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126- निमि-योगीश्वर संवाद: माया क्या है? इसे पार करने का उपाय और प्रेमभक्ति के उदय का रहस्य

Jul 9th, 2026 | 10 Min Read
Blog Thumnail

Category: Bhagavat Purana

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Language: Hindi

श्रीमद्भागवत महापुराण- स्कन्ध: 11 अध्याय: 3

राजा निमिने पूछा की भगवान्की माया ऐसी दुस्तर है कि बड़े-बड़े ज्ञानी भी उससे मोहित होकर उसके वास्तविक स्वरूपको नहीं जान पाते। अतः कृपा करके उसके स्वरूपका वर्णन कीजिये। मैं मृत्युके अधीन एक साधारण मनुष्य हूँ और संसारके विविध तापोंसे दीर्घकालसे संतप्त हूँ। आप जो भगवत्कथारूपी अमृतका पान करा रहे हैं, वही उन सब दुःखोंकी एकमात्र औषधि है। इस अमृतसे मेरा मन तृप्त नहीं होता; अतः कृपा करके आगे भी भगवान्की कथा सुनाइये।
एभिर्भूतानि भूतात्मा महाभूतैर्महाभुज ।
ससर्जोच्चावचान्याद्यः स्वमात्रात्मप्रसिद्धये ॥
अब तीसरे योगीश्वर अन्तरिक्षजीने कहा, “राजन्! आदि-पुरुष परमात्मा जिस शक्तिसे सम्पूर्ण भूतोंके कारण बनते हैं और उनके विषय-भोग तथा मोक्षकी सिद्धिके लिये अथवा अपने उपासकोंकी उत्कृष्ट सिद्धिके लिये स्वनिर्मित पंचभूतोंके द्वारा नाना प्रकारके देव, मनुष्य आदि शरीरोंकी सृष्टि करते हैं, उसीको माया कहते हैं ।” (भागवत 11.3.3)

अर्थात्- भगवान की माया का वास्तविक स्वरूप शब्दों में पूरी तरह नहीं बताया जा सकता। इसलिए उसे उसके कार्यों से समझना चाहिए।
भगवान जिस शक्ति के द्वारा इस सम्पूर्ण सृष्टि की रचना करते हैं, उसी शक्ति को माया कहते हैं।
इसी माया के द्वारा भगवान पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश (पाँच महाभूतों) से देवता, मनुष्य, पशु-पक्षी और अन्य सभी प्रकार के शरीरों की रचना करते हैं।
इन शरीरों के माध्यम से जीव अपने कर्मों के अनुसार सुख-दुःख का अनुभव करता है। इसी मार्ग से कोई संसार के भोगों को प्राप्त करता है और कोई भगवान की भक्ति करके मोक्ष तथा भगवान की प्राप्ति करता है।

भगवान की माया क्या है

अन्तरिक्षजी आगे कहते हैं की भगवान पाँच महाभूतों से बने हुए सभी शरीरों में अन्तर्यामी रूप से प्रवेश करते हैं। फिर वे मन, पाँच ज्ञानेन्द्रियों और पाँच कर्मेन्द्रियों के द्वारा जीव को संसार का अनुभव कराते हैं। परन्तु जीव शरीर को ही अपना वास्तविक स्वरूप मान लेता है। वह इन्द्रियों के द्वारा विषयों का भोग करता है और शरीर तथा संसार में आसक्त हो जाता है। फिर जीव कर्मेन्द्रियों से अनेक कर्म करता है। अच्छे कर्मों का फल सुख और बुरे कर्मों का फल दुःख भोगता है। इस प्रकार वह जन्म-मृत्यु के चक्र में घूमता रहता है। यही भगवान की माया है।

इस प्रकार जीव अपने कर्मों के अनुसार अनेक प्रकार के सुख-दुःख और जन्म-मरण का अनुभव करता रहता है। एक जन्म के बाद दूसरा जन्म और फिर मृत्यु, यह क्रम चलता ही रहता है। यही भगवान की माया है।

जब प्रलय का समय आता है, तब अनन्त काल की शक्ति इस सम्पूर्ण दिखाई देने वाली सृष्टि को धीरे धीरे उसके मूल कारण की ओर समेटना आरम्भ करती है।

सबसे पहले वर्षा रुक जाती है।
एक दो वर्ष नहीं, पूरे सौ वर्षों तक वर्षा नहीं होती। भयंकर सूखा पड़ जाता है। सूर्य का ताप अत्यन्त बढ़ जाता है और वह तीनों लोकों को तपाने और जलाने लगता है। जो संसार कभी हरा भरा और जीवन से परिपूर्ण दिखाई देता था, वही सूखने लगता है।

फिर प्रचण्ड अग्नि प्रकट होती है।
अनन्त शेषनाग के मुख से भयंकर अग्नि निकलती है। वायु के प्रबल वेग से वह पाताल से ऊपर उठती हुई चारों ओर फैल जाती है और सम्पूर्ण सृष्टि को जलाने लगती है।

इसके बाद जल का प्रलय आरम्भ होता है।
संवर्तक मेघ प्रकट होते हैं। वे साधारण बादल नहीं होते। उनसे हाथी की सूँड़ जैसी मोटी जलधाराएँ गिरती हैं। सौ वर्षों तक निरन्तर वर्षा होती रहती है। धीरे धीरे पूरा ब्रह्माण्ड जल में डूब जाता है।

अब विराट सृष्टि का रूप समाप्त होने लगता है।
जैसे ईंधन समाप्त हो जाने पर अग्नि स्वयं शान्त हो जाती है, वैसे ही विराट पुरुष अपना विराट शरीर छोड़कर सूक्ष्म अव्यक्त अवस्था में लीन हो जाते हैं।

लेकिन प्रलय यहीं समाप्त नहीं होता।
अब सृष्टि केवल नष्ट नहीं होती, बल्कि एक एक तत्त्व अपने कारण में लौटने लगता है।
  • पृथ्वी अपना गन्ध गुण खोकर जल में लीन हो जाती है।
  • जल अपना रस गुण खोकर अग्नि में लीन हो जाता है।
  • अग्नि अपना रूप गुण खोकर वायु में लीन हो जाती है।
  • वायु अपना स्पर्श गुण खोकर आकाश में लीन हो जाती है।
  • आकाश अपना शब्द गुण खोकर तामस अहंकार में लीन हो जाता है।
  • फिर इन्द्रियाँ और बुद्धि राजस अहंकार में लीन हो जाती हैं।
  • मन और उसके अधिष्ठाता देवता सात्त्विक अहंकार में लीन हो जाते हैं।
  • इसके बाद तीनों प्रकार के अहंकार महत्तत्त्व में लीन हो जाते हैं।
  • महत्तत्त्व प्रकृति में लीन हो जाता है।
  • और अन्ततः प्रकृति भी परम ब्रह्म में लीन हो जाती है।
यही भगवान की माया का आश्चर्य है। जो पृथ्वी हमें इतनी ठोस और स्थायी दिखाई देती है, वह अन्ततः पृथ्वी नहीं रहती। जो जल वास्तविक लगता है, वह भी अपने कारण में समा जाता है। अग्नि, वायु, आकाश, इन्द्रियाँ, बुद्धि, मन, अहंकार, सब एक एक करके लीन हो जाते हैं। अर्थात् जिसे हम स्थायी संसार समझकर पकड़कर बैठे हैं, वह वास्तव में भगवान की शक्ति से प्रकट हुआ एक अस्थायी विस्तार है। समय आने पर वही शक्ति सम्पूर्ण सृष्टि को परत दर परत समेटकर पुनः उसके मूल में लीन कर देती है।
  • सृष्टि का प्रकट होना माया है।
  • उसका वास्तविक और स्थायी प्रतीत होना माया है।
  • और अन्त में उसका अपने कारण में लीन हो जाना भी उसी माया की शक्ति है।
फिर भगवान की इच्छा से इसी क्रम के उलटे क्रम में पुनः सृष्टि की रचना होती है।

माया को सरलता से कैसे पार कर सकते हैं?

अन्तरिक्षजी ने कहा, “हे राजन्! यही भगवान की त्रिगुणमयी माया है, जो सृष्टि की रचना, पालन और प्रलय का कार्य करती है। मैंने इसका संक्षेप में वर्णन किया। अब आप आगे क्या सुनना चाहते हैं?”

“महर्षिजी! जिन लोगों ने अपने मन को वश में नहीं किया है, उनके लिए भगवान की माया को पार करना बहुत कठिन है। कृपा करके बताइए कि जो लोग शरीर को ही अपना स्वरूप मानते हैं और जिनकी समझ अधिक गहरी नहीं है, वे भी इस माया को सरलता से कैसे पार कर सकते हैं?”

तब चौथे योगीश्वर प्रबुद्धजी बोले, “हे राजन्! संसार में स्त्री-पुरुष के सम्बन्ध और अन्य बन्धनों में बँधे हुए लोग सुख पाने और दुःख दूर करने के लिए अनेक बड़े-बड़े कर्म करते रहते हैं। लेकिन जो मनुष्य माया से पार होना चाहता है, उसे ध्यान से देखना चाहिए कि इन कर्मों का फल प्रायः उलटा ही होता है। मनुष्य सुख चाहता है, पर उसे दुःख मिलता है। वह दुःख मिटाना चाहता है, पर उसका दुःख और बढ़ता जाता है।

धन को ही देखो। उसे कमाना कठिन है, उसकी रक्षा करना कठिन है और उसके कारण चिन्ता भी बढ़ती है। धन के मोह में पड़कर मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को भूल जाता है। इसी प्रकार घर, पुत्र, परिवार, सम्बन्धी, पशु और अन्य सम्पत्तियाँ भी नाशवान हैं। यदि मनुष्य इन्हें पा भी ले, तो इनसे स्थायी सुख और शान्ति कैसे मिल सकती है?

जो मनुष्य माया से पार जाना चाहता है, उसे यह भी समझना चाहिए कि मृत्यु के बाद मिलने वाले स्वर्ग आदि लोक भी स्थायी नहीं हैं। वे भी सीमित कर्मों के सीमित फल हैं। वहाँ भी दूसरों से होड़ रहती है। अपने समान लोगों से स्पर्धा, अधिक सुख और वैभव वालों से ईर्ष्या, और कम सुख वाले लोगों के प्रति तिरस्कार का भाव हो सकता है। और जब पुण्य कर्मों का फल समाप्त हो जाता है, तब वहाँ से नीचे गिरना ही पड़ता है। इसलिए वहाँ भी नाश और पतन का भय बना रहता है।
तस्माद् गुरुं प्रपद्येत जिज्ञासुः श्रेय उत्तमम् ।
शाब्दे परे च निष्णातं ब्रह्मण्युपशमाश्रयम् ॥
इसलिए, जो परम कल्याणका जिज्ञासु हो, उसे चाहिए कि वह बिना किसी देरी के एक प्रामाणिक गुरु की शरण ग्रहण करे। वह गुरु ऐसा होना चाहिए जो शब्द-ब्रह्म (वेदों और शास्त्रों के ज्ञान) में पूर्ण रूप से निपुण हो, परमात्मा के साक्षात् अनुभव में पूरी तरह स्थित हो (भगवत् प्राप्त महापुरुष), और जिसने अपने मन और इंद्रियों को शांत करके सांसारिक विकारों से सर्वथा रहित परम शांति का आश्रय ले लिया हो। (भागवत 11.3.21)

जिज्ञासु को चाहिए कि वह गुरु को अपना परम प्रिय, अपना सच्चा हितैषी और इष्टदेव के समान माने। निष्कपट भाव से उनकी सेवा करे और उनके पास रहकर भागवत धर्म की शिक्षा ग्रहण करे। उन भक्ति-साधनों को केवल सुने ही नहीं, बल्कि जीवन में करना भी सीखे, जो भगवान की प्राप्ति कराते हैं। इन्हीं भक्ति-साधनों से सर्वात्मा भगवान प्रसन्न होते हैं और अपने प्रेमी भक्त को स्वयं अपने स्वरूप तक का दान कर देते हैं।

भक्ति कैसे करें? 

  • साधक पहले शरीर, सन्तान और सांसारिक पदार्थोंमें आसक्ति घटाना सीखे। भगवान्के भक्तोंसे प्रेम तथा समस्त प्राणियोंके प्रति यथायोग्य दया, मैत्री और विनयका निष्कपट भाव रखे।
  • वह बाह्य और आन्तरिक पवित्रता, स्वधर्मपालन, सहनशीलता, मौन, स्वाध्याय, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसाका अभ्यास करे तथा शीत-उष्ण, सुख-दुःख आदि द्वन्द्वोंमें समभाव रखे। 
  • सभी जीवों के भीतर आत्मा को चैतन्य प्रदान करने वाले भगवान् हैं और बाहर सम्पूर्ण जगत् की व्यवस्था, संचालन और नियन्त्रण करने वाले भी भगवान् ही हैं, इस सत्य को समझें और सदैव आत्मसात् करें।
  • एकान्तका सेवन करे, किसी स्थानमें ‘यही मेरा घर है’ ऐसी ममता न रखे और प्रारब्धसे जो मिले, उसीमें सन्तुष्ट रहे।
  • भगवत्प्राप्तिका मार्ग बतानेवाले शास्त्रोंमें श्रद्धा रखे, किसी शास्त्रकी निन्दा न करे तथा मन, वाणी, कर्म और इन्द्रियोंका संयम करे। सत्य बोले और मनको विषयोंमें भटकनेसे रोके।
  • भगवान्के दिव्य जन्म, कर्म, गुण और लीलाओंका श्रवण, कीर्तन और ध्यान करे तथा शरीरसे होनेवाली प्रत्येक चेष्टा भगवान्के लिये करे। यज्ञ, दान, तप, जप, सदाचार, स्त्री, पुत्र, घर, जीवन, प्राण और अपनी प्रत्येक प्रिय वस्तु भगवान्के चरणोंमें समर्पित कर दे।
  • जिन संतों ने भगवान् श्रीकृष्णको अपना आत्मा और स्वामी जान लिया है, उनसे प्रेम करे। समस्त प्राणियोंकी सेवा करे और विशेष रूपसे परोपकारी सज्जनों तथा भगवत्प्रेमी संतोंका संग करे।
  • भगवान्के पवित्र यश और लीलाओंकी ही परस्पर चर्चा करे। भक्तोंके साथ प्रेमपूर्वक रहे, उन्हींके संग सन्तोष और आध्यात्मिक शान्तिका अनुभव करे तथा धीरे-धीरे संसारकी आसक्तिसे निवृत्त हो।
प्रबुद्धजी बोले, "श्रीकृष्ण राशि-राशि पापोंको एक क्षणमें भस्म कर देते हैं। सब उन्हींका स्मरण करें और एक-दूसरेको स्मरण करावें। इस प्रकार साधन-भक्तिका अनुष्ठान करते-करते प्रेमभक्तिका उदय हो जाता है और भक्त का शरीर रोमांचित हो जाता है।"

प्रेमभक्तिका उदय होने पर क्या होता है?

  • प्रेमभक्तिका उदय होनेपर भाकर के हृदय की दशा बहुत अद्भुत होती है। कभी वह सोचने लगता है, “अब तक भगवान नहीं मिले! मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? किससे पूछूँ? कौन मुझे भगवान तक पहुँचाएगा?” ऐसा सोचते-सोचते वह रोने लगता है।
  • कभी भगवान की किसी लीला का स्मरण हो जाता है। जैसे यह देखकर कि सर्वशक्तिमान भगवान गोपियों के डर से छिप रहे हैं, वह खिलखिलाकर हँसने लगता है।
  • कभी भगवान के प्रेम और दर्शन का अनुभव करके आनन्द में डूब जाता है। कभी संसार की साधारण अवस्था से ऊपर उठकर भगवान से बातें करने लगता है। कभी ऐसा मानकर कि भगवान स्वयं सुन रहे हैं, उनके गुणों का गान करने लगता है। कभी नाच-नाचकर उन्हें प्रसन्न करने का प्रयास करता है।
  • कभी भगवान को अपने पास न पाकर उन्हें इधर-उधर खोजने लगता है। और कभी उनके साथ गहरी एकता और निकटता का अनुभव करके परम शान्ति में डूब जाता है और चुप हो जाता है।
प्रबुद्धजी कहतें हैं की जो मनुष्य इस प्रकार भागवत धर्म की शिक्षा ग्रहण करके उसका पालन करता है, उसे प्रेम-भक्ति प्राप्त हो जाती है। वह पूरी तरह भगवान नारायण की शरण में स्थित होकर उस माया को भी सरलता से पार कर जाता है, जिससे निकलना अत्यन्त कठिन है।

नारायण कौन है?

राजा निमिने पूछा, "महर्षियो! आप परमात्मतत्त्वके श्रेष्ठ ज्ञाता हैं। कृपा करके बताइये कि ‘नारायण’ नामसे वर्णित परब्रह्म परमात्माका वास्तविक स्वरूप क्या है?”

पाँचवें योगीश्वर पिप्पलायनजीने कहा की राजन्! जो संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयका निमित्त तथा उपादान, दोनों कारण हैं, किन्तु स्वयं कारणरहित हैं; जो जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति, तीनों अवस्थाओंके साक्षी हैं और समाधिमें भी एकरस रहते हैं; जिनकी सत्तासे शरीर, इन्द्रियाँ, प्राण और अन्तःकरण अपने-अपने कार्य करते हैं- उसी परम सत्यको ‘नारायण’ जानिये।

वह परमतत्त्व मन, वाणी, बुद्धि और इन्द्रियोंकी पहुँचसे परे है। नेत्र उसे देख नहीं सकते, वाणी उसका पूर्ण वर्णन नहीं कर सकती और बुद्धि उसे सीमित नहीं कर सकती। श्रुतियाँ भी ‘नेति-नेति’ कहकर समस्त सीमित धारणाओंका निषेध करती हुई उसी स्वयंप्रकाश सत्यकी ओर संकेत करती हैं।

सृष्टिके पूर्व केवल वही एक परम सत्य था। वही अपनी अनन्त शक्तियोंसे प्रकृति, महत्तत्त्व, सूत्रात्मा और अहंकारके रूपमें वर्णित होता है। समस्त इन्द्रियाँ, उनके विषय, अधिष्ठाता देवता तथा सम्पूर्ण दृश्य-अदृश्य जगत् उसीकी शक्तिका विस्तार हैं। कार्य और कारण, सब उसीमें स्थित हैं और इन सबसे परे भी वही है।

वह आत्मस्वरूप न जन्म लेता है, न मरता है; न बढ़ता है, न घटता है। वह भूत, भविष्य और वर्तमानके समस्त परिवर्तनोंका साक्षी, सर्वव्यापक और अविनाशी है। वह जाननेवाला अथवा जाने जानेवाला कोई सीमित विषय नहीं, स्वयं ज्ञानस्वरूप है।

जैसे एक ही प्राण विभिन्न शरीरों और कार्योंके कारण अनेक नामोंसे जाना जाता है, वैसे ही एक ज्ञानस्वरूप आत्मा इन्द्रियोंकी भिन्नतासे अनेक प्रतीत होता है। सुषुप्तिमें इन्द्रियाँ और अहंकार लीन हो जाते हैं, फिर भी जागनेपर मनुष्य स्मरण करता है की ‘मैं सुखसे सोया था।’ यह स्मृति उस अवस्थामें भी साक्षी आत्माकी उपस्थितिको सिद्ध करती है।

राजन्! जब भगवान् कमलनाभके चरणकमलोंकी प्राप्तिके लिये तीव्र भक्ति की जाती है, तब वही भक्ति अग्निकी भाँति चित्तके समस्त मलको जला देती है। चित्त शुद्ध होते ही आत्मतत्त्वका साक्षात्कार हो जाता है, जैसे नेत्र निर्मल होनेपर सूर्यका प्रकाश स्वयं प्रकट हो जाता है।

सारांश: JKYog India Online Class- श्रीमद् भागवत कथा [हिन्दी]- 06.07.2026