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111- कृष्ण-रुक्मिणी विवाह, प्रद्युम्न का जन्म और शंबरासुर का अन्त

May 14th, 2026 | 7 Min Read
Blog Thumnail

Category: Bhagavat Purana

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Language: Hindi

श्रीमद्भागवत महापुराण- स्कन्ध: 10 अध्याय: 54-55

भगवान श्रीकृष्ण द्वारा रुक्मिणीजी का हरण करके वहाँ से निकल जाने के पश्चात जरासन्ध पक्ष के घमण्डी राजा यह अपमान सह न सके। वे क्रोध से तिलमिलाकर कहने लगे, “धिक्कार है हम पर! हम हाथों में धनुष लिए खड़े रह गए, और ये ग्वाले सिंह का भाग छीन ले जाने वाले हिरनों की भाँति हमारा यश हरकर ले गए!”

इसके बाद सभी राजा क्रोध से भरकर अपनी सेनाओं सहित भगवान् श्रीकृष्ण के पीछे दौड़े। यदुवंशियों ने भी युद्ध के लिए मोर्चा संभाल लिया। जरासन्ध और उसके सहयोगियों ने बाणों की भारी वर्षा की, जिससे युद्धभूमि भयंकर बन गई। रुक्मिणीजी ने जब श्रीकृष्ण की सेना को बाणों से घिरा देखा, तो वे भयभीत हो उठीं। तब भगवान् श्रीकृष्ण ने मुस्कराकर उन्हें आश्वासन दिया कि उनकी सेना शीघ्र ही शत्रुओं को परास्त कर देगी।

इसके बाद बलरामजी, गद और अन्य यदुवंशी वीरों ने प्रचण्ड युद्ध किया और शत्रु सेना को तहस-नहस कर दिया। अन्ततः जरासन्ध और अन्य राजा पराजित होकर भाग गये। 

शिशुपाल रुक्मिणीजी को खो देने के कारण अत्यन्त दुःखी हो गया। तब जरासन्ध ने उसे समझाया कि संसार में जीत-हार स्थायी नहीं होती; सब कुछ काल और भगवान् की इच्छा के अधीन है। उसने कहा कि कभी विजय मिलती है, कभी पराजय, इसलिए शोक नहीं करना चाहिए। मित्रों के समझाने पर शिशुपाल और अन्य राजा अपने-अपने राज्यों को लौट गये।

रुक्मिणीजी का भाई रुक्मी भगवान् श्रीकृष्ण से अत्यन्त द्वेष करता था। उसे यह अपमान सहन नहीं हुआ कि श्रीकृष्ण उसकी बहिन का हरण कर ले जाएँ। इसलिए वह एक अक्षौहिणी सेना लेकर उनके पीछे दौड़ा और प्रतिज्ञा की कि यदि वह श्रीकृष्ण को मारकर रुक्मिणी को वापस न ला सका, तो कुण्डिनपुर वापस नहीं लौटेगा।

क्रोध में भरा रुक्मी भगवान् श्रीकृष्ण को अपमानित करते हुए युद्ध के लिए ललकारने लगा और उन पर बाण चलाये। भगवान् श्रीकृष्ण मुस्कराते हुए उसके एक-के-बाद-एक धनुष, रथ, ध्वजा, घोड़े और अस्त्र-शस्त्र काटते गये। जब उसके सारे शस्त्र नष्ट हो गये, तब रुक्मी तलवार लेकर स्वयं भगवान् पर टूट पड़ा। तब भगवान् श्रीकृष्ण ने उसकी ढाल और तलवार भी काट डाली और उसे मारने के लिए अपनी तलवार उठा ली।

शुकदेवजी कहते हैं कि जब रुक्मिणीजी ने अपने भाई रुक्मी को मृत्यु के निकट देखा, तब वे भय और शोक से काँप उठीं। वे भगवान् श्रीकृष्ण के चरणों में गिरकर करुण प्रार्थना करने लगीं। उनकी दशा देखकर भगवान् दयालु हो गये और उन्होंने रुक्मी को मारने का विचार छोड़ दिया।

किन्तु रुक्मी के अपराध के कारण भगवान् श्रीकृष्ण ने उसे बाँधकर उसकी दाढ़ी-मूँछ और केश काट दिए, जिससे वह अपमानित और कुरूप हो गया। तभी बलरामजी वहाँ पहुँचे। उन्होंने रुक्मी को बन्धन से मुक्त किया और श्रीकृष्ण से कहा कि सम्बन्धी के साथ ऐसा व्यवहार उचित नहीं है।

फिर बलरामजी ने रुक्मिणीजी को समझाया कि सुख-दुःख मनुष्य अपने कर्मों के अनुसार भोगता है; कोई दूसरा उसका कारण नहीं होता। उन्होंने कहा कि क्षत्रिय धर्म में भाई-भाई के बीच भी युद्ध हो जाता है, इसलिए इस घटना पर अधिक शोक नहीं करना चाहिए।

बलरामजी के उपदेश से रुक्मिणीजी का शोक शांत हो गया और उन्होंने विवेकपूर्वक स्थिति को स्वीकार कर लिया। उधर रुक्मी अपमानित और पराजित होकर अत्यन्त दुःखी था। उसने प्रतिज्ञा की थी कि श्रीकृष्ण को हराए बिना और रुक्मिणी को वापस लाए बिना वह कुण्डिनपुर नहीं लौटेगा, इसलिए उसने भोजकट नाम की नई नगरी बसाकर वहीं निवास किया।

श्रीकृष्ण-रुक्मिणी विवाह

इसके बाद भगवान् श्रीकृष्ण रुक्मिणीजी को द्वारका ले आये और विधिपूर्वक उनसे विवाह किया। द्वारका में घर-घर उत्सव मनाया गया। ऊँचे-ऊँचे ध्वज और पताकाएँ लहरा रही थीं। रंग-बिरंगी मालाएँ, वस्त्र और रत्नों के तोरण सजाए गए थे। जल से भरे कलश, सुगन्धित धूप और दीपों की पंक्तियों से पूरी नगरी जगमगा रही थी। मित्र राजाओं को भी आमन्त्रित किया गया था। उस उत्सव में कौतूहल से भरे हुए कुरु, सृञ्जय, कैकय, विदर्भ, यदु और कुन्ति वंश के लोग इधर-उधर घूमते हुए आनन्द मना रहे थे। चारों ओर रुक्मिणी-हरण की कथा गायी जा रही थी। उसे सुनकर राजा और राजकुमारियाँ अत्यन्त आश्चर्यचकित हो रहे थे। जब द्वारकावासियों ने भगवती लक्ष्मी को रुक्मिणी के रूप में और लक्ष्मीपति भगवान श्रीकृष्ण के साथ देखा, तब उनके हृदय परम आनन्द से भर गए।

कृष्ण-रुक्मिणी पुत्र प्रद्युम्न का जन्म

श्रीशुकदेवजी परीक्षित को कहते हैं की कामदेव भगवान वासुदेव के ही अंश हैं। पहले वे शिव जी के क्रोध की अग्नि से भस्म हो गए थे। अब दोबारा शरीर पाने के लिए उन्होंने अपने ही अंशी भगवान वासुदेव का आश्रय लिया। वही कामदेव इस बार भगवान श्रीकृष्ण और रुक्मिणी जी के गर्भ से उत्पन्न हुए और संसार में प्रद्युम्न नाम से प्रसिद्ध हुए। सौन्दर्य, पराक्रम, विनम्रता और अन्य श्रेष्ठ गुणों में वे भगवान श्रीकृष्ण से किसी प्रकार कम नहीं थे।

जब बालक प्रद्युम्न अभी दस दिन के भी नहीं हुए थे, तभी कामरूपी शम्बरासुर भेष बदलकर सूतिकागृह में आया और उन्हें चुरा ले गया। वह जानता था कि यही आगे चलकर उसका शत्रु बनेगा। इसलिए उसने बालक को समुद्र में फेंक दिया और अपने घर लौट गया।

समुद्र में एक बहुत बड़ी मछली ने बालक प्रद्युम्न को निगल लिया। बाद में मछुआरों ने अपने बड़े जाल में उस मछली को दूसरी मछलियों के साथ पकड़ लिया। वे उस बड़ी मछली को भेंट के रूप में शम्बरासुर के पास ले गए। शम्बरासुर के रसोइए उस अद्भुत मछली को रसोईघर में ले गए और कुल्हाड़ियों से काटने लगे।

जब उन्होंने मछली का पेट काटा, तब उसमें एक बालक दिखाई दिया। रसोइयों ने उस बालक को शम्बरासुर की दासी मायावती को दे दिया। उसे यह देखकर बहुत आश्चर्य और शंका हुई।

तभी नारद जी वहाँ आए और उन्होंने बताया कि यह बालक कोई साधारण बालक नहीं, बल्कि कामदेव हैं। ये भगवान श्रीकृष्ण और रुक्मिणीजी के पुत्र हैं, जिन्हें शम्बरासुर समुद्र में फेंक आया था और जो मछली के पेट में पहुँच गए थे।

मायावती वास्तव में कामदेव की पत्नी रति थीं। जब रुद्रभगवान् के क्रोध से कामदेव भस्म हो गये थे, तभी से रति उनके पुनर्जन्म की प्रतीक्षा कर रही थीं। शम्बरासुर ने उन्हें अपने यहाँ दासी बनाकर रखा था।

जब रति को ज्ञात हुआ कि यह बालक प्रद्युम्न ही उनके पति कामदेव हैं, तब वे उनसे अत्यन्त प्रेम करने लगीं। थोड़े ही समय में प्रद्युम्न युवा हो गये और उनका रूप-लावण्य इतना अद्भुत था कि उन्हें देखकर सब मोहित हो जाते थे।

प्रद्युम्न ने मायावती के व्यवहार में परिवर्तन देखकर पूछा कि आप मातृभाव छोड़कर ऐसा व्यवहार क्यों कर रही हैं। तब रति ने उन्हें बताया कि आप भगवान् श्रीकृष्ण और रुक्मिणीजी के पुत्र हैं, जिन्हें शम्बरासुर बचपन में चुराकर समुद्र में फेंक गया था। आप ही मेरे पति कामदेव हैं और मैं आपकी पत्नी रति हूँ।

उन्होंने प्रद्युम्न को यह भी बताया कि शम्बरासुर महान मायावी है, इसलिए उसे पराजित करने के लिए उन्होंने प्रद्युम्न को “महामाया विद्या” सिखायी, जो सभी मायाओं का नाश करने वाली थी।

प्रद्युम्न के द्वारा शम्बरासुर का वध

अब प्रद्युम्न शम्बरासुर के पास गए और उसे कठोर वचन कहने लगे। वे चाहते थे कि किसी प्रकार वह क्रोधित होकर युद्ध करे। उन्होंने उसे खुलकर युद्ध के लिए ललकार भी दिया।
प्रद्युम्नके तीखे वचन सुनकर शम्बरासुर तिलमिला उठा, जैसे किसी ने विषैले साँप को पैर से कुचल दिया हो। उसकी आँखें क्रोध से लाल हो गईं और वह हाथ में गदा लेकर बाहर आ गया।
उसने अपनी गदा को आकाश में बहुत जोर से घुमाया और फिर प्रद्युम्नकी ओर फेंक दिया। गदा चलाते समय उसने इतनी भयानक गर्जना की, मानो आकाश में बिजली गरज रही हो।

शम्बरासुर अपनी मायावी शक्तियों का सहारा लेकर आकाश में चला गया और वहाँ से अनेक अस्त्र-शस्त्र तथा यक्ष, गन्धर्व, पिशाच, नाग और राक्षसों की मायाएँ प्रकट करने लगा। किन्तु प्रद्युम्नने रति द्वारा सिखायी गयी “महामाया विद्या” से उन सभी मायाओं का नाश कर दिया।
अन्त में प्रद्युम्नने तीक्ष्ण तलवार से शम्बरासुर का सिर काट डाला। देवताओं ने प्रसन्न होकर पुष्पवर्षा की। इसके बाद मायावती रति अपने पति प्रद्युम्नको आकाशमार्ग से द्वारका ले आयीं।

रुक्मिणी को मिला अपना खोया पुत्र प्रद्युम्न 

जब प्रद्युम्नअपनी पत्नी मायावती के साथ आकाशमार्ग से द्वारका पहुँचे, तब उनकी साँवली शोभा और मायावती की गौर कांति मेघ और बिजली के समान लग रही थी। वे भगवान् श्रीकृष्ण के अन्तःपुर में पहुँचे, जहाँ की स्त्रियों ने उन्हें देखकर पहले श्रीकृष्ण ही समझ लिया, क्योंकि उनका रूप, चाल, मुस्कान और तेज भगवान् से अत्यन्त मिलता-जुलता था। बाद में उन्हें ज्ञात हुआ कि ये कोई और हैं, तब वे विस्मय और आनन्द से भर गयीं।

उसी समय रुक्मिणीजी वहाँ आयीं। प्रद्युम्नको देखते ही उनके हृदय में अपने खोये हुए पुत्र की स्मृति जाग उठी। वे सोचने लगीं कि कहीं यह वही पुत्र तो नहीं, जो जन्म के बाद उनसे बिछुड़ गया था। तभी भगवान् श्रीकृष्ण, बलरामजी, देवकीजी और वसुदेवजी भी वहाँ पहुँचे। भगवान् श्रीकृष्ण सब कुछ जानते थे। परन्तु वे कुछ नबोले, चुपचाप खड़े रहे। इतनेमें ही नारदजी वहाँ आ पहुँचे और उन्होंने प्रद्युम्नजीको शम्बरासुरका हर ले जाना, समुद्र में फेंक देना आदि जितनी भी घटनाएँ घटित हुई थीं, वे सब कह सुनायीं।

प्रद्युम्नका रूप भगवान् श्रीकृष्ण से इतना मिलता था कि कभी-कभी अन्तःपुर की स्त्रियाँ भी उन्हें श्रीकृष्ण समझ बैठती थीं। क्योंकि वे स्वयं कामदेव के अवतार और भगवान् के ही प्रतिबिम्बस्वरूप थे, इसलिए उनका अनुपम सौन्दर्य सबको मोहित कर देता था।

सारांश: JKYog India Online Class- श्रीमद् भागवत कथा [हिन्दी]- 11.05.2026