श्रीमद्भागवत महापुराण- स्कन्ध: 10 अध्याय: 74-76
जरासन्ध का वध कर बंदी राजाओं को मुक्त कराने के पश्चात भगवान् श्रीकृष्ण, भीमसेन और अर्जुन इन्द्रप्रस्थ लौट आए। वहाँ उन्होंने राजा युधिष्ठिर को सम्पूर्ण वृत्तांत सुनाया। यह समाचार सुनकर युधिष्ठिर अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने भगवान् श्रीकृष्ण की स्तुति की।
युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ का आरम्भ
इसके बाद श्रीकृष्ण की अनुमति से, यज्ञ का शुभ समय आने पर, धर्मराज युधिष्ठिर ने यज्ञकर्म में निपुण वेदज्ञ ब्राह्मणों को ऋत्विज, आचार्य तथा अन्य आवश्यक पदों पर नियुक्त किया। इनके अतिरिक्त धर्मराजने द्रोणाचार्य, भीष्म-पितामह, कृपाचार्य, धृतराष्ट्र और उनके दुर्योधन आदि पुत्रों और विदुर आदिको भी बुलवाया। राजसूय यज्ञमें सम्मिलित होनेके लिये देश-देशके राजा, मन्त्री, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा अनेक गणमान्य व्यक्ति इन्द्रप्रस्थ पहुँचे।
ऋत्विज ब्राह्मणोंने शास्त्रानुसार यज्ञभूमिको तैयार कराकर महाराज युधिष्ठिरको दीक्षा दी। यज्ञकी सारी व्यवस्था अत्यन्त भव्य थी और यज्ञमें प्रयुक्त पात्र भी स्वर्णके बने हुए थे। युधिष्ठिरके निमन्त्रणपर ब्रह्माजी, शिवजी, इन्द्र तथा अन्य देवता, सिद्ध, गन्धर्व, विद्याधर, नाग, मुनि, यक्ष, किन्नर, चारण, अनेक राजा और रानियाँ भी वहाँ उपस्थित हुए।
युधिष्ठिर द्वारा श्रीकृष्ण की अग्रपूजा
विधिपूर्वक यज्ञ सम्पन्न होने लगा। सोमरस ग्रहणके दिन युधिष्ठिरने याजकों और सभाके वरिष्ठ सदस्योंका सम्मान किया। इसके बाद यह विचार होने लगा कि सभा में सबसे पहले अग्रपूजा किसकी की जाये। अनेक मत प्रस्तुत हुए, परन्तु सर्वसम्मति नहीं बन सकी।
तब सहदेव उठकर बोले, “भगवान् श्रीकृष्ण ही अग्रपूजाके सर्वाधिक अधिकारी हैं। वे समस्त देवताओंके आधार, समस्त यज्ञोंके लक्ष्य और सम्पूर्ण जगत्के अन्तर्यामी हैं। यज्ञ, मन्त्र, अग्नि, आहुति तथा ज्ञान और कर्मके सभी मार्ग अन्ततः उन्हींकी प्राप्तिके लिये हैं।
“वे एकमात्र अद्वितीय परब्रह्म हैं, जो सृष्टि, पालन और संहारके कारण हैं। उन्हींकी कृपासे प्राणी धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी प्राप्ति करते हैं। इसलिए भगवान् श्रीकृष्णकी पूजा करनेसे सभी देवताओं और समस्त प्राणियोंकी पूजा हो जाती है। अतः इस सभामें अग्रपूजाके सर्वश्रेष्ठ अधिकारी भगवान् श्रीकृष्ण ही हैं।”
सहदेव भगवान् श्रीकृष्णकी महिमा और प्रभावको भलीभाँति जानते थे। उनके भाषणके समाप्त होते ही यज्ञसभामें उपस्थित सभी सत्पुरुषोंने एक स्वरसे उनकी बातका समर्थन किया और उसे सर्वथा उचित बताया। ब्राह्मणों तथा सभासदोंकी सम्मति जानकर धर्मराज युधिष्ठिर अत्यन्त प्रसन्न हुए। प्रेम और श्रद्धासे अभिभूत होकर उन्होंने अपनी पत्नी, भाइयों, मन्त्रियों और कुटुम्बियोंके साथ भगवान्के चरण पखारे और उस पवित्र चरणामृतको अपने सिरपर धारण किया। फिर उन्होंने भगवान्को पीताम्बर तथा बहुमूल्य आभूषण अर्पित किये। प्रेमके आवेगसे उनकी आँखें आँसुओंसे भर गयीं और वे भगवान्के स्वरूपका भी ठीकसे दर्शन नहीं कर पा रहे थे।
सभा में उपस्थित सभी लोग भगवान् श्रीकृष्णको इस प्रकार सम्मानित होते देखकर हाथ जोड़कर “नमो नमः” और “जय जय” का घोष करने लगे। उसी समय आकाशसे पुष्पवर्षा होने लगी।
शिशुपाल द्वारा श्रीकृष्ण की निन्दा
अपने आसनपर बैठा शिशुपाल यह सब देख-सुन रहा था। भगवान् श्रीकृष्णकी अग्रपूजा और प्रशंसा देखकर वह क्रोधित हो उठा और खड़ा होकर भरी सभामें भगवान्के विरुद्ध कटु वचन कहने लगा।
शिशुपाल बोला, “सभासदो! ऐसा लगता है कि कालके प्रभावसे यहाँ बड़े-बड़े विद्वानोंकी बुद्धि भी भ्रमित हो गयी है, तभी एक बालककी बातको स्वीकार कर लिया गया है।
“मैं मानता हूँ कि आप सभी योग्य निर्णय करनेमें समर्थ हैं। इसलिए सहदेवकी इस बातको स्वीकार नहीं करना चाहिये कि कृष्ण अग्रपूजाके अधिकारी हैं। इस सभामें अनेक तपस्वी, विद्वान्, ब्रह्मनिष्ठ ऋषि और महान् पुरुष उपस्थित हैं, जिनका सम्मान स्वयं देवता भी करते हैं। उन्हें छोड़कर कृष्णको अग्रपूजा देना उचित नहीं है।
“कृष्ण न तो किसी विशेष वर्ण या आश्रमके अनुसार आचरण करते हैं और न ही लोकमर्यादाओंका पालन करते हैं। यदुवंश भी शापित माना जाता है। यदुवंशी मथुरा छोड़कर समुद्रके बीच दुर्ग बनाकर रहते हैं और अपनी इच्छानुसार व्यवहार करते हैं। ऐसी स्थिति में कृष्णको अग्रपूजाका पात्र कैसे माना जा सकता है?”
शुकदेवजी कहते हैं कि शिशुपालका विवेक नष्ट हो चुका था। इसलिए वह भगवान् श्रीकृष्णके प्रति और भी कटु वचन बोलने लगा। परन्तु भगवान् श्रीकृष्ण उसकी बातोंका कोई उत्तर दिये बिना मौन रहे।
सभा में उपस्थित अनेक लोगोंसे भगवान्की निन्दा सुनी न गयी। वे अपने कान बंद करके शिशुपालकी निन्दा करते हुए वहाँसे उठ गये। उधर पाण्डव, मत्स्य, केकय और अन्य राजाओंको शिशुपालका व्यवहार असह्य हो गया। वे क्रोधित होकर उसे दण्ड देनेके लिये शस्त्र उठाकर खड़े हो गये। किन्तु शिशुपाल तनिक भी नहीं डरा। उसने भी अपनी ढाल और तलवार उठा ली तथा सभा में भगवान् श्रीकृष्णके पक्षके राजाओंको ललकारने लगा।
श्रीकृष्ण द्वारा शिशुपाल का उद्धार
उन लोगोंको लड़ते-झगड़ते देख भगवान् श्रीकृष्ण उठ खड़े हुए। उन्होंने अपने पक्षपाती राजाओंको शान्त किया और स्वयं क्रोध करके अपने ऊपर झपटते हुए शिशुपालका सिर छुरेके समान तीखी धारवाले चक्रसे काट लिया ।
शिशुपालके वधके बाद सभा में कोलाहल मच गया और उसके समर्थक राजा वहाँसे भाग गये।
उसी समय सबने देखा कि शिशुपालके शरीरसे एक ज्योति निकलकर भगवान् श्रीकृष्णमें विलीन हो गयी। शिशुपाल तीन जन्मोंसे वैरभाववश निरन्तर भगवान्का चिन्तन करता रहा था। उसी तन्मयताके कारण उसे भगवान्की प्राप्ति हुई।
इसके बाद धर्मराज युधिष्ठिरने ऋत्विजों और सभासदोंको पर्याप्त दक्षिणा देकर उनका सम्मान किया तथा विधिपूर्वक यज्ञकी पूर्णाहुति सम्पन्न की। इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णकी कृपासे राजसूय यज्ञ सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ।
यज्ञान्त-स्नानके बाद युधिष्ठिर अत्यन्त तेजस्वी और शोभायमान दिखाई देने लगे। देवता, मनुष्य और अन्य अतिथि उनका सम्मान प्राप्त कर भगवान् श्रीकृष्ण तथा राजसूय यज्ञकी प्रशंसा करते हुए अपने-अपने स्थानोंको लौट गये।
सब लोग प्रसन्न थे, किन्तु दुर्योधनसे पाण्डवोंका वैभव और उन्नति सहन न हुई। उसी ईर्ष्याने आगे चलकर कुरुवंशके विनाशका मार्ग प्रशस्त किया।
पाण्डवों का वैभव देखकर दुर्योधन की ईर्ष्या
राजा परीक्षितने पूछा, “भगवन्! राजसूय यज्ञमें आये हुए सभी लोग—राजा, ऋषि, मुनि, देवता और अन्य अतिथि—अत्यन्त प्रसन्न थे, किन्तु दुर्योधनको इससे दुःख क्यों हुआ?”
श्रीशुकदेवजीने कहा, “परीक्षित्! महाराज युधिष्ठिरके प्रति प्रेम और सम्मानके कारण उनके सभी स्वजन और मित्रोंने राजसूय यज्ञमें विभिन्न सेवाओंका दायित्व स्वीकार किया था। भीमसेन भोजन-व्यवस्था देखते थे, दुर्योधन कोषाध्यक्ष था, सहदेव अतिथियोंके स्वागतमें लगे थे, नकुल सामग्री-संग्रहका कार्य संभाल रहे थे और अर्जुन गुरुजनोंकी सेवा कर रहे थे। स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण अतिथियोंके चरण पखारते थे, द्रौपदी भोजन परोसती थीं और कर्ण उदारतापूर्वक दान देते थे। इसी प्रकार सात्यकि, विदुर, विकर्ण तथा अन्य अनेक स्वजन भी विभिन्न कार्योंमें नियुक्त थे।”
जब राजसूय यज्ञ सम्पन्न हो गया तब धर्मराज युधिष्ठिर यज्ञान्त-स्नानके लिये गंगाजी गये। उस अवसरपर भव्य उत्सव मनाया गया। वाद्ययंत्र बजने लगे, गायक और नर्तक आनन्द मनाने लगे, देवताओंने पुष्पवर्षा की और राजा, ऋषि, ब्राह्मण तथा प्रजा सब हर्षोल्लाससे उत्सवमें सम्मिलित हुए। सम्पूर्ण इन्द्रप्रस्थ आनन्द और वैभवसे भर उठा।
राजसूय यज्ञमें आये हुए सभी लोग युधिष्ठिरके यश, वैभव, उदारता और भगवान् श्रीकृष्णकी कृपासे अत्यन्त प्रसन्न थे। वे उनकी प्रशंसा करते हुए अपने-अपने स्थानोंको लौट गये। इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णकी कृपासे धर्मराज युधिष्ठिरके सभी मनोरथ पूर्ण हो गये और उनका यश, वैभव तथा सम्मान चरम सीमापर पहुँच गया।
इन्द्रप्रस्थ में दुर्योधन का अपमान
पाण्डवोंकी समृद्धि और ऐश्वर्य देखकर दुर्योधनके हृदयमें ईर्ष्या और जलन उत्पन्न हो गयी। एक अवसरपर युधिष्ठिर अपने भाइयों, स्वजनों और भगवान् श्रीकृष्णके साथ उस सभामें विराजमान थे।
उसी समय दुर्योधन भी वहाँ आया। मयदानवकी मायामयी सभामें कहीं जल स्थलके समान और कहीं स्थल जलके समान दिखाई देता था। भ्रमवश दुर्योधनने स्थलको जल समझकर वस्त्र समेट लिये और फिर जलको स्थल समझकर उसमें गिर पड़ा।
दुर्योधनको इस प्रकार गिरते देखकर भीमसेन, राजमहिलाएँ और अन्य लोग हँस पड़े। यद्यपि युधिष्ठिरने उन्हें रोकनेका प्रयास किया, फिर भी हँसी रुक न सकी।
इस घटनासे दुर्योधन अत्यन्त लज्जित और क्रोधित हो गया। वह अपमानित अनुभव करता हुआ चुपचाप वहाँसे निकलकर हस्तिनापुर लौट गया। उसी दिनसे उसकी ईर्ष्या और वैरभाव और भी बढ़ गया।
भगवान् शिव की कृपा से शाल्व को ‘सौभ’ नामक अद्भुत विमान की प्राप्ति
शाल्व, शिशुपालका मित्र था। रुक्मिणीके विवाहके समय वह शिशुपालकी ओरसे आया था, परन्तु उस युद्धमें यदुवंशियोंने उसे भी पराजित कर दिया था।
उस पराजयसे अपमानित होकर शाल्वने सब राजाओंके सामने प्रतिज्ञा की कि वह यदुवंशका विनाश करेगा। इस उद्देश्यसे उसने भगवान् शिवकी कठोर तपस्या की। एक वर्षतक तप करनेके बाद भगवान् शिव उससे प्रसन्न हुए और वर माँगनेको कहा।
शाल्वने ऐसा विमान माँगा जिसे देवता, दैत्य, मनुष्य या अन्य कोई नष्ट न कर सके, जो इच्छानुसार कहीं भी जा सके और यदुवंशियोंके लिये भयंकर सिद्ध हो। भगवान् शिवके आदेशसे मय दानवने उसके लिये लोहेका ‘सौभ’ नामक अद्भुत विमान बनाया। सौभ वास्तवमें आकाशमें विचरनेवाले एक नगरके समान था। वह अत्यन्त रहस्यमय था और उसे देखना या पकड़ना कठिन था।
यह विमान प्राप्त करते ही शाल्वने यदुवंशियोंसे पुराना वैर चुकानेके लिये द्वारकापर आक्रमण कर दिया। जब शाल्वने सौभ विमानके साथ द्वारकापर आक्रमण किया, तब प्रद्युम्नजी, सात्यकि, साम्ब, गद, कृतवर्मा और अन्य यदुवंशी वीर उसकी सेनाका सामना करनेके लिये निकले।
शाल्व और यादवों के बीच युद्ध
शाल्वका सौभ विमान अत्यन्त मायामय था, जिससे युद्ध कठिन हो गया। फिर भी यदुवंशियोंने उसके आक्रमणका डटकर मुकाबला किया। प्रद्युम्नजीने शाल्वकी माया नष्ट की और उसके अनेक सेनानायकोंको पराजित किया। एक समय वे घुमानके प्रहारसे मूर्छित हो गये, किन्तु शीघ्र ही लौटकर उन्होंने घुमानका वध कर दिया।
उधर सात्यकि, साम्ब, गद और अन्य यादव वीर भी शाल्वकी सेनाका संहार करते रहे। इस प्रकार यदुवंशियों और शाल्वकी सेनाके बीच सत्ताईस दिनोंतक घोर युद्ध चलता रहा, जिसमें दोनों पक्षोंने भरपूर पराक्रम दिखाया।
उन दिनों श्रीकृष्ण राजसूय यज्ञ के लिए इन्द्रप्रस्थ गये हुए थे। वहाँ रहते समय उन्होंने अनेक अपशकुन देखे और समझ गये कि द्वारकापर संकट आया है। वे तुरंत द्वारका लौटे और देखा कि शाल्व अपने मायावी सौभ विमानसे यादवोंपर आक्रमण कर रहा है।
भगवान्ने बलरामजीको नगरकी रक्षाका दायित्व देकर स्वयं शाल्वसे युद्ध करनेके लिये प्रस्थान किया। युद्धमें शाल्वने अनेक मायाओंका प्रयोग किया और भगवान्पर घोर आक्रमण किये, किन्तु भगवान्ने उसके अस्त्रों और विमानको बाणोंसे क्षतिग्रस्त कर दिया।
श्रीकृष्ण द्वारा शाल्व का उद्धार
युद्धके बीच शाल्वने अपनी मायावी शक्तिका प्रयोग करके श्रीकृष्णको भ्रमित करनेका प्रयास किया। पहले एक दूत भगवान्के पास आया और रोते हुए बोला, “माता देवकीजीने मुझे भेजा है। शाल्व आपके पिताश्री वसुदेवजीको बाँधकर ले गया है।”
इसके कुछ ही क्षण बाद शाल्व एक ऐसे पुरुषको लेकर प्रकट हुआ जो हूबहू वसुदेवजीके समान दिखाई देता था। उसने भगवान् श्रीकृष्णको ललकारते हुए कहा, “देख, यही तेरा पिता है। यदि सामर्थ्य है तो इसे बचा ले।”
इतना कहकर शाल्वने उस मायारचित वसुदेवका सिर तलवारसे काट दिया और उसे अपने सौभ विमानपर ले गया। यह दृश्य देखकर ऐसा प्रतीत हुआ मानो वास्तवमें वसुदेवजीका वध हो गया हो।
क्षणभरके लिये भगवान् श्रीकृष्णने शोक और चिन्ताका प्रदर्शन किया। फिर उन्होंने तुरंत विचार किया कि बलरामजीकी उपस्थिति में ऐसा होना असम्भव है। जब उन्होंने ध्यानसे देखा, तब न दूत था, न वसुदेवजीका शरीर। सब कुछ स्वप्नकी भाँति लुप्त हो चुका था।
शाल्वकी माया पहचान लेनेके बाद श्रीकृष्णने शाल्वपर भीषण प्रहार किये। गदाके आघातसे सौभ विमान नष्ट होकर समुद्रमें गिर पड़ा। शाल्व विमानसे उतरकर युद्ध करने लगा, तब भगवान्ने उसका हाथ काट दिया।
अन्तमें श्रीकृष्णने सुदर्शन चक्र चलाकर शाल्वका सिर धड़से अलग कर दिया और उसका वध कर दिया। शाल्वकी मृत्युके साथ ही उसका मायावी आतंक समाप्त हो गया और देवताओंने प्रसन्न होकर पुष्पवर्षा तथा दुन्दुभि-नाद किया।
सारांश: JKYog India Online Class- श्रीमद् भागवत कथा [हिन्दी]- 08.06.2026