श्रीमद्भागवत महापुराण- स्कन्ध: 10 अध्याय: 52-53
काल यवन के भस्म होने और राजा मुचुकुन्द को दर्शन देने के पश्चात भगवान श्रीकृष्ण फिर मथुरापुरी लौट आए। तब तक कालयवन की सेना ने नगर को चारों ओर से घेर रखा था। भगवान ने म्लेच्छों की उस सेना का नाश कर दिया और उनका सारा धन लेकर द्वारका की ओर चल पड़े।
भगवान श्रीकृष्ण की आज्ञा से वह धन मनुष्यों और बैलों के द्वारा ले जाया जा रहा था। तभी मगधराज जरासन्ध अठारहवीं बार तेईस अक्षौहिणी सेना लेकर वहाँ आ पहुँचा। शत्रु सेना का भारी बल देखकर भगवान श्रीकृष्ण और बलराम मनुष्यों जैसी लीला करते हुए उसके सामने से तेज़ी से भाग निकले।
उनके मन में तनिक भी भय नहीं था, फिर भी वे ऐसे अभिनय कर रहे थे मानो बहुत डर गए हों। वे सारा धन वहीं छोड़कर अपने कमल जैसे कोमल चरणों से कई योजनों तक पैदल ही दौड़ते चले गए। इसी दिव्य लीला के द्वारा परम पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण सदैव के लिये ‘रणछोड़’ नाम से विख्यात हुए, जिसका शाब्दिक अर्थ है, “वह जो रणभूमि छोड़ दे।”
जाके भय भयभीत हो, महाकाल बरजोर।
जरासन्ध के भय सोई, भाजि बन्यो रणछोर।।
जब जरासन्ध ने देखा कि श्रीकृष्ण और बलराम भाग रहे हैं, तब वह हँसने लगा और अपनी रथ सेना के साथ उनका पीछा करने लगा। उसे भगवान श्रीकृष्ण और बलरामजी के दिव्य प्रभाव और ऐश्वर्य का ज्ञान नहीं था।
बहुत दूर तक दौड़ने के बाद दोनों भाई कुछ थकने का अभिनय करते हुए एक बहुत ऊँचे पर्वत पर चढ़ गए। उस पर्वत का नाम ‘प्रवर्षण’ इसलिए पड़ा था क्योंकि वहाँ हमेशा बादल वर्षा करते रहते थे।
जब जरासन्ध ने देखा कि वे दोनों पर्वत में कहीं छिप गए हैं और बहुत खोजने पर भी नहीं मिल रहे, तब उसने पर्वत के चारों ओर लकड़ियाँ रखवाकर आग लगवा दी। भगवान ने देखा कि पर्वत के किनारे जलने लगे हैं, तब दोनों भाई जरासन्ध की सेना के घेरे को लाँघकर उस ग्यारह योजन (88 miles) ऊँचे पर्वत से तेज़ी से नीचे भूमि पर कूद पड़े।
शुकदेवजी परीक्षित को कहते हैं कि न तो जरासन्ध ने और न ही उसके किसी सैनिक ने उन्हें देखा। दोनों भाई वहाँ से निकलकर फिर समुद्र से घिरी हुई द्वारकापुरी में पहुँच गए। उधर जरासन्ध ने झूठा यह मान लिया कि श्रीकृष्ण और बलराम आग में जल गए हैं। फिर वह अपनी विशाल सेना के साथ मगध देश लौट गया।
इसके पश्चात द्वारिका में आनर्तदेशके राजा रैवतजी अपनी रेवती नामकी कन्या ब्रह्माजीकी प्रेरणासे बलरामजीके साथ ब्याह दी।
रुक्मिणी हरण प्रसंग
परीक्षित के पूछने पर शुकदेवजी कहते हैं कि कैसे भगवान् श्रीकृष्ण ने स्वयंवर में उपस्थित शिशुपाल, शाल्व और अन्य राजाओं को पराजित करके सबके सामने विदर्भराज भीष्मक की पुत्री तथा लक्ष्मीजी के अवतार रुक्मिणीजी का हरण किया और उनसे राक्षस-विधि से विवाह किया। यह लीला वैसे ही थी जैसे गरुड़ अमृत को हर ले गये थे।
महाराज भीष्मक विदर्भ देश के राजा थे। उनके पाँच पुत्र और एक अत्यन्त सुन्दर कन्या थी। सबसे बड़े पुत्र का नाम रुक्मी था। उनके चार छोटे भाइयों के नाम थे- रुक्मरथ, रुक्मबाहु, रुक्मकेश और रुक्ममाली। उनकी बहन थीं सती रुक्मिणी।
जब रुक्मिणीजी ने भगवान श्रीकृष्ण के सौन्दर्य, पराक्रम, गुण और वैभव की महिमा सुनी तब उन्होंने मन ही मन निश्चय कर लिया कि भगवान श्रीकृष्ण ही मेरे योग्य पति हैं। भगवान श्रीकृष्ण भी यह समझते थे कि “रुक्मिणी बहुत ही सुन्दर लक्षणों वाली, बुद्धिमती, उदार, सुशील और गुणवान हैं। वे ही मेरे योग्य पत्नी हैं।” इस प्रकार भगवान ने भी रुक्मिणीजी से विवाह करने का विचार किया।
रुक्मिणीजी के अन्य भाई और सम्बन्धी भी चाहते थे कि उनका विवाह श्रीकृष्ण से ही हो। लेकिन रुक्मी श्रीकृष्ण से बहुत द्वेष रखता था। उसने इस विवाह का विरोध किया और शिशुपाल को ही अपनी बहन के योग्य वर माना।
जब रुक्मिणीजी को यह पता चला कि उनका बड़ा भाई रुक्मी उनका विवाह शिशुपाल से करना चाहता है, तब वे बहुत दुखी हो गईं। बहुत सोच-विचार करने के बाद उन्होंने एक विश्वासपात्र ब्राह्मण को तुरंत भगवान श्रीकृष्ण के पास भेजा।
जब वे ब्राह्मणदेवता द्वारकापुरी पहुँचे तब वहाँ जाकर उन्होंने देखा कि आदिपुरुष भगवान श्रीकृष्ण स्वर्ण सिंहासन पर विराजमान हैं। श्रीकृष्ण उनको देखते ही अपने आसन पर बैठाया और उसी प्रकार उनकी पूजा की, जैसे देवता स्वयं भगवान की पूजा करते हैं।
भगवान् श्रीकृष्ण ने ब्राह्मण अतिथि का आदर-सत्कार के बाद पूछने लगे कि क्या आपका मन सदा सन्तुष्ट रहता है तथा धर्मपालन में कोई कठिनाई तो नहीं है। जब श्रीकृष्ण ने पूछा तब ब्राह्मण ने रुक्मिणीजी का गुप्त सन्देश सुनना आरम्भ किया।
रुक्मिणीजी ने कहा कि आपके गुणों और रूप-माधुरी को सुनकर और जानकर मेरा मन पूरी तरह आपमें समर्पित हो चुका है। संसार में कुल, शील, सौन्दर्य, विद्या और महिमा में आपके समान कोई नहीं है, इसलिए मैंने आपको ही अपने पति के रूप में वरण किया है।
उन्होंने प्रार्थना की कि आप आकर मुझे स्वीकार करें, ताकि शिशुपाल मेरा स्पर्श भी न कर सके। रुक्मिणीजी ने कहा कि यदि मेरे पुण्य और भगवान् की आराधना सफल हों, तो आप अवश्य आकर मेरा पाणिग्रहण करें।
उन्होंने भगवान् श्रीकृष्ण को उपाय भी बताया कि विवाह से पहले कुलदेवी गिरिजा के मन्दिर जाने की परम्परा है; उसी समय आप आकर शिशुपाल और जरासन्ध की सेनाओं को पराजित करके मेरा हरण कर लें।
अन्त में रुक्मिणीजी ने कहा कि यदि मुझे आपके चरणों की धूल और कृपा न मिली, तो मैं व्रत करके प्राण त्याग दूँगी, परन्तु किसी और को स्वीकार नहीं करूँगी। ब्राह्मण ने यह सारा सन्देश भगवान् श्रीकृष्ण को सुनाकर शीघ्र निर्णय लेने का आग्रह किया।
रुक्मिणीजी का सन्देश सुनकर भगवान् श्रीकृष्ण अत्यन्त प्रसन्न हुए और बोले कि जैसे रुक्मिणी मुझे चाहती हैं, वैसे ही मैं भी उन्हें चाहता हूँ। मेरा चित्त उन्हींमें लगा रहता है। कहाँतक कहूँ, मुझे रातके समय नींदतक नहीं आती। रुक्मी ने द्वेषवश इस विवाह में बाधा डाली है, परन्तु मैं युद्ध करके उन विरोधी राजाओं को परास्त कर रुक्मिणी को अवश्य ले आऊँगा।
जब भगवान् श्रीकृष्ण को ज्ञात हुआ कि विवाह की लग्न निकट है, तब वे ब्राह्मण को साथ लेकर दारुक के रथ पर एक ही रात में विदर्भ पहुँच गये। उधर राजा भीष्मक रुक्मी के आग्रह से शिशुपाल के साथ विवाह की भव्य तैयारियाँ करवा रहे थे। नगर को सजाया गया, ब्राह्मणों द्वारा मंगलकर्म हुए और रुक्मिणीजी को सुन्दर वस्त्रों तथा आभूषणों से सजाया गया।
शिशुपाल के साथ जरासन्ध, शाल्व, दन्तवक्त्र और अन्य अनेक राजा भी विशाल सेनाओं सहित वहाँ पहुँचे थे। वे सब इस निश्चय से आये थे कि यदि भगवान् श्रीकृष्ण रुक्मिणी का हरण करने आएँगे, तो वे मिलकर उनसे युद्ध करेंगे।
जब बलरामजी को यह समाचार मिला कि श्रीकृष्ण अकेले ही कुण्डिनपुर गये हैं और वहाँ युद्ध की सम्भावना है, तब वे भी भ्रातृस्नेहवश बड़ी सेना लेकर उनकी सहायता के लिए चल पड़े।
इधर रुक्मिणीजी श्रीकृष्णके शुभागमनकी प्रतीक्षा कर रही थीं। वे सोच रही थीं कि अभी तक भगवान् श्रीकृष्ण क्यों नहीं आये और सन्देश लेकर गये ब्राह्मण भी क्यों नहीं लौटे। उन्हें भय होने लगा कि शायद भगवान् ने उनमें कोई दोष देख लिया हो या देवता भी उनके अनुकूल न हों।
भगवान् श्रीकृष्ण के प्रेम में डूबी हुई रुक्मिणीजी चिन्तामग्न बैठी थीं। तभी उनके बाएँ नेत्र, भुजा और जाँघ फड़कने लगे, जो शुभ संकेत थे। उसी समय ब्राह्मण लौट आये। ब्राह्मण ने बताया कि भगवान् श्रीकृष्ण विदर्भ पहुँच चुके हैं और आपको हर ले जाने का दृढ़ निश्चय कर चुके हैं।
भीष्मकजी बड़े बुद्धिमान् थे। भगवान्के प्रति उनकी बड़ी भक्ति थी। उन्होंने भगवानको सेना और साथियोंके सहित समस्त सामग्रियोंसे युक्त निवासस्थानमें ठहराया और उनका यथावत् आतिथ्य-सत्कार किया। नगरवासी भी भगवान् के दर्शन के लिए उमड़ पड़े और मन-ही-मन प्रार्थना करने लगे कि रुक्मिणीजी का विवाह केवल भगवान् श्रीकृष्ण के साथ ही हो।
जब नगरवासी यह चर्चा कर रहे थे कि रुक्मिणीजी के योग्य वर केवल भगवान् श्रीकृष्ण ही हैं, उसी समय रुक्मिणीजी देवी अम्बिका के मन्दिर के लिए निकलीं। उनकी रक्षा के लिए बहुत-से सैनिक साथ चल रहे थे।
वे मन-ही-मन भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण करती हुई पैदल मन्दिर की ओर जा रही थीं। उनकी माताएँ और सखियाँ उन्हें चारों ओर से घेरे थीं। सैनिक अस्त्र-शस्त्र लेकर साथ चल रहे थे। मार्ग में शंख, मृदंग, ढोल और तुरही बज रहे थे। बहुत-सी ब्राह्मण-पत्नियाँ और स्त्रियाँ पूजा की सामग्री लेकर साथ चल रही थीं। गवैये गा रहे थे और सूत, मागध तथा वन्दीजन उनकी प्रशंसा कर रहे थे।
मन्दिर पहुँचकर रुक्मिणीजी ने हाथ-पैर धोए, आचमन किया और शान्त भाव से देवी के मन्दिर में प्रवेश किया। ब्राह्मणियों ने उनसे भवानी और शिव जी को प्रणाम करवाया। रुक्मिणीजी ने देवी से प्रार्थना की, “हे अम्बिका माता! आपकी गोद में बैठे आपके प्रिय पुत्र गणेश जी को और आपको मैं बार-बार प्रणाम करती हूँ। कृपा करके मेरी इच्छा पूर्ण कीजिए। भगवान श्रीकृष्ण ही मेरे पति बनें।”
पूजा समाप्त होने पर उन्होंने अपना मौनव्रत तोड़ा और रत्नजड़ित अँगूठियों से चमकते हाथों से एक सखी का हाथ पकड़कर मन्दिर से बाहर निकलीं। रुक्मिणीजी भगवान की योगमाया के समान बड़े-बड़े वीरों को भी मोहित कर लेने वाली थीं। उनकी कमर अत्यन्त पतली और सुन्दर थी। कानों में चमकते कुण्डल उनके मुख की शोभा बढ़ा रहे थे। वे किशोर और तरुण अवस्था के बीच की आयु में थीं। उनके होठों पर मधुर मुस्कान थी। वे अपने कोमल चरणों से राजहंस जैसी चाल चल रही थीं। उनकी अनुपम छवि देखकर वहाँ उपस्थित बड़े-बड़े राजा और वीर मोहित हो गए।
रुक्मिणीजी मन्द-मन्द गति से चलती हुई अपना सम्पूर्ण सौन्दर्य भगवान श्रीकृष्ण पर अर्पित कर रही थीं। उनकी मुस्कान और लज्जा से भरी चितवन देखकर बड़े-बड़े राजा इतने मोहित हो गए कि उनके हाथों से अस्त्र-शस्त्र गिर पड़े और वे स्वयं भी रथ, हाथी और घोड़ों से नीचे गिर पड़े।
इस प्रकार रुक्मिणीजी भगवान श्रीकृष्ण के आने की प्रतीक्षा करती हुई धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थीं। उन्होंने अपने बाएँ हाथ से मुख पर लटकती अलकों को हटाया और लज्जा भरी दृष्टि से वहाँ उपस्थित राजाओं की ओर देखा। तभी उन्हें श्यामसुन्दर भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन हुए।
राजकुमारी रुक्मिणीजी रथपर चढ़ना ही चाहती थीं कि भगवान् श्रीकृष्णने देखते-देखते उन सैकड़ों राजाओंके सिरपर पाँव रखकर उन्हें अपने गरुड़ध्वज रथपर बैठा लिया। इसके बाद जैसे सिंह सियारों के बीच से अपना अधिकार लेकर चला जाए, वैसे ही भगवान श्रीकृष्ण बलराम जी और अन्य यादवों के साथ रुक्मिणीजी को लेकर वहाँ से निकल पड़े।
उस समय जरासन्ध के पक्ष के घमण्डी राजा यह अपमान सह न सके। वे क्रोध से कहने लगे, “धिक्कार है हम पर! हम हाथों में धनुष लिए खड़े रह गए और ये ग्वाले सिंह का भाग छीन ले जाने वाले हिरनों की तरह हमारा यश छीनकर ले गए!”