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129- दत्तात्रेय के 24 गुरु, भाग 1: पृथ्वी से मछली तक, जीवन को दिशा देने वाली अमूल्य शिक्षाएँ

Jul 19th, 2026 | 10 Min Read
Blog Thumnail

Category: Bhagavat Purana

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Language: Hindi

श्रीमद्भागवत महापुराण- स्कन्ध: 11 अध्याय: 7 & 8

यदुने अवधूत दत्तात्रेयजीसे पूछा कि वे संसारमें पूर्णतः निर्लिप्त और आनन्दमय रहकर कैसे विचरण करते हैं। तब दत्तात्रेयजीने बताया कि उन्होंने प्रकृतिके विभिन्न रूपोंसे शिक्षा ग्रहण की है और उनके चौबीस गुरु हैं- पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, अग्नि, चन्द्रमा, सूर्य, कबूतर, अजगर, समुद्र, पतंग, मधुमक्खी, हाथी, मधुहा, हरिण, मछली, पिङ्गला, कुरर पक्षी, बालक, कुँआरी कन्या, बाण बनानेवाला, सर्प, मकड़ी और भृंगी कीट।

दत्तात्रेयजी कहतें हैं की पृथ्वीसे मैंने धैर्य, क्षमा और परोपकार सीखा। जैसे पृथ्वी सबके आघात सहकर भी विचलित नहीं होती, वैसे ही साधकको दूसरोंके व्यवहारसे क्रोधित हुए बिना अपने मार्गपर अटल रहना चाहिये। और जैसे पर्वत तथा वृक्ष अपना सर्वस्व दूसरोंके हितमें अर्पित कर देते हैं, वैसे ही साधुपुरुषका जीवन भी लोककल्याणके लिये होना चाहिये।

मैंने वायुसे यह शिक्षा ली कि साधक केवल जीवन-निर्वाहके लिये आवश्यक वस्तुओंका ही ग्रहण करे, इन्द्रियतृप्तिके लिये विषयोंकी इच्छा न करे। जैसे वायु सबके बीच विचरकर भी किसीके गुण-दोषसे लिप्त नहीं होती, वैसे ही साधक भी संसारमें रहते हुए अनासक्त रहे और अपने लक्ष्यसे विचलित न हो। जैसे वायु गन्धका वहन करती है, पर उससे लिप्त नहीं होती, वैसे ही आत्मज्ञानी शरीरके सुख-दुःखका अनुभव करते हुए भी उनसे निर्लिप्त रहता है।

मैंने आकाशसे यह शिक्षा ली कि जैसे आकाश सबमें व्याप्त होकर भी एक, अखण्ड और असंग रहता है, वैसे ही एक परमात्मा सभी प्राणियोंमें समान रूपसे स्थित है। शरीरोंके भेदसे वह भिन्न प्रतीत होता है, पर वास्तवमें एक ही है। जैसे आकाश सृष्टि और उसके समस्त परिवर्तनोंसे अछूता रहता है, वैसे ही आत्मा भी जन्म, मृत्यु और जगत्के समस्त विकारोंसे सर्वथा निर्लिप्त रहती है।

जलसे मैंने शुद्धता, मधुरता और लोकपावनता सीखी। साधकका स्वभाव भी ऐसा होना चाहिये कि उसके दर्शन, स्पर्श, वचन और संगसे लोगोंका कल्याण हो।

मैंने अग्निसे यह शिक्षा ली कि साधक तेजस्वी, तपस्वी, अल्पसंग्रही और इन्द्रियजित हो। जैसे अग्नि सब कुछ ग्रहण करके भी उससे लिप्त नहीं होती, वैसे ही साधक विषयोंके सम्पर्कमें रहकर भी निर्लिप्त रहे। जैसे अग्नि कहीं प्रकट और कहीं अप्रकट रहती है, वैसे ही साधक भी समयानुसार अपनेको प्रकट या गुप्त रखे। और जैसे अग्नि विभिन्न लकड़ियोंमें भिन्न-भिन्न रूपसे दिखाई देती है, पर स्वयं उनसे भिन्न रहती है, वैसे ही एक आत्मा भी विभिन्न शरीरोंमें भिन्न प्रतीत होती है, पर वास्तवमें उनसे सर्वथा असंग रहती है।

मैंने चन्द्रमा से यह शिक्षा ली कि समय के प्रभाव से चन्द्रमा की कलाएँ घटती और बढ़ती दिखाई देती हैं, लेकिन चन्द्रमा स्वयं न तो घटता है और न ही बढ़ता है। वह सदा वही रहता है। इसी प्रकार जन्म से लेकर मृत्यु तक शरीर में बचपन, युवावस्था, बुढ़ापा जैसी अनेक अवस्थाएँ आती-जाती रहती हैं, लेकिन आत्मा पर उनका कोई प्रभाव नहीं पड़ता। आत्मा सदा एक समान रहती है।

जैसे आग की लपट या दीपक की लौ हर क्षण बदलती रहती है, फिर भी हमें वह लगातार जलती हुई ही दिखाई देती है, वैसे ही तेज़ी से बहते हुए काल के कारण शरीर हर क्षण बदलता रहता है। उसमें हर पल नई कोशिकाएँ बनती हैं और पुरानी नष्ट होती रहती हैं, लेकिन अज्ञान के कारण हमें यह परिवर्तन दिखाई नहीं देता।

मैंने सूर्य से यह शिक्षा ली कि जैसे सूर्य अपनी किरणों से पृथ्वी का जल ऊपर खींच लेते हैं और समय आने पर वर्षा के रूप में उसे वापस लौटा देते हैं, वैसे ही एक योगी अपनी इन्द्रियों से आवश्यकता के अनुसार विषयों का उपयोग करता है और समय आने पर उनका सहज ही त्याग भी कर देता है। वह किसी भी विषय में आसक्त नहीं होता।

मैंने सूर्य से एक और शिक्षा ली। अलग-अलग पात्रों में भरे जल में सूर्य के अनेक प्रतिबिम्ब दिखाई देते हैं। देखने वाले को लगता है कि हर पात्र में अलग-अलग सूर्य है, लेकिन वास्तव में सूर्य एक ही होता है। इसी प्रकार शरीरों के भेद से ऐसा लगता है कि प्रत्येक जीव की आत्मा अलग है, परन्तु यह अज्ञान के कारण होने वाला भ्रम है। वास्तव में आत्मा एक ही है। जैसे सूर्य अनेक नहीं होता, वैसे ही आत्मा भी स्वरूप से एक ही है, उसमें कोई भेद नहीं है।

मैंने कबूतर से यह शिक्षा ली कि किसी भी व्यक्ति या वस्तु में अत्यधिक मोह और आसक्ति नहीं करनी चाहिए। अधिक आसक्ति मनुष्य की स्वतंत्र सोच को समाप्त कर देती है और अंत में उसे दुःख ही देती है।
एक जंगल में एक कबूतर और कबूतरी रहते थे। उन्होंने एक पेड़ पर घोंसला बनाया था और कई वर्षों तक प्रेमपूर्वक साथ रहे।

धीरे-धीरे उनका एक-दूसरे के प्रति मोह इतना बढ़ गया कि सोते, घूमते, खाते, खेलते हर समय साथ रहते और बातें करते। दोनों का मन पूरी तरह एक-दूसरे में ही लगा रहता था।

समय आने पर कबूतरी ने अंडे दिए और उनसे छोटे-छोटे बच्चे निकले। माता-पिता दोनों अपने बच्चों से बहुत प्रेम करते थे। वे उनका लालन-पालन करते, उनकी मीठी आवाज़ सुनकर आनन्दित होते और उनकी छोटी-छोटी चेष्टाएँ देखकर प्रसन्न हो जाते।

एक दिन दोनों अपने बच्चों के लिए दाना चुगने जंगल चले गए। उसी समय एक बहेलिया वहाँ आया। उसने बच्चों को घोंसले के पास देखा और जाल बिछाकर उन्हें पकड़ लिया।

जब कबूतरी दाना लेकर लौटी, तो उसने अपने बच्चों को जाल में तड़पते देखा। यह दृश्य देखकर वह इतनी व्याकुल हो गई कि अपने दुःख में स्वयं को भी भूल गई और बच्चों को बचाने के लिए सीधे जाल में जा फँसी।
कुछ देर बाद कबूतर भी लौटा। उसने देखा कि उसके बच्चे और उसकी प्रिय पत्नी, दोनों जाल में फँसे हुए हैं। वह शोक से भरकर विलाप करने लगा।

वह कहने लगा, “हाय! मेरा सब कुछ नष्ट हो गया। मेरी प्रिय पत्नी और मेरे बच्चे चले गए। अब मेरे जीवन का क्या अर्थ रह गया? मैं इस सूने घर में किसके लिए जीवित रहूँ?”
अपने दुःख और मोह में वह इतना अन्धा हो गया कि सब कुछ सामने देखते हुए भी स्वयं उसी जाल में कूद पड़ा।

बहेलिया बहुत प्रसन्न हुआ। अब उसके जाल में कबूतर, कबूतरी और उनके सभी बच्चे आ चुके थे। वह उन सबको लेकर वहाँ से चला गया।

श्रीदत्तात्रेय कहते हैं, “जो मनुष्य अपने परिवार, धन और सांसारिक सम्बन्धों में ही अपना सारा सुख मानता है और भगवान को भूल जाता है, उसका अन्त भी उस कबूतर जैसा होता है। उसे कभी सच्ची शान्ति नहीं मिलती।
“यह मनुष्य शरीर भगवान की प्राप्ति और मुक्ति का दुर्लभ अवसर है। यदि इसे पाकर भी मनुष्य केवल घर-परिवार के मोह में ही फँसा रहे, तो वह बहुत ऊँचे स्थान पर पहुँचकर भी नीचे गिर जाता है। शास्त्र ऐसे मनुष्य को 'आरूढ़च्युत' कहते हैं। अर्थात् जिसे ऊँची स्थिति मिलने का अवसर मिला, लेकिन मोह के कारण वह उससे गिर पड़ा।”

श्रीदत्तात्रेय कहते हैं, “हे राजन्! जैसे मनुष्य चाहे या न चाहे, अपने पिछले कर्मों के अनुसार उसे दुःख मिल ही जाते हैं, वैसे ही इन्द्रियों के सुख भी समय आने पर बिना विशेष प्रयत्न के मिल जाते हैं। इसलिए जो मनुष्य सुख और दुःख का यह रहस्य समझता है, वह इनके पीछे भागता नहीं और न ही इन्हें पाने या टालने के लिए व्यर्थ प्रयास करता है।

“मैंने अजगर से यह शिक्षा ली है कि बिना माँगे और बिना इच्छा किए जो कुछ सहज रूप से मिल जाए, उसी में सन्तोष करना चाहिए। चाहे भोजन साधारण हो या स्वादिष्ट, कम हो या अधिक, उसी से जीवन चलाना चाहिए और मन को शान्त रखना चाहिए। 

“जैसे अजगर कई दिनों तक भोजन न मिलने पर भी धैर्य से पड़ा रहता है, वैसे ही मनुष्य को भी धैर्य रखना चाहिए और जो भगवान की इच्छा से मिले, उसी में सन्तुष्ट रहना चाहिए। अजगर के शरीर में शक्ति होते हुए भी वह अनावश्यक दौड़-भाग नहीं करता। उसी प्रकार साधक के पास मन की शक्ति, इन्द्रियों की शक्ति और शरीर की शक्ति होने पर भी उसे व्यर्थ की चंचलता और अनावश्यक कर्मों में नहीं पड़ना चाहिए। आवश्यकता होने पर ही कर्म करे और बाकी समय भगवान के स्मरण में स्थित रहे।”

दत्तात्रेय आगे कहते हैं की मैंने समुद्र से यह शिक्षा ली कि साधक को हर परिस्थिति में प्रसन्न, शान्त और गम्भीर रहना चाहिए। उसका हृदय समुद्र की तरह गहरा, विशाल और स्थिर होना चाहिए। किसी भी घटना से उसका मन विचलित नहीं होना चाहिए।

मैंने समुद्र से एक और शिक्षा ली। वर्षा ऋतु में अनेक नदियों का जल उसमें आकर मिलता है, फिर भी वह अपने किनारे छोड़कर उफनता नहीं। और गर्मी में जब नदियों का जल कम हो जाता है, तब भी वह दुःखी या छोटा नहीं हो जाता।

उसी प्रकार भगवान का भक्त धन, मान, सुख या अन्य सांसारिक वस्तुएँ मिलने पर बहुत प्रसन्न नहीं होता और उनके चले जाने पर दुःखी भी नहीं होता। वह हर परिस्थिति में समभाव और सन्तोष बनाए रखता है।
मैंने पतंगे से यह शिक्षा ली कि रूप और सौन्दर्य के आकर्षण में पड़ना मनुष्य के पतन का कारण बन सकता है।

पतंगा अग्नि की चमक देखकर उसकी ओर खिंचा चला जाता है। उसे यह समझ नहीं आता कि यही प्रकाश उसके विनाश का कारण बनेगा। अंत में वह अग्नि में गिरकर जल जाता है। उसी प्रकार जो मनुष्य रूप, सौन्दर्य और बाहरी आकर्षण में फँस जाता है, वह अपने विवेक को खो देता है और अंत में दुःख पाता है। 

इसलिए साधक को चाहिए कि वह इन्द्रियों के आकर्षण से सावधान रहे और बाहरी चमक-दमक में फँसकर अपने जीवन का लक्ष्य न भूल जाए। संन्यासीको चाहिये कि गृहस्थोंको किसी प्रकारका कष्ट न देकर भौंरेकी तरहअपना जीवन-निर्वाह करे। वह अपने शरीरके लिये उपयोगी रोटीके कुछ टुकड़े कई घरोंसे माँग ले।

जिस प्रकार भौंरा विभिन्न पुष्पोंसे–चाहे वे छोटे हों या बड़े-उनका सार संग्रह करता है, वैसे ही बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि छोटे-बड़े सभी शास्त्रोंसे उनका सार उनका रस निचोड़ ले।

मैंने मधुमक्खी से यह शिक्षा ली कि साधक, विशेषकर संन्यासी, को आवश्यकता से अधिक संग्रह नहीं करना चाहिए। उसे केवल उतना ही ग्रहण करना चाहिए, जितना उस समय की आवश्यकता हो। उसके लिए भिक्षा लेने का पात्र उसके हाथ ही हैं और भोजन रखने का पात्र उसका पेट ही है।

मधुमक्खियाँ जीवन भर परिश्रम करके शहद इकट्ठा करती हैं, लेकिन अंत में उसका उपयोग वे स्वयं नहीं कर पातीं। कोई दूसरा आकर सारा शहद ले जाता है और कई बार मधुमक्खियों का जीवन भी संकट में पड़ जाता है।

इसी प्रकार जो मनुष्य आवश्यकता से अधिक संग्रह करता है, वह उसी संग्रह के कारण चिन्ता, भय और दुःख में पड़ जाता है। इसलिए साधक को चाहिए कि वह आवश्यकता भर ही ग्रहण करे, संग्रह न करे और भगवान पर विश्वास रखकर सन्तोषपूर्वक जीवन बिताए।

मैंने हाथीसे यह शिक्षा ली कि विषयासक्ति साधकके बन्धनका कारण है। जैसे हथिनीके मोहमें पड़कर हाथी बँध जाता है, वैसे ही जो पुरुष इन्द्रियविषयोंके आकर्षणमें फँस जाता है, उसका पतन हो जाता है। इसलिये साधकको विषय भोगसे सदा सावधान रहना चाहिये।

मैंने मधु निकालने वाले मधुवा से यह शिक्षा ली कि लोभी मनुष्य जीवन भर बड़ी मेहनत से धन और वस्तुओं का संग्रह करता रहता है, लेकिन न तो उनका सदुपयोग करता है और न ही उन्हें दान देता है। अंत में उसका संचित धन किसी और के काम आ जाता है।

जैसे मधुमक्खियाँ परिश्रम करके शहद इकट्ठा करती हैं, लेकिन उससे पहले ही मधु निकालने वाला आकर सारा शहद ले जाता है, वैसे ही लोभी मनुष्य का संचित धन भी अन्त में कोई दूसरा ही भोगता है।
मैंने हिरण से यह शिक्षा ली कि साधक को इन्द्रियों को आकर्षित करने वाले गीत, संगीत और विषय-भोग बढ़ाने वाले मनोरंजन से सावधान रहना चाहिए।

हिरण मधुर स्वर सुनकर इतना मोहित हो जाता है कि उसे अपने चारों ओर का भी ध्यान नहीं रहता। इसी अवसर का लाभ उठाकर शिकारी उसे पकड़ लेता है। इसी प्रकार यदि साधक विषय-वासनाओं को बढ़ाने वाले गीत, संगीत या मनोरंजन में आसक्त हो जाए, तो उसका मन भगवान से हटकर संसार की ओर चला जाता है और वह आध्यात्मिक मार्ग से भटक सकता है। इसका एक उदाहरण ऋष्यशृंग मुनि हैं। वे अत्यन्त पवित्र और तपस्वी थे, लेकिन स्त्रियों के गीत, संगीत और नृत्य के आकर्षण में पड़कर उनके वश में हो गए।

मैंने मछली से यह शिक्षा ली कि स्वाद का लोभ मनुष्य के पतन का कारण बन सकता है। जैसे मछली काँटे में लगे चारे के स्वाद के लोभ में फँस जाती है और अपने प्राण गँवा देती है, वैसे ही जो मनुष्य स्वाद का दास बन जाता है, वह भी अपने विवेक को खो देता है और दुःख पाता है।

मैंने यह भी देखा कि साधक अन्य इन्द्रियों को तो अपेक्षाकृत आसानी से वश में कर सकता है, लेकिन जिह्वा, अर्थात् स्वाद की इच्छा को जीतना सबसे कठिन है। केवल भोजन कम कर देने या उपवास करने से भी जिह्वा पूरी तरह वश में नहीं होती। कई बार उसकी इच्छा और अधिक बढ़ जाती है।

इसलिए जब तक मनुष्य अपनी जिह्वा पर नियन्त्रण नहीं पा लेता, तब तक उसे पूर्ण जितेन्द्रिय नहीं कहा जा सकता। लेकिन यदि वह स्वाद की लालसा पर विजय पा ले, तो समझो उसने बाकी सभी इन्द्रियों पर भी बहुत हद तक विजय प्राप्त कर ली है।

सारांश: JKYog India Online Class- श्रीमद् भागवत कथा [हिन्दी]- 17.07.2026