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115- कृष्ण-शिव युद्ध, बाणासुर को अभयदान, राजा नृग की कथा और बलरामजी की ब्रज यात्रा और यमुना कर्षण लीला

May 29th, 2026 | 8 Min Read
Blog Thumnail

Category: Bhagavat Purana

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Language: Hindi

श्रीमद्भागवत महापुराण- स्कन्ध: 10 अध्याय: 63-65

बाणासुरने अनिरुद्ध को नागपाशसे बाँधकर शोणितपुर में ही रख लिया। उधर चार महीने बीत जानेपर भी जब अनिरुद्ध का कोई पता नहीं चला, तब उनके परिवारजन अत्यन्त चिन्तित और दुःखी हो गये। उसी समय नारदजीने आकर बताया कि अनिरुद्ध शोणितपुरमें हैं, उन्होंने बाणासुरकी सेनाको परास्त किया था, परन्तु अन्तमें बाणासुरने उन्हें नागपाशसे बाँध लिया है।

यह समाचार सुनते ही श्रीकृष्ण, बलरामजी और प्रद्युम्न, सात्यकि, साम्ब, गद आदि समस्त यदुवंशी वीर बारह अक्षौहिणी सेनाके साथ शोणितपुर पर चढ़ आये और चारों ओरसे नगरको घेर लिया। जब बाणासुरने देखा कि यदुवंशियोंकी सेना उसके उद्यान, किले और द्वारोंको नष्ट कर रही है, तब वह भी क्रोधमें भरकर अपनी विशाल सेना लेकर युद्धके लिये बाहर निकल आया।

बाणासुरकी सहायता करनेके लिये स्वयं भगवान् शिव नन्दीपर सवार होकर अपने पुत्र कार्तिकेय और शिवगणोंके साथ रणभूमिमें आये। वहाँ उनका युद्ध श्रीकृष्ण और बलरामजीसे हुआ। यह युद्ध अत्यन्त भयंकर और अद्भुत था। श्रीकृष्णका युद्ध शिवजीसे, प्रद्युम्नका कार्तिकेयसे, बलरामजीका कुम्भाण्ड और कूपकर्णसे, साम्बका बाणासुरके पुत्रसे तथा सात्यकिका स्वयं बाणासुरसे हुआ। इस महान युद्धको देखनेके लिये ब्रह्मा आदि देवता, ऋषि, गन्धर्व और अप्सराएँ भी विमानोंपर आ पहुँचे।

भगवान् श्रीकृष्णने अपने शार्ङ्गधनुषके तीखी नोकवाले बाणोंसे शंकरजीके अनुचरों-भूत, प्रेत, पिशाच, वेताल, डाकिनी, ब्रह्म-राक्षस आदि मार-मारकर खदेड़ दिया। भगवान् शिवने श्रीकृष्णपर अनेक दिव्य अस्त्र-शस्त्र चलाये, परन्तु श्रीकृष्णने अत्यन्त सहज भावसे उनके प्रत्येक अस्त्रका उचित प्रतिकार किया। ब्रह्मास्त्रके सामने ब्रह्मास्त्र, वायव्यास्त्रके लिये पार्वतास्त्र, आग्नेयास्त्रके लिये पर्जन्यास्त्र और पाशुपतास्त्रके लिये नारायणास्त्रका प्रयोग किया।

इसके बाद श्रीकृष्णने जृम्भणास्त्र चलाकर शिवजीको जम्हाई लेनेके लिये विवश कर दिया। तब वे कुछ समयके लिये युद्धसे विरत हो गये और श्रीकृष्णने बाणासुरकी सेनाका संहार शुरू कर दिया।

प्रद्युम्नने अपने बाणोंसे कार्तिकेयको घायल कर दिया, जिससे वे रणभूमि छोड़कर हट गये। बलरामजीने भी कुम्भाण्ड और कूपकर्णको गम्भीर रूपसे घायल कर दिया। अपने प्रमुख योद्धाओंको पराजित देखकर बाणासुरकी सेना भयभीत होकर भागने लगी।

यह देखकर बाणासुर क्रोधसे भर उठा। उसने अपने हजार हाथोंसे एक साथ पाँच सौ धनुष उठाकर श्रीकृष्णपर बाणोंकी वर्षा करनी चाही। परन्तु श्रीकृष्णने तत्काल उसके सभी धनुष काट डाले, उसके रथ, घोड़ों और सारथिको भी नष्ट कर दिया और फिर विजयी शंखनाद किया।

बाणासुरकी रक्षा करनेके लिये उसकी धर्ममाता कोटरा देवी नग्न अवस्था में बिखरे बालोंके साथ श्रीकृष्णके सामने आ खड़ी हुई। मर्यादाका पालन करते हुए श्रीकृष्णने अपनी दृष्टि फेर ली। इसी अवसरका लाभ उठाकर बाणासुर, जिसका धनुष कट चुका था और रथ नष्ट हो गया था, नगरकी ओर भाग गया।

उधर शिवजीके गणोंके भाग जानेके बाद उनका भयंकर माहेश्वर ज्वर, जिसके तीन सिर और तीन पैर थे, अग्निके समान दहकता हुआ श्रीकृष्णकी ओर बढ़ा। उसके मुकाबलेके लिये श्रीकृष्णने अपना वैष्णव ज्वर प्रकट किया।

दोनों दिव्य ज्वरोंने आपसमें भयंकर संघर्ष किया। अन्ततः वैष्णव ज्वरके तेजसे माहेश्वर ज्वर अत्यन्त पीड़ित और भयभीत हो गया। जब उसे कहीं भी शरण न मिली, तब उसने विनम्र होकर श्रीकृष्णकी शरण ग्रहण की और उनसे रक्षा करनेकी प्रार्थना की। श्रीकृष्णने त्रिशिरा को भय मुक्त कर दिया। माहेश्वर ज्वरने उन्हें प्रणाम किया और वहाँसे चला गया।

इसी बीच बाणासुर फिरसे रथपर सवार होकर युद्धके लिये रणभूमिमें आ पहुँचा। बाणासुर अपने हजार हाथोंमें अनेक अस्त्र-शस्त्र लेकर अत्यन्त क्रोधसे श्रीकृष्णपर बाणोंकी वर्षा करने लगा। तब श्रीकृष्णने अपने सुदर्शन चक्रसे उसकी भुजाएँ काटनी शुरू कर दीं, जैसे कोई वृक्षकी शाखाएँ काटता है।

जब भगवान् शिवने देखा कि बाणासुरकी भुजाएँ कट रही हैं, तब वे श्रीकृष्णके पास आये और उससे कृपा करनेकी प्रार्थना की। उन्होंने कहा कि बाणासुर उनका प्रिय भक्त और सेवक है, इसलिए उसपर दया की जाये।

श्रीकृष्णने शिवजीकी प्रार्थना स्वीकार करते हुए कहा कि वे बाणासुरका वध नहीं करेंगे, क्योंकि वह दैत्यराज बलिका पुत्र और प्रह्लादके वंशका है। उन्होंने बताया कि उन्होंने केवल उसका घमंड तोड़ने और पृथ्वीका भार कम करनेके लिये उसकी भुजाएँ काटी हैं। अब उसकी चार भुजाएँ शेष रहेंगी और वह निर्भय होकर शिवजीका पार्षद बना रहेगा।

अभयदान पाकर बाणासुरने श्रीकृष्णको प्रणाम किया और अनिरुद्धजीको अपनी पुत्री ऊषाके साथ सम्मानपूर्वक उनके पास ले आया। इसके बाद श्रीकृष्ण, शिवजीकी अनुमति लेकर, ऊषा और अनिरुद्धको साथ लेकर द्वारका लौट गये।

दानवीर राजा नृग के गिरगिट योनि प्राप्त करने की कथा

एक दिन साम्ब, प्रद्युम्न, गद और अन्य यदुवंशी राजकुमार उपवनमें विहार कर रहे थे। खेलते-खेलते उन्हें प्यास लगी, तब वे जलकी खोजमें एक सूखे कुएँके पास पहुँचे। वहाँ उन्होंने एक अत्यन्त विशाल और विचित्र गिरगिट देखा, जिसका आकार पर्वतके समान था। राजकुमारोंको उस जीवपर दया आयी और उन्होंने रस्सियोंसे बाँधकर उसे बाहर निकालनेका बहुत प्रयास किया, परन्तु सफल न हो सके। तब वे यह आश्चर्यमय घटना श्रीकृष्णको बताने गये।

श्रीकृष्ण स्वयं कुएँके पास आये और उन्होंने सहज ही अपने बाएँ हाथसे उस गिरगिटको बाहर निकाल लिया। भगवानके स्पर्शमात्रसे उसका गिरगिट-रूप समाप्त हो गया और वह एक दिव्य तेजस्वी देवताके रूपमें प्रकट हो गया, जिसका शरीर सोनेके समान चमक रहा था और जो दिव्य वस्त्रों एवं आभूषणोंसे सुशोभित था।

यद्यपि श्रीकृष्ण सब जानते थे, फिर भी लोकशिक्षाके लिये उन्होंने उस दिव्य पुरुषसे पूछा कि वह कौन है और किस कर्मके कारण उसे गिरगिटकी योनि प्राप्त हुई थी।

तब उस दिव्य पुरुष ने कहा, “प्रभो! मैं महाराज इक्ष्वाकु का पुत्र राजा नृग हूँ। पृथ्वी में जितने धूल के कण हैं, आकाश में जितने तारे हैं और वर्षा में जितनी जलधाराएँ गिरती हैं, मैंने उतनी ही गौओं का दान किया था। वे सभी गौएँ दुधारू, सीधी, सुन्दर और उत्तम गुणों वाली थीं। वे सब न्यायपूर्वक कमाए हुए धन से खरीदी गई थीं। उनके साथ बछड़े भी थे। उनके सींगों पर सोना और खुरों पर चाँदी मढ़ी गई थी। उन्हें वस्त्र, हार और गहनों से सजाकर दान दिया जाता था।

“एक दिन एक तपस्वी ब्राह्मण की गाय भटककर मेरी गौओं में आ मिली। मुझे इसका पता नहीं चला और मैंने अनजाने में वही गाय दूसरे ब्राह्मण को दान कर दी। जब दूसरा ब्राह्मण उस गाय को ले जा रहा था, तब असली मालिक ने कहा, ‘यह गाय मेरी है।’ तब दान लेने वाले ब्राह्मण ने कहा, ‘नहीं, यह मेरी है, क्योंकि राजा नृग ने मुझे दान में दी है।’

“दोनों ब्राह्मण विवाद करते हुए मेरे पास आए। एक कहने लगा, ‘राजा ने यह गाय मुझे दी है’, और दूसरा बोला, ‘यदि ऐसा है, तो तुमने मेरी गाय ले ली है।’ उनकी बातें सुनकर मैं बड़े धर्मसंकट में पड़ गया।

“मैंने दोनों से बहुत विनती की और कहा, ‘मैं बदले में एक लाख उत्तम गौएँ दूँगा। कृपया यह गाय मुझे दे दीजिए। मैं आपका सेवक हूँ। मुझसे अनजाने में यह अपराध हो गया है। मुझ पर दया कीजिए और मुझे इस पाप तथा नरक से बचाइए।’

“लेकिन गाय का असली मालिक बोला, ‘राजन्! मैं इसके बदले में कुछ नहीं लूँगा।’ इतना कहकर वह चला गया। दूसरा ब्राह्मण भी बोला, ‘तुम मुझे एक लाख नहीं, दस लाख गौएँ भी दो, तब भी मैं इसे नहीं छोड़ूँगा।’ और वह भी चला गया।

“कुछ समय बाद मेरी आयु पूरी हुई। तब यमराज के दूत मुझे यमलोक ले गए। वहाँ यमराज ने मुझसे पूछा, ‘राजन्! तुम पहले अपने पाप का फल भोगना चाहते हो या पुण्य का? तुम्हारे दान और धर्म के कारण तुम्हें असीम तेज से भरा हुआ महान लोक प्राप्त होने वाला है।’

“तब मैंने यमराज से कहा, ‘देव! पहले मैं अपने पाप का फल भोगना चाहता हूँ।’ इतना सुनते ही यमराज ने कहा, ‘तो गिर जाओ।’ उनके ऐसा कहते ही मैं वहाँ से गिर पड़ा और गिरते समय मैंने देखा कि मैं गिरगिट बन गया हूँ।

“हे प्रभो! मैं ब्राह्मणों का सेवक, दानी और आपका भक्त था। मेरे मन में हमेशा यही इच्छा रहती थी कि किसी प्रकार आपके दर्शन हो जाएँ। आपकी कृपा से मुझे अपने पूर्वजन्म की स्मृति बनी रही।”

फिर राजा नृगने श्रीकृष्णकी स्तुति-परिक्रमा की, उनके चरणोंमें प्रणाम किया और भगवान्की आज्ञा लेकर सबके सामने दिव्य विमानपर बैठकर देवलोकके लिये प्रस्थान कर गये। इसके बाद श्रीकृष्णने सबको शिक्षा दी कि सत्पुरुष का धन छीनना अत्यन्त घोर पाप है। उन्होंने कहा कि साधारण विषका तो उपचार हो सकता है, परन्तु सन्तोंका धन हड़पनेका दोष पूरे कुलका विनाश कर देता है।

बलरामजी की ब्रज यात्रा तथा यमुना कर्षण लीला

श्रीशुकदेवजी कहते हैं कि एक बार बलरामजीके मनमें व्रजवासियोंसे मिलनेकी तीव्र इच्छा जागी। वे द्वारकासे व्रज पहुँचे। नन्दबाबा, यशोदा मैया, गोप-गोपियाँ और ग्वालबाल उन्हें देखकर प्रेमसे भर उठे। सबने उन्हें गले लगाया, आशीर्वाद दिया और श्रीकृष्णके साथ उनकी कुशल पूछी।

बलरामजीने भी सबके साथ प्रेमपूर्वक मिलकर उनका हालचाल जाना। व्रजवासी ग्वालोंने पूछा कि क्या द्वारकामें रहनेके बाद भी श्रीकृष्णको कभी व्रज और अपने पुराने सखा-संबंधियोंकी याद आती है।

गोपियाँ बलरामजीको देखकर भावविह्वल हो गयीं। उन्होंने विरहभरे स्वरमें पूछा कि क्या श्रीकृष्णको कभी उनकी याद आती है, क्या वे कभी व्रज लौटेंगे। एक गोपीने विरह और उलाहनेके भावमें कहा कि हम तो भोली ग्वालिनें थीं, इसलिये श्रीकृष्णकी मीठी बातोंमें आ गयीं; परन्तु नगरकी चतुर स्त्रियाँ शायद उनके छलावेमें न आती होंगी। 

दूसरी गोपीने कहा कि श्रीकृष्णकी मधुर वाणी, मुसकराहट और प्रेमभरी चितवन इतनी मोहिनी है कि नगरकी स्त्रियाँ भी उनसे मोहित होकर अपना सर्वस्व अर्पित कर देती होंगी। तीसरी गोपीने दुःखभरे वैराग्यसे कहा कि अब श्रीकृष्णकी बातें छोड़ो; यदि वे हमारे बिना रह सकते हैं, तो हमें भी किसी प्रकार अपना समय बिताना ही होगा, चाहे विरहमें दुःख क्यों न सहना पड़े।
बलरामजी प्रेम और करुणासे भर उठे। उन्होंने श्रीकृष्णके प्रेमपूर्ण सन्देश सुनाकर गोपियोंको ढाढ़स बँधाया और उनके विरहको शान्त करनेका प्रयास किया।

बलरामजीने चैत्र और वैशाखके दो महीने व्रजमें बिताये। इस दौरान वे व्रजवासियों, विशेषकर गोपियोंको श्रीकृष्णके सन्देश सुनाकर सान्त्वना देते, उनके साथ प्रेमपूर्ण संगति करते और यमुनातटके उपवनोंमें विहार करते थे। उस समय वसन्त ऋतुकी सुगन्ध, चाँदनी और यमुनातटका वातावरण अत्यन्त मनोहर था।

एक दिन वरुणदेवकी पुत्री वारुणीकी मधुर सुगन्धसे आकर्षित होकर बलरामजी वहाँ पहुँचे। गोपियाँ उनके गुणोंका गान कर रही थीं और बलरामजी आनन्दमग्न होकर वनमें विचर रहे थे।
इसके बाद बलरामजीने जलविहारके लिये यमुनाजीको अपने पास बुलाया, परन्तु यमुनाजीने उनकी आज्ञाका पालन नहीं किया। तब बलरामजीने क्रोधित होकर अपने हलकी नोकसे यमुनाजीको अपनी ओर खींच लिया। 

भयभीत यमुनाजीने तुरंत उनके चरणोंमें गिरकर क्षमा माँगी और उनके दिव्य स्वरूपकी स्तुति की।बलरामजीने उन्हें क्षमा कर दिया। बादमें लक्ष्मीजीने बलरामजीको दिव्य वस्त्र और आभूषण अर्पित किये।

सारांश: JKYog India Online Class- श्रीमद् भागवत कथा [हिन्दी]- 25.05.2026