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103- अक्रूरजी कृष्ण को मथुरा ले जाने ब्रज आए; गोपियों ने विलाप करते हुए कहा, “न जाओ, मथुरा, प्राणाधार!”

Mar 1st, 2026 | 7 Min Read
Blog Thumnail

Category: Bhagavat Purana

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Language: Hindi

श्रीमद्भागवत महापुराण- स्कन्ध: 10 अध्याय: 38-39

श्रीशुकदेवजी कहते हैं कि अक्रूरजी मथुरा से प्रातःकाल रथ पर बैठकर नन्दबाबा के गोकुल के लिए चल पड़े। मार्ग में वे भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन की कल्पना से प्रेम और भक्ति में डूब गए। वे स्वयं को अयोग्य मानते हुए भी अपने महान भाग्य पर आश्चर्य करते हैं कि आज उन्हें उन भगवान के दर्शन होंगे, जिनके चरणों का ध्यान बड़े-बड़े योगी और देवता करते हैं।

अक्रूरजी सोचते हैं कि कंस ने ही उन्हें भेजकर वास्तव में उन पर कृपा की है, क्योंकि इसी बहाने उन्हें भगवान के दर्शन मिलेंगे। वे भगवान के रूप, सौन्दर्य, करुणा और महिमा का स्मरण करते हुए अत्यन्त भावविभोर हो जाते हैं। वे निश्चय करते हैं कि दर्शन होते ही वे रथ से उतरकर श्रीकृष्ण और बलराम के चरणों में गिर पड़ेंगे और उनके चरण पकड़ लेंगे।

उन्हें क्षणभर शंका होती है कि वे कंस के दूत हैं, कहीं भगवान उन्हें शत्रु न समझ लें; परन्तु तुरंत ही वे समझते हैं कि भगवान सर्वज्ञ, समदर्शी और करुणामय हैं, इसलिए वे अवश्य उन्हें अपनाएँगे। वे आशा करते हैं कि भगवान उन्हें प्रेम से आलिंगन करेंगे, उनके सिर पर हाथ रखेंगे, और उनके समस्त पाप तथा कर्मबन्धन नष्ट हो जाएँगे।

अक्रूरजी पूर्ण विश्वास और उत्साह से भर जाते हैं कि आज उनका जीवन सफल हो जाएगा, क्योंकि उन्हें भगवान श्रीकृष्ण और बलराम के दर्शन, स्पर्श और प्रेम का सौभाग्य प्राप्त होगा।
मार्गमें इसी चिन्तनमें डूबे-डूबे रथसे नन्द-गाँव पहुँच गये और सूर्य अस्ताचलपर चले गये।

अक्रूरजी जब व्रज पहुँचे, तब उन्होंने भूमि पर भगवान् श्रीकृष्ण के चरणचिह्न देखे। उन्हें देखते ही अक्रूरजी के हृदय में गहरा आनन्द भर गया। वे अपने भाव को रोक नहीं सके। उनकी आँखों से आँसू बहने लगे। वे रथ से उतरकर उस धूल में लोटने लगे और बोले, “यह तो मेरे प्रभु के चरणों की धूल है।”

व्रज में प्रवेश करने पर अक्रूरजी ने देखा कि श्रीकृष्ण और बलराम गाय दुहने के स्थान पर बैठे हैं। श्रीकृष्ण पीताम्बर पहने थे और बलराम नीलाम्बर। दोनों के नेत्र खिले हुए कमल के समान सुन्दर थे। वे किशोर अवस्था में थे और अत्यन्त सुन्दर दिखाई दे रहे थे। उनके चरणों के चिन्हों से पृथ्वी की शोभा बढ़ रही थी और उनके मुख पर मधुर मुसकान थी।

अक्रूरजी ने समझ लिया कि यही परम भगवान् हैं, जो संसार की रक्षा के लिए श्रीकृष्ण और बलराम के रूप में अवतरित हुए हैं। उन्हें देखते ही अक्रूरजी उनके चरणों में गिर पड़े। आनन्द और प्रेम से उनकी आँखें आँसुओं से भर गईं। वे कुछ बोल भी नहीं सके।

भगवान् श्रीकृष्ण ने उनका भाव समझ लिया। उन्होंने प्रेम से अक्रूरजी को उठाया और उन्हें गले लगा लिया। बलरामजी ने भी उन्हें गले लगाया। फिर दोनों भाई उन्हें अपने घर ले गए। घर पहुँचकर भगवान् ने अक्रूरजी का बहुत आदर किया। उन्हें आसन दिया, उनके चरण धोए और उनका सत्कार किया। उन्हें भोजन कराया और विश्राम कराया। बलरामजी ने भी उन्हें पान और माला देकर सम्मान किया।

इसके बाद नन्दबाबा ने अक्रूरजी से प्रेम से पूछा, “आप लोग कंस के राज्य में कैसे रह रहे हैं? वह बहुत निर्दयी है। उसके राज्य में कोई सुखी कैसे रह सकता है?”

इस प्रकार प्रेम और सम्मान पाकर अक्रूरजी की सारी थकान दूर हो गई और उनका हृदय आनन्द से भर गया। सायंकालका भोजन करनेके बाद अक्रूरजीके पास जाकर श्रीकृष्ण ने अपने स्वजन-सम्बन्धियों के साथ कंसके व्यवहार और उसके अगले कार्यक्रमके सम्बन्धमें पूछा।

भगवान् श्रीकृष्ण ने अक्रूरजी से कहा, “चाचाजी, आपका हृदय बहुत पवित्र है। आपको यात्रा में कोई कष्ट तो नहीं हुआ? मथुरा में हमारे सम्बन्धी और यदुवंशी सब कुशल से हैं न? हमारा मामा कंस हमारे कुल के लिए बड़ी विपत्ति बन गया है। जब तक वह जीवित है, तब तक हमारे परिवार की कुशल कैसे हो सकती है।

मुझे बहुत दुःख है कि मेरे कारण ही मेरे माता-पिता को बहुत कष्ट सहने पड़े। उन्हें जेल में डाल दिया गया और उनके बच्चों को भी मार डाला गया। मैं बहुत समय से आप लोगों से मिलने की इच्छा रखता था। आज आपको देखकर मेरी इच्छा पूरी हो गई। अब कृपा करके बताइए कि आप किस कार्य से यहाँ आए हैं?”

भगवान् के पूछने पर अक्रूरजी ने बताया, “कंस यदुवंश से घोर वैर रखता है। वह वसुदेवजी को मारना चाहता है। उसने मुझे आपको मथुरा बुलाने के लिए भेजा है। नारदजी ने उसे बता दिया है कि आप वसुदेवजी के पुत्र हैं। इसलिए वह आपको और बलरामजी को मथुरा बुलाकर मारना चाहता है।”

यह सुनकर भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी मुसकराए। फिर उन्होंने यह बात नन्दबाबा को भी बता दी। नन्दबाबा ने सभी गोपों को बुलाकर कहा, “सारा दूध, दही और घी इकट्ठा करो। भेंट की सामग्री तैयार करो और गाड़ियाँ सजाओ। हम कल सुबह मथुरा जाएँगे। वहाँ राजा कंस को भेंट देंगे और उत्सव भी देखेंगे।”

श्रीकृष्ण के मथुरा गमन का समाचार सुनकर गोपियों का विलाप

जब गोपियों ने सुना कि अक्रूरजी श्रीकृष्ण और बलरामजी को मथुरा ले जाने आए हैं, तो उनके हृदय में गहरा दुःख हुआ। वे बहुत व्याकुल हो गईं। गोपियों के हृदय में इतनी पीड़ा हुई कि वे गरम साँस लेने लगीं और उनका मुख मुरझा गया। कुछ गोपियाँ तो ऐसी हो गईं कि उन्हें अपने वस्त्र, आभूषण और शरीर का भी ध्यान नहीं रहा।

कुछ गोपियाँ श्रीकृष्ण का ध्यान करते-करते इतनी तन्मय हो गईं कि उन्हें अपने शरीर और संसार का भी ज्ञान नहीं रहा। वे श्रीकृष्ण की चाल, उनकी मुसकान, उनकी चितवन और उनकी लीलाओं को याद करके रोने लगीं। उनकी आँखों से आँसू बहने लगे। 

वे सब मिलकर आपस में कहने लगीं, “हे विधाता, तुम बहुत कठोर हो। पहले तुम हमें श्रीकृष्ण से मिलाते हो और जब हमारा प्रेम बढ़ जाता है, तब उन्हें हमसे दूर कर देते हो। यह बहुत अन्याय है। तुमने हमें श्रीकृष्ण का सुन्दर मुख दिखाया और अब उन्हें हमसे दूर ले जा रहे हो। यह बहुत दुःख की बात है।

हमें लगता है कि अब मथुरा की स्त्रियाँ बहुत भाग्यशाली होंगी। वे श्रीकृष्ण को देखेंगी और उनके मधुर रूप का आनन्द लेंगी। शायद श्रीकृष्ण वहीं रह जाएँ और हमारे पास वापस न आएँ। देखो, यह अक्रूर कितना कठोर है। वह हमारे प्रिय श्रीकृष्ण को हमसे दूर ले जा रहा है और हमें कोई सांत्वना भी नहीं दे रहा।

और देखो, श्रीकृष्ण भी रथ पर बैठ गए हैं। ग्वालबाल भी उनके साथ जाने की तैयारी कर रहे हैं। आज तो लगता है कि विधाता हमारे विरुद्ध ही काम कर रहा है।”

गोपियाँ आपस में कहने लगीं, “चलो सखियो, हम स्वयं जाकर अपने प्रिय श्यामसुन्दर को रोकेंगी। हमें अब किसी का भय नहीं है। हम तो एक क्षण के लिए भी उनसे दूर नहीं रह सकतीं।

हम उन्हीं श्रीकृष्ण के साथ रास की रात्रियों में रही हैं। उनकी मधुर मुसकान, उनकी मीठी बातें और उनके प्रेमपूर्ण व्यवहार से वे लम्बी रातें भी हमें एक क्षण के समान लगती थीं। अब उनके बिना हम इस विरह का दुःख कैसे सहेंगी? प्रतिदिन सायंकाल वे गौएँ चराकर बलरामजी और ग्वालबालों के साथ लौटते थे। उनके घुँघराले बाल और फूलों की माला गौओं की धूल से ढकी रहती थी। वे बाँसुरी बजाते हुए अपनी मुसकान और चितवन से हमारे हृदय को आनन्द से भर देते थे। अब उनके बिना हम कैसे जीवित रहेंगी?”

श्रीशुकदेवजी कहते हैं की गोपियाँ इस प्रकार बोल तो रही थीं, पर उनके मन में केवल श्रीकृष्ण ही थे। वे विरह के दुःख से अत्यन्त व्याकुल हो गईं। उन्होंने लाज छोड़ दी और ऊँचे स्वर में पुकारने लगीं, “हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव!”
न जाओ, मथुरा! प्राणाधार।
जानि-जानि अनजान बनहु जनि, प्रियतम नन्दकुमार।
गोपिन गोपन गोधन के इक, तुमहिं प्राण साकार।
तुमहिं बताओ तुम बिनु पुनि कत, रहे प्रान तनुधार।
उर परतीति न आवति जो कह, अइहौं दिन गये चार।
कह ‘कृपालु’ पुनि कंस नृशंसहुँ, उर डर बारम्बार।।
गोपियाँ रोती रहीं और रोते-रोते पूरी रात बीत गयी। सुबह सूरज निकल आया। तब अक्रूरजी अपने नित्य कर्म करके रथ पर बैठे और मथुरा की ओर चल पड़े। नन्दबाबा और अन्य गोप भी दूध, दही, मक्खन और घी से भरे मटके तथा भेंट की सामग्री लेकर छकड़ों पर बैठकर उनके पीछे-पीछे चलने लगे।

उसी समय प्रेम में डूबी हुई गोपियाँ श्रीकृष्ण के पास आयीं। वे उनकी मधुर मुसकान और प्रेमपूर्ण चितवन को देखकर कुछ शान्त हुईं। वे वहीं खड़ी रहीं, क्योंकि वे अपने प्रिय श्रीकृष्ण से कोई सन्देश सुनना चाहती थीं।

भगवान् श्रीकृष्ण ने देखा कि उनके मथुरा जाने से गोपियाँ बहुत दुःखी हैं। तब उन्होंने दूत के द्वारा उन्हें यह सन्देश भेजा, “मैं फिर लौटकर आऊँगा।” इस सन्देश से गोपियों को थोड़ा धैर्य मिला। जब तक रथ की ध्वजा और पहियों से उड़ती धूल दिखाई देती रही, तब तक गोपियाँ उसी स्थान पर स्थिर खड़ी रहीं, जैसे चित्र बनी हों। उनका मन तो पहले ही श्रीकृष्ण के साथ जा चुका था।

उनके मन में आशा थी कि शायद श्रीकृष्ण लौट आएँगे। परन्तु जब वे वापस नहीं आए, तब वे दुःखी होकर अपने-अपने घर लौट गयीं। उसके बाद वे दिन-रात श्रीकृष्ण की लीलाओं का गान करती रहीं और विरह के दुःख को सहती रहीं।

सारांश: JKYog India Online Class- श्रीमद् भागवत कथा [हिन्दी]- 27.02.2026