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109- जरासन्ध से युद्ध, द्वारकापुरी का निर्माण, कालयवन का भस्म होना और मुचुकुन्द की कथा

May 7th, 2026 | 9 Min Read
Blog Thumnail

Category: Bhagavat Purana

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Language: Hindi

श्रीमद्भागवत महापुराण- स्कन्ध: 10 अध्याय: 50-51

श्रीशुकदेवजी परीक्षित को कहते हैं की कंस की दो रानियाँ थीं, अस्ति और प्राप्ति। पति की मृत्यु के बाद वे अपने पिता के पास चली गयीं। उनके पिता मगध के राजा जरासन्ध थे। उन्होंने अपने दुःख का कारण बताया। यह सुनकर पहले उसे शोक हुआ, फिर क्रोध आया। उसने निश्चय किया कि वह यदुवंश को समाप्त कर देगा। उसने बड़ी सेना तैयार की और तेईस अक्षौहिणी सेना लेकर मथुरा को चारों ओर से घेर लिया।

भगवान श्रीकृष्ण ने देखा कि शत्रु की सेना बहुत बड़ी है और नगर में भय फैल गया है। उन्होंने विचार किया कि पृथ्वी का भार घटाने के लिए यह अवसर उचित है। उन्होंने सोचा कि अभी जरासन्ध को नहीं मारना चाहिए, क्योंकि वह फिर सेना इकट्ठी करेगा और इस प्रकार पृथ्वी का भार घटेगा। 

इसी समय आकाश से दो रथ प्रकट हुए, जिनमें युद्ध की सामग्री थी। उनके साथ दिव्य आयुध भी आ गये। तब श्रीकृष्ण ने अपने बड़े भाई बलराम से कहा कि वे सेना का नाश करें और यदुवंशियों की रक्षा करें। दोनों भाई कवच पहनकर रथ पर सवार हुए और नगर से बाहर निकले। 

श्रीकृष्ण ने पांचजन्य शंख बजाया। उसकी ध्वनि सुनकर शत्रु सेना डर गयी। तब जरासन्ध ने श्रीकृष्ण को ललकारा और अपमान किया। श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया कि वीर लोग केवल बात नहीं करते, अपना बल दिखाते हैं। इसके बाद युद्ध आरम्भ हुआ। जरासन्ध की सेना ने चारों ओर से घेर लिया। कुछ समय के लिए श्रीकृष्ण और बलराम दिखाई नहीं दिए। नगर की स्त्रियाँ यह देखकर व्याकुल हो गयीं।

तब श्रीकृष्ण ने धनुष उठाया और बाणों की वर्षा करने लगे। उन्होंने हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सेना का नाश करना शुरू किया। दूसरी ओर बलरामजी ने अपने मूसल से शत्रुओं का संहार किया। थोड़े समय में पूरी सेना नष्ट हो गयी।

फिर बलरामजी ने जरासन्ध को पकड़ लिया। तब श्रीकृष्ण ने उन्हें रोक दिया और उसे छोड़ देने को कहा, ताकि वह फिर सेना लेकर आए और पृथ्वी का भार कम करने का कार्य आगे बढ़े। बलरामजी ने उसे छोड़ दिया।

जरासन्ध लज्जित होकर अपने राज्य लौट गया। मथुरा में श्रीकृष्ण की विजय से सभी प्रसन्न हुए। श्रीकृष्ण युद्ध से प्राप्त धन और आभूषण लेकर आए और सब उग्रसेन को दे दिया। इस प्रकार जरासन्ध ने सत्रह बार तेईस-तेईस अक्षौहिणी सेना इकट्ठी करके यदुवंशियों से युद्ध किया। किन्तु यादवों ने भगवान श्रीकृष्ण की शक्ति से हर बार जरासन्ध की सेना को नष्ट कर दिया। जब उसकी पूरी सेना समाप्त हो जाती, तब यादव उसे छोड़ देते और वह अपनी राजधानी लौट जाता।

जब अठारहवाँ युद्ध होने वाला था, उसी समय नारद जी के भेजे हुए वीर कालयवन प्रकट हुआ। युद्ध में उसका सामना करने वाला कोई दूसरा वीर नहीं था। जब उसने सुना कि यदुवंशी उसके समान बलवान हैं, तब वह तीन करोड़ म्लेच्छों की सेना लेकर मथुरा को घेरने आ गया।

कालयवन के अचानक आ जाने पर भगवान श्रीकृष्ण ने बलराम के साथ विचार किया की अब यदुवंशियों पर दो संकट एक साथ आ गए हैं। एक ओर कालयवन आकर घेर चुका है और दूसरी ओर जरासन्ध भी शीघ्र आने वाला है। यदि हम दोनों भाई कालयवन से युद्ध में लग जाएँ और उसी समय जरासन्ध आ जाए, तो वह हमारे बन्धुओं को मार सकता है या उन्हें पकड़कर अपने नगर ले जा सकता है, क्योंकि वह बहुत शक्तिशाली है। इसलिए उन्होंने निश्चय किया कि पहले एक ऐसा दुर्ग बनाया जाए, जिसमें किसी का प्रवेश करना बहुत कठिन हो। अपने सब स्वजनों को उस दुर्ग में सुरक्षित रखकर फिर कालयवन का वध किया जाए।

द्वारकापुरी का निर्माण

बलरामजीसे इस प्रकार सलाह करके भगवान् श्रीकृष्णने समुद्रके भीतर एक ऐसा दुर्गम नगर बनवाया, जिसमें सभी वस्तुएँ अद्भुत थीं और उस नगरकी लम्बाई-चौड़ाई अड़तालीस कोसकी थी । उस नगर (द्वारका) की रचना विश्वकर्मा ने की थी। उसमें सड़कों, चौराहों और गलियों का उचित विभाजन किया गया था। नगर में उद्यान और उपवन थे, जिनमें सुन्दर वृक्ष और लताएँ थीं। ऊँचे-ऊँचे भवन, द्वार और अटारियाँ बनी हुई थीं। अन्न रखने के लिए अलग कोठार थे। महल सुसज्जित थे और उनके ऊपर कलश लगे थे। नगर में सब वर्णों के लोग रहते थे। बीच में उग्रसेन, वसुदेव, बलरामजी और भगवान श्रीकृष्ण के महल थे।

उस समय इन्द्र ने पारिजात वृक्ष और सुधर्मा सभा भेजी। उस सभा में बैठने वालों को भूख-प्यास नहीं लगती थी। वरुण ने तेज गति वाले घोड़े भेजे। कुबेर ने अपनी निधियाँ भेजीं। अन्य लोकपालों ने भी अपनी शक्तियाँ अर्पित कीं।

भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी योगमाया से अपने सभी स्वजन और सम्बन्धियों को द्वारका पहुँचा दिया। शेष प्रजा की रक्षा के लिए बलरामजी को मथुरा में रखा। फिर स्वयं कमल की माला धारण करके, बिना किसी अस्त्र-शस्त्र के, नगर के मुख्य द्वार से बाहर निकल आए।

श्रीकृष्ण का कालयवन से हुआ सामना

जब भगवान श्रीकृष्ण मथुरा नगर के मुख्य द्वार से बाहर निकले, तब ऐसा लग रहा था जैसे पूर्व दिशा में चन्द्रमा उदित हो रहा हो। उनका श्याम रंग का शरीर बहुत ही मनोहर था। उन्होंने रेशमी पीताम्बर धारण किया था, वक्षस्थल पर श्रीवत्स चिन्ह सुशोभित था और गले में कौस्तुभ मणि चमक रही थी।
उनकी चार भुजाएँ थीं, जो लम्बी और मजबूत थीं। उनकी आँखें खिले हुए कमल के समान कोमल और हल्की लालिमा लिए हुए थीं। उनके मुख पर अपार आनन्द झलक रहा था। उनके गाल बहुत सुन्दर थे और उनकी मन्द मुस्कान देखने वालों का मन मोह लेती थी। उनके कानों में मकर आकार के कुण्डल चमक रहे थे।

उन्हें देखकर कालयवन ने निश्चय किया, “यही वासुदेव हैं। क्योंकि नारद जी ने जो लक्षण बताए थे (वक्ष पर श्रीवत्स चिन्ह, चार भुजाएँ, कमल जैसे नेत्र, गले में वनमाला और अनुपम सुन्दरता) वे सब इसमें दिखाई दे रहे हैं। इसलिए यह कोई और नहीं हो सकता।”

वह आगे सोचने लगा, “इस समय यह बिना किसी अस्त्र-शस्त्र के पैदल ही मेरी ओर आ रहा है, इसलिए मैं भी इसके साथ बिना अस्त्र-शस्त्र के ही जाऊँगा।”

ऐसा निश्चय करके जब कालयवन भगवान श्रीकृष्ण की ओर दौड़ा, तब भगवान दूसरी दिशा में मुड़कर रणभूमि से निकल गए। कालयवन उन्हें पकड़ने के लिए पीछे-पीछे दौड़ने लगा, परन्तु वे प्रभु योगियों के लिए भी कठिन से मिलने वाले हैं।

भगवान श्रीकृष्ण लीला करते हुए आगे बढ़ते रहे। कालयवन हर कदम पर यही सोचता, “अब पकड़ लिया, अब पकड़ लिया।” इस प्रकार भगवान उसे दूर एक पहाड़ की गुफा तक ले गए।

कालयवन पीछे से बार-बार कहता, “अरे! तुम इतने महान यदुवंश में जन्मे हो, फिर इस तरह युद्ध छोड़कर भागना तुम्हें शोभा नहीं देता।” लेकिन उसके पाप अभी समाप्त नहीं हुए थे, इसलिए वह भगवान को पा नहीं सका।

राजा मुचुकुन्द की दृष्टि पड़ने से हुआ कलावन भष्म

वह बोलता ही रहा, और भगवान उस गुफा में प्रवेश कर गए। कालयवन भी उनके पीछे अंदर चला गया। वहाँ उसने एक दूसरे पुरुष को गहरी नींद में सोते हुए देखा। उसे देखकर कालयवन ने सोचा, “यह मुझे इतनी दूर तक ले आया और अब ऐसे सो रहा है, जैसे कुछ जानता ही न हो, मानो कोई साधु हो।” ऐसा सोचकर उस मूर्ख ने उस सोए हुए पुरुष को जोर से लात मार दी।

वह पुरुष बहुत समय से सो रहा था। लात लगने पर वह उठ बैठा और धीरे-धीरे अपनी आँखें खोलीं। इधर-उधर देखने पर उसने पास ही कालयवन को खड़ा देखा। इस तरह ठोकर मारकर जगाए जाने से वह पुरुष थोड़ा क्रोधित हो गया। जैसे ही उसकी दृष्टि कालयवन पर पड़ी, वैसे ही कालयवन के शरीर में आग लग गई और वह एक ही क्षण में जलकर राख हो गया।

राजा परीक्षित ने पूछा, वह पुरुष कौन था जिसकी दृष्टि से कालयवन भस्म हो गया? वह किस वंश का था और गुफा में क्यों सो रहा था?

श्रीशुकदेवजी कहते हैं, वह इक्ष्वाकु वंश के राजा मुचुकुन्द थे। वे ब्राह्मणों के भक्त, सत्यप्रतिज्ञ और युद्ध में विजयी थे। एक समय इन्द्र आदि देवता असुरों से भयभीत हो गए। उन्होंने मुचुकुन्द से सहायता माँगी। मुचुकुन्द ने लंबे समय तक उनकी रक्षा की। बाद में जब देवताओं को सेनापति के रूप में कार्तिकेय मिल गए, तब उन्होंने मुचुकुन्द से कहा कि अब आप विश्राम करें। आपने हमारे लिए अपना राज्य और सुख छोड़ दिया। अब आपके समय के लोग भी नहीं रहे, सबको काल ले गया।

फिर देवताओं ने मुचुकुन्द से वर माँगने को कहा और बताया कि मोक्ष के अतिरिक्त वह कुछ भी दे सकते हैं क्यों की मोक्ष देने की शक्ति केवल भगवान में है। राजा मुचुकुन्दने देवताओंके इस प्रकार कहनेपर उनकी वन्दना की और बहुत थके होनेके कारण निद्राका ही वर माँगा तथा उनसे वर पाकर वे नींदसे भरकर पर्वतकी गुफामें जा सोये। उस समय देवताओंने कह दिया था कि ‘राजन्! सोते समय यदि आपको कोई मूर्ख बीचमें ही जगा देगा तो वह आपकी दृष्टि पड़ते ही उसी क्षण भस्म हो जायगा’।

श्रीकृष्ण ने दिया राजा मुचुकुन्द को दर्शन

जब कालयवन भस्म हो गया, तब भगवान श्रीकृष्ण ने राजा मुचुकुन्द को दर्शन दिया। उन्हें देखकर मुचुकुन्द चकित हो गए। उन्होंने पूछा, आप कौन हैं? इस वन और गुफा में आने का क्या कारण है? क्या आप अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा, इन्द्र या कोई अन्य देवता हैं? या आप ही ब्रह्मा, विष्णु और शंकर में से नारायण हैं?

मुचुकुन्द ने अपना परिचय दिया कि वे इक्ष्वाकु वंश के क्षत्रिय हैं, मान्धाता के पुत्र हैं। वे बहुत समय तक जागते रहने के कारण थक गए थे, इसलिए गुफा में सो रहे थे। किसी ने उन्हें जगाया और वह उनकी दृष्टि से भस्म हो गया।

तब भगवान श्रीकृष्ण ने कहा, मेरे जन्म, नाम और कर्म अनन्त हैं, उनकी गणना कोई नहीं कर सकता। फिर भी सुनो। ब्रह्माजी की प्रार्थना से मैंने धर्म की रक्षा और पृथ्वी का भार घटाने के लिए यदुवंश में वसुदेव के यहाँ जन्म लिया है, इसलिए मुझे वासुदेव कहा जाता है।

मैंने कंस और अन्य दुष्टों का नाश किया है। यह कालयवन भी मेरी प्रेरणा से तुम्हारी दृष्टि से भस्म हुआ। मैं तुम्हें दर्शन देने और तुम पर कृपा करने के लिए यहाँ आया हूँ, क्योंकि तुमने पहले मेरी आराधना की है। इसलिए तुम जो चाहो, मुझसे वर माँगो। मेरी शरण में आने वाले को फिर किसी वस्तु के लिए शोक नहीं करना पड़ता।

जब भगवान श्रीकृष्ण ने इस प्रकार कहा, तब राजा मुचुकुन्द को गर्ग मुनि का वचन याद आया कि यदुवंश में भगवान अवतीर्ण होंगे। वे प्रसन्न होकर भगवान के चरणों में झुके और स्तुति करने लगे। मुचुकुन्द ने कहा की मैं आपके चरणों की सेवा के अतिरिक्त कुछ नहीं चाहता। आपकी भक्ति ही श्रेष्ठ है। इसलिए मैं सभी कामनाओं को छोड़कर आपकी शरण में आया हूँ। मैं दुःखों से पीड़ित था, अब आपकी शरण चाहता हूँ। आप मेरी रक्षा करें।

तब भगवान श्रीकृष्ण ने कहा, राजन्, तुम्हारा निश्चय शुद्ध है। मैंने तुम्हें वर देने का अवसर दिया, पर तुम कामना में नहीं फँसे। मेरे भक्तों की बुद्धि स्थिर रहती है। जो मेरे भक्त नहीं हैं, वे मन को रोकने का प्रयास करते हुए भी विषयों में फँस जाते हैं।

तुम अपना मन मुझे समर्पित करके पृथ्वी पर विचरण करो। तुम्हारी भक्ति स्थिर रहेगी। तुमने क्षत्रियधर्मका आचरण करते समय शिकार आदिके अवसरोंपर बहुत-से पशुओंका वध किया है। अब तपस्या से उसे शुद्ध करो। अगले जन्म में तुम ब्राह्मण बनोगे, सबके हितकारी होगे और अंत में मुझे प्राप्त करोगे।

शुकदेवजी कहते हैं कि भगवान् श्रीकृष्ण की कृपा पाकर राजा मुचुकुन्द ने उनकी परिक्रमा और प्रणाम किया तथा गुफा से बाहर निकले। बाहर आकर उन्होंने देखा कि मनुष्य, पशु और वृक्ष सब पहले से छोटे हो गए हैं, इससे उन्हें समझ आ गया कि युग बदल चुका है।

इसके बाद वे उत्तर दिशा की ओर चले गए और भगवान् श्रीकृष्ण में चित्त लगाकर गन्धमादन पर्वत होते हुए बदरिकाश्रम पहुँचे, जहाँ भगवान् नर-नारायण का निवास है। वहाँ वे शान्त भाव से तपस्या करके भगवान् की आराधना करने लगे।

सारांश: JKYog India Online Class- श्रीमद् भागवत कथा [हिन्दी]- 04.05.2026