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119- दन्तवक्र का उद्धार, बलरामजी की तीर्थयात्रा और कृष्ण-सुदामा की अद्भुत मित्रता

Jun 15th, 2026 | 11 Min Read
Blog Thumnail

Category: Bhagavat Purana

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Language: Hindi

श्रीमद्भागवत महापुराण- स्कन्ध: 10 अध्याय: 78-81

शाल्व, शिशुपाल और पौण्ड्रकके मारे जानेके बाद उनका मित्र दन्तवक्त्र प्रतिशोध लेनेके लिये अकेला ही गदा लेकर युद्धभूमिमें आ पहुँचा। वह अत्यन्त क्रोधित था और भगवान् श्रीकृष्णको ललकारते हुए बोला कि आज वह अपने मित्रोंकी मृत्युका प्रतिशोध लेगा।

भगवान् श्रीकृष्ण भी रथसे उतरकर गदा हाथमें लेकर उसके सामने खड़े हो गये। दन्तवक्त्रने कटु वचन कहनेके बाद पूरी शक्ति से भगवान्पर गदासे प्रहार किया, किन्तु भगवान्पर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। 

तब भगवान् श्रीकृष्णने अपनी कौमोदकी गदासे दन्तवक्त्रके वक्षःस्थलपर प्रहार किया। उस एक ही प्रहारसे उसका हृदय फट गया और वह रक्त उगलता हुआ भूमि पर गिर पड़ा। दन्तवक्त्रकी मृत्युके बाद सबने देखा कि उसके शरीरसे एक दिव्य ज्योति निकलकर भगवान् श्रीकृष्णमें विलीन हो गयी, जैसे पहले शिशुपालके साथ हुआ था।

दन्तवक्त्रके वधके बाद उसका भाई विदूरथ अत्यन्त क्रोधित होकर ढाल और तलवार लिये भगवान् श्रीकृष्णपर आक्रमण करने आया। जैसे ही वह प्रहार करनेके लिये आगे बढ़ा, भगवान्ने सुदर्शन चक्रसे उसका सिर धड़से अलग कर दिया। इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णने शाल्व, उसके मायावी सौभ विमान, दन्तवक्त्र और विदूरथ इन सभी शक्तिशाली शत्रुओंका संहार कर दिया।

बलरामजी की तीर्थयात्रा और उनके हाथसे सूतजी का वध

जब बलरामजीने सुना कि कौरव और पाण्डव युद्धकी तैयारी कर रहे हैं, तब उन्होंने सोचा कि वे किसी भी पक्षका समर्थन नहीं करेंगे। इसलिए युद्धसे दूर रहनेके लिये वे तीर्थयात्रापर निकल पड़े।

उन्होंने प्रभासक्षेत्रमें स्नान, तर्पण और दानादि कर्म सम्पन्न किये। इसके बाद सरस्वती नदीके तटपर स्थित पृथूदक, बिन्दुसर, त्रितकूप, सुदर्शन, विशाल, ब्रह्म और चक्रतीर्थ जैसे अनेक पवित्र तीर्थों का दर्शन किया। फिर यमुना और गंगाके प्रमुख तीर्थोंकी यात्रा करते हुए वे नैमिषारण्य पहुँचे।

उस समय नैमिषारण्यमें अनेक महान् ऋषि दीर्घकालीन सत्संग और यज्ञमें संलग्न थे। बलरामजीको देखकर सभी ऋषि सम्मानपूर्वक खड़े हो गये, उनका स्वागत किया और उन्हें आदरपूर्वक आसन प्रदान किया।

जब बलरामजी बैठ गये, तब उनकी दृष्टि व्यासजीके शिष्य रोमहर्षण सूतपर पड़ी, जो व्यासगद्दीपर विराजमान थे और उनके आगमनपर न तो उठे, न ही उन्होंने सम्मान प्रकट किया। इसपर बलरामजीको क्रोध आ गया ।

वे कहने लगे, “यह रोमहर्षण प्रतिलोम जातिका होनेपर भी इन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे तथा धर्मके रक्षक हमलोगोंसे ऊपर बैठा हुआ है। भगवान् व्यासदेवका शिष्य होकर इसने बहुत-से शास्त्रोंका अध्ययन भी किया है; परन्तु अभी इसका अपने मनपर संयम नहीं है। ऐसे दम्भी और अहंकारी व्यक्तियोंको दण्ड देना ही धर्मकी रक्षा है।”

ऐसा कहकर बलरामजीने अपने हाथमें धारण किये हुए कुशके अग्रभागसे रोमहर्षणको स्पर्श किया, जिससे उनकी तत्काल मृत्यु हो गयी।

रोमहर्षणकी मृत्युके बाद ऋषि-मुनि दुःखी हो गये। उन्होंने बलरामजीसे कहा, “प्रभो! रोमहर्षणको व्यासगद्दीपर बैठानेका अधिकार हमने ही दिया था और अपने यज्ञकी समाप्तितक उसे दीर्घायुका वरदान भी दिया था। इसलिए उसका वध उचित नहीं हुआ। यद्यपि आप सर्वशक्तिमान् हैं, फिर भी लोकशिक्षाके लिये आपको इसका प्रायश्चित्त करना चाहिये।”

बलरामजीने विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया, “मैं लोककल्याण और लोकशिक्षाके लिये अवश्य प्रायश्चित्त करूँगा। आप लोग जो उचित समझें, वही बताइये। साथ ही ऐसा उपाय भी बताइये जिससे मेरे कार्यका प्रभाव भी बना रहे और आपका वरदान भी असत्य न हो।”

तब ऋषियोंने कहा कि रोमहर्षणके पुत्रको उसके स्थानपर पुराणकथा कहनेका अधिकार दिया जाये। बलरामजीने इसे स्वीकार किया और अपने योगबलसे उसे दीर्घायु, बल तथा योग्यताका आशीर्वाद प्रदान किया।

बलरामजी द्वारा बल्वल का उद्धार

इसके बाद ऋषियोंने बलरामजीसे एक और कार्य करनेका अनुरोध किया। ऋषियोंने कहा,“बलरामजी! इल्वलका पुत्र बल्वल नामका एक भयंकर दानव है। वह प्रत्येक पर्वपर यहाँ आ पहुँचता है और हमारे इस सत्रको दूषित कर देता है। वह यहाँ आकर पीब, खून, विष्ठा, मूत्र, शराब और मांसकी वर्षा करने लगता है। आप उस पापीको मार डालिये। हमलोगोंकी यह बहुत बड़ी सेवा होगी ।

“इसके बाद आप एकाग्रचित्तसे तीर्थों में स्नान करते हुए बारह महीनोंतक भारतवर्षकी परिक्रमा करते हुए विचरण कीजिये। इससे आपकी शुद्धि हो जायगी।”

श्रीशुकदेवजी कहते हैं, “परीक्षित्! पर्वका दिन आते ही बल्वल दानव यज्ञको दूषित करनेके लिये आया। उसके आगमनसे भयंकर आँधी चली, धूल उड़ने लगी और वातावरण अपवित्र हो गया। फिर उसने यज्ञशालापर मल-मूत्र आदि अपवित्र वस्तुओंकी वर्षा की।
कुछ ही देरमें वह स्वयं हाथमें त्रिशूल लिये प्रकट हुआ। उसका रूप अत्यन्त विशाल और भयावह था। उसे देखकर बलरामजीने अपने दिव्य शस्त्र, हल और मूसलका स्मरण किया, जो तुरंत उनके पास आ गये।

बलरामजीने अपने हलसे बल्वलको आकाशसे खींचकर नीचे गिराया और फिर मूसलसे उसके मस्तकपर प्रहार किया। उस एक ही प्रहारसे उसका सिर फट गया और वह धरतीपर गिरकर मारा गया।

बल्वलके वधसे ऋषि-मुनि अत्यन्त प्रसन्न हुए। उन्होंने बलरामजीकी स्तुति की, उनका अभिषेक किया तथा दिव्य वस्त्र, आभूषण और वैजयन्ती माला अर्पित की।”

इसके बाद बलरामजी ऋषियोंसे विदा लेकर उनके निर्देशानुसार अपनी तीर्थयात्रा आगे बढ़ानेके लिये कौशिकी और अन्य पवित्र तीर्थोंकी ओर प्रस्थान कर गये। वे सरयू, प्रयाग, पुलहाश्रम, गण्डकी, गोमती, विपाशा और सोन नदी आदि तीर्थोंमें स्नान करते हुए गया पहुँचे, जहाँ उन्होंने पितरोंका श्राद्ध और तर्पण किया।

फिर गंगासागर, महेन्द्र पर्वत और परशुरामजीके दर्शन करके वे दक्षिण भारतकी ओर गये। मार्गमें उन्होंने गोदावरी, पम्पा, भीमरथी आदि नदियोंमें स्नान किया, कार्तिकेयजी तथा श्रीशैलमें शिवजीके दर्शन किये और वेंकटाचल, कामाक्षी, विष्णुकांची तथा श्रीरंगक्षेत्र जैसे प्रमुख तीर्थोंकी यात्रा की।

इसके बाद वे ऋषभ पर्वत, दक्षिण मथुरा और सेतुबन्ध पहुँचे, जहाँ उन्होंने ब्राह्मणोंको दस हजार गौओंका दान दिया। फिर कृतमाला, ताम्रपर्णी और मलय पर्वत होते हुए अगस्त्य मुनिसे भेंट की तथा कन्याकुमारीमें देवीके दर्शन किये।

आगे चलकर उन्होंने अनन्तशयन क्षेत्र, केरल, त्रिगर्त, गोकर्ण, आर्यादेवीका तीर्थ, शूर्पारक, तापी, पयोष्णी, निर्विन्ध्या, दण्डकारण्य और नर्मदा तटके अनेक पवित्र स्थानोंका दर्शन किया। यात्रा के दौरान उन्होंने अनेक तीर्थोंमें स्नान किया और दान-पुण्य किया।

बलरामजी ने रोकना चाहा दुर्योधन-भीमसेन युद्ध

अन्ततः तीर्थयात्रा पूर्ण करके वे पुनः प्रभासक्षेत्र पहुँचे। वहाँ उन्हें ज्ञात हुआ कि कौरव-पाण्डव युद्धमें अधिकांश क्षत्रियोंका संहार हो चुका है और पृथ्वीका भार बहुत हदतक कम हो गया है।
जिस दिन रणभूमिमें भीमसेन और दुर्योधन गदायुद्ध कर रहे थे, उसी दिन बलरामजी उन्हें रोकनेके लिये कुरुक्षेत्र जा पहुँचे।

बलरामजीने भीम और दुर्योधनसे कहा, “तुम दोनों महान् योद्धा हो। भीमसेन बलमें श्रेष्ठ हैं और दुर्योधन गदायुद्धकी शिक्षामें। इसलिए इस युद्धमें किसीकी स्पष्ट विजय या पराजय सम्भव नहीं दिखती। अतः यह संघर्ष छोड़ दो।”

किन्तु दोनोंके बीचका वैर इतना गहरा हो चुका था कि उन्होंने बलरामजीकी सलाह नहीं मानी। तब बलरामजीने समझ लिया कि यह सब उनके प्रारब्धके अनुसार हो रहा है। इसलिए उन्होंने अधिक आग्रह नहीं किया और वहाँसे द्वारका लौट गये।

द्वारकामें कुछ समय रहनेके बाद वे पुनः नैमिषारण्य गये। वहाँ ऋषियोंके आग्रहपर उन्होंने अनेक यज्ञ सम्पन्न कराये और उन्हें तत्त्वज्ञानका उपदेश दिया। उनके उपदेशसे ऋषियोंको समदृष्टि और आत्मज्ञानकी अनुभूति हुई।

राजा परीक्षित्ने शुकदेवजी से भगवान् श्रीकृष्णकी दूसरी लीलाएँ सुनाने का आग्रह किया। जब राजा परीक्षित्ने इस प्रकार प्रश्न किया, तब श्रीशुकदेवजीने सुदामा की कथा सुनाना आरम्भ किया। 

सुदामा निकले कृष्ण से मिलने

सुदामा नाम का एक ब्राह्मण भगवान् श्रीकृष्णके परम मित्र थे। वे बड़े ब्रह्मज्ञानी, विषयोंसे विरक्त, शान्तचित्त और जितेन्द्रिय और अत्यन्त निर्धन थे। वे गृहस्थ होते हुए भी संग्रह नहीं करते थे और प्रारब्धसे जो कुछ मिल जाता, उसीमें सन्तुष्ट रहते थे। उनकी पत्नी भी उनके समान ही अभावोंमें जीवन बिता रही थी।

एक दिन उनकी पत्नीने विनम्रतापूर्वक कहा, “भगवान् श्रीकृष्ण आपके बालसखा हैं। वे भक्तोंके दुःख दूर करनेवाले और ब्राह्मणोंपर विशेष कृपा करनेवाले हैं। आप उनसे मिलने द्वारका जाइये। वे आपके कष्ट अवश्य दूर करेंगे।”

बार-बार आग्रह करनेपर सुदामाजीने सोचा, “धन मिले या न मिले, श्रीकृष्णके दर्शन तो अवश्य होंगे।” यह सोचकर उन्होंने द्वारका जानेका निश्चय कर लिया।

तब ब्राह्मणीने पड़ोससे चार मुट्ठी चिउड़े माँगकर एक कपड़ेमें बाँध दिये और वही भेंट सुदामाजीको दे दी। वे मार्गमें यह सोचते जाते थे कि ‘मुझे भगवान् श्रीकृष्णके दर्शन कैसे प्राप्त होंगे?’ 

द्वारिका में कृष्ण ने किया सुदामा का प्रेमपूर्ण स्वागत

सुदामाजी द्वारका पहुँचे और अनेक सुरक्षा-द्वारोंको पार करते हुए श्रीकृष्णके महलतक पहुँच गये। वहाँ चारों ओर वैभव और ऐश्वर्यकी अद्भुत छटा थी। अन्ततः वे उस महलमें पहुँचे जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण रुक्मिणीजीके साथ विराजमान थे। जैसे ही भगवान् श्रीकृष्णकी दृष्टि अपने बालसखा सुदामाजीपर पड़ी, वे तुरंत अपने आसनसे उठ खड़े हुए और बड़े प्रेमसे उनके पास गये।

भगवान्ने सुदामाजीको हृदयसे लगा लिया। अपने प्रिय सखाके दर्शन और स्पर्शसे वे इतने भावविह्वल हो गये कि उनके नेत्रोंसे प्रेमाश्रु बहने लगे। भगवान् श्रीकृष्ण सुदामाजीको आदरपूर्वक अपने आसनपर ले गये और उनका बड़े सम्मानसे स्वागत किया। उन्होंने स्वयं उनके चरण धोये, चरणोदक अपने सिरपर धारण किया और चन्दन आदि लगाकर उनकी पूजा की। फिर धूप, दीप, पान और गौदानके साथ मधुर वचनोंमें उनका सत्कार किया।

सुदामाजी अत्यन्त दरिद्र अवस्था में थे। उनके वस्त्र फटे-पुराने थे और शरीर दुर्बल था। फिर भी भगवान् श्रीकृष्णने उनमें अपने प्रिय सखा और पूज्य ब्राह्मणका ही दर्शन किया। यहाँ तक कि रुक्मिणीजी भी स्वयं उनकी सेवा करने लगीं।

भगवान् श्रीकृष्णका यह प्रेम और सम्मान देखकर अन्तःपुरकी स्त्रियाँ आश्चर्यचकित रह गयीं। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि यह साधारण-से दिखनेवाले ब्राह्मण कौन हैं, जिनके प्रति स्वयं द्वारकाधीश इतना आदर और स्नेह प्रकट कर रहे हैं।

कृष्ण-सुदामा की गुरुकुल की मधुर स्मृतियाँ 

भगवान् श्रीकृष्ण और सुदामाजी हाथ पकड़कर गुरुकुलके दिनोंकी मधुर स्मृतियाँ करने लगे।श्रीकृष्णने कहा, “सुदामा! गुरुकुलसे लौटनेके बाद क्या आपने अपने अनुरूप विवाह किया? मैं जानता हूँ कि गृहस्थ जीवनमें रहते हुए भी आपका मन विषय-भोगों और धन-संपत्तिमें आसक्त नहीं है। ऐसे विरले ही लोग होते हैं, जो सांसारिक वासनाओंसे मुक्त रहकर केवल लोककल्याण और धर्मपालनके लिये कर्म करते हैं।

मित्र! क्या तुम्हें हमारे गुरुकुलके दिन याद हैं? वास्तवमें गुरुकुलमें ही मनुष्य ऐसा ज्ञान प्राप्त करता है, जिससे वह अज्ञानके अन्धकारसे पार हो जाता है। इस संसारमें जन्म देनेवाला पिता प्रथम गुरु है। उपनयन और सदाचारकी शिक्षा देनेवाला आचार्य दूसरा गुरु है। और जो आत्मज्ञान देकर परमात्माकी प्राप्ति कराता है, वह गुरु तो मेरे ही स्वरूप हैं। इन गुरुओंका आदर और सेवा करना मनुष्यका महान् कर्तव्य है।

प्रिय मित्र! जो लोग गुरुदेवके उपदेशका पालन करते हैं, वे सहज ही जीवनका सच्चा उद्देश्य प्राप्त कर लेते हैं। मैं स्वयं सबके हृदयमें स्थित हूँ, फिर भी विभिन्न धार्मिक कर्मोंसे उतना प्रसन्न नहीं होता, जितना गुरुदेवकी श्रद्धापूर्वक सेवा और शुश्रूषासे प्रसन्न होता हूँ।”

फिर श्रीकृष्णने कहा, “क्या तुम्हें वह घटना याद है, जब गुरुपत्नीने हम दोनोंको जंगलसे ईंधन लाने भेजा था? वहाँ अचानक भयंकर आँधी और वर्षा आ गयी। चारों ओर अन्धकार छा गया और हम दिशाभ्रमित होकर रातभर एक-दूसरेका हाथ पकड़कर जंगलमें भटकते रहे, परन्तु गुरुदेवकी सेवाके लिये डटे रहे।

प्रातःकाल गुरुदेव सान्दीपनि मुनि हमें खोजते हुए वहाँ पहुँचे। उन्होंने हमारे कष्ट और गुरुसेवाभावको देखकर अत्यन्त प्रसन्न होकर कहा कि सच्चे शिष्य वही हैं जो अपने सुख-दुःखकी परवाह किये बिना गुरुकी सेवा करते हैं। फिर उन्होंने हमें आशीर्वाद दिया कि हमारा वेदाध्ययन सफल हो और हमारे सभी मनोरथ पूर्ण हों। मित्र! गुरुकुलमें रहते हुए ऐसी अनेक घटनाएँ हुई थीं। गुरुदेवकी कृपासे ही मनुष्य शान्ति और पूर्णताको प्राप्त करता है।”

सुदामा ने भी कहा, “प्रभो! आपके साथ गुरुकुलमें रहनेका सौभाग्य ही मेरे जीवनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है। आप स्वयं समस्त ज्ञान और वेदोंके मूल स्रोत हैं। आपका गुरुकुलमें रहकर अध्ययन करना भी आपकी मनुष्य-लीलाका ही एक अद्भुत अभिनय है।”

कृष्ण ने खाए सुदामा के तंदुल

भगवान् श्रीकृष्ण अपने प्रिय सखा सुदामाजीके साथ प्रेमपूर्वक वार्तालाप करते रहे। फिर मुसकराकर बोले, “सुदामा! आप मेरे लिये क्या भेंट लाये हैं? मेरा भक्त प्रेमसे थोड़ी-सी वस्तु भी अर्पित करे तो वह मुझे अत्यन्त प्रिय होती है। परन्तु प्रेमके बिना दी गयी बड़ी-से-बड़ी भेंट भी मुझे संतुष्ट नहीं कर सकती। जो भक्त प्रेमसे पत्र, पुष्प, फल या जल अर्पित करता है, मैं उसे प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार करता हूँ।”

भगवान्के ऐसा कहनेपर भी सुदामाजी संकोचवश अपनी चार मुट्ठी चिउड़ोंकी भेंट निकाल न सके। वे लज्जासे सिर झुकाये बैठे रहे।

किन्तु भगवान् श्रीकृष्ण तो अन्तर्यामी थे। वे सुदामाजीके हृदयकी प्रत्येक भावना जानते थे। उन्होंने समझ लिया कि सुदामाजी धनकी इच्छासे नहीं, बल्कि अपनी पतिव्रता पत्नीके आग्रहपर उनसे मिलने आये हैं। उन्होंने कभी ऐश्वर्यकी कामनासे उनकी भक्ति नहीं की थी।
तब भगवान् मन-ही-मन विचार करने लगे, “यह मेरा प्रिय सखा है। इसने कभी मुझसे धन-संपत्तिकी याचना नहीं की। अब मैं इसे ऐसी समृद्धि प्रदान करूँगा, जो देवताओंके लिये भी दुर्लभ है।”

ऐसा विचार करके सुदामा के वस्त्रमेंसे चिथड़ेकी एक पोटलीमें बँधा हुआ चिउड़ा ‘यह क्या है’-ऐसा कहकर स्वयं ही छीन लिया। और बड़े आदरसे कहने लगे, "प्यारे मित्र! यह तो तुम मेरे लिये अत्यन्त प्रिय भेंट ले आये हो। ये चिउड़े न केवल मुझे, बल्कि सारे संसारको तप्त करनेके लिये पर्याप्त हैं।"

फिर श्रीकृष्ण ने प्रेमपूर्वक एक मुट्ठी चिउड़ा खा लिया। जब वे दूसरी मुट्ठी लेने लगे, तब रुक्मिणीजीने उनका हाथ पकड़ लिया और बोलीं, “प्रभो! बस, एक मुट्ठी ही पर्याप्त है। आपके प्रसन्न हो जानेसे इस भक्तको इस लोक और परलोककी समस्त सम्पत्तियाँ प्राप्त हो जायेंगी।”
सुदामा उस रातको श्रीकृष्णके महल में ही रहे। उन्होंने बड़े आरामसे वहाँ खाया-पिया और ऐसा अनुभव किया, मानो मैं वैकुण्ठमें ही पहुँच गया हूँ।

एक मुट्ठी तंदूल के बदले कृष्ण ने दिया सुदामा को तीनों लोकों की संपत्ति

भगवान् श्रीकृष्णसे विदा लेकर सुदामाजी अपने घरकी ओर चल पड़े। उन्होंने भगवान्से कुछ भी नहीं माँगा था और न ही उन्हें प्रत्यक्ष रूपसे कोई धन-संपत्ति मिली थी। फिर भी वे भगवान्के प्रेम, सम्मान और दर्शनके आनन्दमें मग्न थे। 

मार्गभर वे यही सोचते रहे कि स्वयं लक्ष्मीपति भगवान् श्रीकृष्णने एक निर्धन ब्राह्मणका कितना आदर और देवताके समान उसका सत्कार किया। भगवान्ने शायद उन्हें धन इसलिये नहीं दिया, कहीं धन पाकर उनका मन भगवान्से विमुख न हो जाये। वे भगवान्की इसी कृपाको अपना सबसे बड़ा सौभाग्य मानते हुए घर लौटे।

किन्तु अपने घरके निकट पहुँचकर वे आश्चर्यचकित रह गये। जहाँ पहले उनकी साधारण कुटिया थी, वहाँ अब भव्य महल, सुन्दर उपवन, सरोवर और अपार वैभव दिखाई दे रहा था। तभी सुन्दर वस्त्रों और आभूषणोंसे सुसज्जित स्त्री-पुरुष उनका स्वागत करने आये। उनकी पत्नी भी लक्ष्मीजीके समान दिव्य रूप धारण किये उनका स्वागत करने बाहर आयी।

सुदामाजी समझ गये कि यह सब भगवान् श्रीकृष्णकी कृपाका ही फल है। उन्होंने मन-ही-मन विचार किया, “मैं तो जन्मसे दरिद्र था। यह सम्पत्ति केवल मेरे सखा श्रीकृष्णकी करुणासे ही प्राप्त हुई है। वे भक्तको बहुत कुछ देते हैं, परन्तु उसका प्रदर्शन नहीं करते। मैंने तो केवल एक मुट्ठी चिउड़ा अर्पित किया था, किन्तु उन्होंने उसे अमूल्य मानकर असीम कृपा बरसा दी।”

फिर भी सुदामाजीका मन सम्पत्तिमें नहीं फँसा। वे प्रार्थना करने लगे कि जन्म-जन्म तक उन्हें भगवान् श्रीकृष्णका प्रेम, मित्रता, सेवा और भक्तोंका सत्संग प्राप्त होता रहे। उन्होंने उस सम्पत्तिको भगवान्का प्रसाद समझकर अनासक्त भावसे स्वीकार किया और अपनी पत्नीके साथ रहते हुए निरन्तर भगवान्के स्मरण और भजनमें लगे रहे।

धीरे-धीरे उनकी भगवद्भक्ति और भी गहरी होती गयी। अन्ततः भगवान् श्रीकृष्णके ध्यानमें तन्मय होकर उन्होंने अज्ञानका बन्धन काट दिया और भगवान्के दिव्य धामको प्राप्त हो गये।

सारांश: JKYog India Online Class- श्रीमद् भागवत कथा [हिन्दी]- 12.06.2026