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112- श्रीकृष्ण पर स्यमन्तकमणि चोरी का कलंक, जाम्बवान् से युद्ध तथा जाम्बवती, सत्यभामा और कालिन्दी से विवाह

May 18th, 2026 | 10 Min Read
Blog Thumnail

Category: Bhagavat Purana

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Language: Hindi

श्रीमद्भागवत महापुराण- स्कन्ध: 10 अध्याय: 56-58

शुकदेवजी परीक्षित से कहते हैं कि द्वारका के प्रमुख यादवों में से एक सत्राजित् भगवान् सूर्य का महान भक्त था। उसकी अनन्य भक्ति से प्रसन्न होकर सूर्यदेव ने उसे दिव्य स्यमन्तकमणि प्रदान की। उस मणि को धारण करते ही सत्राजित् का तेज इतना अद्भुत हो गया कि जब वह द्वारका नगरी में पहुँचा, तब लोगों ने उसे स्वयं सूर्यदेव समझ लिया।

वे आश्चर्यचकित होकर भगवान् श्रीकृष्ण के पास गए और कहने लगे, “हे प्रभु! ऐसा प्रतीत होता है कि स्वयं सूर्यनारायण आपके दर्शन करने आ रहे हैं।” यह सुनकर भगवान् श्रीकृष्ण मुस्कराए और बोले, “यह सूर्यदेव नहीं हैं, बल्कि सत्राजित् है, जो स्यमन्तकमणि के प्रभाव से इतना तेजस्वी दिखाई दे रहा है।”

इसके बाद सत्राजित् अपने घर गया और ब्राह्मणों द्वारा उस दिव्य स्यमन्तकमणि को देवमन्दिर में विधिपूर्वक स्थापित करवा दिया।

वह स्यमन्तकमणि प्रतिदिन आठ भार (७६–८० किलो) सोना उत्पन्न करती थी। जहाँ उसकी श्रद्धापूर्वक पूजा की जाती थी, वहाँ दुर्भिक्ष, महामारी, ग्रहदोष, सर्पभय, मानसिक और शारीरिक कष्ट तथा अन्य प्रकार के अमंगल कभी नहीं होते थे।

एक बार भगवान् श्रीकृष्ण ने सत्राजित् से कहा कि यह मणि राजा उग्रसेन को दे देनी चाहिए क्यों की राजा के पास होने से उसका लाभ सम्पूर्ण प्रजा को मिलेगा। किन्तु सत्राजित् अत्यन्त लोभी था। उसने भगवान् की आज्ञा और उचित मर्यादा की भी परवाह न करते हुए उस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया।

श्रीकृष्ण पर लगा स्यमन्तकमणि चोरी का कलंक

एक दिन सत्राजित् का भाई प्रसेन स्यमन्तकमणि पहनकर शिकार खेलने वन में गया। वहाँ एक सिंह ने उसे और उसके घोड़े को मार डाला तथा मणि ले ली। बाद में ऋक्षराज जाम्बवान् ने उस सिंह को मारकर मणि अपनी गुफा में ले जाकर अपने बच्चे को खेलने के लिए दे दी।

जब प्रसेन वापस नहीं लौटा, तब सत्राजित् ने बिना प्रमाण के यह आरोप लगा दिया कि भगवान् श्रीकृष्ण ने ही मणि के लोभ से उसके भाई की हत्या की होगी। यह बात नगर में फैल गयी। अपने ऊपर लगे इस झूठे कलंक को मिटाने के लिए भगवान् श्रीकृष्ण कुछ लोगों को साथ लेकर वन में गये। वहाँ उन्होंने प्रसेन और सिंह के मृत शरीर देखे तथा चिन्हों का पीछा करते हुए जाम्बवान् की गुफा तक पहुँचे।

भगवान् श्रीकृष्ण ने सबको बाहर रोककर अकेले गुफा में प्रवेश किया। वहाँ उन्होंने देखा कि स्यमन्तकमणि जाम्बवान् के बच्चे के खिलौने के रूप में रखी हुई है। जैसे ही वे उसे लेने आगे बढ़े, बच्चे की धाय चिल्ला उठी। उसकी आवाज सुनकर जाम्बवान् क्रोध में वहाँ आ पहुँचे।

जाम्बवान् उस समय श्रीकृष्ण की वास्तविक महिमा को पहचान नहीं सके और उन्हें साधारण मनुष्य समझकर युद्ध करने लगे। दोनों के बीच भयंकर युद्ध हुआ। पहले अस्त्र-शस्त्र चले, फिर शिलाएँ और वृक्ष फेंके गये, और अन्त में दोनों में घोर बाहुयुद्ध होने लगा।

श्रीकृष्ण और जाम्बवान् अट्ठाईस दिनों तक निरन्तर युद्ध करते रहे। अन्तमें भगवान् श्रीकृष्णके घुसोंकी चोटसे जाम्बवानके शरीरकी एक-एक गाँठ टूट-फूट गयी। उत्साह जाता रहा। शरीर पसीनेसे लथपथ हो गया। 

तब उन्होंने अत्यन्त विस्मित–चकित होकर श्रीकृष्णसे कहा कि अब मैं समझ गया हूँ, आप ही समस्त प्राणियों के स्वामी, रक्षक और पुराणपुरुष भगवान् विष्णु हैं। फिर जाम्बवान् को स्मरण हो आया कि आपने ही रामावतार में समुद्र पर सेतु बाँधा था और लंका का विनाश किया था। आपके बाणों से राक्षसों के सिर कट-कटकर गिर रहे थे। अवश्य ही आप मेरे वे ही ‘रामजी’ श्रीकृष्णके रूपमें आये हैं।

श्रीकृष्ण और जाम्बवती का विवाह

जब ऋक्षराज जाम्बवान् ने भगवान् श्रीकृष्ण को पहचान लिया, तब भगवान् ने करुणापूर्वक अपने शीतल करकमलों से उनके शरीर को स्पर्श किया और प्रेम से कहा कि मैं इस गुफा में स्यमन्तकमणि लेने आया हूँ, ताकि अपने ऊपर लगे झूठे कलंक को मिटा सकूँ।

यह सुनकर जाम्बवान् अत्यन्त प्रसन्न हुए। उन्होंने श्रद्धा और प्रेम से स्यमन्तकमणि के साथ अपनी पुत्री जाम्बवती को भी भगवान् श्रीकृष्ण के चरणों में समर्पित कर दिया।

भगवान् श्रीकृष्ण के साथ गये लोग बारह दिनों तक गुफा के बाहर उनकी प्रतीक्षा करते रहे। जब वे बाहर नहीं निकले, तब सब दुःखी होकर द्वारका लौट आये। यह समाचार सुनकर देवकीजी, वसुदेवजी, रुक्मिणीजी और समस्त द्वारकावासी अत्यन्त शोक में डूब गये तथा सत्राजित् को दोष देने लगे।

भगवान् श्रीकृष्ण की कुशलता के लिए सभी ने महामाया दुर्गादेवी की उपासना की। देवी की कृपा से शीघ्र ही भगवान् श्रीकृष्ण स्यमन्तकमणि और अपनी नववधू जाम्बवती के साथ सबके सामने प्रकट हो गये। उन्हें सुरक्षित लौटे देखकर समस्त द्वारकावासी ऐसे आनन्दित हुए मानो कोई मृत व्यक्ति पुनः जीवित होकर लौट आया हो।

श्रीकृष्ण और सत्यभामा का विवाह

भगवान् श्रीकृष्ण ने सत्राजित् को राजसभा में बुलाकर सबके सामने स्यमन्तकमणि की पूरी कथा सुनायी और फिर वह मणि उसे लौटा दी। इससे सत्राजित् अत्यन्त लज्जित और पश्चात्ताप से भर गया। अपने अपराध का प्रायश्चित करने के लिए उसने निश्चय किया कि अपनी पुत्री सत्यभामा और स्यमन्तकमणि दोनों भगवान् श्रीकृष्ण को अर्पित कर दूँ। इसी उद्देश्य से वह दोनों को लेकर भगवान् के पास पहुँचा।

सत्यभामा गुण, सौन्दर्य और शील में अत्यन्त श्रेष्ठ थीं। भगवान् श्रीकृष्ण ने विधिपूर्वक उनका पाणिग्रहण किया। किन्तु स्यमन्तकमणि वापस करते हुए भगवान् ने कहा कि यह मणि आप ही के पास रहे, क्योंकि आप सूर्यदेव के भक्त हैं। हमें केवल उससे प्राप्त होनेवाले सोने का भाग पर्याप्त है।

शतधन्वा ने किया सत्राजित की हत्या

शुकदेवजी राजा परीक्षित को कहते हैं कि यद्यपि भगवान् श्रीकृष्णको इस बातका पता था कि लाक्षागृहकी आगसे पाण्डवोंका बाल भी बाँका नहीं हुआ है, तथापि जब उन्होंने सुना कि कुन्ती और पाण्डव जल मरे, तब उस समयका कुल-परम्परोचित व्यवहार करनेके लिये वे बलरामजीके साथ हस्तिनापुर गये।

तब द्वारका में अक्रूर और कृतवर्मा ने शतधन्वा को उकसाया की सत्राजित ने सत्यभामा का विवाह हमसे करने का वचन दिया था, लेकिन बाद में उसने हमारा अपमान करके उसका विवाह कृष्ण से कर दिया। अब सत्राजित को भी अपने भाई प्रसेन की तरह यमलोक भेजकर तुम सत्राजित से स्यमन्तक मणि क्यों नहीं छीन लेते?

शतधन्वा पापी स्वभाव का था और उसकी मृत्यु भी निकट आ चुकी थी। अक्रूर और कृतवर्मा के बहकाने पर वह उनकी बातों में आ गया। उस दुष्ट ने लोभ में आकर सोते हुए सत्राजित की हत्या कर दी। सत्राजित की हत्या करके स्यमन्तक मणि लेकर वहाँ से भाग गया।

जब सत्यभामाजी ने देखा कि उनके पिता की हत्या हो गई है, तब वे अत्यन्त दुःखी हो गईं। वे बार-बार रोकर कहने लगीं, “हाय पिताजी! हाय पिताजी! मैं नष्ट हो गई!” बीच-बीच में वे मूर्छित हो जातीं और फिर होश आने पर विलाप करने लगतीं।

इसके बाद उन्होंने अपने पिता के शरीर को तेल से भरे बड़े पात्र में सुरक्षित रखवा दिया और स्वयं हस्तिनापुर चली गईं। वहाँ जाकर उन्होंने बड़े दुःख के साथ भगवान श्रीकृष्ण को अपने पिता की हत्या का समाचार सुनाया।

सत्राजित् की हत्या का समाचार सुनकर भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी ने मनुष्यों की तरह शोक प्रकट किया और फिर सत्यभामाजी के साथ द्वारका लौट आये। वहाँ पहुँचकर उन्होंने शतधन्वा को दण्ड देने और स्यमन्तकमणि वापस लाने का निश्चय किया।

श्रीकृष्ण ने शतधन्वा का किया वध

जब शतधन्वा को पता चला कि भगवान् श्रीकृष्ण उसका पीछा करने वाले हैं, तब वह भयभीत होकर पहले कृतवर्मा के पास सहायता माँगने गया। किन्तु कृतवर्मा ने कहा कि श्रीकृष्ण और बलरामजी सर्वशक्तिमान् हैं, उनसे वैर लेकर कोई सुखी नहीं रह सकता।

इसके बाद शतधन्वा अक्रूरजी के पास गया। अक्रूरजी ने भी भगवान् श्रीकृष्ण की महिमा बताते हुए सहायता करने से मना कर दिया और कहा कि वे वही भगवान् हैं जिन्होंने बाल्यावस्था में गोवर्द्धन पर्वत उठाया था।

जब किसी ने सहायता नहीं की, तब शतधन्वा ने स्यमन्तकमणि अक्रूरजी के पास रख दी और तेज घोड़े पर बैठकर भाग निकला। तब भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी रथ पर सवार होकर उसका पीछा करने निकल पड़े।

मिथिला के निकट शतधन्वा का घोड़ा गिर पड़ा, तब वह भयभीत होकर पैदल भागने लगा। भगवान् श्रीकृष्ण भी उसके पीछे दौड़े और अपने सुदर्शन चक्र से उसका सिर काट डाला। फिर उन्होंने उसके पास स्यमन्तकमणि खोजी, परन्तु वह वहाँ नहीं मिली।

तब भगवान् श्रीकृष्ण ने बलरामजी से कहा कि शतधन्वा को व्यर्थ ही मारा गया, क्योंकि मणि उसके पास नहीं थी। बलरामजी ने अनुमान किया कि उसने मणि किसी और के पास रख दी होगी। इसके बाद उन्होंने श्रीकृष्ण को द्वारका लौटकर मणि का पता लगाने को कहा और स्वयं अपने प्रिय मित्र विदेहराज से मिलने मिथिला चले गये।

मिथिलानरेश ने बड़े प्रेम और सम्मान से बलरामजी का स्वागत किया। बलरामजी कई वर्षों तक मिथिला में रहे और वहीं दुर्योधन ने उनसे गदायुद्ध की शिक्षा प्राप्त की।

उधर भगवान् श्रीकृष्ण द्वारका लौट आये और सत्यभामाजी को बताया कि शतधन्वा मारा गया, किन्तु स्यमन्तकमणि उसके पास नहीं मिली। इसके बाद उन्होंने सत्राजित् की समस्त अन्त्येष्टि और श्राद्ध सम्बन्धी क्रियाएँ विधिपूर्वक सम्पन्न करायीं।

श्रीकृष्ण ने स्यमन्तकमणि अक्रूर को दिया

अक्रूर और कृतवर्मा ने ही शतधन्वा को सत्राजित् की हत्या के लिए उकसाया था। इसलिए जब उन्हें पता चला कि भगवान् श्रीकृष्ण ने शतधन्वा का वध कर दिया है, तब वे भयभीत होकर द्वारका से भाग गये।

कुछ लोगों ने कहना शुरू किया कि अक्रूर के चले जाने से द्वारका में अनेक अनिष्ट और कष्ट आने लगे। नगर के वृद्ध लोग अक्रूर और उनके पिता श्वफल्क की महिमा बताते हुए कहते थे कि जहाँ वे रहते हैं, वहाँ सुख, वर्षा और समृद्धि बनी रहती है।

यद्यपि भगवान् श्रीकृष्ण जानते थे कि द्वारका में किसी उपद्रव का वास्तविक कारण अक्रूर का जाना नहीं है, फिर भी लोकमत को शांत करने के लिए उन्होंने अक्रूरजी को वापस बुलवाया। भगवान् ने प्रेमपूर्वक उनका सत्कार किया और मुस्कराकर कहा कि हमें पहले से ज्ञात है कि शतधन्वा स्यमन्तकमणि आपके पास छोड़ गया था।

भगवान् श्रीकृष्ण ने अक्रूरजी से कहा कि यद्यपि इस मणि पर हमारे पुत्रों का अधिकार बनता है, फिर भी यह आपके ही पास रहे। केवल इतना कीजिये कि मणि दिखाकर बलरामजी, सत्यभामा और जाम्बवती का सन्देह दूर कर दीजिये।

तब अक्रूरजी ने वस्त्र में लपेटी हुई तेजस्वी स्यमन्तकमणि भगवान् श्रीकृष्ण को दिखायी। भगवान् ने सबके सामने वह मणि दिखाकर अपने ऊपर लगा कलंक मिटा दिया और फिर उसे पुनः अक्रूरजी को लौटा दिया।

श्रीकृष्ण गए पांडवों से मिलने इंद्रप्रस्थ

शुकदेवजी कहते हैं कि जब यह ज्ञात हो गया कि पाण्डव लाक्षागृह में नहीं जले हैं, तब भगवान् श्रीकृष्ण सात्यकि और अन्य यदुवंशियों के साथ उनसे मिलने इन्द्रप्रस्थ गये। भगवान् को देखकर पाण्डव अत्यन्त आनन्दित हो उठे और प्रेमपूर्वक उनका आलिंगन किया। उनके स्पर्श और दर्शन से पाण्डवों के सारे दुःख दूर हो गये।

भगवान् श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर और भीमसेन को प्रणाम किया, अर्जुन को हृदय से लगाया तथा नकुल-सहदेव ने उनके चरणों की वन्दना की। द्रौपदी ने भी लज्जाभाव से आकर भगवान् को प्रणाम किया। इसके बाद भगवान् अपनी बुआ कुन्ती के पास गये। कुन्तीजी ने प्रेम से उन्हें हृदय से लगा लिया और भावविह्वल होकर कहा कि जब आपने हमारा स्मरण किया और अक्रूर को भेजा, तभी हम अनाथों को सहारा मिल गया।

युधिष्ठिरजी ने भी भगवान् की महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि बड़े-बड़े योगी जिनके दर्शन कठिनता से पाते हैं, वे हमें सहज ही प्राप्त हो रहे हैं। युधिष्ठिरजी के आग्रह पर भगवान् श्रीकृष्ण वर्षा ऋतु के चार महीनों तक इन्द्रप्रस्थ में रहे और वहाँ के लोगों को अपनी रूप-माधुरी से आनन्दित करते रहे।

श्रीकृष्ण और कालिन्दी का विवाह

एक अर्जुन और श्रीकृष्ण एक घने वन में गए थे। प्यास लगने पर अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण के साथ यमुना जी के तट पर पहुँचे। दोनों महारथियों ने यमुना में हाथ-पैर धोए, निर्मल जल पिया और वहाँ एक अत्यन्त सुन्दर कन्या को तपस्या करते देखा। 

भगवान श्रीकृष्ण के कहने पर अर्जुन उसके पास गए और बोले, “सुन्दरी! तुम कौन हो? किसकी पुत्री हो? कहाँ से आई हो? और क्या करना चाहती हो?”

तब उस कन्या ने कहा, “मैं सूर्यदेव की पुत्री हूँ। मेरा नाम कालिन्दी है। मैं भगवान विष्णु को पति के रूप में पाना चाहती हूँ। इसी उद्देश्य से मैं कठोर तपस्या कर रही हूँ। अनाथों के एकमात्र सहारे और प्रेम बाँटने वाले भगवान श्रीकृष्ण मुझ पर प्रसन्न हों। मेरे पिता ने यमुना जल के भीतर मेरे लिए एक भवन बनवाया है। मैं वहीं रहती हूँ और जब तक भगवान के दर्शन नहीं होंगे, यहीं तपस्या करती रहूँगी।”

अर्जुन ने जाकर भगवान् श्रीकृष्ण को सारी बातें बताईं। भगवान् तो पहले से ही सब जानते थे। इसके बाद उन्होंने कालिन्दीजी को अपने रथ पर बैठाया और धर्मराज युधिष्ठिर के पास ले आए। बाद में द्वारका लौटने पर शुभ मुहूर्त में भगवान् श्रीकृष्ण ने कालिन्दीजी के साथ विधिपूर्वक विवाह किया।

सारांश: JKYog India Online Class- श्रीमद् भागवत कथा [हिन्दी]- 15.05.2026