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113- श्रीकृष्ण की विवाह लीलाएँ, भौमासुर और मुर दैत्य का वध तथा 16,100 राजकुमारियों का उद्धार

May 22nd, 2026 | 8 Min Read
Blog Thumnail

Category: Bhagavat Purana

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Language: Hindi

श्रीमद्भागवत महापुराण- स्कन्ध: 10 अध्याय: 58-59

पाण्डवों की प्रार्थना पर भगवान् श्रीकृष्ण ने विश्वकर्मा से उनके लिए एक अद्भुत और भव्य नगर बनवाया। भगवान् कुछ समय तक वहीं रहकर पाण्डवों का आनन्द और हित करते रहे। इसी दौरान उन्होंने अर्जुन के सारथि बनकर अग्निदेव की सहायता की और खाण्डव वन दहन कराया।

अग्निदेव प्रसन्न होकर अर्जुन को दिव्य गाण्डीव धनुष, अक्षय बाणों से भरे तरकस, दिव्य रथ, चार श्वेत घोड़े और अभेद्य कवच प्रदान करते हैं। खाण्डव-दाह में अर्जुन ने मय दानव की रक्षा की, इसलिए उसने पाण्डवों के लिए एक अद्भुत मायासभा बनाई। उसी सभा में दुर्योधन जल और स्थल का भ्रम खाकर उपहास का पात्र बना।

कुछ समय बाद भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन और अन्य सम्बन्धियों की अनुमति लेकर सात्यकि आदि के साथ द्वारका लौट आये। वहाँ उन्होंने शुभ मुहूर्त में सूर्यपुत्री कालिन्दीजी से विधिपूर्वक विवाह किया, जिससे पूरे यदुवंश में आनन्द और मंगल छा गया।

श्रीकृष्ण की मित्रविन्दा, सत्या, भद्रा और लक्ष्मणा से किया विवाह 

अवन्ती (उज्जैन) देश के राजा विन्द और अनुविन्द थे। वे दुर्योधन के पक्ष में रहने वाले और उसके अनुयायी थे। उनकी बहन मित्रविन्दा स्वयंवर में भगवान श्रीकृष्ण को ही पति बनाना चाहती थीं, लेकिन विन्द और अनुविन्द ने उन्हें रोक दिया।

मित्रविन्दा, श्रीकृष्ण की बुआ राजाधिदेवी की पुत्री थीं। श्रीकृष्ण ने मित्रविन्दा को भी राजाओं से भरी सभा में से हर ले गए और बाद में उनसे भी विवाह किया।

कोसल देश के राजा नग्नजित अत्यन्त धर्मात्मा थे। उनकी अत्यन्त सुन्दर कन्या का नाम सत्या था। नग्नजित की पुत्री होने के कारण वे नाग्नजिती भी कहलाती थीं। राजा नग्नजित की प्रतिज्ञा थी कि जो वीर उनके सात भयंकर बैलों को वश में कर लेगा, उसी से वे अपनी पुत्री का विवाह करेंगे। उन बैलों के सींग बहुत नुकीले थे और वे इतने उग्र थे कि किसी वीर पुरुष की गन्ध भी सहन नहीं कर सकते थे।

तब श्रीकृष्ण विशाल सेना के साथ कोसलपुरी (अयोध्या) पहुँचे। राजा नग्नजित ने बड़े आदर और प्रेम से भगवान् का स्वागत किया।

राजकुमारी सत्या पहले से ही भगवान् श्रीकृष्ण को अपने पति के रूप में चाहती थीं। उन्होंने मन-ही-मन प्रार्थना की कि यदि उनके व्रत, नियम और भक्ति सच्चे हैं, तो भगवान् ही उन्हें पति रूप में प्राप्त हों।

राजा नग्नजित ने भगवान् श्रीकृष्ण की बड़े प्रेम और श्रद्धा से पूजा की और श्रीकृष्ण राजा के प्रेम और आदर से प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा कि क्षत्रिय को याचना करना शोभा नहीं देता, फिर भी वे प्रेम-संबंध स्थापित करने के लिए उनकी पुत्री सत्या का वरण करना चाहते हैं। साथ ही भगवान् ने स्पष्ट किया कि यदुवंश में विवाह के बदले कोई शुल्क लेने-देने की प्रथा नहीं है।
राजा नग्नजित ने उत्तर दिया कि भगवान् श्रीकृष्ण ही उनकी पुत्री के लिए सबसे योग्य वर हैं, क्योंकि वे समस्त गुणों के धाम और स्वयं लक्ष्मीपति हैं।

लेकिन उन्होंने पहले से एक प्रण कर रखा है कि जो वीर उनके सात अत्यन्त उग्र और अजेय बैलों को वश में करेगा, वही सत्या से विवाह कर सकेगा। उन बैलों ने अब तक अनेक राजकुमारों को पराजित और घायल कर दिया था। यदि इन्हें आप ही नाथ लें, अपने वशमें कर लें, तो आप ही हमारी कन्याके लिये अभीष्ट वर होंगे।

श्रीकृष्णने राजा नग्नजित्का ऐसा प्रण सुनकर कमरमें फेंट कस ली और खेल-खेलमें ही उन बैलोंको नाथ लिया। यह देखकर राजा नग्नजित अत्यन्त प्रसन्न और आश्चर्यचकित हुए। उन्होंने विधिपूर्वक अपनी पुत्री सत्या का विवाह भगवान् श्रीकृष्ण से कर दिया।

पूरा नगर उत्सव से भर गया। राजा नग्नजित ने विशाल दहेज, गौएँ, हाथी, रथ, घोड़े और सेवकों सहित अपनी पुत्री को विदा किया। वात्सल्य से भरे राजा ने भगवान् श्रीकृष्ण और सत्या को सम्मानपूर्वक द्वारका के लिए विदा किया।

जब अन्य राजाओं ने सुना कि श्रीकृष्ण ने राजा नग्नजित के सातों भयंकर बैलों को वश में कर सत्या का वरण कर लिया है, तब वे ईर्ष्या और क्रोध से भर उठे। उन्होंने मार्ग में श्रीकृष्ण को घेरकर उनपर बाणों की वर्षा शुरू कर दी।

उस समय अर्जुन ने अपने प्रिय मित्र श्रीकृष्ण की सहायता के लिए गाण्डीव धनुष उठाया और सिंह की भाँति उन राजाओं को पराजित करके भगा दिया। इसके बाद श्रीकृष्ण सत्या और विशाल दहेज सहित द्वारका लौट आये और वहाँ गृहस्थ जीवन की लीलाएँ करने लगे।

इसके बाद श्रीशुकदेवजी बताते हैं कि भगवान् श्रीकृष्ण ने अपनी बुआ श्रुतकीर्ति की पुत्री भद्रा से भी विवाह किया। भद्रा के भाइयों ने स्वयं उसे भगवान् को समर्पित किया था।

फिर मद्रदेश की राजकुमारी लक्ष्मणा के स्वयंवर में भगवान् श्रीकृष्ण ने अकेले ही सभी राजाओं को पराजित कर उसका हरण किया।

श्रीकृष्ण ने किया भौमासुर और मुर दैंत्य का उद्धार

भौमासुर प्राग्ज्योतिषपुर का अत्यन्त शक्तिशाली और अत्याचारी राजा था। (वह, जिसे नरकासुर भी कहा जाता है, भगवान् विष्णु के वराहावतार और पृथ्वी देवी (भूदेवी) का पुत्र था। पृथ्वीपुत्र होनेके कारण उसे “भौम” या “भौमासुर” कहा गया।)

वरदानके अहंकारमें आकर वह अत्याचारी बन गया और देवताओं, ऋषियों तथा राजाओंको सताने लगा। उसने वरुणका छत्र, देवमाता अदितिके कुण्डल और मेरु पर्वतपर स्थित देवताओंका मणिपर्वत नामक स्थान छीन लिया था। 

उसके अत्याचारोंसे पीड़ित होकर देवराज इन्द्र श्रीकृष्णकी शरणमें गये और उसकी एक-एक करतूत सुनायी। अब भगवान् श्रीकृष्ण सत्यभामाके साथ गरुड़पर सवार हुए और भौमासुरकी राजधानी प्रागज्योतिषपुरमें गये जो अत्यन्त अभेद्य था। उसके चारों ओर पहाड़, शस्त्रों की घेराबंदी, जल से भरी खाई, अग्नि और वायु की दीवारें थी।

उसकी की रक्षा के लिये मुर दैत्य ने नगर के चारों ओर दस हजार भयानक और मजबूत जाल बिछा रखे थे। श्रीकृष्ण ने अपनी गदा से पर्वतों को तोड़ डाला, बाणों से शस्त्रों की घेराबंदी नष्ट कर दी और सुदर्शन चक्र से अग्नि, जल तथा वायु की दीवारों को ध्वस्त कर दिया। फिर तलवार से मुर दैत्य के सभी जाल काट डाले।

भगवान् के पांचजन्य शंख की प्रलयकारी ध्वनि सुनकर पाँच सिर वाला मुर दैत्य जाग उठा। वह अत्यन्त भयंकर और तेजस्वी था। उसने त्रिशूल लेकर गरुड़ और भगवान् श्रीकृष्ण पर आक्रमण किया। 

भगवान् ने अपने तीक्ष्ण बाणों से उसका त्रिशूल काट डाला और उसके मुखों पर प्रहार किया। क्रोधित होकर मुर ने गदा चलाई, पर भगवान् ने अपनी गदा से उसे भी चूर-चूर कर दिया।
अन्त में जब वह निःशस्त्र होकर झपटा, तब भगवान् श्रीकृष्ण ने खेल-खेल में ही सुदर्शन चक्र से उसके पाँचों सिर काट डाले।

मुर दैत्य की मृत्यु के बाद उसके सात पुत्र और सेनापति पीठ क्रोध में भरकर युद्ध के लिये आये। उन्होंने भगवान् पर अनेक अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा की, किन्तु भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने दिव्य बाणों से उनके सभी अस्त्र नष्ट कर दिये। फिर भगवान् ने पीठ और उसके साथियों का संहार कर उन्हें यमलोक पहुँचा दिया।

जब भौमासुर ने देखा कि श्रीकृष्ण ने उसके सेनापतियों और सेना का संहार कर दिया है, तब वह अत्यन्त क्रोधित हो उठा। वह मदमस्त हाथियों की विशाल सेना लेकर युद्धभूमि में आया। 
उसने देखा कि श्रीकृष्ण सत्यभामाजी के साथ गरुड़ पर आकाश में विराजमान हैं। तब उसने स्वयं भगवान् पर शतघ्नी शक्ति चलाई और उसके सैनिकों ने भी एक साथ अनेक अस्त्र-शस्त्रों से आक्रमण कर दिया।

श्रीकृष्ण ने अपने तीक्ष्ण बाणों से उन सभी अस्त्रों को नष्ट कर दिया। उनके बाणों से भौमासुर की सेना के सैनिकों के हाथ, पैर, गर्दन और धड़ कट-कटकर गिरने लगे। हाथी और घोड़े भी मारे जाने लगे।

गरुड़जी भी युद्ध में हाथियों पर टूट पड़े। अपने पंखों, चोंच और पंजों से उन्होंने हाथियों को घायल कर दिया, जिससे वे भयभीत होकर रणभूमि छोड़ भागने लगे। अब भौमासुर अकेला रह गया। उसने गरुड़जी पर एक अत्यन्त शक्तिशाली अस्त्र चलाया, पर उससे गरुड़जी को तनिक भी चोट नहीं पहुँची।

जब भौमासुर ने देखा कि उसकी कोई भी चाल सफल नहीं हो रही, तब उसने त्रिशूल उठाकर श्रीकृष्ण पर आक्रमण करना चाहा। लेकिन उससे पहले ही भगवान् ने अपने तीक्ष्ण सुदर्शन चक्र से उसका सिर काट डाला।

भौमासुर का मुकुट और कुण्डलों से सुशोभित सिर पृथ्वी पर गिर पड़ा। उसके सम्बन्धी विलाप करने लगे, जबकि ऋषि “साधु! साधु!” कहकर भगवान् की स्तुति करने लगे और देवताओं ने प्रसन्न होकर पुष्पवर्षा की।

भौमासुर के वध के बाद पृथ्वीदेवी श्रीकृष्ण के पास आयीं। उन्होंने प्रेमपूर्वक उनके गले में वैजयन्ती और वनमाला पहनायी तथा माता अदिति के रत्नजटित दिव्य कुण्डल, वरुण का छत्र और एक महामणि उन्हें समर्पित की।

जब पृथ्वीदेवीने भक्तिभावसे विनम्र होकर श्रीकृष्णकी स्तुति की, तब उन्होंने भगदत्तको अभयदान दिया और भौमासुरके ऐश्वर्यशाली महलमें प्रवेश किया।

भौमासुर द्वारा बंदी बनाई हुई 16100 राजकुमारियोंको श्रीकृष्ण ने किया मुक्त

वहाँ उन्होंने देखा कि भौमासुरने बलपूर्वक 16100 राजकुमारियोंको बंदी बनाकर रखा हुआ है। जब उन राजकुमारियोंने अन्तःपुरमें पधारे हुए श्रीकृष्णको देखा, तब वे उनके रूप, करुणा और दिव्य तेजसे मोहित हो गयीं। 

प्रत्येक राजकुमारीने मन-ही-मन यही संकल्प किया, “यदि विधाता कृपा करें, तो श्रीकृष्ण ही हमारे पति बनें।” इस प्रकार उन्होंने प्रेमपूर्वक अपना हृदय कृष्णको समर्पित कर दिया।

श्रीकृष्णने उन सबको सुन्दर वस्त्र और आभूषण पहनवाकर पालकियोंमें बैठाकर द्वारका भेज दिया। उनके साथ असंख्य रथ, घोड़े, खजाने और अतुल सम्पत्ति भी भेजी गयी। ऐरावतवंशी चौंसठ श्वेत, चार-दाँतोंवाले दिव्य हाथी भी द्वारका भेजे गये।

पारिजात पुष्प को श्रीकृष्ण स्वर्ग से द्वारिका ले आए

इसके बाद श्रीकृष्ण सत्यभामाके साथ अमरावती पहुँचे। वहाँ इन्द्र और इन्द्राणीने उनका आदरपूर्वक पूजन किया। श्रीकृष्णने माता अदितिके कुण्डल उन्हें लौटा दिये।

लौटते समय सत्यभामाजीकी इच्छा से श्रीकृष्णने पारिजात वृक्ष उखाड़ लिया और गरुड़पर रखकर द्वारका ले आये। इन्द्र तथा देवताओंने इसका विरोध किया, परन्तु श्रीकृष्णने उन्हें पराजित कर दिया। द्वारकामें सत्यभामाके महलके उद्यानमें वह पारिजात वृक्ष  स्थापित किया गया, जिससे वहाँकी शोभा और भी बढ़ गयी। उसके सुगन्धित मकरन्दके लोभी भौंरे भी स्वर्गसे द्वारका आ पहुँचे।

शुकदेवजी कहते हैं की जब इन्द्रको सहायता चाहिए थी, तब वे विनम्र होकर श्रीकृष्णके चरणोंमें झुके; परन्तु कार्य सिद्ध हो जानेपर उन्हींसे युद्ध करने लगे। यही धन और पदका अहंकार है।


इसके बाद श्रीकृष्णने अपनी योगमायासे एक साथ अनेक रूप धारण किये और सभी राजकुमारियोंके साथ अलग-अलग महलोंमें शास्त्रोक्त विधिसे विवाह किया। उन सभी महलोंमें अद्भुत वैभव और दिव्य सामग्री थी। श्रीकृष्ण प्रत्येक महलमें अपनी-अपनी पत्नीके साथ ऐसे विहार करते थे, जैसे कोई आदर्श गृहस्थ अपने परिवारके साथ प्रेमपूर्वक रहता हो।

ब्रह्मा आदि देवता भी जिनके वास्तविक स्वरूपको नहीं जान सकते, उन्हीं श्रीकृष्णको उन रानियोंने अपने पति रूपमें पाया था। वे प्रेम, लज्जा, मधुर मुसकान, चितवन और सेवा-भावसे निरन्तर उनका आनन्दपूर्वक सेवा-सत्कार करती रहती थीं।

यद्यपि प्रत्येक रानीके पास सैकड़ों दासियाँ थीं, फिर भी जब श्रीकृष्ण उनके महलमें आते, तब वे स्वयं आगे बढ़कर उनका स्वागत करतीं, आसन पर बिठातीं, चरण पखारतीं, पंखा झलतीं, चन्दन और इत्र लगातीं, पुष्पमालाएँ पहनातीं, भोजन करातीं और प्रेमपूर्वक उनकी सेवा करतीं।

सारांश: JKYog India Online Class- श्रीमद् भागवत कथा [हिन्दी]- 18.05.2026