श्रीमद्भागवत महापुराण- स्कन्ध: 10 अध्याय: 82-84
श्रीशुकदेवजी परीक्षित् को कहते हैं की एक बार प्रलयकालके समान दुर्लभ सर्वग्रास सूर्यग्रहण लगा। उसका समाचार पाकर भारतवर्षके विभिन्न प्रदेशोंसे लोग पुण्यसंचय और तीर्थस्नानके लिये समन्तपंचक-तीर्थ, कुरुक्षेत्रमें एकत्र हुए।
यदुवंशी भी वसुदेव, उग्रसेन, बलरामजी, भगवान् श्रीकृष्ण, प्रद्युम्न, साम्ब आदि के साथ कुरुक्षेत्र आये। वहाँ उन्होंने स्नान, उपवास, गोदान और ब्राह्मण-भोजन आदि धर्मकर्म किये और भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंमें प्रेमभक्ति बने रहनेकी कामना की।
कुरुक्षेत्र में हुआ कृष्ण का नन्दबाबा, यशोदा मैया, और अन्य गोप गोपियों से पुनर्मिलन
उस अवसरपर भारतवर्षके अनेक राजा, कुरु, पाण्डव, मत्स्य, विदर्भ, केकय आदि राजवंश तथा नन्दबाबा, गोपगण और भगवान्के दर्शनके लिये व्याकुल गोपियाँ भी वहाँ पहुँचीं। बहुत दिनों बाद सबका मिलन हुआ। एक-दूसरेको देखकर सभी प्रेमसे भर गये, आलिंगन करने लगे, उनके नेत्रोंसे आँसू बहने लगे और वे आनन्दमें मग्न हो गये।
कुन्तीने वसुदेवजीसे अपने पुराने दुःख और उपेक्षाका उल्लेख किया, तब वसुदेवजीने कहा कि सब कुछ दैवाधीन है और कंसके अत्याचारोंके कारण वे स्वयं भी बहुत कष्टोंमें रहे थे। वहाँ उपस्थित राजाओंने उग्रसेन और यदुवंशियोंकी प्रशंसा करते हुए कहा कि वे धन्य हैं, क्योंकि जिन भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन बड़े-बड़े योगियोंके लिये भी दुर्लभ है, उन्हींके साथ वे नित्य रहते, चलते-फिरते और व्यवहार करते हैं।
जब नन्दबाबाको ज्ञात हुआ कि श्रीकृष्ण और यदुवंशी कुरुक्षेत्र आये हैं, तब वे गोपोंके साथ वहाँ पहुँचे। उन्हें देखकर यदुवंशी अत्यन्त आनन्दित हो उठे। वसुदेवजीने प्रेमपूर्वक नन्दबाबाको आलिंगन किया और पुरानी बातें स्मरण कर भावविह्वल हो गये।
भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीने नन्दबाबा और यशोदा मैयाको प्रणाम किया। यशोदा मैया और नन्दबाबाने दोनोंको गोदमें बैठाकर हृदयसे लगा लिया और उनके वियोगका सारा दुःख दूर हो गया।
इसके बाद देवकी और रोहिणीने यशोदा मैयाको आलिंगन करके कहा, “आप और नन्दबाबाने बलराम और श्रीकृष्णका जिस प्रेमसे पालन-पोषण और संरक्षण किया, उसका प्रतिदान हम कभी नहीं चुका सकते। जब ये बालक अपने माता-पिताको भी नहीं पहचानते थे, तब आपने इनकी रक्षा अपनी आँखोंकी पुतलियोंकी तरह की। वास्तवमें इनके माता-पिता आप ही हैं। सत्पुरुषोंके लिये अपना-पराया कोई नहीं होता, और आपने इसी संतस्वभावका परिचय दिया है।”
गोपियों का कृष्ण से पुनर्मिलन
गोपियोंके जीवन, प्राण और सर्वस्व केवल श्रीकृष्ण ही थे। उनके वियोगमें वे एक क्षण भी नहीं रह सकती थीं। जब उनके दर्शनके समय नेत्रोंकी पलकें गिर पड़तीं, तब वे पलकोंको बनानेवालेको ही कोसने लगतीं। उन्हीं प्रेमकी मर्ति गोपियोंको आज बहत दिनोंके बाद भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन हुआ। उनकी हृदयकी लालसा और प्रेमका वर्णन नहीं किया जा सकता। उन्होंने अपने नेत्रोंके माध्यमसे श्रीकृष्णको हृदयमें उतार लिया, मन-ही-मन उनका गाढ़ आलिंगन किया और पूर्णतः उनमें तन्मय हो गयीं।
उस समय गोपियाँ ऐसी परम दिव्य भावावस्थाको प्राप्त हुईं, जो निरन्तर साधना करनेवाले बड़े-बड़े योगियोंके लिये भी अत्यन्त दुर्लभ है। जब भगवान् श्रीकृष्णने देखा कि गोपियाँ प्रेमवश पूर्णतः उनमें तन्मय हो गयी हैं, तब वे एकान्तमें उनके पास गये, उन्हें हृदयसे लगाया, उनका कुशल-मंगल पूछा और हँसते हुए बोले, “हे सखियो! हम अपने स्वजनों के कार्यों के कारण व्रज से बाहर आ गए और तुम्हारी जैसी प्रिय सखियों को छोड़कर शत्रुओं के विनाश में लग गए। बहुत समय बीत गया। क्या तुम कभी हमारा स्मरण भी करती हो?
“मेरी प्यारी गोपियो! कहीं तुमने हमें अकृतज्ञ तो नहीं समझ लिया? कहीं ऐसा सोचकर तुम हमसे नाराज़ तो नहीं हो गईं? वास्तव में भगवान ही जीवों के मिलन और बिछुड़ने के कारण हैं।
जैसे वायु बादलों, तिनकों, रूई और धूल के कणों को कभी एक साथ कर देती है और फिर उन्हें अलग-अलग बिखेर देती है, वैसे ही भगवान अपनी इच्छा से सभी प्राणियों का मिलन और वियोग कराते हैं।
“हे सखियो! यह तुम्हारा बहुत बड़ा सौभाग्य है कि तुम्हें मेरे प्रति वह प्रेम प्राप्त हो गया है, जो मनुष्य को मेरी प्राप्ति करा देता है। क्योंकि मेरे प्रति की हुई प्रेम-भक्ति प्राणियोंको अमृतत्व प्रदान करनेमें समर्थ है।
“मेरी प्यारी गोपियो! जैसे घड़ा, वस्त्र और अन्य सभी भौतिक वस्तुओं के पहले, बीच और अन्त में, बाहर और भीतर, उनके कारणरूप पाँच महाभूत- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश- व्याप्त रहते हैं, वैसे ही इस सम्पूर्ण जगत के पहले, बाद में, बीच में, बाहर और भीतर केवल मैं ही व्याप्त हूँ।
“इसी प्रकार सभी प्राणियों के शरीर में ये पाँच महाभूत कारणरूप से स्थित हैं और जीव आत्मा भोग करने वाले के रूप में स्थित है। लेकिन मैं इन दोनों से परे, अविनाशी और परम सत्य हूँ। शरीर और जीव दोनों मुझमें ही स्थित हैं। तुम ऐसा ही अनुभव करो।”
श्रीशुकदेवजी कहते हैं की भगवान श्रीकृष्ण ने इस प्रकार गोपियों को अध्यात्मज्ञान का उपदेश दिया। उस उपदेश का बार-बार स्मरण करने से गोपियों का लिंग शरीर (सूक्ष्म शरीर, जो जन्म-मृत्यु का कारण बनता है) नष्ट हो गया। वे भगवान से एकरस प्रेम में स्थित हो गईं और उन्हें सदा-सर्वदा के लिए प्राप्त कर लिया।
तब गोपियों ने प्रार्थना की, “हे कमलनाभ! बड़े-बड़े योगेश्वर आपके चरणकमलों का अपने हृदय में निरन्तर ध्यान करते रहते हैं। जो लोग संसाररूपी गहरे कुएँ में गिरे हुए हैं, उनके लिए आपके चरणकमल ही बाहर निकलने का एकमात्र सहारा हैं।
“हे प्रभु! हम पर ऐसी कृपा कीजिए कि आपके वे चरणकमल हमारे हृदय में सदा विराजमान रहें। हम गृहस्थ जीवन के कार्य करते रहें, फिर भी एक क्षण के लिए भी आपको न भूलें और आपका स्मरण कभी हमारे हृदय से दूर न हो।”
युधिष्ठिर सहित पांडवों का कृष्ण से मिलन
भगवान् श्रीकृष्ण, जो स्वयं गोपियोंके गुरु और उनकी प्रेम-भक्तिका परम लक्ष्य हैं, गोपियोंपर अनुग्रह करनेके बाद धर्मराज युधिष्ठिर तथा अन्य सम्बन्धियोंसे मिले और उनका कुशल-मंगल पूछा।
भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलोंके दर्शनसे ही उनके सारे अशुभ नष्ट हो चुके थे। उनके सत्कार और स्नेहपूर्ण व्यवहारसे वे अत्यन्त आनन्दित हो गये और बोले, “भगवन्! महापुरुष आपके चरणकमलोंके मधुर रसका निरन्तर आस्वादन करते रहते हैं। आपकी लीला-कथाएँ उसी दिव्य रसकी धारा हैं, जिन्हें सुननेसे जीवकी अविद्या और जन्म-मृत्युका बन्धन नष्ट हो जाता है।
आप ज्ञानस्वरूप, अखण्ड आनन्दके समुद्र और परमहंसोंकी परम गति हैं। जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति जैसी अवस्थाएँ भी आपके स्वयंप्रकाश स्वरूपको स्पर्श नहीं कर सकतीं। वेदोंकी रक्षाके लिये ही आपने अपनी योगमायासे मनुष्य-लीला धारण की है। हम आपके चरणोंमें बार-बार नमस्कार करते हैं।”
जिस समय दूसरे लोग इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति कर रहे थे, उसी समय यादव और कौरव-कुलकी स्त्रियाँ एकत्र होकर आपसमें भगवान्की त्रिभुवन-विख्यात लीलाओंका वर्णन कर रही थीं।
द्रौपदीजीके आग्रह पर श्रीकृष्ण की रानियों ने बताया कि किस प्रकार भगवान् ने अपनी योगमाया से उनका पाणिग्रहण किया। रुक्मिणी, सत्यभामा, जाम्बवती, कालिन्दी, मित्रविन्दा, सत्या और भद्रा ने संक्षेप में अपने-अपने विवाह प्रसंग सुनाते हुए कहा कि वे स्वयं को भगवान् की दासी मानती हैं और जन्म-जन्म उनके चरणों की सेवा ही चाहती हैं।
कृष्ण-लक्ष्मणा स्वयंवर प्रसंग
तत्पश्चात लक्ष्मणाजी ने अपना अद्भुत स्वयंवर प्रसंग सुनाया। लक्ष्मणाने कहा की देवर्षि नारदसे बार-बार भगवान् श्रीकृष्णकी लीलाएँ सुनकर और यह जानकर कि स्वयं लक्ष्मीजीने भी भगवान्को ही पति रूपमें वरण किया है, मेरा चित्त उनके चरणोंमें अनुरक्त हो गया।
जब पिताजी बृहत्सेनको मेरी इच्छा मालूम हुई, तब उन्होंने मेरे स्वयंवरमें मत्स्यवेधकी व्यवस्था की। मछली बाहरसे ढकी हुई थी और केवल उसकी परछाईं जलमें दिखाई देती थी। यह समाचार सुनकर जरासन्ध, शिशुपाल, दुर्योधन, कर्ण, आदि अनेक राजा स्वयंवरमें आये।
बहुत-से राजा धनुष भी न चढ़ा सके, कुछ धनुषका भार न सँभाल सके, और जिन्होंने धनुष चढ़ा लिया, वे लक्ष्यका पता न लगा सके।
तब भगवान् श्रीकृष्णने खेल-खेलमें धनुष उठाया, डोरी चढ़ायी, एक बार जलमें परछाईं देखी और तुरंत मछलीको गिरा दिया। चारों ओर जय-जयकार होने लगी, देवताओंने पुष्पवर्षा की।
मैं वरमाला लेकर सभा में आयी और पहलेसे ही भगवान्पर अनुरक्त होनेके कारण लज्जामिश्रित मुस्कानके साथ उनके गलेमें वरमाला डाल दी। बाजे बजने लगे और उत्सव मनाया जाने लगा।
यह देखकर राजाओंको बड़ा क्रोध हुआ। भगवान् मुझे अपने रथपर बैठाकर चल पड़े। कुछ राजाओंने उनका पीछा किया, परन्तु भगवान्के बाणोंसे वे पराजित हो गये। कोई मारा गया, कोई घायल हुआ और शेष भाग खड़े हुए।
इसके बाद भगवान् मुझे लेकर द्वारका पहुँचे। पिताजी अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने यदुवंशियोंका सम्मान करके भगवान्को दासियाँ, हाथी, घोड़े, रथ, सैनिक और बहुमूल्य उपहार भेंट किये। अन्तमें लक्ष्मणाने कहा, “निश्चय ही हमने पूर्वजन्ममें कोई महान् तपस्या की होगी, तभी इस जन्ममें हमें आत्माराम भगवान् श्रीकृष्णकी दासी बननेका सौभाग्य प्राप्त हुआ है।”
सोलह हजार रानियोंकी ओरसे रोहिणीजीने कहा की भौमासुरने दिग्विजयके समय हमराजकन्याओंको जीतकर अपने महलमें बंदी बना रखा था। भगवान् श्रीकृष्णने भौमासुर और उसकी सेनाका वध करके हमें मुक्त किया और हमारा पाणिग्रहण किया। तभीसे हम सदा उनके उन चरणकमलोंका चिन्तन करती हैं, जो जन्म-मृत्युके बन्धनसे मुक्त करनेवाले हैं।
हम न साम्राज्य, न इन्द्रपद, न ऐश्वर्य, न ब्रह्मपद और न ही किसी प्रकारकी मुक्ति चाहती हैं। हमारी केवल एक ही अभिलाषा है कि हम अपने प्रियतम प्रभुके सुकोमल चरणकमलोंकी उस पवित्र रजको सदा अपने सिरपर धारण करें, जिसे स्वयं लक्ष्मीजी भी प्राप्त करना चाहती हैं। जिन चरणकमलोंके स्पर्शकी आकांक्षा गोप, गोपियाँ, भीलिनियाँ, तिनके और वनकी लताएँतक करती थीं, हमारी भी केवल उन्हीं चरणोंकी चाह है।
श्रीशुकदेवजी कहते हैं की भगवान् श्रीकृष्णकी रानियोंका भगवान्के प्रति अलौकिक प्रेम सुनकर कुन्ती, गान्धारी, द्रौपदी, सुभद्रा और अन्य राजपत्नियाँ प्रेम-विह्वल हो गयीं।
ऋषियों ने बताया कर्म बंधन से मुक्ति का उपाय
उसी समय व्यासजी, नारदजी, परशुरामजी, वसिष्ठजी, विश्वामित्रजी, सनकादि और अनेक महर्षि भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीके दर्शनके लिये वहाँ आये। भगवान् श्रीकृष्ण, बलरामजी, पाण्डव और सभी राजाओंने उठकर उनका स्वागत और पूजन किया।
भगवान् श्रीकृष्णने कहा कि संतोंका दर्शन बड़े-बड़े देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। जलमय तीर्थ और प्रतिमाएँ समय लेकर पवित्र करती हैं, परन्तु संत पुरुष दर्शनमात्रसे ही पवित्र कर देते हैं। जो शरीरको ही आत्मा, सम्बन्धियोंको ही अपना और केवल जलको ही तीर्थ मानता है, वह मनुष्य होकर भी गधेके समान है।
भगवान्के इन गूढ़ वचनोंको सुनकर ऋषि-मुनि चकित रह गये। फिर उन्होंने समझा कि भगवान् लोकशिक्षाके लिये मनुष्यवत् व्यवहार कर रहे हैं। उन्होंने भगवान्की स्तुति करते हुए कहा कि वे स्वयं परब्रह्म होते हुए भी भक्तोंकी रक्षा और धर्मकी स्थापना के लिये मनुष्य-लीला करते हैं।
इसके बाद वसुदेवजीने ऋषियोंसे पूछा कि कौन-सा कर्म मनुष्यको कर्मबन्धनसे मुक्त कर सकता है। ऋषियोंने उत्तर दिया कि श्रद्धापूर्वक यज्ञ और भगवान् विष्णुकी आराधना ही कर्मवासनाओंके नाशका सर्वोत्तम उपाय है। उन्होंने वसुदेवजीको देवताओंके ऋणसे उऋण होनेके लिये यज्ञ करनेका उपदेश दिया।
वासुदेवजी ने किया भव्य यज्ञ का आयोजन
वसुदेवजीने ऋषियोंको ऋत्विज् बनाकर कुरुक्षेत्रमें भव्य यज्ञ सम्पन्न किये, विपुल दक्षिणा दी और सबका सम्मान किया। यज्ञके बाद राजा, ऋषि और सम्बन्धी भगवान् श्रीकृष्णकी अनुमति लेकर अपने-अपने देश लौट गये।
विदा होते समय वसुदेवजीने नन्दबाबासे कहा, “प्रेमका बन्धन अत्यन्त प्रबल है। आपने हमपर जो उपकार और मित्रता की है, उसका बदला हम कभी नहीं चुका सकते।”
नन्दबाबा भी श्रीकृष्ण और बलरामजीके प्रेममें बँधकर तीन महीने तक वहीं रहे। अन्तमें यदुवंशियोंसे भेंटें लेकर वे व्रजके लिये चले, पर उनका और गोप-गोपियोंका चित्त श्रीकृष्णके चरणोंमें ऐसा लग गया था कि लौटते समय भी उनका मन वहीं रह गया।
इसके बाद वर्षा ऋतु आनेपर यदुवंशी द्वारका लौट गये और सब लोगोंको इस तीर्थयात्रा, यज्ञमहोत्सव तथा स्वजन-मिलनकी कथा सुनाने लगे।
सारांश: JKYog India Online Class- श्रीमद् भागवत कथा [हिन्दी]- 15.06.2026