श्रीमद्भागवत महापुराण- स्कन्ध: 10 अध्याय: 46-47
शूरसेन के वसुदेव, देवभाग, उपदेश, परिजात आदि कई पुत्र हुए। उनमे से वसुदेव के पुत्र श्रीकृष्ण और देवभाग के पुत्र उद्धव हुए। चचेरे भाई होने के साथ-साथ उद्धव कृष्ण के परम सखा और मन्त्री भी थे। वे बृहस्पतिजी के शिष्य तथा परम ज्ञानी थे।
एक दिन भगवान् श्रीकृष्ण ने स्नेहपूर्वक उनका हाथ पकड़कर उन्हें व्रज जाने के लिए कहा। उन्होंने कहा कि नन्दबाबा और यशोदा मैया को सान्त्वना देना और गोपियों को मेरा सन्देश सुनाकर उनके विरह-दुःख को कम करना।
श्रीकृष्ण कहते हैं कि गोपियों का मन, प्राण और जीवन सब कुछ उन्हीं में लगा हुआ है। उनके प्रेम में उन्होंने अपने पति, पुत्र और अन्य सभी सांसारिक सम्बन्धों का त्याग कर दिया है और श्रीकृष्ण को अपना प्रियतम ही नहीं, बल्कि अपना आत्मा मान लिया है।
श्रीकृष्ण बताते हैं कि उनके मथुरा चले आने से गोपियाँ विरह से अत्यन्त व्याकुल हो रही हैं, उन्हें स्मरण करके बार-बार मूर्छित हो जाती हैं और निरन्तर उनके दर्शन की उत्कण्ठा में रहती हैं। वे केवल इस आशा से अपने प्राण सँभाले हुए हैं कि श्रीकृष्ण ने उनसे कहा था, “मैं अवश्य आऊँगा।”
भगवान् श्रीकृष्ण का सन्देश लेकर उद्धवजी रथ से नन्दगाँव पहुँचे। उस समय सायंकाल था और वन से गौएँ लौट रही थीं, जिनके खुरों से उड़ती धूल से वातावरण भर गया था। व्रज में गौएँ और बछड़े, मतवाले साँड़, तथा गाय दुहने की ध्वनि और बाँसुरी की मधुर टेर से अत्यन्त मनोहर वातावरण बना हुआ था।
गोप और गोपियाँ श्रीकृष्ण और बलराम के मंगलमय चरित्रों का गान कर रहे थे। घरों में अग्नि, देवता, गौ, ब्राह्मण और अतिथियों की पूजा हो रही थी, धूप और दीप से पूरा व्रज सुगन्धित और प्रकाशमय था। चारों ओर फूलों से लदे वन, चहकते पक्षी, गुंजार करते भौंरे तथा कमलों से सजे जलाशयों के कारण व्रजभूमि अत्यन्त सुन्दर और रमणीय दिखाई दे रही थी।
उद्धवजी मिले नन्दबाबा-यशोदा मैया से
जब उद्धवजी व्रज पहुँचे, तब नन्दबाबा उन्हें देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्हें गले लगाकर ऐसा सम्मान किया मानो स्वयं श्रीकृष्ण आ गये हों। उन्होंने प्रेमपूर्वक उनका सत्कार किया, उत्तम भोजन कराया और सेवकों से उनकी थकान दूर कराई।
इसके बाद नन्दबाबा ने उनसे वसुदेवजी और उनके परिवार की कुशलता के बारे में पूछा। साथ ही उन्होंने कहा कि कंस का अपने अनुयायियों सहित मारा जाना उचित ही हुआ, क्योंकि वह धर्मात्मा यदुवंशियों से सदैव द्वेष करता था।
नन्दबाबा उद्धवजी से अत्यन्त स्नेह और विरहभाव से पूछते हैं कि क्या श्रीकृष्ण कभी व्रज, अपने माता-पिता, सखाओं, गोपों, गौओं, वृन्दावन और गोवर्धन को याद करते हैं। वे यह भी पूछते हैं कि क्या गोविन्द एक बार फिर व्रज आकर अपने प्रियजनों को दर्शन देंगे।
फिर नन्दबाबा उद्धव को एक-एक करके श्रीकृष्ण की लीलाओं का वर्णन करते हुए कहते हैं कि उन्होंने अनेक बार दावानल, आँधी-पानी और भयानक दैत्यों से व्रजवासियों की रक्षा की थी। उनके हास्य, मधुर वचन और चितवन का स्मरण करते-करते व्रजवासी इतने तन्मय हो जाते हैं कि उनसे कोई काम भी नहीं हो पाता।
व्रज के प्रत्येक स्थान, यमुना, गोवर्धन, वन और श्रीकृष्ण के चरणचिह्न आदि उन्हें निरन्तर कृष्ण की याद दिलाते हैं। नन्दबाबा स्वीकार करते हैं कि श्रीकृष्ण और बलराम साधारण नहीं, बल्कि दिव्य पुरुष हैं, जिन्होंने कंस, कुवलयापीड और अनेक दैत्यों का सहज ही वध किया तथा गोवर्धन को उठाकर व्रज की रक्षा की।
नन्दबाबा श्रीकृष्ण की लीलाओं का स्मरण करते-करते गहरे प्रेम और विरह में डूब जाते हैं। उनकी उत्कण्ठा इतनी बढ़ जाती है कि वे भाव-विह्वल होकर बोल नहीं पाते। यशोदा मैया भी यह सब सुनकर अत्यन्त भावुक हो जाती हैं; उनके नेत्रों से आँसू बहने लगते हैं।
नन्दबाबा और यशोदा मैया के हृदय में श्रीकृष्ण के प्रति ऐसा गहरा प्रेम देखकर उद्धवजी अत्यन्त आनन्दित होते हैं और उनसे बात करने लगते हैं। उद्धवजी कहते हैं कि आप दोनों अत्यन्त भाग्यशाली हैं, क्योंकि समस्त सृष्टि के कारण भगवान् नारायण के प्रति आपके हृदय में सच्चा वात्सल्यभाव है। श्रीकृष्ण और बलराम ही सृष्टि के मूल कारण और सबके जीवनदाता हैं। जो व्यक्ति मृत्यु के समय भी एक क्षण के लिए भगवान् का स्मरण करता है, वह कर्मबंधन से मुक्त होकर परमगति को प्राप्त करता है। उद्धवजी दोनों को आश्वासन देते हैं कि श्रीकृष्ण शीघ्र ही व्रज आएँगे।
उद्धवजी नन्दबाबा और यशोदा मैया को समझाते हैं कि श्रीकृष्ण सर्वव्यापी परमात्मा हैं, जो सभी प्राणियों के हृदय में सदैव विद्यमान रहते हैं। वे किसी के प्रति विशेष प्रिय या अप्रिय नहीं होते, क्योंकि वे सबके प्रति समान हैं और जन्म, देह या सांसारिक सम्बन्धों से परे हैं। यद्यपि भगवान् अजन्मा और गुणातीत हैं, फिर भी वे साधुओं की रक्षा और लीला के लिए विभिन्न योनियों में अवतार लेकर सृष्टि की रचना, पालन और संहार करते हैं। जीव अज्ञानवश अपने को कर्ता मान लेता है, जबकि वास्तविक कर्ता परमात्मा ही हैं।
उद्धवजी कहते हैं कि श्रीकृष्ण केवल नन्द-यशोदा के पुत्र ही नहीं, बल्कि समस्त प्राणियों के आत्मा, पिता, माता और स्वामी हैं। वास्तव में इस जगत में जो कुछ भी दिखाई देता है, वह सब भगवान् श्रीकृष्ण से ही व्याप्त है और वही परम सत्य हैं।
उद्धवजी मिले गोपियों से
उद्धवजी और नन्दबाबा रातभर श्रीकृष्ण की बातें करते रहे। प्रातःकाल गोपियाँ उठकर घरों की सफाई करती हैं, दीपक जलाकर पूजन करती हैं और दही मथते हुए श्रीकृष्ण की मधुर लीलाओं का गान करने लगती हैं।
सूर्योदय के समय गोपियाँ देखती हैं कि नन्दबाबा के द्वार पर एक स्वर्ण रथ खड़ा है। वे आपस में चर्चा करने लगती हैं कि यह किसका रथ है। कुछ गोपियाँ अनुमान करती हैं कि शायद वही अक्रूर फिर आ गया है, जो पहले श्रीकृष्ण को मथुरा ले गया था। किसी दूसरी गोपीने कहा, 'क्या अब वह हमें ले जाकर कंसका पिण्डदान करेगा? अब यहाँ उसके आनेका और क्या प्रयोजन हो सकता है?’
व्रजवासिनी स्त्रियाँ इसी प्रकार आपसमें बातचीत कर रही थीं कि उसी समय नित्यकर्मसे निवृत्त होकर उद्धवजी आ पहुँचे। गोपियों ने देखा कि उद्धवजी का रूप और वेश श्रीकृष्ण से बहुत मिलता-जुलता है—लंबी भुजाएँ, कमल के समान नेत्र, पीताम्बर, पुष्पमाला और कानों में कुण्डल। उन्हें देखकर गोपियाँ आश्चर्य करने लगीं कि यह सुन्दर पुरुष कौन है और किसका दूत बनकर आया है।
जब उन्हें पता चला कि वे श्रीकृष्ण के सखा और उनका सन्देश लेकर आए हैं, तब गोपियाँ अत्यन्त उत्सुक हो गईं। उन्होंने विनम्रता, मधुर वाणी और सलज्ज मुस्कान से उद्धवजी का आदर किया, उन्हें एकान्त में आसन पर बैठाया और उनसे श्रीकृष्ण के समाचार पूछने लगीं।
गोपियाँ कहती हैं, “उद्धवजी! हम जानती हैं कि आप यदुनाथके पार्षद हैं। उन्हींका संदेश लेकर यहाँ पधारे हैं। आपके स्वामीने अपने माता-पिताको सुख देनेके लिये आपको यहाँ भेजा है। अन्यथा हमें तो अब इस नन्दगाँवमें उनके स्मरण करने योग्य कोई भी वस्तु दिखायी नहीं पड़ती।
माता-पिता आदि सगे-सम्बन्धियोंका स्नेह-बन्धन तो बड़े-बड़े ऋषि-मुनि भी बड़ी कठिनाईसे छोड़ पाते हैं। दूसरों के साथ जो प्रेम-सम्बन्धका स्वाँग किया जाता है, वह तो किसी-न-किसी स्वार्थके लिये ही होता है। जैसे भौंरे और फूल, वेश्या और ग्राहक, राजा और प्रजा, शिष्य और आचार्य आदि। जब स्वार्थ समाप्त हो जाता है, तो लोग भी साथ छोड़ देते हैं।”
गोपियों का मन, वाणी और शरीर पूर्ण रूप से श्रीकृष्ण में ही लीन था। जब उद्धवजी श्रीकृष्ण का सन्देश लेकर व्रज आए, तब गोपियाँ अपने विरह और प्रेम में इतनी डूब गईं कि उन्हें यह भी ध्यान नहीं रहा कि किसके सामने क्या कहना चाहिए। श्रीकृष्ण की बाल्य और किशोर लीलाओं का स्मरण करते-करते वे उनका गान करने लगीं। प्रेम और विरह में आत्मविस्मृत होकर वे अपनी लज्जा भी भूल गईं और फूट-फूटकर रोने लगीं।
एक गोपीको श्रीकृष्णके मिलनकी लीलाका स्मरण कर रही थी की उसी समय उसने देखा कि पास ही एक भौंरा गुनगुना रहा है। उसने ऐसा समझा मानो मुझे रूठी हुई समझकर श्रीकृष्णने मनानेके लिये दूत भेजा हो। वह गोपी भौंरेसे इस प्रकार कहने लगी:
भ्रमर गीत
गोप्युवाच
मधुप कितवबन्धो मा स्पृशङ्घ्रिं
सपत्न्याः कुचविलुलितमालाकुङ्कुमश्मश्रुभिर्नः
वहतु मधुपतिस्तन्मानिनीनां प्रसादं यदुसदसि
विडम्ब्यं यस्य दूतस्त्वमीदृक् ॥
गोपीने कहा, “रे मधुप! तू कपटीका सखा है; इसलिये तू भी कपटी है। तू हमारे पैरोंको मत छु। झूठे प्रणाम करके हमसे अनुनय-विनय मत कर। हम देख रही हैं कि श्रीकृष्णकी जो वनमाला हमारी सौतोंके वक्षःस्थलके स्पर्शसे मसली हुई है, उसका पीला-पीला कुंकुम तेरी मूछोंपर भी लगा हुआ है। तू स्वयं भी तो किसी कुसुमसे प्रेम नहीं करता, यहाँ-से-वहाँ उड़ा करता है। जैसे तेरे स्वामी, वैसा ही तू! मधुपति श्रीकृष्ण मथुराकी मानिनी नायिकाओंको मनाया करें, उनका वह कुंकुमरूप कृपा-प्रसाद, जो युदवंशियोंकी सभामें उपहास करनेयोग्य है, अपने ही पास रखें। उसे तेरे द्वारा यहाँ भेजनेकी क्या आवश्यकता है? (भागवत 10.47.12)
“तुम उनके गुण गाकर हमें मत मनाओ। हम उन्हें अच्छी तरह जानती हैं। वे अपनी मधुर मुस्कान और मीठी बातों से सबका मन मोह लेते हैं। लक्ष्मीजी भी उनके चरणों की सेवा करती हैं, फिर हम तो उनके लिए कुछ भी नहीं हैं।
“फिर भी एक बात है, जो उनके प्रेम और लीलाओं का थोड़ा-सा रस भी चख लेता है, वह उन्हें भूल नहीं पाता। यही हमारी अवस्था है। हम चाहकर भी उनका स्मरण छोड़ नहीं सकतीं।
अच्छा, यह बताओ कि क्या श्रीकृष्ण मथुरा में सुख से हैं? क्या उन्हें कभी नन्दबाबा, यशोदा मैया, ग्वालबाल और हमारी भी याद आती है? क्या कभी ऐसा समय आएगा जब वे फिर से आकर हमसे मिलेंगे?”
शुकदेवजी परीक्षित् से कहते हैं कि गोपियाँ भगवान् श्रीकृष्ण के दर्शन के लिए अत्यन्त व्याकुल थीं और विरह में तड़प रही थीं। उनकी यह दशा देखकर उद्धवजी उन्हें सांत्वना देते हुए कहते हैं कि हे गोपियो! तुम सचमुच धन्य और कृतकृत्य हो, क्योंकि तुमने अपना हृदय और सर्वस्व भगवान् श्रीकृष्ण को समर्पित कर दिया है।
दान, व्रत, तप, जप, ध्यान आदि अनेक साधन केवल इसी उद्देश्य से किए जाते हैं कि भगवान् की भक्ति प्राप्त हो। परन्तु तुमने वह सर्वोच्च प्रेमभक्ति पा ली है, जो बड़े-बड़े ऋषि-मुनियों के लिए भी दुर्लभ है।
उद्धवजी कहते हैं कि तुमने पुत्र, पति, देह और घर तक का त्याग कर पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण को ही अपना सर्वस्व माना है। उनके वियोग ने तुम्हारे भीतर ऐसा भाव जगा दिया है कि तुम हर जगह उसी परमात्मा का दर्शन करती हो। मैं भगवान् श्रीकृष्ण का दूत बनकर आया हूँ और तुम्हारे प्रियतम ने तुम्हें सांत्वना देने के लिए जो संदेश भेजा है, वही अब तुम्हें सुनाता हूँ।
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं, “मैं सबका आत्मा हूँ और सबमें स्थित हूँ, इसलिए मुझसे तुम्हारा कभी भी वास्तविक वियोग नहीं हो सकता। जैसे आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी से ही सभी भौतिक वस्तुएँ बनी हैं और वे सबमें व्याप्त हैं, वैसे ही मन, प्राण, इन्द्रियाँ और उनके विषय सब मुझमें स्थित हैं। मैं ही सबके रूप में प्रकट हो रहा हूँ।
“अपनी माया के द्वारा मैं ही इस जगत की रचना करता हूँ, उसका पालन करता हूँ और समय आने पर उसे समेट भी लेता हूँ। आत्मा वास्तव में माया और उसके कार्यों से अलग है। वह शुद्ध ज्ञानस्वरूप है और किसी गुण से बँधी नहीं है।
“मनुष्य को समझना चाहिए कि जैसे स्वप्न में दिखाई देने वाली वस्तुएँ वास्तविक नहीं होतीं, वैसे ही जाग्रत अवस्था में दिखाई देने वाले विषय भी नश्वर हैं। इसलिए मन और इन्द्रियों को इन विषयों से हटाकर मेरा स्मरण करना चाहिए। जैसे सभी नदियाँ अंत में समुद्र में मिल जाती हैं, वैसे ही वेदाध्ययन, योग, तप, त्याग, इन्द्रियसंयम और सत्य जैसे सभी साधन अंत में मेरी ही प्राप्ति तक पहुँचाते हैं।
“गोपियो! मैं तुम्हारे जीवन का आधार हूँ। मैं तुमसे दूर इसलिए रहता हूँ कि तुम निरन्तर मेरा ध्यान कर सको। जब प्रिय दूर होता है, तब उसका स्मरण और भी गहरा हो जाता है। इसलिए अपने सम्पूर्ण मन को मुझमें लगाकर मेरा स्मरण करो। ऐसा करने से तुम शीघ्र ही मुझे प्राप्त कर लोगी।
“कल्याणियो! जिस समय मैंने वृन्दावनमें शारदीय पूर्णिमाकी रात्रिमें रास-क्रीडा की थी उस समय जो गोपियाँ स्वजनोंके रोक लेनेसे व्रजमें ही रह गयीं, वे मेरी लीलाओंका स्मरण करनेसे ही मुझे प्राप्त हो गयी थीं। तुम्हें भी मैं मिलूँगा अवश्य, निराश होनेकी कोई बात नहीं है।"
सारांश: JKYog India Online Class- श्रीमद् भागवत कथा [हिन्दी]- 13.03.2026