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125- निमि-योगीश्वर संवाद: भगवान् से विमुखता ही भय और भ्रम का मूल, भक्ति के लक्षण और तीन प्रकार के भक्त

Jul 5th, 2026 | 7 Min Read
Blog Thumnail

Category: Bhagavat Purana

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Language: Hindi

श्रीमद्भागवत महापुराण- स्कन्ध: 11 अध्याय: 2

विदेहराज निमिने जब नवयोगेश्वरोंके दर्शनका महान् सौभाग्य प्राप्त किया, तब उन्होंने विनयपूर्वक निवेदन किया, “महापुरुषो! मनुष्य-जन्म क्षणभंगुर होते हुए भी अत्यन्त दुर्लभ है और उससे भी दुर्लभ है आप जैसे भगवत्परायण संतोंका संग। अतः कृपा करके उस भागवत धर्मका विस्तारसे वर्णन कीजिये, जिसके पालनसे जीव सहज ही भगवान्के चरणोंकी परम भक्ति प्राप्त कर ले।”

राजा निमिके इस प्रश्नसे प्रसन्न होकर उन भगवत्प्रेमी योगीश्वरोंमें सबसे पहले कवि बोले, "राजन्! अच्युत भगवान्के चरणकमलोंकी नित्य उपासना ही जीवका परम कल्याण और सर्वथा निर्भय मार्ग है। जब मनुष्य शरीर, घर, परिवार और अन्य नाशवान वस्तुओं को ही ‘मैं’ और ‘मेरा’ मान लेता है, तभी उसके मन में भय, चिन्ता और अशान्ति पैदा होती है। लेकिन भगवान की इस उपासना से यह सारा भय पूरी तरह समाप्त हो जाता है। भगवान ने स्वयं अपने श्रीमुख से ऐसा सरल मार्ग बताया है, जिसके द्वारा साधारण और भोले-भाले लोग भी उन्हें सरलता से प्राप्त कर सकते हैं। उसी मार्ग को भागवत धर्म कहते हैं।

“हे राजन्! जो मनुष्य भागवत धर्म का आश्रय लेता है वह कभी विघ्नोंसे पीडित नहीं होता और नेत्र बंद करके दौड़नेपर भी अर्थात् विधि-विधान में त्रुटि हो जानेपर भी न तो मार्गसे स्खलित ही होता है और न तो भगवद् प्राप्ति से वञ्चित ही होता है।”
कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा
बुद्ध्यात्मना वानुसृतस्वभावात् ।
करोति यद् यत् सकलं परस्मै
नारायणायेति समर्पयेत्तत् ॥
मनुष्य अपने शरीर से, वाणी से, मन से, अपनी समस्त इन्द्रियों से, अपनी बुद्धि से, अपनी आत्मा से अथवा अपने जन्मजात स्वभाव के वशीभूत होकर जो कुछ भी कर्म करता है, उस प्रत्येक कर्म को उसे परम पुरुषोत्तम भगवान श्री नारायण के चरणों में समर्पित कर देना चाहिए कि 'यह सब नारायण के लिए ही है'। (भागवत 11.2.36)
भयं द्वितीयाभिनिवेशतः स्यात्
ईशात् अपेतस्य विपर्ययोऽस्मृतिः ।
तन्माययातो बुध आभजेत्तं
भक्त्यैकयेशं गुरुदेवतात्मा ॥
जब जीव भगवान से विमुख हो जाता है, तब भगवान की माया के प्रभाव से वह अपने वास्तविक आत्म-स्वरूप को भूल जाता है (अस्मृति) और स्वयं को इस नश्वर शरीर के रूप में देखने लगता है (विपर्यय)। इस विपरीत भावना के कारण ही उसके भीतर 'मुझसे अलग भी कोई दूसरा (द्वैत) अस्तित्व है' यह विचार उत्पन्न होता है, जो सभी प्रकार के भय और क्लेशों का कारण (द्वितीयाभिनिवेश) बनता है। इसलिए, एक बुद्धिमान मनुष्य को चाहिए कि वह गुरु को ही अपने आराध्य देव और अपनी आत्मा के रूप में स्वीकार करके, अनन्य भक्ति भाव से केवल उन परमेश्वर की ही निरंतर आराधना करे। (भागवत 11.2.37)

कवि कहते हैं कि वास्तव में भगवान् के अतिरिक्त कोई भी स्वतंत्र सत्ता नहीं है। आत्मा और यह जगत दोनों वास्तविक हैं, किन्तु दोनों भगवान् पर आश्रित हैं। फिर भी अविद्या के कारण जीव स्वयं को भगवान् से पृथक् और संसार को ही अपना सर्वस्व मान बैठता है।

जैसे स्वप्न में मन की कल्पना से अनेक दृश्य वास्तविक प्रतीत होते हैं, अथवा जाग्रत अवस्था में मनुष्य अपनी कल्पनाओं और मनोरथों में खोकर एक अलग ही संसार रच लेता है, उसी प्रकार जीव संसार में शरीर, धन, सम्बन्ध, सुख-दुःख आदि को 'मेरा' और 'मैं' मान लेता है। यही भ्रम/भ्रान्ति है। 

इसलिए बुद्धिमान मनुष्य को चाहिए कि वह संसार से जुड़े संकल्पों, इच्छाओं और कल्पनाओं में भटकने वाले मन को वश में करे और उसे भगवान् की ओर लगा दे। जब मन भगवान् में स्थिर हो जाता है और संसार की आसक्ति तथा 'मैं' और 'मेरा' की भ्रान्ति से मुक्त हो जाता है, तब जीव अभय परम पद अर्थात् भगवान् की प्राप्ति कर लेता है।

एक सरल उदाहरण- मान लीजिए, आपने सिनेमा देखा। पर्दा, प्रोजेक्टर और चलचित्र वास्तविक हैं। लेकिन यदि कोई दर्शक फिल्म को ही अंतिम सत्य मानकर उसमें इतना डूब जाए कि अपनी वास्तविक स्थिति भूल जाए, तो उसका मोह स्वप्न के समान है।

इसलिए लज्जा और संकोच छोड़कर भगवान की दिव्य लीला, नाम और गुणों का निरन्तर कीर्तन करना चाहिए। साथ ही, किसी व्यक्ति, वस्तु या स्थान में आसक्त हुए बिना जीवन बिताना चाहिए। जो मनुष्य इस प्रकार का शुद्ध जीवन और दृढ़ नियम अपनाता है, उसके हृदय में भगवान के नाम-कीर्तन से प्रेम का अंकुर फूट पड़ता है। उसका मन भगवान के प्रेम में पिघल जाता है। तब वह साधारण लोगों की सोच और व्यवहार से ऊपर उठ जाता है।

ऐसा भक्त दिखावे के कारण नहीं, बल्कि स्वाभाविक प्रेम के कारण भगवान के प्रेम में डूबा रहता है। कभी वह आनन्द से हँस पड़ता है, कभी प्रेम में रोने लगता है। कभी ऊँचे स्वर में भगवान को पुकारता है, तो कभी मधुर स्वर में उनके गुणों का गान करता है। और जब उसे अपने प्रिय प्रभु की उपस्थिति का अनुभव होता है, तब वह उन्हें प्रसन्न करने के लिए प्रेम से नृत्य भी करने लगता है।

यह आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, ग्रह, नक्षत्र, सभी प्राणी, दिशाएँ, वृक्ष, वनस्पतियाँ, नदियाँ और समुद्र, ये सब भगवान का ही विराट स्वरूप हैं। ऐसा अनुभव करके भक्त अपने सामने आने वाले प्रत्येक प्राणी और यहाँ तक कि निर्जीव वस्तुओं में भी भगवान का दर्शन करता है और सबको भगवान का रूप मानकर श्रद्धा से प्रणाम करता है।
भक्तिः परेशानुभवो विरक्तिः
अन्यत्र चैष त्रिक एककालः ।
प्रपद्यमानस्य यथाश्नतस्स्युः
तुष्टिः पुष्टिः क्षुदपायोऽनुघासम् ॥ 
जैसे भोजन करनेवालेको प्रत्येक ग्रासके साथ ही तुष्टि (तप्ति अथवा सुख), पुष्टि (जीवनशक्तिका संचार) और क्षुधा-निवृत्तिये तीनों एक साथ होते जाते हैं; वैसे ही जो मनुष्य भगवान्की शरण लेकर उनका भजन करने लगता है, उसे भजनके प्रत्येक क्षणमें भगवान्के प्रति प्रेम, अपने प्रेमास्पद प्रभुके स्वरूपका अनुभव और उनके अतिरिक्त अन्य वस्तुओंमें वैराग्य-इन तीनोंकी एक साथ ही प्राप्ति होती जाती है। (भागवत 11.2.42)

तीन प्रकार के भक्त

राजा निमिने पूछा, “योगीश्वर! अब आप कृपा करके भगवान के भक्त का लक्षण वर्णन कीजिये। भक्त का क्या धर्म हैं और कैसा स्वभाव होता है? वह मनुष्योंके साथ व्यवहार करते समय कैसा आचरण करता है, क्या बोलता है? और किन लक्षणोंके कारण भगवान्का प्यारा होता है?”

  1. उत्तम भक्त
    हरि योगीश्वर कहते हैं की जो प्रत्येक जीव में भगवान का ही स्वरूप देखता है और यह भी अनुभव करता है कि सभी जीव और यह सम्पूर्ण जगत भगवान में ही स्थित हैं, वही उत्तम भागवत है। ऐसे भक्त की दृष्टि में कोई छोटा-बड़ा, अपना-पराया या ऊँच-नीच नहीं होता। उसे हर जगह केवल भगवान ही दिखाई देते हैं।

    वह इन्द्रियों द्वारा संसार की वस्तुओं को देखता और उनका अनुभव तो करता है, लेकिन न तो मनपसन्द वस्तु मिलने पर बहुत प्रसन्न होता है और न ही अप्रिय वस्तु मिलने पर द्वेष करता है। वह जानता है कि यह सब भगवान की माया है। जन्म, मृत्यु, भूख, प्यास, थकान, दुःख, भय और इच्छाएँ शरीर और मन के स्वाभाविक धर्म हैं। लेकिन जो भगवान के स्मरण में इतना स्थिर रहता है कि इन सबसे विचलित नहीं होता, वही उत्तम भागवत है।

    जिसके मन में विषय-भोग की इच्छा, कर्मों की लालसा और वासनाएँ समाप्त हो चुकी हैं, और जिसका मन केवल भगवान वासुदेव में ही लगा रहता है, वही श्रेष्ठ भक्त है। 

    जिसे अपने कुल, जन्म, तपस्या, जाति, वर्ण या आश्रम का अभिमान नहीं है, वह भगवान का अत्यन्त प्रिय भक्त है।

    जो धन, शरीर और संसार की किसी वस्तु में "यह मेरा है" और "यह दूसरे का है" ऐसा भेद नहीं करता, बल्कि सबमें एक ही परमात्मा का दर्शन करता है, जो हर परिस्थिति में शान्त और समभाव में रहता है, वही उत्तम भक्त है।
  2. मध्यम भक्त
    मध्यम भक्त के चार प्रकार के व्यवहार होते हैं:
    1. भगवान से प्रेम करता है।
    2. भगवान के भक्तों से मित्रता रखता है।
    3. दुःखी और अज्ञानी लोगों पर दया करता है।
    4. जो भगवान से द्वेष करते हैं, उनसे दूरी बनाए रखता है।
  3. साधारण भक्त
    जो श्रद्धा से भगवान की मूर्ति की पूजा तो करता है, लेकिन भगवान के भक्तों की सेवा नहीं करता और अन्य लोगों के प्रति प्रेम व सम्मान का भाव नहीं रखता, वह साधारण श्रेणी का भक्त है।
जो पुरुष बड़े-बड़े देवताओं और ऋषियोंके द्वारा वन्दनीय भगवान्के चरणकमलोंकी सेवा और स्मरणसे क्षणभरके लिये भी विमुख नहीं होता, तथा त्रिभुवनका राज्य मिलनेपर भी भगवत्स्मृतिको नहीं छोड़ता, वही भक्तोंमें श्रेष्ठ है।

भगवान्के चरणकमलोंका आश्रय पाकर जिसके हृदयका विरह, शोक और संसारका संताप सदा-सर्वदाके लिये मिट गया है, उसमें वह दुःख फिर कभी लौटकर नहीं आता। जो भगवान् श्रीहरिको प्रेमकी डोरीसे अपने हृदयमें बाँध लेता है, उसे वे एक क्षणके लिये भी नहीं छोड़ते। वही वास्तवमें भगवान्के भक्तोंमें अग्रगण्य है।

सारांश: JKYog India Online Class- श्रीमद् भागवत कथा [हिन्दी]- 03.07.2026