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105- श्रीकृष्ण के द्वारा मथुरा में धनुष भंग, कुवलयापीड हाथी, चाणूर-मुष्टिक और कंस का उद्धार

Mar 8th, 2026 | 10 Min Read
Blog Thumnail

Category: Bhagavat Purana

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Language: Hindi

श्रीमद्भागवत महापुराण- स्कन्ध: 10 अध्याय: 42-44

कुब्जा पर कृपा करने के बाद श्रीकृष्ण नगरवासियों से धनुष-यज्ञ का स्थान पूछते हुए रंगशाला में पहुँचे। वहाँ उन्होंने एक अद्भुत धनुष देखा, जो इन्द्रधनुष के समान विशाल और मनोहर था। उस धनुष पर बहुत-सा धन व्यय किया गया था; उसे बहुमूल्य अलंकारों से सजाया गया था, विधिपूर्वक उसकी पूजा की गयी थी और अनेक सैनिक उसकी कड़ी रक्षा कर रहे थे।

भगवान् श्रीकृष्ण ने रक्षकों के रोकने पर भी उस धनुष को बलपूर्वक उठा लिया। सबके सामने उन्होंने उसे अपने बाएँ हाथ से उठाया, उस पर प्रत्यंचा चढ़ायी और एक ही क्षण में खींचकर बीच से दो टुकड़े कर दिये। जब वह धनुष टूटा, तब उसके भयंकर शब्द से आकाश, पृथ्वी और दिशाएँ गूँज उठीं। उस गर्जन को सुनकर कंस भी भय से काँप उठा।

धनुष के टूटते ही उसके रक्षक असुर अत्यन्त क्रोधित हो गये। वे अपने साथियों के साथ दौड़कर आये और श्रीकृष्ण को घेरकर चिल्लाने लगे, “पकड़ लो! बाँध लो! इसे जाने मत दो!”
उनका दुष्ट अभिप्राय समझकर श्रीकृष्ण और बलरामजी भी तनिक क्रोधित हुए। उन्होंने उसी टूटे हुए धनुष के टुकड़ों को उठाया और उनसे ही उन रक्षकों का संहार कर डाला। फिर उन्हीं धनुषखण्डों से उन्होंने कंस द्वारा भेजी गयी सेना को भी परास्त कर दिया।

इसके बाद दोनों भाई यज्ञशाला के प्रधान द्वार से बाहर निकल आये और बड़े आनन्द से मथुरापुरी की शोभा देखते हुए नगर में विचरण करने लगे। जब नगरवासियों ने दोनों भाइयों का यह अद्भुत पराक्रम सुना और उनके तेज, साहस तथा अनुपम रूप का दर्शन किया, तब वे आश्चर्यचकित रह गये। सबके मन में यही विचार उत्पन्न हुआ कि ये साधारण मनुष्य नहीं, अवश्य ही कोई महान् देवता हैं।

इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी मथुरापुरी में पूर्ण स्वतन्त्रता से विचरण करने लगे। जब सूर्यास्त हुआ, तब दोनों भाई ग्वालबालों से घिरे हुए नगर से बाहर अपने डेरे पर लौट आये, जहाँ व्रजवासियों के छकड़े ठहरे हुए थे। 

तीनों लोकों के देवता भी जिन लक्ष्मीजी को प्राप्त करने की इच्छा करते हैं, उन्हीं लक्ष्मीजी ने सबको छोड़कर न चाहने वाले भगवान् श्रीकृष्ण को ही अपना नित्य निवास बना लिया है। अब मथुरा के निवासी उन्हीं पुरुषभूषण भगवान् के अद्भुत सौन्दर्य का दर्शन कर रहे थे। उनका सौभाग्य कितना महान था! व्रज में जब श्रीकृष्ण मथुरा के लिये प्रस्थान कर रहे थे, तब गोपियों ने विरह से व्याकुल होकर मथुरावासियों के सौभाग्य की जो बातें कही थीं, वे सब यहाँ अक्षरशः सत्य सिद्ध हो गयीं। सचमुच मथुरा के लोग उनके दर्शन से परमानन्द में मग्न हो गये।

इसके बाद श्रीकृष्ण और बलरामजी ने हाथ-पैर धोकर दूध से बने हुए खीर आदि मधुर पदार्थों का भोजन किया। फिर कंस की आगे की योजना के विषय में जानकारी लेकर वे उसी डेरे में उस रात शान्ति से विश्राम करने लगे।

उधर जब कंस को समाचार मिला कि श्रीकृष्ण और बलराम ने धनुष को तोड़ डाला है और उसके रक्षकों तथा सहायता के लिये भेजी गयी सेना का भी संहार कर दिया है तब वह अत्यन्त भयभीत हो गया। उस दुष्ट को उस रात तनिक भी नींद नहीं आयी। जाग्रत अवस्था और स्वप्न दोनों में उसे अनेक अपशकुन दिखाई देने लगे, जो उसकी निकट आती मृत्यु के संकेत थे।

जागते समय उसे ऐसा प्रतीत होता कि जल या दर्पण में शरीर की छाया तो दिखती है, परन्तु सिर दिखाई नहीं देता। बिना किसी कारण के चन्द्रमा, तारे और दीपक की ज्योति उसे दो-दो दिखाई पड़ती। अपनी छाया में छेद दिखाई देता और कानों में अँगुली डालने पर भी प्राणों की ध्वनि सुनाई नहीं देती। वृक्ष उसे स्वर्ण के बने हुए प्रतीत होते और रेत या कीचड़ में अपने पैरों के चिन्ह भी नहीं दिखते।

स्वप्न में उसने देखा कि वह प्रेतों को आलिंगन कर रहा है, गधे पर सवार होकर जा रहा है और विष पी रहा है। उसका शरीर तेल से लथपथ है, गले में जपाकुसुम की माला है और वह नग्न होकर कहीं जा रहा है। इस प्रकार के अनेक भयानक स्वप्न और अपशकुन देखकर उसका हृदय भय से काँप उठा। वह चिन्ता से व्याकुल होकर सारी रात जागता रहा।

प्रातःकाल राजा कंस ने मल्लक्रीड़ा के महोत्सव की तैयारी आरम्भ करायी। राजकर्मचारियों ने रंगभूमि को सुन्दर ढंग से सजाया। तुरही, भेरी और अन्य वाद्य बजने लगे। दर्शकों के लिये बने मंचों को फूलों के हार, ध्वजाओं, वस्त्रों और बन्दनवारों से सुसज्जित कर दिया गया।

ब्राह्मण, क्षत्रिय, नगरवासी और ग्रामवासी सब अपने-अपने स्थानों पर बैठ गये। अनेक राजाओं ने भी आकर अपने निश्चित आसनों को ग्रहण किया। स्वयं राजा कंस मन्त्रियों और मण्डलेश्वरों के बीच में उच्च राजसिंहासन पर बैठा, यद्यपि उसके मन में अभी भी अपशकुनों के कारण भय बना हुआ था।

इसी बीच बाजों की ध्वनि के साथ पहलवान अखाड़े में उतरने लगे। चाणूर, मुष्टिक, कूट, शल और तोशल जैसे प्रमुख मल्ल सज-धजकर अपने-अपने गुरुओं के साथ रंगभूमि में आकर बैठ गये।

तभी भोजराज कंस ने नन्दबाबा और अन्य गोपों को भी बुलवाया। वे सब आकर उसे विभिन्न प्रकार की भेंटें अर्पित कर अपने लिये निर्धारित मंच पर बैठ गये और आगे होने वाली मल्लक्रीड़ा की प्रतीक्षा करने लगे।

कुवलयापीड हाथी का उद्धार

श्रीशुकदेवजी बताते हैं कि श्रीकृष्ण और बलराम स्नानादि नित्यकर्म करके दंगल की नगाड़े की ध्वनि सुनते हुए रंगभूमि की ओर चले। द्वार पर कंस का विशाल हाथी कुवलयापीड महावत के साथ खड़ा था। श्रीकृष्ण ने महावत को रास्ता देने के लिए चेतावनी दी, पर उसने क्रोध में हाथी को श्रीकृष्ण पर आक्रमण करने के लिए उकसा दिया।

कुवलयापीड ने श्रीकृष्ण को पकड़ने का प्रयास किया, परन्तु श्रीकृष्ण चतुराई और शक्ति से उससे बचते रहे। वे कभी उसकी सूँड़ से निकल जाते, कभी उसकी पूँछ पकड़कर उसे दूर तक घसीट लेते और खेल-खेल में उसे भ्रमित करते रहे। अंततः श्रीकृष्ण ने हाथी को भूमि पर पटक दिया, उसके दाँत उखाड़ लिये और उन्हीं से हाथी तथा महावतों का वध कर दिया।
इसके बाद श्रीकृष्ण और बलराम हाथों में हाथी के दाँत लिए ग्वालबालों के साथ रंगभूमि में प्रवेश करते हैं। उस समय उनके शरीर पर रक्त और मद की बूंदें तथा मुख पर पसीना चमक रहा था, जिससे उनकी वीर और अद्भुत शोभा प्रकट हो रही थी।

जब श्रीकृष्ण और बलराम रंगभूमि में पहुँचे, तब सभी लोग उन्हें अपने-अपने भाव के अनुसार देख रहे थे। पहलवानों को वे वज्र जैसे कठोर योद्धा लगे, स्त्रियों को मूर्तिमान् कामदेव, गोपों को अपने प्रिय स्वजन, दुष्ट राजाओं को दण्ड देने वाले शासक, कंस को अपनी मृत्यु और भक्तों को अपने इष्टदेव दिखाई दिये।

कंस ने जब सुना कि श्रीकृष्ण ने कुवलयापीड हाथी को मार डाला है, तब वह भीतर ही भीतर भयभीत हो गया। वहीं दर्शक श्रीकृष्ण और बलराम के सौन्दर्य, वीरता और लीलाओं को देखकर उनके अद्भुत कार्यों जैसे पूतना, तृणावर्त, केशी आदि दैत्यों का वध, कालिय नाग का दमन और गोवर्धन धारण आदि की चर्चा करने लगे।

कृष्ण-बलराम द्वारा चाणूर-मुष्टिक का वध

इसी बीच पहलवान चाणूर ने श्रीकृष्ण और बलराम को कुश्ती के लिए ललकारा और। श्रीकृष्ण ने विनम्रता से कहा कि वे तो बालक हैं और समान बल वालों से ही कुश्ती उचित है। परन्तु चाणूर ने तर्क दिया कि कुवलयापीड को मारने वाले श्रीकृष्ण और बलराम साधारण बालक नहीं हैं, इसलिए उन्हें शक्तिशाली पहलवानों से ही लड़ना चाहिए। अंततः तय हुआ कि श्रीकृष्ण चाणूर से और बलराम मुष्टिक से कुश्ती लड़ेंगे।

श्रीकृष्ण और बलराम ने चाणूर और मुष्टिक से मल्लयुद्ध आरम्भ किया। दोनों ओर से दाँव-पेच, पकड़-धकड़ और प्रहार होते रहे। यह देखकर वहाँ उपस्थित स्त्रियाँ करुणा से व्याकुल हो उठीं और कहने लगीं कि शक्तिशाली पहलवानों के साथ इन किशोर बालकों का युद्ध कराना अधर्म है। वे व्रजभूमि और गोपियों के सौभाग्य की भी प्रशंसा करने लगीं।
व्रजभूमि अत्यन्त पवित्र और धन्य है, क्योंकि वहीं भगवान् श्रीकृष्ण मनुष्य रूप में रहकर बलरामजी के साथ गौएँ चराते, बाँसुरी बजाते और विविध लीलाएँ करते हैं। गोपियाँ अत्यन्त भाग्यशाली हैं, क्योंकि वे निरन्तर श्रीकृष्ण की रूप-माधुरी का दर्शन करती हैं। उनका सौन्दर्य अद्वितीय, स्वयंसिद्ध और हर क्षण नया लगता है। गोपियाँ अपने सभी दैनिक कार्य करते समय भी प्रेम से श्रीकृष्ण की लीलाओं और गुणों का गान करती रहती हैं।

स्त्रियोंकी ये भयपूर्ण बातें माता-पिता देवकी-वसुदेव भी सुन रहे थे। वे पुत्रस्नेहवश शोकसे विह्वल हो गये। उनके हृदयमें बड़ी जलन, बड़ी पीड़ा होने लगी। क्योंकि वे अपने पत्रोंके बलवीर्यको नहीं जानते थे। तब श्रीकृष्ण ने चाणूर को पकड़कर घुमाते हुए धरती पर पटक दिया, जिससे उसकी मृत्यु हो गई। उसी प्रकार बलराम ने मुष्टिक को एक प्रहार से मार डाला। इसके बाद बलराम ने कूट को और श्रीकृष्ण ने शल तथा तोशल को भी परास्त कर दिया।
जब ये सब पहलवान मारे गए, तब बाकी योद्धा भय से भाग खड़े हुए। इसके बाद श्रीकृष्ण और बलराम अपने समवयस्क ग्वालबालों के साथ हँसी-खुशी नाचते और खेलते हुए रंगभूमि में मल्लक्रीड़ा का आनन्द लेने लगे।

श्रीकृष्ण द्वारा कंस का उद्धार

पहलवानों के वध से कंस अत्यन्त क्रोधित हो गया और उसने आदेश दिया कि उनको को नगर से निकाल दिया जाए, नन्द को कैद कर लिया जाए और वसुदेव को मार डाला जाए। कंस इस प्रकार कटु वचन बोल रहा था तभी श्रीकृष्ण कुपित होकर अत्यन्त वेग से उछले और उसके ऊँचे मंच पर जा पहुँचे।

जब कंस ने देखा कि मेरी मृत्यु के समान भयानक भगवान् श्रीकृष्ण सामने खड़े हैं, तब वह घबराकर तुरंत अपने सिंहासन से उठ खड़ा हुआ। उसने हाथ में ढाल और तलवार उठा ली और अवसर देखकर प्रहार करने के लिये पैंतरे बदलने लगा। कभी दायीं ओर, कभी बायीं ओर वह इस प्रकार घूमने लगा, मानो आकाश में उड़ता हुआ बाज अपने शिकार पर झपटने की तैयारी कर रहा हो।

किन्तु भगवान् का तेज अत्यन्त प्रचण्ड और असह्य है। जैसे गरुड़ साँप को पकड़ लेते हैं, वैसे ही भगवान् श्रीकृष्ण ने झटपट आगे बढ़कर उसे पकड़ लिया। उसी क्षण कंस का मुकुट गिर पड़ा। भगवान् ने उसके केश पकड़ लिये और उसे उस ऊँचे मंच से खींचकर रंगभूमि में पटक दिया।

इसके बाद समस्त विश्व के आश्रय, परम स्वतन्त्र भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं उसके ऊपर कूद पड़े। उनके कूदते ही कंस के प्राण निकल गये। सबके सामने भगवान् श्रीकृष्ण उसकी निष्प्राण देह को रंगभूमि में इस प्रकार घसीटने लगे, जैसे सिंह हाथी को घसीटता है।

उस समय सम्पूर्ण सभा में हाहाकार मच गया। चारों ओर से लोगों के मुख से “हाय! हाय!” की ध्वनि गूँज उठी। मथुरा की रंगभूमि में उस क्षण सबने देख लिया कि अधर्म का अन्त और धर्म की विजय किस प्रकार होती है।

कंस हमेशा डर के कारण श्रीकृष्ण के बारे में ही सोचता रहता था। वह खाते, पीते, सोते, चलते, बोलते और साँस लेते समय भी अपने सामने चक्र धारण किए भगवान श्रीकृष्ण को ही देखता रहता था। इस तरह लगातार उनका स्मरण करने से, चाहे वह द्वेष के कारण ही क्यों न हो, उसे अंत मेंसारूप्य मुक्ति मिली, जो बड़े-बड़े तप करने वाले योगियों को भी कठिनाई से मिलती है।

कंस के कंक और न्यग्रोध आदि आठ छोटे भाई थे। वे अपने बड़े भाई की मृत्यु का बदला लेने के लिए क्रोध में भरकर भगवान श्रीकृष्ण और बलराम की ओर दौड़े। जब बलरामजी ने देखा कि वे तेजी से युद्ध करने के लिए आ रहे हैं, तब उन्होंने परिघ उठाया और उन्हें उसी तरह मार दिया जैसे सिंह पशुओं को मार देता है।

उस समय आकाश में दुन्दुभियाँ बजने लगीं। ब्रह्मा, शंकर आदि देवता आनन्दित होकर फूल बरसाने लगे और भगवान की स्तुति करने लगे। अप्सराएँ नाचने लगीं। कंस और उसके भाइयों की पत्नियाँ अपने पति और संबंधियों की मृत्यु से बहुत दुःखी हो गयीं। वे सिर पीटती हुई और आँखों में आँसू भरे वहाँ पहुँचीं और अपने पतियों से लिपटकर रोते हुए ऊँचे स्वर में विलाप करते हुए कहने लगी कीआपने निरपराध प्राणियों के साथ अन्याय किया था, इसलिए आपकी यह अवस्था हुई। भगवान श्रीकृष्ण ही संसार के सभी प्राणियों की उत्पत्ति और प्रलय के आधार हैं। वही सबके रक्षक भी हैं। जो उनका अनादर करता है या उनका विरोध करता है, वह कभी सुखी नहीं हो सकता।

श्रीकृष्ण ने रानियों को समझाकर धैर्य दिया। फिर लोक की रीति के अनुसार मृतकों के सभी क्रिया-कर्म कराए। इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण और बलराम जेल में गए और अपने माता-पिता को बन्धन से मुक्त किया। उन्होंने उनके चरणों को सिर से स्पर्श करके प्रणाम किया।

लेकिन जब पुत्रों ने प्रणाम किया, तब भी देवकी और वसुदेव ने उन्हें भगवान समझकर अपने हृदय से नहीं लगाया। उनके मन में संकोच था कि हम जगदीश्वर को अपना पुत्र कैसे मानें।

सारांश: JKYog India Online Class- श्रीमद् भागवत कथा [हिन्दी]- 06.03.2026