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130- दत्तात्रेय के 24 गुरु 2: पिंगला से भृंगी कीड़े तक- अनासक्ति, भगवदाकारता और आत्मसाक्षात्कार की शिक्षा

Jul 24th, 2026 | 7 Min Read
Blog Thumnail

Category: Bhagavat Purana

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Language: Hindi

श्रीमद्भागवत महापुराण- स्कन्ध: 11 अध्याय: 8 & 9

श्रीदत्तात्रेय महाराज यदुको आगे कहते हैं की अब मैं तुम्हें अपने चौबीसवें गुरुओं में से एक पिंगलाकी शिक्षा सुनाता हूँ। बहुत समय पहले मिथिला नगरी में पिंगला नाम की एक वेश्या रहती थी। मैंने उससे भी एक महान शिक्षा प्राप्त की।

एक रात वह सुन्दर वस्त्र और आभूषण पहनकर अपने घर के द्वार पर खड़ी हो गई। वह किसी ऐसे धनी व्यक्ति की प्रतीक्षा कर रही थी, जो उसके पास आए और उसे बहुत-सा धन दे। जो भी व्यक्ति वहाँ से गुजरता, वह सोचती, ‘‘शायद यही मेरे पास आ रहा है।’’ लेकिन वह आगे निकल जाता। तब वह फिर आशा बाँध लेती कि ‘‘अब कोई और धनी व्यक्ति आएगा और मुझे बहुत धन देगा।’’

इस प्रकार उसकी आशा बढ़ती ही गई। वह कभी बाहर खड़ी रहती, कभी घर के भीतर जाती। प्रतीक्षा करते-करते आधी रात बीत गई, लेकिन कोई भी उसके पास नहीं आया। धीरे-धीरे वह थक गई। उसका मन दुःखी हो गया। 

तब उसे यह अनुभव हुआ कि धन और संसार की आशा ही उसके दुःख का कारण है। उसी समय उसके मन में वैराग्य जाग गया। उसने समझ लिया कि जब तक मनुष्य आशाओं में बँधा रहता है, तब तक उसे शान्ति नहीं मिल सकती।

तब उसने सोचा, ‘‘मैं व्यर्थ ही नश्वर मनुष्यों से सुख और धन की आशा करती रही। यदि मैं भगवान से प्रेम करती और उन्हीं पर आश्रित रहती, तो मुझे सच्चा सुख मिल जाता।’’

जब पिंगलाके चित्तमें इस प्रकार वैराग्यकी भावना जाग्रत् हुई, तब उसने एक गीत गाया।

पिङ्गलाने कहा, "हाय! मैं इन्द्रियोंके वश होकर नश्वर विषयों और तुच्छ मनुष्योंसे सुखकी आशा करती रही, जबकि मेरे हृदयमें ही सच्चे स्वामी भगवान् विराजमान हैं, जो वास्तविक प्रेम और आनन्दके दाता हैं। विषयभोगकी लालसामें मैंने अपने शरीर और जीवनको व्यर्थ कष्ट दिया। यह शरीर भी नश्वर और अशुद्ध है, फिर भी मैं इसीसे सुख चाहती रही। अब मैं समझ गयी हूँ कि विषयभोग कभी सुख नहीं देते, वे केवल दुःख और बन्धनका कारण हैं। भगवान्की कृपासे मुझे वैराग्य प्राप्त हुआ है। 

“अब मैं समस्त दुराशाओंका त्याग करके भगवान्की शरण ग्रहण करती हूँ, प्रारब्धमें जो मिले उसीमें सन्तोष रखूँगी और अपने हृदयस्थित प्रभुके साथ ही आनन्दपूर्वक रहूँगी। भगवान्के अतिरिक्त जीवकी रक्षा करनेवाला कोई नहीं है; अतः विषयोंसे विरक्त होकर उन्हींकी शरण लेनी चाहिये।"

श्रीदत्तात्रेय कहते हैं, “हे राजन्! यह निश्चय करके पिंगला ने धन और विषय-सुख की आशा छोड़ दी और शान्त मन से जाकर अपने बिस्तर पर सो गई। उस रात उसे ऐसा सुकून मिला, जैसा उसे पहले कभी नहीं मिला था।
मैंने उससे यह शिक्षा ली कि आशा सबसे बड़ा दुःख है और आशाओं का त्याग सबसे बड़ा सुख। जब पिंगला ने मनुष्यों से सुख पाने की आशा छोड़ दी, तभी उसे सच्ची शान्ति और सुख की नींद मिली।”

कुरर पक्षीकी चोंच में मांस का एक टुकड़ा था। उसे देखकर दूसरे बलवान पक्षी उसे छीनने के लिए उस पर चोंच मारने लगे। लेकिन जैसे ही उसने मांस का टुकड़ा छोड़ दिया, उसे तुरंत शान्ति और सुख मिल गया। मैंने उससे यह शिक्षा ली है की मनुष्य जिन वस्तुओं को बहुत प्रिय मानकर उनका संग्रह करता है, वही आगे चलकर उसके दुःख का कारण बनती हैं। जो बुद्धिमान व्यक्ति यह समझकर किसी भी वस्तु में आसक्ति नहीं रखता और संग्रह नहीं करता, उसे परमात्मा की प्राप्ति होती है।

मुझे मान या अपमानका कोई ध्यान नहीं है और घर एवं परिवारवालोंको जो चिन्ता होती है, वह मुझे नहीं है। मैं अपने आत्मामें ही रमता हूँ और अपने साथ ही क्रीडा करता हूँ। यह शिक्षा मैंने बालकसेली है। अतः उसीके समान मैं भी मौजसे रहता हूँ। इस जगत्में दो ही प्रकारके व्यक्ति निश्चिन्त और परमानन्दमें मग्न रहते हैं- एक तो भोलाभाला बालक और दूसरा वह पुरुष जो गुणातीत हो गया हो।

एक बार एक कुमारी कन्याके घर उसे वरण करनेके लिये कुछ लोग आये। घरके लोग बाहर थे, इसलिये वह स्वयं उनका आतिथ्य करने लगी। भोजनकी तैयारीके लिये जब वह धान कूटने लगी, तब उसकी शंखकी चूड़ियाँ बजने लगीं। 

लज्जावश उसने एक-एक करके सब चूड़ियाँ तोड़ दीं और अन्तमें प्रत्येक हाथमें केवल एक-एक चूड़ी रहने दी। जब दोनों कलाइयोंमें केवल एक-एक चूड़ी रह गयी तब किसी प्रकारकी आवाज नहीं हुई।
उस समय इधर-उधर घूमताघामता मैं भी वहाँ पहुँच गया था।

मैंने उससे यह शिक्षा ग्रहण की कि जब बहुत लोग एक साथ रहते हैं तब कलह होता है और दो आदमी साथ रहते हैं तब भी बातचीत तो होती ही है; इसलिये कुमारी कन्याकी चूड़ीके समान अकेले ही विचरना चाहिये।

मैंने देखा था कि एक बाण बनाने वाला कारीगर बाण बनाने में इतना तन्मय हो रहा था कि उसके पास से ही दलबल के साथ राजा की सवारी निकल गई और उसे पता तक न चला। मैंने उससे यह शिक्षा ली कि साधक आसन और श्वासको जीतकर वैराग्य और अभ्यासके द्वारा अपने मनको वशमें कर ले और फिर बड़ी सावधानीके साथ उसे एक लक्ष्यमें लगा दे। जब मन परमात्मामें स्थित हो जाता है, तब कर्मवासनाएँ नष्ट हो जाती हैं और रजोगुण तथा तमोगुण शान्त होकर चित्त निर्मल एवं स्थिर हो जाता है। ऐसा साधक बाहर-भीतरकी सुध खो देता है।

मैंने साँपसे यह शिक्षा ली कि साधकको सर्पकी भाँति एकाकी, अनासक्त और अप्रसिद्ध रहना चाहिये।
उसे किसी स्थान या आश्रयका मोह नहीं रखना चाहिये, न मठ या घर बनानेके बन्धनमें पड़ना चाहिये। जैसे साँप दूसरोंके बनाये बिलमें रहकर निश्चिन्त रहता है, वैसे ही साधकको भी शरीरके लिये घर बनानेकी चिन्ता छोड़कर जो सहज उपलब्ध हो, उसीमें संतोषपूर्वक निवास करना चाहिये।

श्रीदत्तात्रेय कहते हैं की अब मैं तुम्हें मकड़ी से मिली शिक्षा सुनाता हूँ। मैंने देखा कि जैसे मकड़ी अपने शरीर से जाला निकालती है, उसी में रहती है और समय आने पर उसे फिर अपने भीतर समेट लेती है, वैसे ही परमेश्वर भी इस जगत्को अपनेमेंसे उत्पन्न करते हैं, उसमें जीवरूपसे विहार करते हैं और फिर उसे अपनेमें लीन कर लेते हैं।

इस प्रकार मैंने मकड़ी से यह शिक्षा ली कि यह सम्पूर्ण जगत भगवान से ही उत्पन्न होता है, उन्हीं में स्थित रहता है और अन्त में उन्हीं में लीन हो जाता है। मैंने भृंगी कीड़े से यह शिक्षा ली कि यदि कोई प्राणी प्रेम, द्वेष या भय, किसी भी कारण से एकाग्र होकर निरन्तर किसी का चिन्तन करता है, तो धीरे-धीरे उसका मन उसी के अनुरूप हो जाता है।

मैंने देखा कि भृंगी एक कीड़े को पकड़कर अपने बिल में बंद कर देता है। वह कीड़ा भय के कारण लगातार उसी भृंगी का चिन्तन करता रहता है और अन्त में उसी के समान रूप धारण कर लेता है। इसी प्रकार मनुष्य जिस वस्तु या व्यक्ति का निरन्तर चिन्तन करता है, उसका मन भी वैसा ही बन जाता है। इसलिए साधक को सदैव भगवान का चिन्तन करना चाहिए।
अहो हरि! औहै दिन कब ऐहैं?
रूप, माधुरी निशि दिन ध्यावत, मन भृंगी बनि जैहैं।
श्रीदत्तात्रेय आगे कहते हैं, “हे राजन्! अब मैं तुम्हें बताता हूँ कि मैंने अपने शरीर से क्या शिक्षा ली। यह शरीर भी मेरा गुरु है। इससे मैंने सीखा कि यह नश्वर है और एक दिन अवश्य नष्ट हो जाएगा। यद्यपि इसी शरीर के द्वारा आत्मज्ञान प्राप्त किया जा सकता है, फिर भी इसे अपना नहीं मानना चाहिए और इससे आसक्ति नहीं रखनी चाहिए।

“मनुष्य इसी शरीर के सुख के लिए धन, परिवार और अनेक वस्तुओं का संग्रह करता है। जीवन भर परिश्रम करता है, लेकिन अंत में शरीर नष्ट हो जाता है और जीव फिर नए जन्म के बंधन में पड़ जाता है। मैंने यह भी देखा कि शरीर की इन्द्रियाँ मनुष्य को अलग-अलग दिशाओं में खींचती रहती हैं। जिह्वा स्वाद चाहती है, कान मधुर शब्द सुनना चाहते हैं, आँखें सुन्दर रूप देखना चाहती हैं, नाक सुगन्ध की ओर दौड़ती है, त्वचा सुखद स्पर्श चाहती है और अन्य इन्द्रियाँ भी अपने-अपने विषयों की ओर मन को खींचती रहती हैं।

“भगवान ने अनेक प्रकार की योनियाँ बनाई, लेकिन मनुष्य शरीर सबसे श्रेष्ठ बनाया, क्योंकि इसी के द्वारा भगवान की प्राप्ति हो सकती है। यद्यपि यह शरीर नश्वर है, फिर भी यह मोक्ष का साधन है। इसलिए बुद्धिमान मनुष्य को मृत्यु आने से पहले ही भगवान की प्राप्ति का प्रयास करना चाहिए। केवल विषय-भोगों में यह दुर्लभ जीवन नहीं गँवाना चाहिए।

“हे राजन्! यही विचार करके मुझे संसार से वैराग्य हो गया। अब मैं बिना किसी आसक्ति और अहंकार के आनन्दपूर्वक विचरण करता हूँ। मैंने इन चौबीस गुरुओं से यह शिक्षाएँ ग्रहण की हैं। अंत में मैंने यह भी समझा कि केवल गुरु से सुन लेना ही पर्याप्त नहीं है। मैंने यह भी समझा कि केवल गुरु से सुनना ही पर्याप्त नहीं है। मनुष्य को स्वयं भी विचार करके सत्य को समझना चाहिए।”
  • श्रवण: गुरु से भगवान के संबंध में सुनना।
  • मनन: सुनी हुई बात पर अपनी बुद्धि से विचार करना, शंकाओं का समाधान करना और ज्ञान को दृढ़ करना।
  • निदिध्यासन: उस ज्ञान में बार-बार मन को स्थिर करना, उसका निरंतर चिंतन करना और उसे जीवन में उतार देना, जिससे वह प्रत्यक्ष अनुभूति बन जाए।
भगवान श्रीकृष्ण ने उद्धव से कहा, “हे उद्धव! इस प्रकार अवधूत दत्तात्रेय ने राजा यदु को उपदेश दिया। राजा यदु ने उनकी वन्दना की और उनके उपदेश को ग्रहण करके आसक्ति से मुक्त तथा समदर्शी हो गए।”

सारांश: JKYog India Online Class- श्रीमद् भागवत कथा [हिन्दी]- 20.07.2026