और कीर्तन पतित से पतित व्यक्ति को भी पवित्र कर देता है, उन्हीं परम मंगलस्वरूप मेरे आराध्य देव भगवान का आज तुमने मुझे स्मरण करा दिया है।”
नौ योगीश्वरों का परिचय
नारदजी आगे कहते हैं की तुमने जो प्रश्न किया है, उसके विषय में संतजन एक प्राचीन कथा सुनाते हैं। यह कथा है ऋषभदेव के नौ योगीश्वर पुत्रों और विदेह के राजा का पवित्र संवाद का। तुम जानते ही हो कि स्वायम्भुव मनु के एक प्रसिद्ध पुत्र थे प्रियव्रत। प्रियव्रत के पुत्र थे आग्नीध्र, उनके पुत्र नाभि, और नाभि के पुत्र हुए ऋषभदेव। शास्त्रों में उन्हें भगवान वासुदेव का अंश बताया गया है। उन्होंने मोक्ष का मार्ग सिखाने के लिए अवतार लिया था। उनके सौ पुत्र थे और सभी वेदों के गहरे ज्ञाता थे।
- ऋषभदेवजी के 100 पुत्र हुए।
- ज्येष्ठ पुत्र: राजर्षि भरत > भगवान नारायण के परम भक्त > उनके नाम से अजनाभवर्ष भारतवर्ष हुआ > सम्पूर्ण पृथ्वी पर राज्य किया > अन्त में वन में जाकर तपस्या की > तीन जन्मों में भगवान की प्राप्ति की (जड़भरत)।
- अन्य 9 पुत्र भारतवर्ष के चारों ओर स्थित नौ द्वीपों के अधिपति बने।
- शेष 81 पुत्र > ब्राह्मण बने > कर्मकाण्ड के प्रवर्तक (रचयिता) > वेदिक यज्ञ, संस्कार और धर्म व्यवस्था को स्थापित किया।
- शेष नौ संन्यासी हो गये। वे बड़े ही भाग्यवान् थे। उन्होंने आत्मविद्याके सम्पादनमें बड़ा परिश्रम किया था और वास्तवमें वे उसमें बड़े निपुण थे। वे प्रायः दिगम्बर ही रहते थे और अधिकारियोंको परमार्थ-वस्तुका उपदेश किया करते थे।
कविर्हरिरन्तरिक्षः प्रबुद्धः पिप्पलायनः ।
आविहोत्रोऽथ द्रुमिलश्चमसः करभाजनः ॥
उनके नाम थे–कवि, हरि, अन्तरिक्ष, प्रबुद्ध, पिप्पलायन, आविर्होत्र, द्रुमिल, चमस और कर-भाजन। (11.2.21)
वे योगीश्वर इस पूरे जगत को, कारण और कार्य, प्रकट और अप्रकट, सबको भगवान का ही रूप मानते थे और अपने आप से अलग नहीं समझते थे। इसी भाव में स्थित होकर वे पृथ्वी पर पूरी स्वतंत्रता से घूमते थे। उनके लिए कहीं कोई रोक नहीं थी। वे जहाँ चाहते, वहाँ चले जाते। वे देवताओं, सिद्धों, गन्धर्वों, यक्षों, मनुष्यों, किन्नरों और नागों के लोकों में, तथा मुनियों, चारणों, भूतनाथों, विद्याधरों, ब्राह्मणों और गौओं के स्थानों में भी स्वच्छन्द घूमते रहते थे। वे सभी जीवित रहते हुए ही मुक्त थे, अर्थात् जीवन्मुक्त थे।
नौ योगीश्वर -निमि संवाद
एक बार की बात है। इसी अजनाभ (भारत) वर्ष में विदेह के राजा निमि एक बहुत बड़ा यज्ञ करा रहे थे, जिसमें अनेक महान ऋषि उपस्थित थे। तभी वे नौ योगीश्वर घूमते-घूमते वहाँ पहुँच गए। वे योगीश्वर भगवान के परम प्रेमी भक्त थे और सूर्य के समान तेजस्वी थे। उन्हें देखकर राजा निमि, यज्ञ की अग्नियाँ और सभी ऋत्विज ब्राह्मण खड़े होकर उनका स्वागत करने लगे।
राजा निमि ने उन्हें भगवान के प्रिय भक्त जानकर आदरपूर्वक ऊँचे आसनों पर बैठाया और प्रेम व आनन्द से उनकी विधिपूर्वक पूजा की। फिर राजा निमि ने विनम्र होकर प्रश्न किया-
दुर्लभो मानुषो देहो देहिनां क्षणभङ्गुरः ।
तत्रापि दुर्लभं मन्ये वैकुण्ठ-प्रियदर्शनम् ॥
जीवोंके लिये मनुष्य-शरीरका प्राप्त होना दुर्लभ है। यदि यह प्राप्त भी हो जाता है तो प्रतिक्षण मृत्युका भय सिरपर सवार रहता है, क्योंकि यह क्षणभंगुर है। इसलिये अनिश्चित मनुष्य-जीवनमें भगवान्के प्यारे और उनको प्यार करनेवाले भक्तजनोंका, संतोंका दर्शन तो और भी दुर्लभ। (11.2.29)
इसलिए, हे महात्माओ! हम आपसे यह पूछते हैं कि परम कल्याण का स्वरूप क्या है, और उसे पाने का उपाय क्या है? इस संसार में आधे क्षण का भी सत्संग मनुष्य के लिए बहुत बड़ा धन है।
हे योगीश्वरो! यदि हम सुनने के योग्य हों, तो कृपा करके हमें भागवत धर्म का उपदेश दीजिए। क्योंकि इन धर्मों के पालन से भगवान श्रीकृष्ण प्रसन्न होते हैं। और जो भक्त इनका पालन करके उनकी शरण में जाते हैं, उन्हें भगवान अपने आप तक का भी दान दे देते हैं।
सारांश: JKYog India Online Class- श्रीमद् भागवत कथा [हिन्दी]- 29.06.2026