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102- अरिष्टासुर, व्योमासुर और केशी उद्धार: नारदजी ने खोले कंस के सामने कृष्ण का भेद

Feb 25th, 2026 | 10 Min Read
Blog Thumnail

Category: Bhagavat Purana

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Language: Hindi

श्रीमद्भागवत महापुराण- स्कन्ध: 10 अध्याय: 36-37

श्रीशुकदेवजी परीक्षित से कहते हैं की एक दिन जब भगवान् श्रीकृष्ण व्रज में प्रवेश कर रहे थे और वहाँ उत्सव जैसा वातावरण था, उसी समय अरिष्टासुर नाम का एक दैत्य बैल का रूप लेकर आया। उसका शरीर बहुत बड़ा था। वह अपने खुरों से इतनी जोर से धरती पटक रहा था कि जमीन काँप रही थी।

वह जोर-जोर से गर्जता और धूल उड़ाता हुआ इधर-उधर दौड़ रहा था। अपनी सींगों से वह दीवारें और खेतों की मेड़ तोड़ रहा था। उसकी गर्जना से लोग बहुत डर गए। स्त्रियाँ और गौएँ भय से काँप उठीं। पशु अपने स्थान छोड़कर भागने लगे।

सब व्रजवासी पुकारने लगे, “श्रीकृष्ण, हमें बचाओ।”

भगवान् श्रीकृष्ण ने देखा कि ब्रज में भय फैल गया है। उन्होंने सबको ढाढ़स बँधाया और उस दैत्य को ललकारा, “दुष्ट, तू गौओं और ग्वालों को क्यों डरा रहा है? तेरे जैसे अभिमानी का घमंड मैं अभी तोड़ दूँगा।”

यह सुनकर अरिष्टासुर क्रोध से भर गया और जोर से धरती खोदता हुआ श्रीकृष्ण की ओर दौड़ा। उसने अपने तीखे सींग आगे कर लिए और बहुत वेग से आक्रमण किया। भगवान् श्रीकृष्ण ने उसके दोनों सींग पकड़ लिए और जैसे बलवान व्यक्ति दूसरे को पीछे हटा देता है, वैसे ही उसे कई कदम पीछे धकेलकर गिरा दिया। वह फिर उठ खड़ा हुआ और और भी क्रोध से भरकर दोबारा हमला करने लगा।

तब भगवान् ने फिर उसके सींग पकड़ लिए, उसे गिराकर पैरों से दबा दिया और बुरी तरह मसल डाला। फिर उसका एक सींग उखाड़कर उसी से उसे मारा। वह दैत्य खून उगलता हुआ तड़पने लगा और अन्त में प्राण छोड़ दिए।

दैत्य के मारे जाने पर देवताओं ने आकाश से फूल बरसाए और भगवान् की स्तुति की। व्रजवासी आनन्द से भर गए। भगवान् श्रीकृष्ण बलरामजी के साथ गोष्ठ में लौटे, और उन्हें देखकर गोपियों के मन और नेत्र आनन्द से भर उठे।

नारदजी ने बताया कंस को कृष्ण ही है देवकी का आठवाँ पुत्र

शुकदेवजी आगे कहते हैं कि भगवान् की लीलाएँ बहुत अद्भुत हैं। जब भगवान् श्रीकृष्ण ने अरिष्टासुर का वध किया, उसी समय नारदजी कंस के पास पहुँचे और कहा:
यशोदायाः सुतां कन्यां देवक्याः कृष्णमेव च ।
रामं च रोहिणीपुत्रं वसुदेवेन बिभ्यता ॥


न्यस्तौ स्वमित्रे नन्दे वै याभ्यां ते पुरुषा हताः ।
निशम्य तद्‍भोजपतिः कोपात् प्रचलितेन्द्रियः ॥
‘कंस! जो कन्या तुम्हारे हाथसे छूटकर आकाशमें चली गयी, वह तो यशोदाकी पुत्री थी। और व्रजमें जो श्रीकृष्ण हैं, वे देवकीके पुत्र हैं। वहाँ जो बलरामजी हैं, वे रोहिणीके पुत्र हैं। वसुदेवने तुमसे डरकर अपने मित्र नन्दके पास उन दोनोंको रख दिया है। उन्होंने ही तुम्हारे अनुचर दैत्योंका वध किया है।’ यह बात सुनते ही कंसकी एक-एक इन्द्रिय क्रोधके मारे काँप उठी। (भागवत 10.36.17-18)

उसने तुरंत तलवार उठाई और वसुदेव को मारने के लिए दौड़ा, पर नारदजी ने उसे रोक दिया। जब कंस को यह समझ में आ गया कि वसुदेव के पुत्र ही उसकी मृत्यु का कारण हैं, तब उसने देवकी और वसुदेव को फिर से बेड़ियों में बाँधकर जेल में डाल दिया।

नारदजी के जाने के बाद कंस ने केशी नाम के दैत्य को बुलाया और आदेश दिया, “व्रज में जाकर बलराम और कृष्ण को मार डालो।” केशी चला गया। 

फिर कंस ने चाणूर, मुष्टिक, शल, तोशल जैसे पहलवानों, अपने मन्त्रियों और महावतों को बुलाया। उसने कहा, “सुनो, वसुदेव के दो पुत्र बलराम और कृष्ण नन्द के व्रज में रहते हैं। कहा जाता है कि उन्हीं के हाथ से मेरी मृत्यु होगी। इसलिए जब वे यहाँ आएँ, तो तुम लोग कुश्ती के बहाने उन्हें मार डालना। अखाड़े के चारों ओर मंच बनवाओ, ताकि नगर और देश के लोग बैठकर यह दंगल देखें।”

महावत, तुम चतुर हो। अपने कुवलयापीड हाथी को दंगल के द्वार पर खड़ा रखना। जब वे भीतर आएँ, तो उसी हाथी से उन्हें कुचलवा देना। और इस चतुर्दशी को विधि से धनुषयज्ञ आरम्भ कर दो। उसकी सफलता के लिए भैरव को पशु बलि चढ़ाओ।”

कंस ने अक्रूरजी को भेजा कृष्ण को मथुरा लाने

कंस केवल अपना स्वार्थ देखता था। उसने मन्त्री, पहलवान और महावत को आदेश देने के बाद श्रेष्ठ यदुवंशी अक्रूर को बुलवाया। उनका हाथ पकड़कर वह बोला, “अक्रूरजी, आप उदार और मेरे आदरणीय हैं। आज आप मेरा एक काम कर दीजिए। यादवों में आपसे बढ़कर मेरा हित चाहने वाला कोई नहीं है।

“यह काम बड़ा है, इसलिए मैंने आपका सहारा लिया है। आप नन्द के व्रज में जाइए। वहाँ वसुदेव के दो पुत्र हैं, बलराम और कृष्ण। उन्हें इसी रथ पर बैठाकर यहाँ ले आइए। देर नहीं होनी चाहिए।

“कहा जाता है कि देवताओं ने उन्हीं दोनों को मेरी मृत्यु का कारण ठहराया है। इसलिए उन्हें तो ले ही आइए, साथ ही नन्द और अन्य गोपों को भी भेंटों के साथ बुला लाइए। यहाँ आने पर मैं उन्हें अपने हाथी कुवलयापीड से कुचलवा दूँगा। यदि वे उससे बच गए, तो मेरे पहलवान मुष्टिक और चाणूर उन्हें मार डालेंगे।

“उनके मरने के बाद वसुदेव और उनके कुल के लोग शोक में डूब जाएँगे। तब मैं उन्हें भी मार डालूँगा। मेरा पिता उग्रसेन अभी जीवित है और राज्य चाहता है। बाद में मैं उसे, उसके भाई देवक को और जो भी मेरे विरोधी हैं, सबको समाप्त कर दूँगा।

“फिर इस पृथ्वी पर केवल मैं और आप रहेंगे। जरासन्ध मेरा ससुर है, द्विविद मेरा मित्र है। शम्बर, नरक और बाणासुर भी मेरे साथ हैं। इनकी सहायता से मैं सब विरोधियों को हराकर निश्चिन्त राज्य करूँगा।

“यह सब मैंने आपसे गुप्त रूप से कहा है। अब आप शीघ्र बलराम और कृष्ण को यहाँ ले आइए। वे अभी बालक ही हैं, उन्हें मारना कठिन नहीं होगा। उनसे इतना ही कहिए कि वे धनुषयज्ञ देखने और मथुरा की शोभा देखने के लिए आ जाएँ।”

अक्रूरजी ने कहा, “महाराज, आप अपनी मृत्यु और संकट को दूर करना चाहते हैं, इसलिए ऐसा सोच रहे हैं, यह स्वाभाविक है। पर मनुष्य को चाहिए कि वह सफलता और असफलता दोनों में समान भाव रखे और अपना कर्तव्य करता रहे। फल केवल प्रयास से नहीं मिलता, वह दैव के अनुसार मिलता है।

“मनुष्य कई योजनाएँ बनाता है, पर यह नहीं जानता कि भाग्य ने पहले से क्या तय कर रखा है। जब भाग्य साथ देता है तो प्रयास सफल हो जाता है और वह प्रसन्न होता है। और जब भाग्य साथ नहीं देता, तो प्रयास असफल होता है और वह दुःखी हो जाता है। फिर भी, मैं आपकी आज्ञा का पालन करूँगा।” 

कंस ने इस प्रकार मन्त्रियों और अक्रूरजी को आदेश देकर सबको विदा किया। फिर वह अपने महल में चला गया और अक्रूरजी अपने घर लौट आए।

केशी उद्धार

श्रीशुकदेवजी परीक्षित को कहते हैं की कंस ने जो केशी नाम का दैत्य भेजा था, वह बहुत बड़े घोड़े का रूप लेकर व्रज में आया। वह बहुत तेज़ दौड़ रहा था। उसके खुरों की चोट से धरती काँप रही थी। उसकी हिनहिनाहट इतनी भयानक थी कि सब लोग डर गए। उसका शरीर बहुत विशाल था, आँखें बड़ी-बड़ी थीं और मुँह बहुत बड़ा था। वह श्रीकृष्ण को मारने के इरादे से आया था।
भगवान् श्रीकृष्ण ने देखा कि उसके आने से ब्रज में भय फैल गया है। तब वे आगे बढ़े और सिंह के समान गर्जना करके उसे ललकारा।

भगवान् को सामने देखकर केशी और क्रोधित हो गया। वह मुँह फैलाकर बहुत वेग से उनकी ओर दौड़ा और पास पहुँचकर पिछली टाँगों से वार किया। पर भगवान् ने स्वयं को बचा लिया। उन्होंने उसके दोनों पिछले पैर पकड़ लिए और जैसे गरुड़ साँप को झटक देता है, वैसे ही उसे घुमाकर दूर फेंक दिया।

कुछ देर बाद केशी फिर उठ खड़ा हुआ और और भी क्रोध से भरकर भगवान् पर झपटा। तब भगवान् मुसकराए और अपना बायाँ हाथ उसके मुँह में डाल दिया। भगवान् का हाथ उसके मुँह में जाते ही उसके दाँत टूटकर गिर गए। फिर भगवान् की भुजा उसके मुँह के भीतर फैलने लगी। वह इतनी बड़ी हो गई कि केशी की साँस रुक गई। उसका दम घुटने लगा। वह छटपटाने लगा, पसीने से भर गया और अन्त में धरती पर गिर पड़ा। थोड़ी ही देर में उसके प्राण निकल गए। 

उसका मृत शरीर फट गया। भगवान् श्रीकृष्ण ने अपनी भुजा बाहर निकाल ली। देवताओं ने यह दृश्य देखा तो वे आश्चर्य और आनन्द से भर गए। उन्होंने आकाश से फूल बरसाए और भगवान् की स्तुति करने लगे।

नारदजी ने किया श्रीकृष्ण की स्तुति

देवर्षि नारदजी कंस के पास से लौटकर वे सीधे भगवान् श्रीकृष्ण के पास आए और एकान्त में उनसे बोले, “हे श्रीकृष्ण, आप सच्चिदानन्दस्वरूप परमात्मा हैं। आपका वास्तविक स्वरूप मन और वाणी से समझा नहीं जा सकता। आप ही पूरे जगत् के संचालक हैं। आप सबके हृदय में रहते हैं और सब कुछ आपमें स्थित है। आप भक्तों के परम प्रिय और यदुवंश के श्रेष्ठ हैं।

“जैसे एक अग्नि अनेक लकड़ियों में छिपी रहती है, वैसे ही आप सब प्राणियों के आत्मा हैं। भीतर रहकर भी आप दिखाई नहीं देते, फिर भी आप सबके साक्षी और नियन्ता हैं। सृष्टि की रचना, पालन और संहार आप ही अपनी शक्ति से करते हैं। आपको किसी सहारे की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि आप सर्वशक्तिमान् हैं।

“आप दैत्यों और अधर्मियों का नाश करने तथा धर्म की रक्षा के लिए यदुवंश में अवतीर्ण हुए हैं।
यह बहुत आनन्द की बात है कि आपने खेल-ही-खेल में केशी दैत्य का वध कर दिया। अब शीघ्र ही आप चाणूर, मुष्टिक, दूसरे पहलवानों, कुवलयापीड हाथी और स्वयं कंस का भी वध करेंगे। फिर शंखासुर, कालयवन, मुर और नरकासुर का नाश करेंगे।

“आप स्वर्ग से कल्पवृक्ष लाएँगे और इन्द्र के अभिमान को भी दूर करेंगे। आप अनेक वीर कन्याओं से विवाह करेंगे और द्वारका में रहकर लोगों को पाप से मुक्त करेंगे।

“आप जाम्बवान से स्यमन्तक मणि लाएँगे और ब्राह्मण के मरे हुए पुत्रों को भी वापस ले आएँगे। बाद में आप पौण्ड्रक का वध करेंगे और युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में शिशुपाल तथा बाद में दन्तवक्त्र का भी नाश करेंगे।

“द्वारका में रहते हुए आप और भी अनेक पराक्रम करेंगे, जिन्हें आगे चलकर ज्ञानी लोग गाएँगे। फिर आप अर्जुन के सारथि बनकर महायुद्ध में पृथ्वी का भार हल्का करेंगे और बड़ी-बड़ी सेनाओं का नाश करेंगे। यह सब मैं देखूँगा।

“हे प्रभो, आप शुद्ध ज्ञान और आनन्द के स्वरूप हैं। आपके अतिरिक्त कुछ भी स्वतन्त्र नहीं है। आप सदा अपने आनन्द में स्थित रहते हैं। आपके लिए सब कुछ सदा प्राप्त है। आपका संकल्प कभी व्यर्थ नहीं जाता। आपकी शक्ति के सामने यह माया और यह संसार कुछ भी नहीं है।

“यह जगत् और इसके सभी भेद आपकी माया से ही प्रकट होते हैं। अभी आप मनुष्य रूप में लीला कर रहे हैं और यदुवंश के शिरोमणि बने हैं। ऐसे सच्चिदानन्दस्वरूप भगवान् को मैं प्रणाम करता हूँ और आपकी शरण ग्रहण करता हूँ।”

नारदजी इस प्रकार भगवान् की स्तुति करके वहाँ से चले गए। उधर भगवान् श्रीकृष्ण ने केशी दैत्य को मारने के बाद फिर पहले की तरह अपने प्रिय ग्वालबालों के साथ गौएँ चराना शुरू कर दिया। 

व्योमासुर उद्धार

एक समय वे सब ग्वालबाल पहाड़की चोटियोंपर गाय आदि पशुओंको चरा रहे थे तथा कुछ चोर और कुछ रक्षक बनकर छिपने-छिपानेका लुका-लुकीका खेल खेल रहे थे। उसी समय ग्वालका वेष धारण करके व्योमासुर वहाँ आया। वह मायावियोंके आचार्य मयासुरका पुत्र था और स्वयं भी बड़ा मायावी था। वह खेलमें बहुधा चोर ही बनता और भेड़ बने हुए बहुत-से बालकोंको चुराकर छिपा आता।

वह उन्हें ले जाकर एक पहाड़की गुफामें डाल देता और उसका दरवाजा एक बड़ी चट्टानसे ढक देता। इस प्रकार ग्वालबालोंमें केवल चार-पाँच बालक ही बच रहे। भक्तवत्सल भगवान् उसकी यह करतूत जान गये।

व्योमासुर बड़ा बली था। उसने पहाड़के समान अपना असली रूप प्रकट कर दिया और चाहा कि अपनेको छुड़ा लूँ। परन्तु भगवान्ने उसको इस प्रकार अपने शिकंजे में फाँस लिया था कि वह अपनेको छुड़ा न सका ।

तब भगवान् श्रीकृष्णने अपने दोनों हाथोंसे जकड़कर उसे भूमिपर गिरा दिया और पशुकी भाँति गला घोंटकर मार डाला। देवतालोग विमानोंपर चढ़कर उनकी यह लीला देख रहे थे।
अब भगवान् श्रीकृष्णने गुफाके द्वारपर लगे हुए चट्टानोंके पिहान तोड़ डाले और ग्वालबालोंको उस संकटपूर्ण स्थानसे निकाल लिया। बड़े-बड़े देवता और ग्वालबाल उनकी स्तुति करने लगे और भगवान् श्रीकृष्ण व्रजमें चले आये।

सारांश: JKYog India Online Class- श्रीमद् भागवत कथा [हिन्दी]- 13.02.2026