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104- अक्रूरजी को कृष्ण ने दिखया अपना दिव्य स्वरूप: मथुरा में धोबी का उद्धार, दर्जी, माली और कुब्जा पर कृपा

Mar 5th, 2026 | 9 Min Read
Blog Thumnail

Category: Bhagavat Purana

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Language: Hindi

श्रीमद्भागवत महापुराण- स्कन्ध: 10 अध्याय: 39-41

ब्रज से निकलकर श्रीकृष्ण, बलरामजी और अक्रूरजी तेज गति से रथ पर बैठकर यमुनाजी के तट पर पहुँचे। वहाँ उन्होंने हाथ-मुँह धोया और यमुनाजी का शीतल, मधुर जल पिया। इसके बाद बलरामजीके साथ भगवान् वृक्षोंके झुरमुटमें खड़े रथपर सवार हो गये। अक्रूरजी यमुनाजीके कुण्ड (अनन्त–तीर्थ या ब्रह्मह्रद) पर आकर स्नान करनेके बाद वे जल में डुबकी लगाकर गायत्रीका जप करने लगे।

उसी समय अक्रूरजी को जल के भीतर श्रीकृष्ण और बलरामजी दिखाई दिए। यह देखकर अक्रूरजी चकित हो गये। उन्होंने जल से सिर बाहर निकालकर देखा। परन्तु उन्होंने पाया कि श्रीकृष्ण और बलरामजी रथ पर पहले की तरह ही बैठे हैं। इससे वे और भी आश्चर्य में पड़ गये। उन्होंने सोचा कि शायद जल में जो देखा, वह भ्रम था। यह सोचकर उन्होंने फिर से जल में डुबकी लगायी।

अक्रूरजी ने जब फिर से जल में डुबकी लगायी, तब उन्होंने अद्भुत दिव्य दृश्य देखा। उन्होंने देखा कि अनन्तदेव श्रीशेषजी वहाँ विराजमान हैं और सिद्ध, गन्धर्व, देवता आदि उनकी स्तुति कर रहे हैं। उनके हजार फण थे और प्रत्येक फण पर मुकुट सुशोभित था।

शेषजी की गोद में श्यामसुन्दर भगवान् श्रीकृष्ण विराजमान थे। उन्होंने पीताम्बर धारण किया हुआ था और उनका चतुर्भुज रूप अत्यन्त शान्त और दिव्य था। उनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म शोभा पा रहे थे। उनके वक्षःस्थल पर श्रीवत्स चिह्न था, गले में कौस्तुभ मणि और वनमाला थी। 

अक्रूरजी ने देखा कि ब्रह्मा, शिव, नारद, सनकादि ऋषि, प्रह्लाद तथा अनेक देवता और भक्त भगवान् की स्तुति कर रहे हैं। लक्ष्मीजी सहित भगवान् की अनेक दिव्य शक्तियाँ भी उनकी सेवा में उपस्थित थीं।

यह दिव्य दर्शन देखकर अक्रूरजी का हृदय आनन्द से भर गया। उनका शरीर रोमांचित हो गया और नेत्रों से प्रेमाश्रु बहने लगे। वे अत्यन्त भावविभोर होकर भगवान् के चरणों में गिर पड़े और हाथ जोड़कर श्रद्धा से उनकी स्तुति करने लगे।

अक्रूरजी भगवान् को प्रणाम करते हुए कहते हैं कि आप ही समस्त कारणों के परम कारण, अविनाशी पुरुषोत्तम नारायण हैं। ब्रह्मा, प्रकृति, महत्तत्त्व, पंचमहाभूत, इन्द्रियाँ, उनके विषय और समस्त देवता—सब आपके ही अंश हैं। सम्पूर्ण जगत आपके द्वारा ही संचालित है, परन्तु आप उससे सर्वथा निर्लिप्त और साक्षी हैं।

विभिन्न मार्गों जैसे कर्म, ज्ञान, योग, वैष्णव पद्धति, शिवमार्ग अथवा अन्य देवताओं की उपासना से लोग अंततः आपकी ही आराधना करते हैं। जैसे सभी नदियाँ घूम-फिरकर समुद्र में मिलती हैं, वैसे ही सभी उपासना-पथ अंततः आपमें आकर मिलते हैं।

आप सत्त्व, रज और तम गुणों से परे हैं। यह समस्त सृष्टि गुणों से बंधी है, पर आप उनसे अछूते हैं। सम्पूर्ण विश्व को आपके विराट् स्वरूप के रूप में देखा जा सकता है—अग्नि आपका मुख, सूर्य-चन्द्र आपके नेत्र, पृथ्वी आपके चरण आदि।

आप ही मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, चतुर्व्यूह, बुद्ध और कल्कि आदि विभिन्न अवतार धारण कर संसार के शोक-मोह का नाश करते हैं।

अक्रूरजी स्वीकार करते हैं कि जीव आपकी माया से मोहित होकर ‘मैं’ और ‘मेरा’ के अहंकार में भटकता है। वे स्वयं भी देह-गेह को सत्य मानकर अज्ञान में पड़े रहे। इन्द्रियाँ और मन उन्हें विषयों की ओर खींचते रहे।

अन्त में वे कहते हैं कि अब मैं आपके चरणों में आया हूँ। आप ही ज्ञानस्वरूप, ब्रह्म और समस्त शक्तियों के अधिष्ठान हैं। प्रभो! मेरी रक्षा कीजिए।

श्रीशुकदेवजी परीक्षित् से कहते हैं कि जब अक्रूरजी भगवान् की स्तुति कर रहे थे, तब श्रीकृष्ण ने उन्हें जल में अपना दिव्य, विराट् रूप दिखाया और फिर उसे वैसे ही छिपा लिया जैसे कोई नट अभिनय के बाद अपना रूप परदे के पीछे छिपा ले।

दिव्य दर्शन लुप्त होने पर अक्रूरजी अत्यन्त विस्मित होकर जल से बाहर आए, अपने नित्य कर्म शीघ्रता से पूरे किए और रथ पर लौट आए।

श्रीकृष्ण मुस्कराकर पूछते हैं, “चाचाजी, क्या आपने पृथ्वी, आकाश या जल में कोई अद्भुत वस्तु देखी है? आपकी मुद्रा तो कुछ ऐसा ही संकेत कर रही है।”

अक्रूरजी विनम्र भाव से उत्तर देते हैं, “प्रभो! पृथ्वी, आकाश, जल या समस्त जगत में जितने भी अद्भुत पदार्थ हैं, वे सब आपमें ही समाए हुए हैं। आप ही विश्वरूप हैं। जब मैंने आपको देख लिया, तब ऐसा क्या शेष रह गया जिसे देखना बाकी हो? आपमें सब कुछ है, फिर अलग से कोई अद्भुत वस्तु देखने की बात ही क्या है?”

अक्रूरजी रथ हाँकते हुए श्रीकृष्ण और बलरामजी को लेकर सायंकाल तक मथुरापुरी पहुँच जाते हैं।

मार्ग में जहाँ-जहाँ से रथ गुजरता है, गाँवों के लोग दर्शन के लिये उमड़ पड़ते हैं। श्रीकृष्ण और बलरामजी की छवि देखकर वे आनन्द में डूब जाते हैं और एकटक निहारते रह जाते हैं, मानो दृष्टि हट ही न सके।

नन्दबाबा और अन्य व्रजवासी पहले ही मथुरा पहुँचकर नगर के बाहर उपवन में उनकी प्रतीक्षा कर रहे होते हैं। वहाँ पहुँचकर श्रीकृष्ण ने अक्रूरजी कहा, “चाचाजी, आप रथ लेकर पहले नगर में प्रवेश कीजिये और अपने घर जाइये। हम लोग यहीं उतरकर बाद में मथुरा का दर्शन करने आयेंगे।”
अक्रूरजी कहते हैं, “प्रभो! मैं आपके बिना मथुरा में प्रवेश नहीं कर सकता।कृपा करके बलरामजी, ग्वालबालों और नन्दरायजी के साथ मेरे घर चलें और अपने चरणों की धूलि से उसे पवित्र करें।”

तब भगवान् कहते हैं, “चाचाजी! मैं दाऊ भैया के साथ आपके घर अवश्य आऊँगा। पहले इस यदुवंश के द्रोही कंस का वध कर लूँ, फिर अपने सभी सुहृदों को प्रसन्न करूँगा।”
इस प्रकार कहनेपर अक्रूरजी कुछ अनमने-से हो गये। उन्होंने पुरीमें प्रवेश करके कंससे श्रीकृष्ण और बलरामके ले आनेका समाचार निवेदन किया और फिर अपने घर गये ।

श्रीकृष्ण ने किया मथुरा में प्रवेश

दूसरे दिन तीसरे पहर बलरामजी और ग्वालबालोंके साथ भगवान् श्रीकृष्णने मथुरापुरीको देखनेके लिये नगरमें प्रवेश किया । जब भगवान् ने मथुरा नगरी को देखा, तो उसके ऊँचे स्फटिकमणि के गोपुर, सोने के फाटक और तोरण, ताँबे-पीतल की चहारदीवारी, खाई, उद्यान और रमणीय उपवन उसकी भव्यता प्रकट कर रहे थे। महलों, बाजारों और सभा-भवनों में वैदूर्य, हीरे, नीलम, मोती आदि जड़े थे। मार्गों पर जल का छिड़काव था, द्वारों पर कलश, दीप, फूल, केले और सुपारी के वृक्षों से सजावट थी।

जब श्रीकृष्ण और बलरामजी ग्वालबालों के साथ राजपथ से नगर में प्रवेश करते हैं, तो मथुरा की स्त्रियाँ उत्साह में अटारियों पर दौड़ पड़ती हैं। कोई उलटे गहने पहन लेती है, कोई एक ही कंगन या पायल पहनकर ही चल पड़ती है, कोई भोजन छोड़ देती है, कोई स्नान अधूरा छोड़ देती है, कोई शिशु को गोद से उतार देती है। सबका मन केवल दर्शन की उत्कंठा से भर जाता है।

श्रीकृष्ण मतवाले गजराज की भाँति मस्त चाल से चलते हैं। उनकी प्रेममयी चितवन और मन्द मुस्कान नगर-नारियों के हृदय को हर लेती है। वर्षों से जिनकी लीलाएँ सुन-सुनकर वे व्याकुल थीं, आज उन्हें प्रत्यक्ष देखकर उनका विरह शांत हो जाता है।

अटारियों से पुष्पवर्षा होती है। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य दही, अक्षत, पुष्प और चन्दन से पूजा करते हैं। समस्त नगर ‘धन्य है!’ कह उठता है—और आश्चर्य करता है कि ब्रज की गोपियों ने कैसी तपस्या की होगी, जो वे इन मनोहर किशोरों के दर्शन सदा करती रहती हैं।

कृष्ण ने किया धोबी का मान भंग

मथुरा में प्रवेश करते समय श्रीकृष्ण ने एक धोबी को आते देखा, जो राजा कंस का सेवक था और वस्त्र रंगने का काम भी करता था। भगवान् ने उससे विनम्रता से उत्तम वस्त्र माँगे और कहा कि यदि वह उन्हें वस्त्र देगा तो उसका परम कल्याण होगा।

यद्यपि सब कुछ भगवान् का ही है, फिर भी उन्होंने लीला से माँगने का व्यवहार किया। परन्तु कंस का अहंकारी सेवक होने के कारण वह धोबी अभिमान से भर गया। उसने अपमानजनक शब्दों में उत्तर दिया, उन्हें जंगल में रहनेवाले कहकर तुच्छ समझा और धमकी दी कि राजकर्मचारी उन्हें दण्ड देंगे।

उसकी उद्दण्डता देखकर श्रीकृष्ण ने हल्का-सा तमाचा मारा, जिससे उसका प्राणान्त हो गया। यह देखकर उसके साथी भय से वस्त्रों के गट्ठर छोड़कर भाग गये। तब श्रीकृष्ण और बलरामजी ने मनोनुकूल वस्त्र धारण किये और शेष वस्त्र ग्वालबालों में बाँट दिये; कुछ वस्त्र वहीं छोड़कर आगे बढ़ गये।

मथुरा का दर्जी जिसने किया कृष्ण का श्रृंगार

धोबी के दण्ड के बाद जब भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी आगे बढ़े, तब मार्ग में उन्हें एक कुशल दर्जी मिला। जैसे ही उसकी दृष्टि उन दोनों गौर-श्याम किशोरों पर पड़ी, वह उनके अलौकिक सौन्दर्य पर मुग्ध हो गया। उसने अत्यन्त प्रेम और श्रद्धा से रंग-बिरंगे उत्तम वस्त्र निकालकर उन्हें इस प्रकार सुसज्जित किया कि दोनों भाई और भी अधिक शोभायमान हो उठे, मानो उत्सव के लिये अलंकृत श्वेत और श्याम गजशावक हों।

भगवान् श्रीकृष्ण उसकी सरल सेवा और निष्कपट भाव से अत्यन्त प्रसन्न हुए। उन्होंने उसे धन, ऐश्वर्य, बल, तीक्ष्ण इन्द्रियशक्ति, अपनी अखण्ड स्मृति तथा देह त्याग के पश्चात् सारूप्य मोक्ष का वरदान प्रदान किया। इस प्रकार एक साधारण दर्जी भी भगवान् की कृपा से आध्यात्मिक और लौकिक दोनों प्रकार की सिद्धि प्राप्त कर धन्य हो गया।

कृष्ण ने किया सुदामा माली को मालामाल

इसके बाद दोनों भाई सुदामा माली के घर पहुँचे। सुदामा ने उन्हें आते देख प्रेम-विह्वल होकर दण्डवत् प्रणाम किया, आदरपूर्वक आसन पर बैठाया और उनके चरणकमलों को पखारकर फल, पान, चन्दन तथा सुगन्धित पुष्पमालाओं से पूजा की। उसका हृदय कृतज्ञता से भर उठा। वह बोला, “प्रभो! आज आपके आगमन से मेरा जीवन सफल हो गया। मेरा कुल, मेरे पितर और मेरा जन्म सब धन्य हो गये।”

सुदामा ने उनसे केवल यही वर माँगा उनके चरणों में अटल भक्ति, भगवान् के भक्तों के प्रति सच्ची मैत्री और समस्त प्राणियों पर अहैतुक दया। भगवान् श्रीकृष्ण ने उसकी यह आध्यात्मिक कामना सहर्ष पूर्ण की। साथ ही उसे बढ़ती हुई लक्ष्मी, बल, आयु, कीर्ति और कान्ति का भी आशीर्वाद दिया। इस प्रकार जो भगवान् से केवल भक्ति माँगता है, उसे वे भक्ति के साथ-साथ सब कुछ प्रदान कर देते हैं।

कृष्ण ने किया कुब्जा पर कृपा 

श्रीशुकदेवजी कहते हैं की परीक्षित्! जब भगवान् श्रीकृष्ण अपनी मण्डली के साथ राजमार्ग से आगे बढ़ रहे थे, तब उनकी दृष्टि एक युवती पर पड़ी। उसका मुख अत्यन्त सुन्दर था, परन्तु शरीर तीन स्थानों से टेढ़ा होने के कारण वह ‘कुब्जा’ कहलाती थी। वह हाथ में चन्दन और अंगराग का पात्र लिये जा रही थी।

प्रेमरस के दाता भगवान् श्रीकृष्ण ने उस पर कृपा करने के लिये मुसकराकर पूछा, “सुन्दरी! तुम कौन हो और यह चन्दन किसके लिये ले जा रही हो? यह उत्तम अंगराग हमें भी दो; इससे तुम्हारा परम कल्याण होगा।”

कुब्जा ने विनम्रता से उत्तर दिया, “मैं कंस की दासी त्रिवक्रा हूँ। मैं चन्दन और अंगराग बनाने का कार्य करती हूँ। यह सब महाराज कंस के लिये ले जा रही हूँ। परन्तु आप दोनों से बढ़कर इसका और कोई योग्य पात्र नहीं।”

भगवान् के सौन्दर्य, मधुर वाणी और चितवन से उसका हृदय मोहित हो गया। उसने प्रेमपूर्वक वह अंगराग दोनों भाइयों को अर्पित कर दिया। श्रीकृष्ण ने अपने श्याम शरीर पर पीत वर्ण का, और बलरामजी ने अपने गौर शरीर पर लाल वर्ण का अंगराग लगाया।

भगवान् श्रीकृष्ण उस पर प्रसन्न हुए और उसके जीवन को धन्य करने का निश्चय किया। उन्होंने अपने चरणों से उसके पाँव दबाये और दो अँगुलियों से उसकी ठोड़ी उठाकर शरीर को सीधा कर दिया। उनके स्पर्श मात्र से उसका कुटिल शरीर पूर्णतः सीधा और सुडौल हो गया। वह तत्काल ही रूपवती, तेजस्विनी और सुन्दर युवती बन गयी। भगवान् के स्पर्श से उसका बाह्य रूप ही नहीं, हृदय भी दिव्य हो उठा।

कृतज्ञता और अनुराग से भरकर उसने भगवान् का दुपट्टा पकड़ लिया और निवेदन किया, “प्रभो! मेरे घर पधारिये।”

भगवान् श्रीकृष्ण ने हँसते हुए उत्तर दिया, “सुन्दरी, हम अपना कार्य पूर्ण करके अवश्य आयेंगे।” इस प्रकार मधुर वचन कहकर उन्होंने उसे आश्वस्त किया और आगे बढ़ गये।

जब वे बाजार में पहुँचे, तब व्यापारियों ने पान, पुष्पमालाएँ, चन्दन और विविध भेंटों से उनका सम्मान किया। उनके दर्शनमात्र से नगर की स्त्रियाँ प्रेम और आनन्द से भर उठीं। वे इतनी तन्मय हो जातीं कि अपने शरीर की भी सुध न रहती; मानो चित्रलिखित मूर्तियों की भाँति स्थिर खड़ी रह जातीं।

सारांश: JKYog India Online Class- श्रीमद् भागवत कथा [हिन्दी]- 02.03.2026