श्रीमद्भागवत महापुराण- स्कन्ध: 10 अध्याय: 66-69
शुकदेवजी परीक्षित को कहते हैं कि जब बलरामजी व्रजमें थे, उसी समय करूषदेशका राजा पौण्ड्रक मिथ्या अहंकारमें अपनेको ही “सच्चा वासुदेव” मान बैठा। मूर्ख लोग उसकी चापलूसी करते थे कि वही भगवान् है और जगत्की रक्षा के लिये अवतरित हुआ है।
इस भ्रममें उसने श्रीकृष्णके पास दूत भेजकर कहलवाया कि “सच्चे वासुदेव केवल पौण्ड्रक ही हैं। वे ही प्राणियोंकी रक्षा के लिये अवतरित हुए हैं। तुमने व्यर्थ ही ‘वासुदेव’ नाम और उनके चिह्न धारण कर रखे हैं। इन्हें त्यागकर उनकी शरणमें आ जाओ, अन्यथा युद्धके लिये तैयार रहो।”
दूतने द्वारकाकी सभामें यह संदेश सुनाया। यह सुनकर उग्रसेन आदि सभासद् हँस पड़े। तब श्रीकृष्णने दूतसे उत्तर देते हुए कहा कि वे अपने दिव्य चिह्न (ध्वजा, वज्र, अंकुश, कमल, चक्र, शंख, अर्धचन्द्र, मत्स्य, कलश, यव, स्वस्तिक, गोपद, त्रिकोण) त्यागनेवाले नहीं हैं, बल्कि युद्धमें उन्हीं चिह्नोंसे पौण्ड्रक और उसके भ्रम फैलानेवाले साथियोंका विनाश करेंगे। उन्होंने चेतावनी दी कि अहंकारमें अंधा पौण्ड्रक युद्धभूमिमें मारा जायेगा और उसका शरीर पशु-पक्षियोंका आहार बनेगा।
श्रीकृष्णके आक्रमणका समाचार मिलते ही पौण्ड्रक दो अक्षौहिणी सेनाके साथ युद्धके लिये निकल पड़ा। उसका मित्र काशीराज भी उसकी सहायता हेतु तीन अक्षौहिणी सेना लेकर साथ आ गया। तब श्रीकृष्णने युद्धभूमिमें पौण्ड्रकको देखा।
पौण्ड्रकने श्रीकृष्णकी नकल करते हुए शंख, चक्र, गदा, शार्ङ्ग धनुष, श्रीवत्सचिह्न, बनावटी कौस्तुभमणि, वनमाला, पीताम्बर और गरुड़चिह्नयुक्त ध्वजा धारण कर रखी थी। उसका सारा वेष किसी रंगमंचके अभिनेता जैसा कृत्रिम था। उसे अपने समान सजा देखकर श्रीकृष्ण हँस पड़े।
इसके बाद पौण्ड्रक और काशीराजकी सेनाओंने विविध अस्त्र-शस्त्रोंसे आक्रमण किया। तब श्रीकृष्णने अपने दिव्य शस्त्रोंसे उनकी विशाल सेना, हाथी, रथ, घोड़े और सैनिकोंका भयंकर संहार कर दिया। रणभूमि टूटे हुए रथों, पशुओं और सैनिकोंसे भर गयी और युद्ध अत्यन्त भीषण दिखाई देने लगा।
श्रीकृष्णने पौण्ड्रकका उपहास करते हुए कहा कि जिस दिव्य चिह्नोंको त्यागनेका संदेश उसने भेजा था, अब वही अस्त्र-शस्त्र उसपर चलाये जायेंगे। उन्होंने कहा कि झूठे अहंकारसे धारण किया गया “वासुदेव” नाम भी उससे छीन लिया जायेगा।
इसके बाद श्रीकृष्णने अपने बाणोंसे पौण्ड्रकका रथ नष्ट कर दिया और सुदर्शन चक्रसे उसका सिर काट डाला। फिर काशीराजका सिर भी धड़से अलग करके काशीपुरीमें गिरा दिया। इस प्रकार दोनोंका वध करके श्रीकृष्ण विजयी होकर द्वारका लौट आये और सिद्धजन उनकी महिमाका गान करने लगे।
यद्यपि पौण्ड्रक मिथ्या अहंकारमें श्रीकृष्णकी नकल करता था, फिर भी वह निरन्तर किसी-न-किसी भावसे उनका चिन्तन करता रहता था। इसी सतत स्मरणके कारण मृत्युके बाद उसे भगवान्के सारूप्यकी प्राप्ति हुई।
सुदक्षिण का प्रतिशोध, माहेश्वरी कृत्या का प्राकट्य और काशी का दहन
उधर काशीमें जब राजमहलके द्वारपर कुण्डलोंसे सुशोभित काशीराजका कटा हुआ सिर गिरा, तब लोग भय और आश्चर्यमें पड़ गये। पहचान होनेपर रानियाँ, राजकुमार और समस्त नगरवासी विलाप करने लगे और अपने राजाके वियोगमें शोक करने लगे।
काशीराजके पुत्र सुदक्षिणने अपने पिताका अन्त्येष्टि-संस्कार करनेके बाद यह संकल्प लिया कि वह अपने पिताके वधका बदला अवश्य लेगा। इसी उद्देश्यसे वह अपने पुरोहितों और आचार्योंके साथ अत्यन्त एकाग्रतासे भगवान् शंकरकी आराधनामें लग गया।
सुदक्षिणकी तपस्यासे प्रसन्न होकर भगवान् शिवने उसे पिताके वधका प्रतिशोध लेनेका उपाय बताया। उनके निर्देशानुसार सुदक्षिणने ब्राह्मणोंके साथ विशेष अभिचार यज्ञ किया, जिससे एक अत्यन्त भयंकर अग्निरूप कृत्या प्रकट हुई। वह ज्वालाओंसे दहकती हुई द्वारकाकी ओर बढ़ी और उसके साथ अनेक भूत-प्रेत भी थे।
उस भयंकर अग्निको देखकर द्वारकावासी भयभीत होकर श्रीकृष्णकी शरणमें गये। श्रीकृष्णने उन्हें आश्वस्त किया और समझ गये कि यह काशीसे भेजी गयी माहेश्वरी कृत्या है। तब उन्होंने अपने सुदर्शन चक्रको उसे रोकनेकी आज्ञा दी।
सुदर्शन चक्रने उस कृत्याका तेज नष्ट कर दिया। पराजित होकर वह अग्नि वापस काशी लौटी और उसी सुदक्षिण तथा यज्ञ करानेवाले आचार्योंको भस्म कर दिया। इसके बाद सुदर्शन चक्रने पूरी काशी नगरीको भी जला डाला और फिर वापस श्रीकृष्णके पास लौट आया।
बलरामजी द्वारा द्विविद का वध
राजा परीक्षित ने शुकदेवजी के सामने बलरामजीकी अन्य अद्भुत लीलाएँ सुननेकी इच्छा प्रकट की। तब श्रीशुकदेवजीने द्विविद वानरकी कथा सुनायी।
द्विविद भौमासुरका मित्र, सुग्रीवका मन्त्री और अत्यन्त बलशाली वानर था। जब उसे ज्ञात हुआ कि श्रीकृष्णने भौमासुरका वध कर दिया है, तब वह प्रतिशोधकी भावनासे भर उठा और अनेक प्रदेशोंमें उत्पात मचाने लगा। वह नगरों, गाँवों और बस्तियोंमें आग लगाता, पहाड़ उखाड़कर प्रदेशोंको नष्ट करता और विशेष रूपसे आनर्त देशमें उपद्रव करता, क्योंकि वहीं श्रीकृष्ण निवास करते थे।
उसमें दस हजार हाथियोंका बल था। कभी वह समुद्रका जल उछालकर तटीय प्रदेशोंमें बाढ़ ला देता। इतना ही नहीं, वह ऋषि-मुनियोंके आश्रमोंको नष्ट करता, वनस्पतियाँ उजाड़ देता और यज्ञकुण्डोंको अपवित्र करके धर्मकार्यमें विघ्न डालता था। वह समाजमें उपद्रव फैलानेके साथ कुलीन स्त्रियोंका भी अपमान करता था।
एक दिन वह रैवतक पर्वतपर पहुँचा, जहाँ बलरामजी आनन्दपूर्वक अपने स्वजनोंके साथ विराजमान थे। वहाँ संगीत और उत्सवका वातावरण था। द्विविदने वृक्षोंपर चढ़कर डालियाँ हिलानी शुरू कर दीं, जोर-जोरसे किलकारियाँ मारने लगा और उपद्रव करने लगा। उसकी ढिठाई देखकर वहाँ उपस्थित स्त्रियाँ हँसने लगीं। द्विविद वानरने बलरामजीके सामने स्त्रियोंका अपमान करता, भद्दी चेष्टाएँ करता और चिढ़ाने लगा।
यह देखकर बलरामजी क्रोधित हो गये। द्विविदने विशाल वृक्ष उखाड़-उखाड़कर उनपर प्रहार करना शुरू किया, परन्तु बलरामजीने अपने मूसलसे उन वृक्षों और चट्टानोंको चूर-चूर कर दिया। दोनोंके बीच भयंकर युद्ध हुआ और पूरा वन उजड़ गया। अन्तमें द्विविद स्वयं बलरामजीपर झपटा। तब बलरामजीने अपने प्रचण्ड प्रहारसे उसकी हँसली तोड़ दी। द्विविद रक्त उगलता हुआ धरतीपर गिर पड़ा और उसका अन्त हो गया।
कौरवों पर बलरामजी का कोप, हस्तिनापुर को हल से उखाड़कर गंगाजी की ओर खींचना
जाम्बवतीके पुत्र साम्ब अत्यन्त पराक्रमी थे। उन्होंने दुर्योधनकी पुत्री लक्ष्मणाको उसके स्वयंवरसे बलपूर्वक हर लिया। इससे कौरव अत्यन्त क्रोधित हो गये। वे साम्बको उद्दण्ड बताकर उसे बन्दी बनानेका निश्चय करने लगे और सोचने लगे कि यदि यदुवंशी विरोध करेंगे तो उनका अभिमान भी तोड़ दिया जायेगा।
कर्ण, शल, भूरिश्रवा, यज्ञकेतु और दुर्योधन आदि महारथियोंने साम्बका पीछा किया। अकेले होनेपर भी साम्ब सिंहके समान निर्भय होकर युद्धमें डट गये। उन्होंने अपने अद्भुत धनुर्विद्या-कौशलसे अनेक वीरोंको घायल किया और उनके घोड़ों तथा सारथियोंपर भी प्रहार किया। उनकी वीरता देखकर शत्रुपक्ष भी उनकी प्रशंसा करने लगा।
किन्तु अन्तमें छह महारथियोंने मिलकर साम्बका रथ नष्ट कर दिया, उनके घोड़ोंको मार डाला और धनुष काट दिया। इस प्रकार साम्बको बन्दी बना लिया गया और कौरव उन्हें लक्ष्मणाके साथ हस्तिनापुर ले गये।
नारदजीसे साम्बके बन्दी बनाये जानेका समाचार सुनकर यदुवंशी अत्यन्त क्रोधित हो गये और महाराज उग्रसेनकी आज्ञासे कौरवोंपर चढ़ाईकी तैयारी करने लगे। किन्तु बलरामजीने दोनों कुलोंके बीच युद्ध उचित नहीं समझा। उन्होंने यदुवंशियोंको शान्त किया और स्वयं कुछ ब्राह्मणों तथा कुलके वरिष्ठजनोंके साथ हस्तिनापुर गये। वहाँ पहुँचकर उन्होंने पहले उद्धवजीको धृतराष्ट्रकी सभामें भेजा।
उद्धवजीने धृतराष्ट्र, भीष्म, द्रोणाचार्य, बाह्नीक और दुर्योधनको बलरामजीके आगमनका समाचार दिया। यह सुनकर कौरव प्रसन्न हुए और विधिपूर्वक उनका स्वागत करने बाहर आये। सबने आदरपूर्वक बलरामजीका सत्कार किया।
तब बलरामजीने धैर्य और गम्भीरतासे महाराज उग्रसेनका संदेश सुनाया। उन्होंने कहा कि कौरवोंने अनेक वीरोंको मिलाकर अकेले साम्बको अधर्मपूर्वक बन्दी बनाया है। यदुवंशी केवल सम्बन्धोंकी मर्यादाके कारण इसे सह रहे हैं, अतः अब बिना विवाद बढ़ाये साम्ब और लक्ष्मणाको सम्मानपूर्वक लौटा देना चाहिये।
बलरामजी की वीरता और पराक्रम से परिपूर्ण वाणी सुनकर कौरव क्रोध से भर उठे। अहंकारवश उन्होंने यदुवंशियों का अपमान करते हुए कहा कि यदुवंशियों को जो राजवैभव, सम्मान और राजचिह्न प्राप्त हैं, वे सब कौरवों की कृपा का परिणाम हैं। स्वयं को श्रेष्ठ और यदुवंशियों को अपने आश्रित बताते हुए व्यंग्य करते हुए कहा की जिन्हें उन्होंने अपने समान स्थान दिया, वे ही अब उन्हें आदेश देने का साहस कर रहे हैं।
जैसे साँप को दूध पिलाना अंततः हानिकारक सिद्ध होता है, वैसे ही यदुवंशियों को सम्मान और अधिकार देना अब उनके लिए संकट बन गया है। अपने बल और सामर्थ्य का घमण्ड करते हुए कौरवों ने यह भी कहा कि भीष्म, द्रोण और अर्जुन जैसे कौरव वीरों की अनुमति के बिना कोई भी, यहाँ तक कि देवराज इन्द्र भी, किसी वस्तु का उपभोग नहीं कर सकता।
कौरव अपने कुल, शक्ति और धनके अहंकारमें इतने अंधे हो गये कि उन्होंने बलरामजीका भी अपमान कर दिया और कटु वचन कहकर लौट गये। यह देखकर बलरामजी अत्यन्त क्रोधित हुए।
उन्होंने कहा कि जो लोग अहंकारमें डूब जाते हैं, वे प्रेम की भाषा नहीं समझते; उन्हें दण्ड देकर ही सही मार्गपर लाया जा सकता है। बलरामजीने स्मरण कराया कि यदुवंशी और स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण किसीके कृपापात्र नहीं, बल्कि देवता और लोकपाल भी जिनकी महिमा मानते हैं, वे स्वयं सर्वश्रेष्ठ हैं। उन्होंने संकल्प किया कि यदि आवश्यकता पड़ी तो पूरी पृथ्वीको कौरवोंसे रहित कर देंगे।
क्रोधमें भरकर बलरामजी ने अपना हल उठाया और उसकी नोकसे हस्तिनापुरको खींचकर गंगाजीकी ओर ले जाने लगे। उनके दिव्य बलसे पूरा नगर ऐसे काँपने लगा, जैसे जलमें नाव डगमगा रही हो। यह देखकर कौरव भयभीत हो उठे कि कहीं हस्तिनापुर सचमुच गंगामें न डूब जाये।
जब कौरवोंने देखा कि बलरामजीके हलसे हस्तिनापुर सचमुच गंगाजीकी ओर खिंच रहा है, तब वे भयभीत होकर साम्ब और लक्ष्मणाको आगे लेकर परिवार सहित उनकी शरणमें आये। उन्होंने हाथ जोड़कर स्वीकार किया कि अहंकार और अज्ञानके कारण उनसे बड़ा अपराध हुआ है तथा बलरामजीकी दिव्य शक्ति और महिमाका वे सही आकलन नहीं कर सके।
कौरवोंने बलरामजीकी स्तुति करते हुए उन्हें समस्त जगतके आधार, शेषस्वरूप और सर्वशक्तिमान बताया तथा क्षमा माँगी। उनकी विनती सुनकर भगवान् बलरामजीका क्रोध शान्त हो गया। उन्होंने कौरवोंको अभय दिया और साम्बका विवाह सम्मानपूर्वक सम्पन्न कराया।
दुर्योधनने अपनी पुत्री लक्ष्मणाको बड़े वैभवके साथ विदा किया। इसके बाद बलरामजी नवदम्पतिके साथ द्वारका लौट आये और यदुवंशियोंको हस्तिनापुरकी पूरी घटना सुनायी। हस्तिनापुर आज भी दक्षिणकी ओर ऊँचा और गंगाजीकी ओर कुछ झुका हुआ है और इस प्रकार यह बलरामजीके पराक्रमकी सूचना दे रहा है ।
द्वारका में भगवान् श्रीकृष्ण की योगमाया देखकर विस्मित होते नारदजी
देवर्षि नारदजीने जब सुना कि भगवान् श्रीकृष्णने एक ही समय सोलह हजार रानियोंके साथ अलग-अलग महलोंमें गृहस्थ-लीला की है, तब वे उनकी अद्भुत योगमायाका दर्शन करने द्वारका पहुँचे। वहाँ उन्होंने दिव्य वैभव, रत्नजटित महलों और भगवान्की ऐश्वर्यमयी नगरीका दर्शन किया।
नारदजीने देखा कि प्रत्येक महलमें भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं उपस्थित हैं और अलग-अलग कार्य कर रहे हैं। कहीं वे रुक्मिणीजीके साथ विराजमान हैं, कहीं उद्धवजीके साथ चौसर खेल रहे हैं, कहीं बच्चोंको दुलार रहे हैं, कहीं स्नान, यज्ञ, जप, दान, सभा, राज्यकार्य, विवाह, सन्धि-विग्रह, धर्मकर्म या भक्तोंकी सेवा कर रहे हैं। हर स्थानपर वे पूर्ण प्रेम, मर्यादा और आदर्श गृहस्थधर्मका पालन करते दिखाई दिये।
हर महलमें भगवान् श्रीकृष्णने नारदजीका अत्यन्त विनम्रतासे स्वागत किया, उनके चरण पखारे और उन्हें सम्मान दिया। यह देखकर नारदजी भगवान्की अचिन्त्य योगशक्ति और भक्तवत्सलतापर विस्मित हो गये।
श्रीकृष्णकी अद्भुत योगमाया और उनकी अनेक रूपोंमें चल रही गृहस्थ-लीलाओंको देखकर देवर्षि नारद अत्यन्त विस्मित हो गये। उन्होंने कहा कि भगवान्की यह योगमाया शक्ति ब्रह्मा आदि देवताओंके लिये भी अगम्य है, परन्तु उनके चरणोंकी सेवासे भक्तोंपर यह रहस्य स्वयं प्रकट हो जाता है।
नारदजीने भगवान्से आज्ञा माँगी कि वे तीनों लोकोंमें उनकी पवित्र लीलाओंका गान करते हुए भ्रमण करें।
तब भगवान् श्रीकृष्णने कहा कि वे स्वयं धर्मके उपदेशक, पालनकर्ता और धर्माचरणका समर्थन करनेवाले हैं। इसी कारण वे लोकशिक्षाके लिये मनुष्यवत् आचरण करते हैं। उन्होंने नारदजीसे कहा कि उनकी योगमायाको देखकर मोहित नहीं होना चाहिये।
श्रीशुकदेवजी कहते हैं कि भगवान् श्रीकृष्ण द्वारकामें आदर्श गृहस्थके रूपमें धर्म, मर्यादा और लोकशिक्षाका आचरण कर रहे थे। यद्यपि वे एक ही परमात्मा हैं, फिर भी देवर्षि नारदने उन्हें प्रत्येक रानीके महलमें अलग-अलग रूपसे उपस्थित देखा और उनकी अचिन्त्य योगमायापर अत्यन्त विस्मित हुए।
द्वारकामें भगवान् अपनी रानियोंके साथ प्रेमपूर्ण और मर्यादित गृहस्थ-लीला करते हुए भी जगतके पालनकर्ता और योगमायाके स्वामी ही बने रहे। उनकी लीलाएँ अलौकिक हैं और उनका श्रवण, कीर्तन तथा स्मरण मनुष्यके हृदयमें भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंके प्रति प्रेममयी भक्ति उत्पन्न करता है।
सारांश: JKYog India Online Class- श्रीमद् भागवत कथा [हिन्दी]- 29.05.2026