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108- ब्रजरस में डूबे उद्धव: वृन्दावन की लता बनने की अभिलाषा

Apr 28th, 2026 | 8 Min Read
Blog Thumnail

Category: Bhagavat Purana

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Language: Hindi

श्रीमद्भागवत महापुराण- स्कन्ध: 10 अध्याय: 47-49

श्रीशुकदेवजी परीक्षित से कहते हैं की अपने प्रियतम श्रीकृष्ण का सन्देश सुनकर गोपियों को बड़ा आनन्द हुआ। उस सन्देश से उन्हें श्रीकृष्ण के स्वरूप और उनकी लीलाओं की याद आने लगी। प्रेम से भरकर उन्होंने उद्धवजी से कहा।

गोपियों ने कहा, “उद्धवजी! यह बड़े आनन्द की बात है कि कंस अपने साथियों सहित मारा गया और अब श्रीकृष्ण अपने बन्धु-बान्धवों के साथ सुख से रह रहे हैं। पर आप हमें यह बताइये, जैसे वे व्रज में हमसे प्रेम करते थे, क्या मथुरा की स्त्रियों से भी वैसे ही प्रेम करते हैं?”

एक गोपी बोली, “सखी! हमारे श्यामसुन्दर तो प्रेम की कला में निपुण हैं। नगर की स्त्रियाँ जब उनसे मीठी बातें करती होंगी और प्रेम से देखती होंगी, तब वे उन पर क्यों न मोहित होंगे?”

दूसरी गोपी बोली, “उद्धवजी! जब वे मथुरा में स्त्रियों के बीच बैठकर बातें करते होंगे, तब क्या कभी हम ग्वालिनों की भी याद करते हैं?”

कुछ गोपियों ने कहा, “क्या उन्हें वे शरदपूर्णिमा की रातें याद आती हैं, जब वृन्दावन में रास हुआ था?”

कुछ गोपियाँ बोलीं, “हम तो उनके विरह में जल रही हैं। क्या कभी वे यहाँ आकर हमें अपने स्पर्श से फिर जीवन देंगे?”

एक गोपी बोली, “अब तो वे राज्य पा चुके हैं और बड़े-बड़े राजाओं की पुत्रियों से विवाह करेंगे। फिर वे हम ग्वालिनों के पास क्यों आयेंगे?”

दूसरी ने कहा, “सखी! वे तो स्वयं लक्ष्मीपति हैं, उन्हें किसी से कुछ चाहिये नहीं। फिर भी हम उनसे आशा छोड़ नहीं पातीं। उनके लौटने की आशा ही हमारा जीवन है।”

फिर गोपियाँ बोलीं, “उद्धवजी! यह वही नदी है, वही पर्वत, वही वन और वही गौएँ हैं, जिनके बीच श्रीकृष्ण हमारे साथ रहते थे। यहाँ की हर धूल उनके चरणों से पवित्र है। इन्हें देखते ही हमें श्यामसुन्दर की याद आ जाती है। हम उन्हें कैसे भूल सकती हैं? उनकी मधुर चाल, हँसी, प्रेम भरी दृष्टि और वाणी ने हमारा मन ही ले लिया है। अब हमारा मन हमारे वश में नहीं है।

“हे श्यामसुन्दर! तुम ही हमारे जीवन के स्वामी हो। तुम लक्ष्मीपति हो, पर हमारे लिए तो व्रज के स्वामी हो। तुमने बार-बार हमारी रक्षा की है। यह सारा गोकुल, ग्वालबाल, माता-पिता, गौएँ और हम सब तुम्हारे विरह में दुखी हैं। गोविन्द! आओ और हमारी रक्षा करो।”

श्रीशुकदेवजी कहते हैं की श्रीकृष्ण का प्रिय सन्देश सुनकर गोपियों के विरह की व्यथा कुछ शान्त हो गयी। वे समझ गयीं कि भगवान श्रीकृष्ण इन्द्रियों से परे हैं और सबके आत्मा के रूप में सर्वत्र स्थित हैं। तब वे बड़े प्रेम और आदर से उद्धवजी का सत्कार करने लगीं।

उद्धवजी कई महीनों तक व्रज में ही रहे। वे कभी नदी के किनारे जाते, कभी वनों में घूमते और कभी गिरिराज की घाटियों में विचरते। वे फूलों से भरे वृक्षों के बीच जाकर व्रजवासियों से पूछते, “यहाँ श्रीकृष्ण ने कौन-सी लीला की थी?” इस प्रकार वे सबको बार-बार श्रीकृष्ण की लीलाओं का स्मरण कराते।

व्रज में रहकर उद्धवजी ने गोपियों का यह गहरा प्रेम और विरह देखा। उनकी यह अवस्था देखकर वे प्रेम और आनन्द से भर गए। तब उन्होंने गोपियों को नमस्कार करते हुए कहा,
“इस पृथ्वी पर गोपियों का जन्म लेना ही सबसे श्रेष्ठ और सफल है, क्योंकि वे सर्वात्मा भगवान श्रीकृष्ण के परम प्रेम में स्थित हैं। प्रेम की यह अवस्था बड़े-बड़े मुनियों, मुक्त पुरुषों और भक्तों के लिए भी अभी चाहने योग्य है, पर हमें भी यह सहज नहीं मिलती। 

“जिसे श्रीकृष्ण की लीलाओं का रस मिल गया, उसके लिए कुल, संस्कार या बड़े यज्ञों का क्या महत्व रह जाता है? और यदि भगवान की कथा में रुचि ही न हो, तो ऊँचे पद प्राप्त करने से भी क्या लाभ?

“देखो, ये साधारण ग्वालिनें हैं, जिन्हें न शास्त्र का ज्ञान है न कोई बड़ा संस्कार; फिर भी इन्हें श्रीकृष्ण में ऐसा अनन्य प्रेम है। इससे सिद्ध होता है कि यदि कोई भगवान के स्वरूप को पूरी तरह न भी जाने, फिर भी सच्चे मन से उनसे प्रेम करे, तो भगवान अपनी कृपा से उसका कल्याण कर देते हैं; जैसे कोई अनजाने में भी अमृत पी ले तो वह उसे अमर कर देता है। 

“रासलीला के समय भगवान श्रीकृष्ण ने इन व्रजांगनाओं को जो कृपा और प्रेम दिया, वैसा प्रेम उनकी वक्षःस्थल पर विराजमान लक्ष्मीजी को भी नहीं मिला। देवांगनाओं को भी नहीं मिला, फिर अन्य स्त्रियों की तो बात ही क्या है।”
आसामहो चरणरेणुजुषामहं स्यां।
वृन्दावने किमपि गुल्मलतौषधीनाम्।

या दुस्त्यजं स्वजनमार्यपथं च हित्वा।
भेजुर्मुकुन्दपदवीं श्रुतिभिर्विमृग्याम् ।।
वृंदावन की गोपियों ने (श्री कृष्ण के प्रति) अपने प्रगाढ़ प्रेम और भक्ति में अपने पतियों, बच्चों और अन्य परिवारजनों का संग त्याग दिया- वे संबंध, जिन्हें त्यागना अत्यंत कठिन है। उन्होंने अपनी मर्यादा और पतिव्रता धर्म तक का भी त्याग कर, केवल श्रीकृष्ण के कमल चरणों की शरण ली, जिन्हें केवल गहन वैदिक ज्ञान से ही समझा जा सकता है। मेरी तीव्र इच्छा है कि मैं वृंदावन के पौधों, झाड़ियों, या लताओं के रूप में जन्म लूँ, क्योंकि वे इतने सौभाग्यशाली हैं कि गोपियाँ जब उन पर चलती हैं, तो उनके पद रज को प्राप्त करते हैं। (भागवत 10.47.61)

स्वयं भगवती लक्ष्मीजी जिनकी पूजा करती रहती हैं; ब्रह्मा, शंकर आदि परम समर्थदेवता, पूर्णकाम आत्माराम और बड़े-बड़े योगेश्वर अपने हृदयमें जिनका चिन्तन करते रहते हैं, भगवान् श्रीकृष्णके उन्हीं चरणारविन्दोंको रास-लीलाके समय गोपियोंने अपने वक्षःस्थलपर रखा और उनका आलिंगन करके अपने हृदयकी जलन, विरह-व्यथा शान्त की।
वन्दे नन्दव्रजस्त्रीणां पादरेणुमभीक्ष्णशः।
यासां हरिकथोद्गीतं पुनाति भुवनत्रयम् ।।
नंद महाराज के गोकुल की उन गोपियों के पवित्र पद रज को मैं बारंबार नमन करता हूँ। प्रेम भरे उनके हृदय जब श्रीकृष्ण की महिमा को ऊँचे स्वर में गाते हैं, तो उनके भजनों की अलौकिक ध्वनियाँ तीनों लोकों को पवित्र कर देती है। (भागवत 10.47.63)

कई महीनों तक व्रज में रहकर जब उद्धवजी मथुरा जाने लगे, तब नन्दबाबा और अन्य गोप बहुत-सी भेंट लेकर आए और प्रेम से भरे हुए बोले कि हमारा मन, वाणी और शरीर सदा श्रीकृष्ण की सेवा और स्मरण में लगे रहें। हम मोक्ष भी नहीं चाहते; चाहे किसी भी योनि में जन्म मिले, बस हमारी श्रीकृष्ण के प्रति प्रीति निरन्तर बढ़ती रहे।

उद्धवजी मथुरा पहुँचे, वहाँ भगवान् श्रीकृष्ण को प्रणाम किया और व्रजवासियों की प्रेमभक्ति का वर्णन सुनाया।
माधो! धन्य धन्य ब्रजनार।
जिनके रोम रोम महँ उरझानो, सगुण ब्रह्म साकार।
सात्त्विक भाव आठहुँ इनके, प्रकटत नित इकसार।
सहज समाधि सदा इन सब की, गयों देखि बलिहार।
इनहीं चेतनाचेतन सब जग, दीखत नन्दकुमार।
कवि ‘कृपालु’ हम लता बिटप बनि, चरणधूरि सिर धार।।

श्रीकृष्ण गए कुब्जा के घर

कुछ समय के पश्चात भगवान श्रीकृष्ण, कुब्जा को प्रसन्न करने उद्धवजी को साथ लिये उसके घर गये। कुब्जा ने बड़े आदर और भक्ति से उनका स्वागत और पूजा की। पिछले समय में भगवान को अंगराग अर्पित करने के उस छोटे से सेवा-भाव के फलस्वरूप उसे यह दुर्लभ अवसर मिला कि वह भगवान के चरणों का स्पर्श और उनकी कृपा प्राप्त कर सके।

परन्तु भगवान को पाकर भी कुब्जा ने उनसे व्रज की गोपियों की तरह निरन्तर सेवा का वर नहीं माँगा; उसने केवल इतना निवेदन किया कि भगवान कुछ समय उसके साथ रहें और उसे उनका सान्निध्य मिल जाए। भगवान श्रीकृष्ण ने उसका मान रखा, उसकी भावना स्वीकार की और फिर उद्धवजी के साथ अपने घर लौट आये।

श्रीकृष्ण ने अक्रूरजी को पांडवों का खबर लेने हस्तिनापुर भेजा

एक दिन भगवान् श्रीकृष्ण, बलरामजी और उद्धवजी अक्रूरजी की इच्छा पूर्ण करने तथा उनसे कुछ कार्य लेने के लिए उनके घर गये। अक्रूरजी ने भगवान का यथोचित सत्कार किया और अंत में विनती की कि कृपा करके हमारे इस मोह-बन्धन को काटकर हमें मुक्त कीजिये।
श्रीकृष्ण मुस्कराकर उनसे बोले कि आप हमारे गुरु, हितैषी और चाचा हैं; हम तो आपके बालक हैं। जो मनुष्य अपना कल्याण चाहता है, उसे आप जैसे महाभाग संतों की सेवा करनी चाहिए, क्योंकि संत देवताओं से भी श्रेष्ठ होते हैं और उनके दर्शन मात्र से ही मनुष्य पवित्र हो जाता है।

फिर भगवान् श्रीकृष्ण ने उनसे कहा कि आप हमारे सुहृद हैं, इसलिए हस्तिनापुर जाकर पाण्डवों का कुशल-क्षेम जानिए। पाण्डु के निधन के बाद कुन्ती और पाण्डव बहुत दुःख में हैं और धृतराष्ट्र के अधीन रहते हुए दुर्योधन के कारण उन्हें उचित व्यवहार नहीं मिल रहा। अतः आप वहाँ जाकर उनकी स्थिति जानें; आपके द्वारा समाचार मिलने पर मैं ऐसा उपाय करूँगा जिससे पाण्डवों को सुख मिले। ऐसा आदेश देकर भगवान् श्रीकृष्ण बलरामजी और उद्धवजी के साथ अपने घर लौट आये।

अक्रूरजी भगवान् की आज्ञा से हस्तिनापुर पहुँचे और वहाँ धृतराष्ट्र, भीष्म, विदुर, कुन्ती, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, कर्ण, दुर्योधन तथा पाँचों पाण्डवों से मिले। उन्होंने सबका कुशल-क्षेम पूछा और कुछ समय वहीं रहकर यह जानने का प्रयास किया कि धृतराष्ट्र पाण्डवों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं। उन्हें ज्ञात हुआ कि दुर्योधन आदि पाण्डवों से ईर्ष्या करते हैं और कई बार उनके साथ अन्याय कर चुके हैं।

कुन्ती ने अक्रूरजी को देखकर अपने मायके और भगवान् श्रीकृष्ण को स्मरण किया और दुःख से भरकर प्रार्थना की कि वे आकर उसे और उसके अनाथ बच्चों को रक्षा और सांत्वना दें। अक्रूरजी और विदुरजी ने उसे समझाकर धैर्य दिया कि उसके पुत्र अधर्म का नाश करने के लिए जन्मे हैं। मथुरा लौटने से पहले अक्रूरजी ने कौरव सभा में धृतराष्ट्र को समझाया कि वे धर्मपूर्वक राज्य करें और अपने पुत्रों तथा पाण्डवों के साथ समान व्यवहार करें, क्योंकि संसार में सब कुछ नश्वर है और पक्षपात अंततः विनाश का कारण बनता है।

धृतराष्ट्र ने स्वीकार किया कि अक्रूरजी की बातें सत्य हैं, परन्तु पुत्र-मोह के कारण उनका मन स्थिर नहीं रह पाता। अंत में अक्रूरजी मथुरा लौटकर भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी को हस्तिनापुर की सारी स्थिति बता दी।

सारांश: JKYog India Online Class- श्रीमद् भागवत कथा [हिन्दी]- 16.03.2026