Log in
English

114- श्रीकृष्ण के पुत्र-पौत्रों का वर्णन, बलरामजी द्वारा रुक्मी वध तथा उषा-अनिरुद्ध प्रेम प्रसंग

May 23rd, 2026 | 9 Min Read
Blog Thumnail

Category: Bhagavat Purana

|

Language: Hindi

श्रीमद्भागवत महापुराण- स्कन्ध: 10 अध्याय: 60-62

एक दिन श्रीकृष्ण रुक्मिणीजीके महलमें सुन्दर शय्यापर विश्राम कर रहे थे। रुक्मिणीजी अपनी सखियोंके साथ बड़े प्रेम और विनयसे अपने पतिदेवकी सेवा कर रही थीं तथा उन्हें चँवरसे पंखा झल रही थीं। रुक्मिणीजीका अपने प्रति अनन्य प्रेम और समर्पण देखकर श्रीकृष्ण अत्यन्त प्रसन्न हुए। वे मुसकराकर प्रेमपूर्वक उनसे परिहास करने लगे।

उन्होंने कहा, “राजकुमारी! अनेक महान् राजा, जो ऐश्वर्य, बल, सौन्दर्य और वैभवमें लोकपालोंके समान थे, तुमसे विवाह करना चाहते थे। तुम्हारे पिता और भाई भी उन्हींमेंसे किसीके साथ तुम्हारा विवाह करना चाहते थे। शिशुपाल जैसे बड़े-बड़े वीर तुम्हें पानेके लिये व्याकुल थे, फिर भी तुमने उन सबको छोड़कर मेरे-जैसे व्यक्तिको पति क्यों चुना, जो किसी भी प्रकार तुम्हारे योग्य नहीं दिखाई देता?

“देखो, हम तो जरासन्ध जैसे शक्तिशाली राजाओंके भयसे समुद्रके बीच द्वारकामें आकर रहने लगे हैं। अनेक बलवान राजाओंसे हमारा वैर है और राजसिंहासनपर भी हमारा स्थायी अधिकार नहीं है।”

श्रीकृष्णने कहा कि वे न तो लौकिक व्यवहारोंमें रुचि रखते हैं, न ही धन, वैभव या स्त्रियोंको रिझानेमें। वे अकिंचन और विरक्त हैं, इसीलिये धनी और अभिमानी लोग उनसे प्रेम नहीं करते। 
समान कुल, धन और स्थिति वालोंमें ही विवाह उचित माना जाता है, इसलिये उन्होंने बिना विचार किये उन्हें स्वीकार कर लिया। यदि चाहें तो अब भी किसी श्रेष्ठ क्षत्रियको चुन सकती हैं। 

श्रीकृष्ण आगे कहते हैं कि रुक्मिणी-हरणका उद्देश्य केवल शिशुपाल, जरासन्ध और रुक्मी जैसे अभिमानी राजाओंका गर्व तोड़ना था। वास्तवमें वे स्त्री, पुत्र और धनसे निरपेक्ष, आत्माराम और साक्षीमात्र हैं।

शुकदेवजी परीक्षित् को कहते हैं की श्रीकृष्णका स्नेह और साथ निरन्तर प्राप्त होनेसे रुक्मिणीजीके मनमें यह सूक्ष्म गर्व आ गया था कि “मैं ही कृष्णकी सबसे प्रिय हूँ।” उसी गर्वको दूर करनेके लिये श्रीकृष्णने यह परिहासपूर्ण वचन कहे और फिर मौन हो गये।

जब रुक्मिणीजीने श्रीकृष्णके मुखसे ऐसी कठोर और अप्रिय वाणी सुनी, जो उन्होंने पहले कभी नहीं सुनी थी, तब वे भीतरसे काँप उठीं। उनका हृदय तेजीसे धड़कने लगा। वे रोते-रोते चिन्ताके अथाह समुद्रमें डूबने-उतराने लगीं।वियोगकी कल्पनामात्रसे उनका शरीर शिथिल पड़ गया। भय, शोक और पीड़ासे उनकी चेतना विचलित हो गयी। हाथसे चँवर गिर पड़ा और वे मूर्छित होकर धरतीपर वैसे ही गिर पड़ीं। उनके केश बिखर गये और सम्पूर्ण शरीर असहाय-सा हो गया।

श्रीकृष्णने देखा कि रुक्मिणीजी उनके हास्य-विनोदका रहस्य नहीं समझ पायीं और प्रेमकी गहनताके कारण सचमुच व्याकुल हो उठी हैं। वे तुरंत शय्यासे उठे। अपने चारभुज रूपमें उन्होंने रुक्मिणीजीको सँभालकर उठाया, उनके बिखरे हुए केशोंको सँवारा और अपने शीतल करकमलोंसे उनके नेत्रोंके आँसू पोंछे और रुक्मिणीजीको हृदयसे लगा लिया।

श्रीकृष्ण जब देखा कि उनके विनोदपूर्ण वचनोंसे रुक्मिणीजी अत्यन्त दीन और व्याकुल हो गयी हैं, तब उन्होंने प्रेमपूर्वक उन्हें समझाते हुए कहा, “विदर्भनन्दिनी! मुझसे बुरा मत मानो। मैं जानता हूँ कि तुम पूर्णतः मेरी ही हो। मैंने तो केवल तुम्हारे प्रेमभरे उत्तर सुनने और तुम्हारे प्रणय-कोपकी मधुर छटा देखनेके लिये हँसी-हँसीमें यह परिहास किया था।

"मैं देखना चाहता था कि मेरे ऐसे वचन सुनकर तुम्हारे होठ कैसे फड़कते हैं, नेत्रोंमें कैसी लाली छा जाती है और भौंहें चढ़ जानेपर तुम्हारा मुख कितना मनोहर लगता है। प्रिये! गृहस्थजीवनका सबसे बड़ा सुख यही है कि पति-पत्नी प्रेम, हास्य और परिहासके कुछ मधुर क्षण साथ बिताएँ।”

रुक्मिणीजीने उत्तर दिया, “कमलनयन! आप सर्वगुणसम्पन्न, अनन्त और समस्त देवताओंके स्वामी हैं; मैं आपकी समानता कैसे कर सकती हूँ? आप तो तीनों गुणोंसे परे परमात्मा हैं और मैं गुणमयी प्रकृति। आपने जो कहा कि आप राजाओंसे भयभीत होकर समुद्रमें रहते हैं, उसका भी गूढ़ अर्थ है। वास्तवमें आप बाहरी राजाओंसे नहीं, बल्कि दुष्ट इन्द्रियों और मायिक गुणोंसे वैर रखते हैं।

"मैंने किसी भ्रम या अदूरदर्शितासे आपको नहीं चुना। संत-महात्माओंसे आपकी महिमा सुनकर मैंने जान-बूझकर आपको अपना सर्वस्व स्वीकार किया है। ब्रह्मा, इन्द्र या अन्य राजाओंका वैभव भी आपके सामने तुच्छ है।

"आप कहते हैं कि आपका अनुसरण करनेवालोंको कष्ट मिलता है, परन्तु अंग, पृथु, भरत और ययाति जैसे राजाओंने तो राज्य छोड़कर आपकी भक्ति में ही परम सुख पाया। फिर ऐसी कौन बुद्धिमती स्त्री होगी जो आपको छोड़कर नश्वर और दुःखमय संसारके पुरुषोंको चुने?

मेरी एकमात्र अभिलाषा यही है कि जन्म-जन्मान्तर तक आपके चरणोंकी शरण बनी रहे। आपके अतिरिक्त मुझे किसी अन्य पुरुष, वैभव या सुखकी इच्छा नहीं है।”

श्रीकृष्ण ने मुसकराकर कहा कि मैंने तो केवल तुम्हारे प्रेमकी गहराई सुननेके लिये परिहास किया था। तुमने मेरे प्रत्येक वचनका जो अर्थ बताया, वह पूर्णतः सत्य है। तुम मेरी अनन्य प्रेयसी हो और तुम्हारा प्रेम निष्काम तथा अटल है।

श्रीकृष्ण के पुत्र और पौत्रों का वर्णन

श्रीशुकदेवजी कहते हैं कि श्रीकृष्णकी प्रत्येक पत्नीसे दस-दस पुत्र उत्पन्न हुए, जो रूप, बल और गुणोंमें अपने पिता जैसे ही थे। प्रत्येक रानीको यही लगता था कि श्रीकृष्ण केवल उन्हींके साथ रहते हैं और वही उन्हें सबसे अधिक प्रिय हैं; परन्तु वे उनकी दिव्य महिमाको पूर्णतः नहीं समझ पाती थीं।

रानियाँ श्रीकृष्णके सौन्दर्य, मधुर मुसकान, प्रेमभरी चितवन और वाणीपर मोहित रहती थीं। वे अपने रूप, हावभाव और प्रेमसे उन्हें आकर्षित करना चाहती थीं, परन्तु आत्माराम श्रीकृष्ण कभी इन्द्रियवश नहीं हुए।

यद्यपि भगवान्के वास्तविक स्वरूपको ब्रह्मा आदि देवता भी पूर्णतः नहीं जान पाते, फिर भी उन रानियोंको उन्हें पतिके रूपमें सेवा करनेका सौभाग्य मिला। वे निरन्तर प्रेम, आदर और समर्पणसे उनकी सेवा करती थीं। स्वयं उनका स्वागत करना, चरण पखारना, चन्दन लगाना, भोजन कराना, पंखा झलना और हर प्रकारसे प्रेमपूर्वक सेवा करना ही उनके जीवनका आनन्द था।

श्रीकृष्णकी आठ मुख्य पटरानियोंके पुत्र विशेष रूपसे प्रसिद्ध हुए।
  1. रुक्मिणी- प्रद्युम्न, चारुदेष्ण, सुदेष्ण, चारुदेह, सुचारु, चारुगुप्त, भद्रचारु, चारुचन्द्र, विचारु और चारु।
  2. सत्यभामा- भानु, सुभानु, स्वर्भानु, प्रभानु, भानुमान्, चन्द्रभानु, बृहद्भानु, अतिभानु, श्रीभान और प्रतिभान।
  3. जाम्बवती- साम्ब, सुमित्र, पुरुजित्, शतजित्, सहस्रजित्, विजय, चित्रकेतु, वसुमान्, द्रविड और क्रतु।
  4. सत्या- वीर, चन्द्र, अश्वसेन, चित्रगु, वेगवान्, वृष, आम, शंकु, वसु और कुन्ति।
  5. कालिन्दी- श्रुत, कवि, वृष, वीर, सुबाहु, भद्र, शान्ति, दर्श, पूर्णमास और सोमक।
  6. लक्ष्मणा- प्रघोष, गात्रवान्, सिंह, बल, प्रबल, ऊर्ध्वग, महाशक्ति, सह, ओज और अपराजित उत्पन्न हुए।
  7. मित्रविन्दा- वृक, हर्ष, अनिल, गृध्र, वर्धन, अन्नाद, महाश, पावन, वह्नि और क्षुधि।
  8. भद्रा- संग्रामजित्, बृहत्सेन, शूर, प्रहरण, अरिजित्, जय, सुभद्र, वाम, आयु और सत्यक।
इनके अतिरिक्त श्रीकृष्णकी सोलह हजार एक सौ अन्य पत्नियाँ भी थीं, जिनसे भी दस-दस पुत्र उत्पन्न हुए। 

रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्नका विवाह रुक्मीकी पुत्री रुक्मवतीसे हुआ, जिनके गर्भसे परम पराक्रमी अनिरुद्धका जन्म हुआ। इस प्रकार श्रीकृष्णका वंश अत्यन्त विशाल हो गया और उनके पुत्र-पौत्रोंकी संख्या करोड़ोंतक पहुँच गयी।

राजा परीक्षित्ने आश्चर्य प्रकट करते हुए पूछा कि रणभूमिमें अपमानित होनेके बाद भी रुक्मीने अपनी पुत्री रुक्मवतीका विवाह श्रीकृष्णके पुत्र प्रद्युम्नसे कैसे कर दिया, जबकि वह भीतर-ही-भीतर श्रीकृष्णसे बदला लेनेकी भावना रखता था।

श्रीशुकदेवजीने बताया कि प्रद्युम्नजी अत्यन्त रूपवान् और गुणवान् थे। स्वयंवरमें रुक्मवतीने स्वयं उन्हें वरमाला पहनाई। इसके बाद प्रद्युम्नजीने वहाँ उपस्थित राजाओंको पराजित करके रुक्मवतीका हरण कर लिया।

यद्यपि रुक्मीका श्रीकृष्णके प्रति वैर और अपमानका दुःख समाप्त नहीं हुआ था, फिर भी अपनी बहन रुक्मिणीको प्रसन्न करनेके लिये उसने अपनी पुत्रीका विवाह अपने भानजे प्रद्युम्नसे कर दिया।

रुक्मिणीजीकी दस पुत्रोंके अतिरिक्त चारुमती नामकी एक अत्यन्त सुन्दरी कन्या भी थी, जिसका विवाह कृतवर्माके पुत्र बलीसे हुआ।

रुक्मीने अपनी बहन रुक्मिणीको प्रसन्न करनेके लिये अपनी पौत्री रोचनाका विवाह रुक्मिणीके पौत्र अनिरुद्धसे कर दिया। इस विवाहमें श्रीकृष्ण, बलरामजी, रुक्मिणीजी, प्रद्युम्न, साम्ब आदि द्वारकावासी भोजकट पहुँचे।

बलरामजी द्वारा रुक्मी का वध

विवाहोत्सव समाप्त होनेके बाद कलिंगनरेश आदि घमंडी राजाओंने रुक्मीको उकसाया कि वह चौसरके खेलमें बलरामजीको हराकर उनका उपहास करे। वे जानते थे कि बलरामजीको खेलका विशेष कौशल नहीं था, यद्यपि उन्हें खेलनेका शौक था।

रुक्मीने बलरामजीको चौसर खेलनेके लिये बुलाया। प्रारम्भमें सौ, हजार और दस हजार मुहरोंके दाँवमें रुक्मी जीत गया। उसकी जीतपर कलिंगनरेश ठहाके लगाकर बलरामजीकी हँसी उड़ाने लगा, जिससे बलरामजीको क्रोध आने लगा।

इसके बाद एक लाख मुहरोंका दाँव लगा, जिसमें बलरामजी जीते; परन्तु रुक्मी नहीं माना। तब बलरामजीने दस करोड़ मुहरोंका बड़ा दाँव लगाया और इस बार भी वही जीते। फिर भी रुक्मी धूर्ततासे अपनी जीतका दावा करने लगा। 

तभी आकाशवाणी हुई कि धर्मके अनुसार विजय बलरामजीकी ही हुई है। इसके बाद भी रुक्मी अहंकार और दुष्ट राजाओंके उकसावेमें आकर नहीं माना। उसने बलरामजीका उपहास करते हुए कहा कि “तुम लोग तो वन-वन घूमनेवाले ग्वाले हो, पासा और युद्धकला राजाओंका काम है।”

रुक्मीके इस अपमानजनक व्यवहार और अन्य राजाओंकी हँसीसे बलरामजी अत्यन्त क्रोधित हो उठे। उन्होंने उसी सभामें मुद्गर उठाकर रुक्मीका वध कर दिया। कलिंगनरेश, जो पहले हँस रहा था, भयभीत होकर भागने लगा; परन्तु बलरामजीने पकड़कर उसके दाँत तोड़ डाले। अन्य राजाओंको भी उन्होंने दण्डित किया। वे घायल, भयभीत और रक्तरंजित होकर वहाँसे भाग गये।

बाणासुर पुत्री उषा और कृष्ण पौत्र अनिरुद्ध की प्रेम कहानी 

श्रीशुकदेवजीने बताया कि दैत्यराज बलिका सबसे बड़ा पुत्र बाणासुर था। वह भगवान् शिवका महान भक्त, उदार, बुद्धिमान और प्रतिज्ञाका पक्का था। वह शोणितपुरमें राज्य करता था और शिवजीकी कृपासे अत्यन्त प्रभावशाली बन गया था। उसके पास हजार भुजाएँ थीं और देवता भी उसकी सेवा करते थे।

एक बार शिवजीके ताण्डवनृत्यके समय बाणासुरने अपने हजार हाथोंसे अनेक वाद्य बजाकर उन्हें प्रसन्न किया। प्रसन्न होकर शिवजीने वर माँगनेको कहा, तब बाणासुरने प्रार्थना की कि शिवजी उसके नगरकी रक्षा करते हुए वहीं निवास करें।

समयके साथ बाणासुर अपने बलके अहंकारमें चूर हो गया। उसने शिवजीसे कहा कि हजार भुजाएँ होनेपर भी उसे अपने समान कोई योद्धा नहीं मिलता और उसकी बाहें युद्धके लिये व्याकुल रहती हैं। उसने गर्वसे बताया कि दिग्गज भी उससे डरकर भाग गये और उसने पर्वतोंको तोड़ डाला। उसका अहंकार देखकर शिवजीने क्रोधित होकर भविष्यवाणी की, “जब तेरी ध्वजा टूटकर गिरेगी, तब तेरा सामना मेरे समान एक महान योद्धासे होगा, जो तेरा घमण्ड चूर कर देगा।”

मूर्ख बाणासुर इस चेतावनीको भी अपने लिये गौरव समझ बैठा और उस महान युद्धकी प्रतीक्षा करने लगा।

बाणासुरकी एक कन्या थी, उसका नाम था ऊषा। एक दिन स्वप्नमें उसने एक अत्यन्त सुन्दर युवकको देखा और उसीपर मोहित हो गयी। स्वप्न टूटनेपर वह व्याकुल होकर उठी और सखियोंके बीच लज्जित हो गयी।

ऊषाकी प्रिय सखी चित्रलेखा, जो बाणासुरके मन्त्री कुम्भाण्डकी पुत्री थी, उससे उसकी व्याकुलताका कारण पूछती है। तब ऊषा अपने स्वप्नके उस साँवले, कमलनयन, पीताम्बरधारी और अत्यन्त मनोहर युवकका वर्णन करती है, जिसने उसके हृदयको पूरी तरह मोह लिया था।
चित्रलेखाने ऊषासे कहा कि यदि उसका प्रियतम त्रिलोकीमें कहीं भी होगा और वह उसे पहचान सकेगी, तो वह उसे अवश्य खोज लायेगी। फिर उसने देवता, गन्धर्व, सिद्ध, दैत्य, यक्ष और अनेक मनुष्योंके चित्र बनाकर ऊषाको दिखाने शुरू किये।

जब उसने वृष्णिवंशके शूर, वसुदेवजी, बलरामजी, श्रीकृष्ण और अन्य यादवोंके चित्र बनाये, तब प्रद्युम्नका चित्र देखते ही ऊषा लज्जासे भर गयी। जब उसने अनिरुद्धका चित्र देखा, तब तो लज्जाके मारे उसका सिर नीचा हो गया। फिर मन्द-मन्द मुसकराते हुए उसने कहा, ‘मेरा वह प्राणवल्लभ यही है, यही है’।

चित्रलेखा योगसिद्ध योगिनी थी। वह समझ गयी कि ऊषाके स्वप्नमें आनेवाले युवक श्रीकृष्णके पौत्र अनिरुद्धजी हैं। तब वह रात्रिमें आकाशमार्गसे द्वारका पहुँची और योगबलसे सोते हुए अनिरुद्धजीको उठाकर शोणितपुर ले आयी।

अपने प्रियतमको सामने देखकर ऊषाका हृदय आनन्दसे भर उठा। वह अपने अत्यन्त सुरक्षित अन्तःपुरमें अनिरुद्धजीके साथ प्रेमपूर्वक विहार करने लगी। दिन-प्रतिदिन उसका प्रेम और बढ़ता गया। ऊषाके प्रेममें अनिरुद्धजी भी इतने तल्लीन हो गये कि उन्हें समयका भी ध्यान न रहा।

ऊषाके व्यवहार से महलके पहरेदारों को संदेह हुआ और उन्होंने यह बात बाणासुरको बतायी। यह सुनकर बाणासुर अत्यन्त क्रोधित और दुःखी हुआ तथा तुरंत ऊषाके महलमें जा पहुँचा।
वहाँ उसने अत्यन्त सुन्दर, तेजस्वी और पीताम्बरधारी अनिरुद्धजीको ऊषाके साथ बैठे देखा। अनिरुद्धजी प्रद्युम्नजीके पुत्र थे और उनके रूप-माधुर्यकी शोभा अद्भुत थी। उस समय वे ऊषाके साथ प्रेमपूर्वक पासा खेल रहे थे।

जब अनिरुद्धजीने देखा कि बाणासुर अनेक शस्त्रधारी सैनिकोंके साथ महलमें घुस आया है, तब उन्होंने लोहेका भयंकर परिघ उठाकर वीरतापूर्वक उनका सामना किया। वे ऐसे युद्ध कर रहे थे मानो स्वयं यमराज कालदण्ड लेकर खड़े हों।

जो सैनिक उन्हें पकड़नेके लिये आगे बढ़ते, अनिरुद्धजी उन्हें मार-मारकर गिरा देते। उनकी प्रचण्ड चोटोंसे सैनिकोंके सिर, भुजाएँ और जंघाएँ टूट गयीं और वे भयभीत होकर भागने लगे।
जब बाणासुरने देखा कि उसकी सेना परास्त हो रही है, तब उसने क्रोधमें आकर नागपाशसे अनिरुद्धजीको बाँध लिया। 

अपने प्रियतमको बँधा हुआ देखकर ऊषा अत्यन्त दुःखी हो गयी और आँसू बहाकर विलाप करने लगी।

सारांश: JKYog India Online Class- श्रीमद् भागवत कथा [हिन्दी]- 22.05.2026