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87- यमलार्जुन उद्धार: कुवेरपुत्र नलकूबर और मणिग्रीव का उद्धार

Nov 30th, 2025 | 6 Min Read
Blog Thumnail

Category: Bhagavat Purana

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Language: Hindi

श्रीमद्भागवत महापुराण- स्कन्ध: 10 अध्याय: 10

राजा परीक्षितने शुकदेवजी से पूछा की नलकूबर और मणिग्रीवको शाप क्यों मिला। उन्होंने ऐसा कौन-सा निन्दित कर्म किया था, जिसके कारण परम शान्त देवर्षि नारदजीको भी क्रोध आ गया? 

श्रीशुकदेवजीने कहा की नलकूबर और मणिग्रीव-ये दोनों एक तो धनाध्यक्ष कुबेरके लाड़ले लड़के थे और दूसरे इनकी गिनती हो गयी रुद्रभगवान्के अनुचरोंमें। इससे उनका घमण्ड बढ़ गया। एक दिन वे दोनों मन्दाकिनीके तटपर कैलासके रमणीय उपवनमें वारुणी मदिरा पीकर मदोन्मत्त हो गये थे। नशेके कारण उनकी आँखें घूम रही थीं। बहुत-सी स्त्रियाँ उनके साथ गा-बजा रही थीं और वे पुष्पोंसे लदे हुए वनमें उनके साथ विहार कर रहे थे। वे जलके भीतर जैसे हाथियोंका जोड़ा हथिनियोंके साथ जलक्रीडा कर रहा हो, वैसे ही वे उन युवतियों के साथ तरह-तरहकी क्रीडा करने लगे। 

संयोगवश उधरसे परम समर्थ देवर्षि नारदजी आ निकले। उन्होंने उन यक्षयुवकोंको देखा और समझ लिया कि ये इस समय मतवाले हो रहे हैं। देवर्षि नारदको देखकर वस्त्रहीन अप्सराएँ लजा गयीं। शापके डरसे उन्होंने तो अपनेअपने कपड़े झटपट पहन लिये, परन्तु इन यक्षोंने कपड़े नहीं पहने।

नारदजी ने देखा कि कुबेर के दोनों पुत्र देवताओं के घर में जन्म लेने के बाद भी धन, वैभव और मदिरा के नशे में पड़कर पूरी तरह बिगड़ गये हैं। इसलिए उन पर कृपा करने के लिये उन्होंने कहा की जो लोग संसारी भोग-विलास में ही डूबे रहते हैं, उनकी बुद्धिको सबसे ज़्यादा नष्ट करनेवाला है श्रीमद अर्थात् धन-सम्पत्तिका नशा। हिंसा, कुल का घमंड रखना भी इतना ख़राब नहीं जितना श्रीमद ख़तरनाक है। क्योंकि जहाँ श्रीमद होता है, वहाँ स्त्री–आसक्ति, जुआ और मदिरा भी साथ आते हैं। धन के नशे में अंधे लोग सोचते हैं कि उनका शरीर कभी ख़त्म नहीं होगा। इन्द्रियों के गुलाम होकर वे दूसरों को कष्ट पहुँचाते हैं, जानवरों को मार डालते हैं।

नारदजी कहते हैं की ये शरीर अंत में या तो मिट्टी में सड़ जायेगा, या पक्षी-कुत्ते खा लेंगे, या जलकर राख हो जायेगा। फिर ऐसे तुच्छ शरीर के लिए दूसरों से दुश्मनी क्यों? नारदजी आगे प्रश्न करते हैं कि यह शरीर आखिर है किसका है? उस किसान का है, जो हमें अन्न देता है या पिता का, जिसने गर्भाधान किया या माँ का, जिसने नौ महीने पालकर रखा या नाना का, जिसने माँ को जन्म दिया? जो इसे बल से काम करा ले – उसका? या जो पैसे देकर खरीद ले – उसका? या फिर उस चिता की आग का, जो इसे जला देगी? या कुत्तों-गिद्धों का, जो इसे नोच खायेंगे?

शरीर तो प्रकृति से बना है और उसी में मिल जायेगा। फिर कौन मूर्ख इसे ‘मैं’ समझकर दूसरों को कष्ट पहुँचायेगा? जिन्हें धन का घमंड होता है, उन्हें नीचे गिराने और आँख खोलने वाला सबसे अच्छा उपाय गरीबी है। गरीब व्यक्ति समझ सकता है “दूसरों को भी उतना ही दर्द होता है, जितना मुझे।” जिसे कभी काँटा चुभा हो, वही इसकी पीड़ा जानता है और चाहता है कि किसी और को काँटा न चुभे। धनी और नशे में चूर लोग यह समझ ही नहीं पाते।

गरीब को रोज़ की रोटी के लिए संघर्ष करना पड़ता है। उसके मन में घमंड, दिखावा, हेकड़ी कुछ भी नहीं रहता। उसके भोग सीमित होते हैं; इसलिए वह दूसरों का अहित भी नहीं करता। ऐसे में साधु-संतों का संग उसे आसानी से मिलता है और उनके साथ रहने से उसके मन की लालसाएँ मिट जाती हैं और उसका हृदय शुद्ध हो जाता है। संत लोग सबको समान देखते हैं और भगवान के चरणों में ही रस लेते हैं; इसलिए धन के घमंडी और दुष्चारी लोगों की उन्हें कोई ज़रूरत नहीं। वे तो उपेक्षा के ही पात्र हैं।

नारदजी कहते हैं की ये दोनों यक्ष वारुणी मदिरा पीकर, धन के नशे में अंधे होकर स्त्रियों के पीछे भाग रहे हैं। इनकी अज्ञानता और घमंड को मैं तोड़ूँगा। कुबेर के पुत्र होकर भी इन्हें यह भी नहीं पता कि ये पूरी तरह नग्न खड़े हैं – यह कितना बड़ा अनर्थ है। इसलिए ये दोनों वृक्ष बनने के योग्य हैं। वे वृक्ष–योनि में रहें, ताकि इन्हें फिर से ऐसा घमंड न हो।

परन्तु करुणा करके नारदजी आगे कहते हैं की मेरी कृपा से वृक्ष बने हुए भी इन्हें भगवान की स्मृति बनी रहेगी। देवताओं के सौ वर्ष बीतने पर भगवान कृष्ण इनके सामने प्रकट होंगे, और उनके स्पर्श से ये मुक्त होकर अपने लोक को लौट जायेंगे।

श्रीशुकदेवजी कहते हैं की देवर्षि नारद इस प्रकार कहकर भगवान् नर-नारायणके आश्रमपर चले गये। नलकूबर और मणिग्रीव-ये दोनों एक ही साथ अर्जुन वृक्ष होकर यमलार्जुन नामसे प्रसिद्ध हुए ।

भगवान् श्रीकृष्णने अपने परम प्रेमी भक्त देवर्षि नारदजीकी बात सत्य करनेके लिये धीरे-धीरे ऊखल घसीटते हए उस ओर प्रस्थान किया, जिधर यमलार्जुन वृक्ष थे। भगवान्ने सोचा कि ‘देवर्षि नारद मेरे अत्यन्त प्यारे हैं और ये दोनों भी मेरे भक्त कुबेरके लड़के हैं। इसलिये महात्मा नारदने जो कुछ कहा है, उसे मैं ठीक उसी रूपमें पूरा करूँगा’।

यह विचार करके भगवान् श्रीकृष्ण दोनों वृक्षोंके बीचमें घुस गये। वे तो दूसरी ओर निकल गये, परन्तु ऊखल टेढ़ा होकर अटक गया। दामोदर भगवान् श्रीकृष्णकी कमरमें रस्सी कसी हुई थी। उन्होंने अपने पीछे लुढ़कते हुए ऊखलको ज्यों ही तनिक जोरसे खींचा, त्यों ही पेडोंकी सारी जडें उखड गयी। समस्त बलविक्रमके केन्द्र भगवान्का तनिक-सा जोर लगते ही पेड़ोंके तने, शाखाएँ, छोटी-छोटी डालियाँ और एक-एक पत्ते काँप उठे और वे दोनों बड़े जोरसे तड़तड़ाते हुए पृथ्वीपर गिर पड़े।

उन दोनों वृक्षोंमेंसे अग्निके समान तेजस्वी दो सिद्ध पुरुष निकले। उनके चमचमाते हुए सौन्दर्यसे दिशाएँ दमक उठीं। उन्होंने सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी भगवान् श्रीकृष्णके पास आकर उनके चरणोंमें सिर रखकर प्रणाम किया और हाथ जोड़कर शुद्ध हृदयसे स्तुति करते हुए विनती करते हैं की हम आपके दासों के दास हैं। हमें स्वीकार कीजिये। नारदजी की कृपा से ही आपका दर्शन मिला है। और प्रार्थना करते हैं की हमारी वाणी आपके गुण गाये, कान आपकी कथा सुनें, हाथ सेवा करें, मन आपके चरणों में लगे, आँखें संतों के दर्शन करती रहें, और हमारा मस्तक सबके सामने नम्र बना रहे।

श्रीकृष्णने नलकूबर और मणिग्रीवके इस प्रकार स्तुति करनेपर रस्सीसे ऊखलमें बँधे-बँधे ही हँसते हुए उनसे कहा, "तुमलोग श्रीमदसे अंधे हो रहे थे। मैं पहलेसे ही यह बात जानता था कि परम कारुणिक देवर्षि नारदने शाप देकर तुम्हारा ऐश्वर्य नष्ट कर दिया तथा इस प्रकार तुम्हारे ऊपर कृपा की।"
साधूनां समचित्तानां सुतरां मत्कृतात्मनाम् ।
दर्शनान्नो भवेद्‍बन्धः पुंसोऽक्ष्णोः सवितुर्यथा ॥
जिनकी बुद्धि समदर्शिनी है और हृदय पूर्ण-रूपसे मेरे प्रति समर्पित है, उन साधु पुरुषोंके दर्शनसे बन्धन होना ठीक वैसे ही सम्भव नहीं है, जैसे सूर्योदय होनेपर मनुष्यके नेत्रोंके सामने अन्धकारका होना। (भागवत 10-10-41)

इसलिये नलकूबर और मणिग्रीव! तुमलोग मेरे परायण होकर अपने-अपने घर जाओ। तुमलोगोंको संसार चक्रसे छुड़ानेवाले अनन्य भक्तिभावकी, जो तुम्हें अभीष्ट है, प्राप्ति हो गयी है।"

श्रीशुकदेवजी कहते हैं की जब भगवान्ने इस प्रकार कहा, तब उन दोनोंने उनकी परिक्रमा की और बार-बार प्रणाम किया। इसके बाद ऊखलमें बँधे हुए सर्वेश्वरकी आज्ञा प्राप्त करके उन लोगोंने उत्तर दिशाकी यात्रा की। 

वृक्षोंके गिरनेसे जो भयंकर शब्द हुआ था, उसे नन्दबाबा आदि गोपोंने भी सुना। उनके मनमें यह शंका हुई कि कहीं बिजली तो नहीं गिरी! सब-के-सब भयभीत होकर वृक्षोंके पास आ गये। वहाँ पहुँचनेपर उन लोगोंने देखा कि दोनों अर्जुनके वृक्ष गिरे हुए हैं। यद्यपि वृक्ष गिरनेका कारण स्पष्ट था वहीं उनके सामने ही रस्सीमें बँधा हुआ बालक ऊखल खींच रहा था, परन्तु वे समझ न सके। ‘यह किसका काम है, ऐसी आश्चर्यजनक दुर्घटना कैसे घट गयी?’ यह सोचकर वे कातर हो गये, उनकी बुद्धि भ्रमित हो गयी।

वहाँ कुछ बालक खेल रहे थे। उन्होंने कहा, ‘अरे, इसी कन्हैयाका तो काम है। यह दोनों वृक्षोंके बीचमेंसे होकर निकल रहा था। ऊखल तिरछा हो जानेपर दूसरी ओरसे इसने उसे खींचा और वृक्ष गिर पड़े। हमने तो इनमें से निकलते हुए दो पुरुष भी देखे हैं।’ परन्तु गोपोंने बालकोंकी बात नहीं मानी। वे कहने लगे, 'एक नन्हा-सा बच्चा इतने बड़े वृक्षोंको उखाड़ डाले, यह कभी सम्भव नहीं है।’ किसी-किसीके चित्तमें श्रीकृष्णकी पहलेकी लीलाओंका स्मरण करके सन्देह भी हो आया। नन्दबाबाने देखा, उनका प्राणोंसे प्यारा बच्चा रस्सीसे बँधा हुआ ऊखल घसीटता जा रहा है। वे हँसने लगे और जल्दीसे जाकर उन्होंने रस्सीकी गाँठ खोल दी।

सारांश: JKYog India Online Class- श्रीमद् भागवत कथा [हिन्दी]- 28.11.2025