श्रीमद्भागवत महापुराण- स्कन्ध: 10 अध्याय: 70-73
शुकदेवजी परीक्षित को श्रीकृष्ण की दिनचर्या का वर्णन करते हुए कहते हैं कि प्रातःकाल जब मुर्गों की बाँग और पक्षियों के मधुर स्वर सुनाई देने लगते, तब द्वारका की रानियाँ यह सोचकर उदास हो जाती थीं कि अब भगवान् श्रीकृष्ण अपने दैनिक कार्यों में व्यस्त हो जाएँगे। उसी समय पारिजातकी सुगन्धसे वातावरण महक उठता, भौंरे गुंजार करते और पक्षी मानो प्रभातका स्वागत करते हुए मधुर कलरव करने लगते।
भगवान् श्रीकृष्ण प्रतिदिन ब्राह्ममुहूर्तमें उठकर शुद्धाचार सम्पन्न करते और फिर अपने मायातीत दिव्य स्वरूपका ध्यान करते। इस प्रकार वे आदर्श जीवनचर्या और आध्यात्मिक अनुशासनका पालन करते थे। भगवान् श्रीकृष्ण प्रतिदिन ब्राह्ममुहूर्तमें उठकर अपने दिव्य, मायातीत और अखण्ड आत्मस्वरूपका ध्यान करते थे। इसके बाद वे स्नान, सन्ध्या-वन्दन, हवन, गायत्री-जप तथा सूर्योपासना जैसे वैदिक नित्यकर्म सम्पन्न करते और देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंका तर्पण करते।
वे ब्राह्मणों, गुरुजनों और कुलके बड़ोंका सम्मान करते तथा प्रतिदिन बड़ी संख्या में गौदान और अन्य दान देकर धर्मका आदर्श प्रस्तुत करते। इसके बाद वे गौ, ब्राह्मण, देवप्रतिमा और अन्य मंगलमय वस्तुओंका दर्शन कर प्रजाजन, सम्बन्धियों और सेवकोंकी आवश्यकताओंकी पूर्ति करते तथा सबको प्रसन्न देखकर स्वयं भी आनन्दित होते।
फिर भगवान् श्रीकृष्ण राजोचित वेश धारण कर सारथि दारुक, उद्धवजी और सात्यकिके साथ रथपर आरूढ़ होकर सुधर्मा सभामें जाते। वहाँ यदुवंशके वीरों, विद्वानों, कलाकारों और सभासदोंके बीच वे राजकार्य, धर्मचर्चा और लोककल्याणके कार्योंका संचालन करते।
जरासन्ध के कारागार में बंदी राजाओं की करुण पुकार लेकर द्वारका पहुँचा दूत
एक दिनकी बात है, द्वारकापुरी के राजसभा में एक दूत आया। उसने उन लगभग बीस हजार राजाओंका सन्देश सुनाया, जिन्हें मगधराज जरासन्धने पराजित कर बंदी बना रखा था। उन राजाओंने भगवान् श्रीकृष्णसे प्रार्थना की कि वे ही शरणागतोंके रक्षक और भयका नाश करनेवाले हैं। राजसत्ता और सांसारिक वैभव क्षणभंगुर हैं, फिर भी मोहवश वे उनमें फँसे रहे और अब भारी कष्ट भोग रहे हैं।
उन्होंने कहा कि जरासन्ध अत्यन्त बलशाली है और उन्हें असहाय बनाकर कैद किये हुए है। यद्यपि भगवान् श्रीकृष्ण पहले भी अनेक बार उसे पराजित कर चुके हैं, फिर भी उसका अहंकार बढ़ गया है और वह भगवान् के भक्त राजाओंको और अधिक सताने लगा है।
अन्तमें उन बंदी राजाओंने भगवान् श्रीकृष्णकी शरण लेकर उनसे विनती की कि वे उन्हें जरासन्धके बन्धनसे मुक्त करें और उनका उद्धार करें।
धर्मराज युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ का समाचार लेकर द्वारका पहुँचे नारदजी
जब जरासन्धके बंदी राजाओंका सन्देश सुनाया जा रहा था, तभी देवर्षि नारदजी द्वारका की सभा में पहुँचे। भगवान् श्रीकृष्णने नारदजीसे तीनों लोकोंका समाचार पूछा और विशेष रूपसे पाण्डवोंके विषयमें जानना चाहा।
तब नारदजीने नारदजीने बताया कि महाराज युधिष्ठिर किसी भौतिक लाभकी इच्छा नहीं रखते, किन्तु वे भगवान् श्रीकृष्णकी आराधना और लोककल्याणके उद्देश्यसे राजसूय यज्ञ सम्पन्न करना चाहते हैं। इस यज्ञमें अनेक देवता, ऋषि और राजा उपस्थित होंगे तथा सभीको भगवान् श्रीकृष्णके दर्शनका अवसर मिलेगा।
जब नारदजीने युधिष्ठिरके राजसूय यज्ञकी बात कही, तब सभा में उपस्थित यदुवंशी इस विचारसे सहमत नहीं हुए, क्योंकि उनका मानना था कि पहले जरासन्धका पराभव करके बंदी राजाओंको मुक्त कराना आवश्यक है।
तब भगवान् श्रीकृष्णने मुसकराकर अपने परम बुद्धिमान् मन्त्री और प्रिय सखा उद्धवजीकी ओर देखा। उन्होंने कहा कि उद्धवजी हितकारी सलाह देनेवाले, दूरदर्शी और कार्यके तत्त्वको समझनेवाले हैं, इसलिए वे इस विषयमें अपना मत बतायें।
उद्धवजी ने पहले जरासन्ध-वध और फिर राजसूय यज्ञ का परामर्श दिया
यद्यपि भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं सर्वज्ञ थे, फिर भी लोकव्यवहार और आदर्श नेतृत्वका उदाहरण प्रस्तुत करनेके लिये उन्होंने उद्धवजीसे परामर्श माँगा। श्रीकृष्णके वचन सुनकर महामति उद्धवजीने देवर्षि नारद, सभासद् और भगवान् श्रीकृष्णके मतपर विचार किया और फिर वे कहने लगे, “भगवन्! देवर्षि नारदजीकी सलाह उचित है। पाण्डवोंके राजसूय यज्ञको सफल बनाने और आपकी शरणमें आये हुए बन्दी राजाओंकी रक्षा करने, दोनों उद्देश्योंकी पूर्ति के लिये पहले जरासन्धका पराभव आवश्यक है।
"राजसूय यज्ञ वही कर सकता है जो सभी दिशाओंपर विजय प्राप्त कर ले। इसलिए जरासन्धको हराना अनिवार्य है। उसके पराजित होते ही बन्दी राजाओंकी मुक्ति हो जायेगी और आपका यश भी चारों ओर फैलेगा।
"जरासन्ध अत्यन्त बलशाली है, परन्तु भीमसेन उसके समकक्ष हैं। वह ब्राह्मणोंका बड़ा सम्मान करता है और उनकी याचना कभी नहीं टालता। इसलिए भीमसेन ब्राह्मण-वेषमें जाकर उससे द्वन्द्वयुद्धकी भिक्षा माँगें। आपकी कृपासे भीमसेन उसे अवश्य पराजित कर देंगे।
"जरासन्धके वधसे बन्दी राजाओंका उद्धार होगा, पाण्डवोंका राजसूय यज्ञ सम्पन्न होगा और आपकी कीर्ति दूर-दूर तक फैलेगी। इसलिए मेरी रायमें पहले जरासन्धका वध करना ही उचित है।”
उद्धवजीकी यह सलाह सब प्रकारसे हितकर थी। देवर्षि नारदजी, यदुवंशके बड़े-बूढ़ों और स्वयं भगवान् श्रीकृष्णने भी उसका समर्थन किया। तब भगवान् श्रीकृष्णने वसुदेवजी आदि गुरुजनोंसे अनुमति लेकर दारुक आदि सेवकोंको इन्द्रप्रस्थ जानेकी तैयारी करनेकी आज्ञा दी। फिर उग्रसेनजी और बलरामजीसे आज्ञा लेकर रानियों, बच्चों तथा आवश्यक सामानको आगे भेज दिया और स्वयं गरुड़ध्वज रथपर सवार हुए।
इसके बाद भगवान् श्रीकृष्णने जरासन्धके बंदी राजाओंके दूतको आश्वासन देते हुए कहा, “अपने राजाओंसे जाकर कह दो कि वे भय न करें। उनका कल्याण हो। मैं जरासन्धका वध कराकर उन्हें मुक्त करूँगा।”
भगवान्की आज्ञा पाकर वह दूत गिरिव्रज गया और बंदी राजाओंको उनका सन्देश सुना दिया। तब वे सभी राजा कारागारसे मुक्त होने और भगवान् श्रीकृष्णके दर्शनकी प्रतीक्षा करने लगे।
श्रीकृष्ण का इन्द्रप्रस्थ में आगमन एवं पाण्डवों द्वारा आत्मीय स्वागत
भगवान् श्रीकृष्ण आनर्त, सौवीर, मरु और कुरुक्षेत्र आदि प्रदेशोंसे होते हुए मार्गमें पड़नेवाले पर्वतों, नदियों, नगरों और गाँवोंको पार करते हुए आगे बढ़े। दृषद्वती और सरस्वती नदियोंको पार कर वे पांचाल तथा मत्स्य देशोंसे होते हुए अन्ततः इन्द्रप्रस्थ पहुँच गये।
जब महाराज युधिष्ठिरको समाचार मिला कि भगवान् श्रीकृष्ण इन्द्रप्रस्थ पधार रहे हैं, तब वे अपने आचार्यों, स्वजनों और नगरवासियोंके साथ भगवान्की अगवानी करने नगरसे बाहर आये। मंगलगीत, वाद्ययंत्रों और वेदमन्त्रोंके बीच बड़े आदरपूर्वक भगवान्का स्वागत किया गया।
भगवान् श्रीकृष्णको देखकर युधिष्ठिर प्रेमसे अभिभूत हो गये और बार-बार उनका आलिंगन करने लगे। भीमसेन, अर्जुन, नकुल तथा सहदेवने भी प्रेमपूर्वक भगवान्से भेंट की। स्तुतियों, वाद्यों और उत्सवके वातावरणके बीच भगवान् श्रीकृष्णने अपने स्वजनोंके साथ इन्द्रप्रस्थमें प्रवेश किया। जब नगरकी स्त्रियोंने सुना कि भगवान् श्रीकृष्ण राजमार्गसे आ रहे हैं, तब वे सब कार्य छोड़कर उनके दर्शनके लिये दौड़ पड़ीं।
अटारियोंपर खड़ी होकर उन्होंने भगवान् तथा उनकी रानियोंके दर्शन किये, पुष्पवर्षा की और प्रेमपूर्वक उनका स्वागत किया। कुन्तीने अपने भतीजे भगवान् श्रीकृष्णको हृदयसे लगा लिया। द्रौपदीने रुक्मिणी, सत्यभामा, जाम्बवती, कालिन्दी तथा भगवान्की अन्य रानियोंका यथोचित सत्कार किया।
मयासुरद्वारा निर्मित दिव्य सभाभवन भी वहाँ सुशोभित था, जिसे उसने भगवान्की आज्ञासे युधिष्ठिरके लिये बनाया था। भगवान् श्रीकृष्ण कई महीनोंतक इन्द्रप्रस्थमें रहे।
युधिष्ठिर द्वारा राजसूय यज्ञ का प्रस्ताव
एक दिन महाराज युधिष्ठिर मुनियों, ब्राह्मणों, राजाओं, अपने भाइयों, आचार्यों तथा स्वजनोंके साथ सभामें बैठे थे। उसी समय उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णसे कहा, “मैं राजसूय यज्ञके द्वारा आपका तथा आपके विभूतिस्वरूप देवताओंका पूजन करना चाहता हूँ। कृपया मेरे इस संकल्पको पूर्ण कीजिये।”
श्रीकृष्णने उत्तर दिया, “धर्मराज! आपका यह संकल्प अत्यन्त उत्तम है। राजसूय यज्ञसे आपकी मंगलमयी कीर्ति समस्त लोकोंमें फैलेगी और यह यज्ञ ऋषियों, देवताओं, पितरों, स्वजनों तथा समस्त प्राणियोंके लिये हितकारी होगा।
"किन्तु पहले पृथ्वीके समस्त राजाओंको जीतकर उन्हें अपने अधीन कीजिये और यज्ञके लिये आवश्यक सामग्री एकत्र कीजिये। उसके बाद इस महायज्ञका अनुष्ठान कीजिये। आपके चारों भाई लोकपालोंके अंशसे उत्पन्न महान् वीर हैं और आप स्वयं परम संयमी तथा धर्मनिष्ठ हैं। आप सबने अपने सद्गुणोंसे मुझे प्रसन्न कर लिया है। मेरे भक्तका तेज, यश, ऐश्वर्य और सम्मान कोई भी देवता या राजा दबा नहीं सकता।”
श्रीकृष्णकी बात सुनकर युधिष्ठिरने सहदेवको दक्षिण, नकुलको पश्चिम, अर्जुनको उत्तर और भीमसेनको पूर्व दिशामें विजय अभियानका आदेश दिया। पाण्डवोंने अपने पराक्रमसे अनेक राजाओंको जीतकर उन्हें युधिष्ठिरके अधीन किया और राजसूय यज्ञके लिये विपुल धन-संपत्ति एकत्र की।
श्रीकृष्ण, भीमसेन और अर्जुन का ब्राह्मण-वेश धारण कर जरासन्ध की राजधानी पहुँचना
किन्तु जब युधिष्ठिरको ज्ञात हुआ कि मगधराज जरासन्ध अब भी पराजित नहीं हुआ है, तब वे चिन्तित हो गये। उस समय भगवान् श्रीकृष्णने उन्हें वही उपाय बताया जो पहले उद्धवजीने सुझाया था।
इसके बाद भगवान् श्रीकृष्ण, भीमसेन और अर्जुन ब्राह्मणोंका वेश धारण करके गिरिव्रज पहुँचे, जो जरासन्धकी राजधानी थी। जरासन्ध ब्राह्मणोंका सम्मान करनेवाला और अतिथियोंका सत्कार करनेवाला राजा था। अतः जब ये तीनों ब्राह्मण-वेशधारी क्षत्रिय अतिथि बनकर उसके पास पहुँचे, तब उन्होंने उससे एक विशेष याचना की।
ब्राह्मण-वेशधारी श्रीकृष्ण, भीमसेन और अर्जुनने जरासन्धसे कहा, “राजन्! हम दूरसे आये हुए आपके अतिथि हैं। अतः हम जो याचना करें, कृपया उसे स्वीकार कीजिये।
“राजन्! हरिश्चन्द्र, रन्तिदेव, मुद्गल, शिबि, बलि तथा अन्य अनेक महापुरुषोंने अतिथियोंके लिये अपना सर्वस्व तक अर्पित कर अमर यश प्राप्त किया है। इसलिए आप भी हमें निराश न कीजिये और हमारी याचना स्वीकार कीजिये।”
जरासन्धने उनकी वाणी, रूप-रंग और कलाइयोंपर धनुषकी प्रत्यंचाके चिह्न देखकर समझ लिया कि वे ब्राह्मण नहीं, क्षत्रिय हैं। वह मन-ही-मन सोचने लगा कि ये किसी विशेष उद्देश्यसे ब्राह्मण-वेश धारण करके आये हैं।
उसने विचार किया, “यदि ये याचक बनकर मेरे द्वारपर आये हैं, तो मैं इन्हें निराश नहीं करूँगा। आवश्यकता पड़नेपर अपना शरीर तक दे दूँगा। दैत्यराज बलिने भी ब्राह्मणरूपधारी विष्णुभगवान्को सब कुछ दान कर अमर कीर्ति प्राप्त की थी। यह शरीर तो नश्वर है, परन्तु उससे प्राप्त यश अमर रहता है।”
ऐसा विचार करके उदारचित्त जरासन्धने उनसे कहा, “आप जो चाहें माँग लें। आवश्यकता हो तो मैं अपना सिर भी दे सकता हूँ।”
तब श्रीकृष्णने कहा, “राजन्! हम अन्न माँगनेवाले ब्राह्मण नहीं, क्षत्रिय हैं। हम आपके पास युद्धकी भिक्षा माँगने आये हैं। यदि आप उचित समझें तो हममेंसे किसी एकके साथ द्वन्द्वयुद्ध कीजिये।ये पाण्डुपुत्र भीमसेन हैं, ये अर्जुन हैं, और मैं इन दोनोंका ममेरा भाई तथा आपका पुराना शत्रु कृष्ण हूँ।”
जब भगवान् श्रीकृष्णने अपना परिचय दिया, तब जरासन्ध हँसकर बोला, “यदि युद्ध ही चाहते हो तो मैं तुम्हारी यह इच्छा अवश्य पूरी करूँगा। कृष्ण! मैं तुमसे युद्ध नहीं करूँगा, क्योंकि तुम पहले ही मेरे भयसे मथुरा छोड़कर भाग गये थे। अर्जुन भी मुझसे आयु और बलमें छोटा है, इसलिए वह भी मेरे योग्य प्रतिद्वन्द्वी नहीं है। केवल भीमसेन ही मेरे समान बलवान् हैं, अतः मैं उन्हींसे युद्ध करूँगा।”
यह कहकर जरासन्धने भीमसेनको एक विशाल गदा दी और स्वयं दूसरी गदा लेकर नगरसे बाहर युद्धभूमिमें आ गया। दोनों महावीर गदाएँ लेकर आमने-सामने भिड़ गये। वे विविध पैंतरोंसे एक-दूसरेपर प्रहार करने लगे। उनकी गदाओंकी टक्करसे भयंकर शब्द होने लगे और दोनोंने एक-दूसरेके शरीरपर लगातार आघात किये।
लम्बे समय तक चले इस भीषण गदायुद्धमें अन्ततः दोनोंकी गदाएँ टूट गयीं। तब उन्होंने मुष्टियुद्ध आरम्भ कर दिया और घूँसोंसे एक-दूसरेपर प्रहार करने लगे। जरासन्ध और भीमसेन बल, कौशल तथा उत्साहमें लगभग समान थे। इसलिए लगातार युद्ध करते रहनेपर भी न किसीकी विजय हुई और न पराजय। दिनमें वे घोर युद्ध करते और रातमें शत्रुताका व्यवहार छोड़ देते।
भीमसेन के हाथों जरासन्ध का वध
इस प्रकार उनके बीच सत्ताईस दिनोंतक युद्ध चलता रहा। अट्ठाईसवें दिन भीमसेनने भगवान् श्रीकृष्णसे कहा, “मैं युद्धमें जरासन्धको पराजित नहीं कर पा रहा हूँ।”
श्रीकृष्ण जरासन्धके जन्म और मृत्युका रहस्य जानते थे। वे जानते थे कि जरा राक्षसीने उसके शरीरके दो अलग-अलग भागोंको जोड़कर उसे जीवन दिया था। इसलिए उन्होंने भीमसेनको उसकी मृत्युका उपाय बतानेका निश्चय किया।
भगवान्ने एक वृक्षकी डालीको बीचसे चीरकर संकेत दिया। भीमसेन तुरंत उनका अभिप्राय समझ गये।
तब भीमसेनने जरासन्धको पकड़कर भूमि पर पटक दिया, उसका एक पैर अपने पैरसे दबाया और दूसरे पैरको दोनों हाथोंसे पकड़कर उसके शरीरको बीचसे फाड़ डाला। इस प्रकार जरासन्धका वध हो गया।
जरासन्धकी मृत्युसे मगधकी प्रजा शोक करने लगी। श्रीकृष्ण और अर्जुनने भीमसेनका आलिंगन कर उनका सम्मान किया। श्रीकृष्णने जरासन्धके पुत्र सहदेवको मगधके सिंहासनपर बैठाया और जरासन्धद्वारा बंदी बनाये गये सभी राजाओंको कारागारसे मुक्त कर दिया।
जरासन्ध के कारागार से बंदी राजाओं को श्रीकृष्ण ने किया मुक्त
जरासन्धने बीस हजार आठ सौ राजाओंको पराजित करके एक पर्वतीय दुर्गमें कैद कर रखा था। जब भगवान् श्रीकृष्णने उन्हें मुक्त कराया, तब वे दीर्घकालीन कारावासके कारण अत्यन्त दुर्बल और कष्टग्रस्त हो चुके थे। उनके वस्त्र मैले थे, शरीर क्षीण हो गये थे और भूख-प्याससे उनकी अवस्था दयनीय हो रही थी।
कारागारसे बाहर निकलते ही उन राजाओंकी दृष्टि भगवान् श्रीकृष्णपर पड़ी। उन्होंने भगवान्के दिव्य, श्यामसुन्दर स्वरूपका दर्शन किया, जो पीताम्बर धारण किये हुए शंख, चक्र, गदा और कमलसे सुशोभित था। उनके वक्षःस्थलपर श्रीवत्सका चिह्न, गलेमें कौस्तुभमणि और वनमाला शोभायमान थी।
भगवान्के दर्शन करते ही उन राजाओंके समस्त दुःख और क्लेश दूर हो गये। वे प्रेम और श्रद्धासे अभिभूत होकर मानो नेत्रोंसे भगवान्का पान करने लगे। उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंमें सिर रखकर प्रणाम किया।
भगवान्के दर्शनसे उन्हें ऐसा आनन्द प्राप्त हुआ कि कारावासके सारे कष्ट भूल गये। तब वे हाथ जोड़कर विनम्रतापूर्वक भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति करने लगे।
भगवान् श्रीकृष्णने उन मुक्त हुए राजाओंसे कहा, “अब तुममें मेरी दृढ़ भक्ति होगी। यह जान लो कि मैं सबका आत्मा और स्वामी हूँ। धन, ऐश्वर्य और राज्यका मद मनुष्यको पतनकी ओर ले जाता है। हैहय, नहुष, वेन, रावण और नरकासुर जैसे अनेक राजा एवं शक्तिशाली व्यक्ति इसी अहंकारके कारण पतित हुए। इसलिए शरीर, परिवार और सम्पत्तिको नश्वर समझकर उनमें आसक्त मत हो।
“धर्मपूर्वक प्रजाकी रक्षा करो, यज्ञोंके द्वारा मेरा पूजन करो, मन और इन्द्रियोंको वशमें रखो तथा जीवनमें आनेवाले सुख-दुःख, लाभ-हानि और जन्म-मृत्युको मेरे प्रसादके समान स्वीकार करो। मेरा स्मरण करते हुए जीवन व्यतीत करो। इस प्रकार अन्तमें तुम मुझे ही प्राप्त हो जाओगे।”
इसके बाद भगवान्ने उन राजाओंकी सेवा और सम्मानकी व्यवस्था की। जब वे पुनः राजसी वैभवसे सुशोभित हो गये, तब भगवान् श्रीकृष्णने उन्हें श्रेष्ठ रथोंपर बैठाकर सम्मानपूर्वक उनके राज्योंके लिये विदा किया। वे सभी राजा भगवान्की कृपा और उपदेशसे कृतार्थ होकर अपने-अपने देश लौट गये। अपने राज्योंमें पहुँचकर उन्होंने प्रजाको भगवान् श्रीकृष्णकी अद्भुत लीला और कृपाका वर्णन किया तथा भगवान्के उपदेशानुसार धर्मपूर्वक राज्य करने लगे।
उधर भगवान् श्रीकृष्ण, भीमसेन और अर्जुन जरासन्धका वध कराकर तथा मगधके नये राजा सहदेवसे सम्मान प्राप्त करके इन्द्रप्रस्थके लिये लौट चले। इन्द्रप्रस्थके निकट पहुँचकर उन विजयी वीरोंने अपने शंख बजाये, जिनकी ध्वनिसे उनके मित्र आनन्दित और शत्रु भयभीत हो उठे।
सारांश: JKYog India Online Class- श्रीमद् भागवत कथा [हिन्दी]- 01.06.2026