श्रीमद्भागवत महापुराण- स्कन्ध: 10 अध्याय: 34-35
श्रीशुकदेवजी परीक्षित से कहते हैं कि एक बार शिवरात्रि के अवसर पर नन्दबाबा और अन्य गोप बहुत उत्साह और आनन्द के साथ बैलों से जुती गाड़ियों पर बैठकर अम्बिकावन गए। वहाँ उन्होंने सरस्वती नदी में स्नान किया और भगवान् शंकर तथा भगवती अम्बिका की भक्ति से पूजा की।
उन्होंने ब्राह्मणों को गौएँ, सोना, वस्त्र, मधु और उत्तम भोजन दान में दिया और उन्हें आदर से खिलाया-पिलाया। उस दिन नन्दबाबा और अन्य गोप उपवास पर थे। रात में उन्होंने केवल जल पिया और सरस्वती नदी के तट पर ही सो गए।
उस अम्बिकावन में एक बहुत बड़ा अजगर रहता था। वह उस दिन बहुत भूखा था। संयोग से वह वहीं आ गया और सोए हुए नन्दबाबा को पकड़ लिया। अजगर के पकड़ते ही नन्दबाबा जोर से चिल्लाए, “बेटा कृष्ण, जल्दी आओ। यह अजगर मुझे निगल रहा है। मैं तुम्हारी शरण में हूँ, मुझे बचाओ।”
नन्दबाबा की आवाज़ सुनकर सभी गोप जाग गए। उन्होंने नन्दबाबा को अजगर के मुँह में देखा और घबरा गए। वे अधजली लकड़ियों से अजगर को मारने लगे, लेकिन वह नन्दबाबा को छोड़ नहीं रहा था। तभी भक्तों के रक्षक भगवान् श्रीकृष्ण वहाँ पहुँचे और अपने चरणों से उस अजगर को स्पर्श किया।
भगवान् के चरणों का स्पर्श होते ही अजगर के सारे पाप नष्ट हो गए और उसी क्षण वह अजगर का शरीर छोड़कर एक सुन्दर पुरुष बन गया। उस पुरुष के शरीर से प्रकाश निकल रहा था। वह सोने के आभूषण पहने हुए था। उसने भगवान् को प्रणाम किया और हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। तब भगवान् श्रीकृष्ण ने उससे पूछा कि वह कौन है और उसे अजगर की योनि क्यों मिली थी।
उस ने कहा कि वह पहले एक सुदर्शन नाम का विद्याधर था। सौन्दर्य और धन के घमण्ड में उसने कुछ अंगिरस ऋषियों का अपमान कर दिया था। ऋषियों का शाप भी वास्तव में कृपा ही था, क्योंकि आज भगवान् श्रीकृष्ण के चरणों के स्पर्श से वह शाप से मुक्त हो गया। भगवान् से अनुमति लेकर वह अपने लोक को लौट गया।
शंखचूड़ा ने किया गोपियों का अपहरण
एक दिन की बात है। अलौकिक कर्म करने वाले भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी रात के समय गोपियों के साथ वन में विहार कर रहे थे। भगवान् श्रीकृष्ण ने स्वच्छ पीताम्बर धारण किया था और बलरामजी नीलाम्बर पहने हुए थे। दोनों के गले में फूलों की सुन्दर मालाएँ थीं। शरीर पर सुगन्धित चन्दन लगा था और आभूषण धारण किए हुए थे। गोपियाँ प्रेम और आनन्द से मधुर स्वर में दोनों भाइयों के गुण गा रही थीं।
साँझ हो चुकी थी। आकाश में तारे दिखाई देने लगे थे और चन्द्रमा की चाँदनी फैल रही थी। बेला की सुगन्ध से भौंरे मँडरा रहे थे। तालाबों में खिले कुमुद के फूलों की महक के साथ शीतल हवा धीरे-धीरे चल रही थी। उसी वातावरण में भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी ने मिलकर राग छेड़ा। उनका गान सुनकर गोपियाँ इतनी मोहित हो गईं कि उन्हें अपने शरीर की भी सुध नहीं रही।
उसी समय, जब दोनों भाई इस प्रकार स्वच्छन्द रूप से विहार कर रहे थे, वहाँ शंखचूड नाम का एक यक्ष आ पहुँचा। वह कुबेर का सेवक था। दोनों भाइयों के देखते ही देखते वह गोपियों को जबरन पकड़कर उत्तर दिशा की ओर भागने लगा। गोपियाँ रोती हुई “हा कृष्ण! हा राम!” पुकारने लगीं।
यह देखकर दोनों भाई उसी समय उसकी ओर दौड़ पड़े। वे बोले, “डरो मत, डरो मत।” हाथ में शाल का वृक्ष लेकर वे क्षण भर में उस यक्ष के पास पहुँच गए। यक्ष ने देखा कि ये दोनों भाई तो मृत्यु के समान उसके सामने खड़े हैं। वह घबरा गया। उसने गोपियों को वहीं छोड़ दिया और स्वयं प्राण बचाने के लिए भागने लगा।
स्त्रियों की रक्षा के लिए बलरामजी वहीं रुक गए। श्रीकृष्ण उस यक्ष के पीछे दौड़ पड़े। वे उसके सिर की मणि लेना चाहते थे। थोड़ी दूर जाकर भगवान् श्रीकृष्ण ने उसे पकड़ लिया और एक प्रहार से उसके सिर को मणि सहित धड़ से अलग कर दिया।
इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण शंखचूड का वध करके वह चमकीली मणि लेकर लौट आए। सब गोपियों के सामने उन्होंने प्रेमपूर्वक वह मणि अपने बड़े भाई बलरामजी को दे दी।
युगल गीत
श्रीशुकदेवजी परीक्षित को कहते हैं की भगवान श्रीकष्णके गौओंको चरानेके लिये प्रतिदिन वनमें चले जानेपर उनके साथ गोपियोंका चित्त भी चला जाता था। उनका मन श्रीकृष्णका चिन्तन करता रहता और वे वाणीसे उनकी लीलाओंका गान करती रहतीं। इस प्रकार वे बड़ी कठिनाईसे अपना दिन बितातीं ।
श्रीगोप्य ऊचुः
वामबाहुकृतवामकपोलो वल्गितभ्रुरधरार्पितवेणुम् ।
कोमलाङ्गुलिभिराश्रितमार्गं गोप्य ईरयति यत्र मुकुन्दः ॥२॥
व्योमयानवनिताः सह सिद्धैः विस्मितास्तदुपधार्य सलज्जाः ।
काममार्गणसमर्पितचित्ताः कश्मलं ययुरपस्मृतनीव्यः ॥ ३ ॥
गोपियाँ आपसमें कहतीं, “अरी सखी! जब मुक्ति प्रदान करने वाले मुकुन्द अपनी बाईं भुजा पर बायां कपोल (गाल) टिकाकर, अपनी भृकुटियों को नचाते हुए, अधरों पर वंशी धारण करते हैं; और अपनी कोमल अंगुलियों को वंशी के छिद्रों पर फिराते हुए मधुर तान छेड़ते हैं तब उस संगीत को सुनकर आकाशगामी विमानों में स्थित सिद्धों की पत्नियां अपने पतियों के साथ विस्मित हो जाती हैं। वे लज्जित होकर विचार करती हैं कि उनका संगीत-ज्ञान इस वंशी-ध्वनि के सम्मुख तुच्छ है। कामदेव के बाणों से उनका चित्त श्रीकृष्ण के चरणों में समर्पित हो जाता है और वे सुध-बुध खो देती हैं, यहाँ तक कि उन्हें अपने वस्त्रों के खिसकने का भी भान नहीं रहता। (भागवत 10.35.2-3)
“गोपियाँ आपस में कहने लगीं, “सखियो, यह कितना अद्भुत है। ये नन्दनन्दन श्रीकृष्ण कितने सुन्दर हैं। जब वे हँसते हैं तब हास्य रेखाएँ हारका रूप धारण कर लेती हैं। उनके उजले दाँत मोतियों जैसे दिखाई देते हैं।
“उनके वक्ष पर झूलता हुआ हार और भी चमक उठता है। उनके वक्ष पर जो श्रीवत्स का चिन्ह है, वह ऐसा लगता है जैसे काले बादल पर बिजली ठहर गई हो। जब वे दुःखी लोगों को सुख देने के लिए और विरह में तड़प रहे लोगों में फिर से प्राण भरने के लिए बाँसुरी बजाते हैं, तब व्रज के झुंड-के-झुंड बैल, गायें और हिरन उनके पास दौड़े चले आते हैं।
“इतना ही नहीं सखी, उनके मुँह में चबाया हुआ घास का टुकड़ा वैसे का वैसा रह जाता है। न वे उसे निगल पाते हैं, न उगल पाते हैं। दोनों कान खड़े करके वे ऐसे स्थिर हो जाते हैं, मानो सो गए हों या दीवार पर बने चित्र हों। ऐसा होना स्वाभाविक ही है, क्योंकि श्रीकृष्ण की बाँसुरी की ध्वनि उनका मन पूरी तरह खींच लेती है।
“सखी, जब नन्द के लाड़ले श्रीकृष्ण अपने सिर पर मोरपंख लगाते हैं, घुँघराले बालों में फूल सजा लेते हैं, शरीर पर रंग लगाते हैं और नई पत्तियों से अपना वेष बनाते हैं, तब वे बहुत ही सुन्दर दिखाई देते हैं। फिर वे बलरामजी और ग्वालबालों के साथ बाँसुरी बजाते हुए गायों को नाम लेकर पुकारते हैं।
“उस समय, प्यारी सखियो, नदियों का बहना भी रुक जाता है। वे चाहती हैं कि हवा उड़कर हमारे प्रिय श्रीकृष्ण के चरणों की धूल उनके पास पहुँचा दे, ताकि उसे पाकर वे धन्य हो जाएँ। लेकिन सखियो, वे भी हमारी ही तरह भाग्यहीन हैं। जैसे श्रीकृष्ण का आलिंगन करते समय हमारे हाथ प्रेम के कारण काँपने लगते हैं और हम उन्हें हिला भी नहीं पातीं, वैसे ही नदियाँ भी प्रेम से काँपने लगती हैं। वे अपनी लहरों रूपी भुजाएँ दो-चार बार उठाने की कोशिश करती हैं, लेकिन फिर विवश होकर स्थिर हो जाती हैं। प्रेम के कारण वे भी जड़-सी हो जाती हैं।
“सखी, जैसे देवता अनन्त और अचिन्त्य शक्तियों वाले भगवान् नारायण के गुण गाते रहते हैं, वैसे ही ग्वालबाल नटनागर श्रीकृष्ण की लीलाओं का गान करते रहते हैं। जब वही श्रीकृष्ण वृन्दावन में घूमते हैं और बाँसुरी बजाकर गोवर्धन की तराई में चरती हुई गौओं को नाम लेकर बुलाते हैं, तब वन के वृक्ष और लताएँ फूलों और फलों से भर जाती हैं। उनके भार से डालियाँ झुककर धरती को छूने लगती हैं, मानो वे प्रणाम कर रही हों। प्रेम से उनका रोम-रोम खिल उठता है और वे मधु की धाराएँ बरसाने लगती हैं।”
गोपियाँ कहने लगीं, “सखी, इस संसार में और इसके बाहर जो कुछ भी देखने योग्य है, उनमें सबसे अधिक सुन्दर और सबसे मधुर हमारे मनमोहन श्रीकृष्ण ही हैं। उनके साँवले मस्तक पर लगा केसर बहुत ही शोभा देता है, बस देखते ही मन ठहर जाता है। उनके गले में घुटनों तक लटकती हुई वनमाला है। उसमें तुलसी की दिव्य सुगन्ध फैली रहती है। उस सुगन्ध और मधु से मोहित होकर भौंरों के झुंड मधुर और ऊँचे स्वर में गुनगुनाते रहते हैं। हमारे नटनागर श्यामसुन्दर उन भौंरों की गुनगुनाहट को सुनते हैं और उसी लय में अपनी बाँसुरी बजाने लगते हैं।
“सखी, उस समय उनका वह मन को मोह लेने वाला संगीत सुनकर तालाबों में रहने वाले सारस, हंस और अन्य पक्षी भी अपना होश खो बैठते हैं। वे विवश होकर श्रीकृष्ण के पास आकर बैठ जाते हैं, आँखें बन्द कर लेते हैं और मन को एकाग्र करके उनकी आराधना करने लगते हैं, मानो वे कोई महान साधक हों। सच कहो सखी, यह कितनी अद्भुत बात है।
“सखियो, जब हमारे श्यामसुन्दर अपने कानों में फूलों के कुण्डल पहन लेते हैं और बलरामजी के साथ गोवर्धन पर्वत पर खड़े होकर बाँसुरी बजाते हैं, तो ऐसा लगता है मानो वे पूरी दुनिया को आनन्द से भर रहे हों। उस समय बादल भी उनकी बाँसुरी की तान के साथ धीरे-धीरे गरजने लगते हैं। वे डरते हैं कि कहीं तेज़ गरज से बाँसुरी की मधुर ध्वनि में बाधा न पड़ जाए। जब धूप तेज़ होती है, तो वही बादल श्यामसुन्दर पर छाया बन जाते हैं और कभी-कभी हल्की फुहार बरसाकर जैसे उन पर प्रेम बरसाते हैं। देवता भी बादलों की ओट से फूलों की वर्षा करते हैं।
“माता यशोदा, तुम्हारे लाड़ले लाल ग्वालबालों के साथ खेलने में बहुत निपुण हैं। वे बहुत चतुर हैं। उन्होंने बाँसुरी बजाना किसी से नहीं सीखा, अपने आप ही नये-नये राग निकाल लेते हैं। जब वे अपने लाल होंठों पर बाँसुरी रखकर मधुर स्वर निकालते हैं, तो ब्रह्मा, शंकर और इन्द्र जैसे बड़े देवता भी उस संगीत को समझ नहीं पाते और मोहित हो जाते हैं।
“उनके कोमल चरणों पर सुन्दर चिन्ह बने हैं। जब व्रज की भूमि गौओं के खुरों से दुखती है, तो वे अपने कोमल चरणों से उसे शान्त करते हुए धीरे-धीरे चलते हैं और साथ ही बाँसुरी भी बजाते रहते हैं। उनकी चाल, उनकी दृष्टि और बाँसुरी की ध्वनि हमारे हृदय में प्रेम और मिलन की इच्छा को बहुत बढ़ा देती है। उस समय हम इतनी मोहित हो जाती हैं कि हमें अपने वस्त्र और केशों की भी सुध नहीं रहती।
“उन्हें तुलसी की सुगन्ध बहुत प्रिय है, इसलिए वे तुलसी की माला सदा धारण करते हैं। श्यामसुन्दर के गले में मणियों की माला बहुत सुन्दर लगती है। जब वे उसी माला से गौओं की गिनती करते हुए किसी सखा के गले में बाँह डालकर गाते-बजाते चलते हैं, तो उनकी बाँसुरी की ध्वनि सुनकर हिरणियाँ भी मोहित हो जाती हैं और उनके पास आकर खड़ी हो जाती हैं, जैसे हम गोपियाँ सब कुछ छोड़कर उनके पास आ जाती हैं।
“यशोदा मैया, तुम सचमुच बहुत भाग्यशाली हो। ऐसे प्रेमी और कोमल हृदय वाले पुत्र तुम्हें ही मिल सकते हैं। जब वे ग्वालबालों और गौओं के साथ यमुना के तट पर खेलते हैं, तो ठंडी और सुगन्धित हवा उनकी सेवा करती है और देवता गीत गाकर उनका आदर करते हैं।”
अन्त में गोपियाँ कहती हैं, “सखियो, श्यामसुन्दर को व्रज की गौओं से बहुत प्रेम है। इसलिए उन्होंने गोवर्धन उठाया था। अब सन्ध्या हो रही है, वे गौओं को लेकर लौट रहे होंगे। रास्ते में ब्रह्मा और शंकर जैसे बड़े ज्ञानी उनके चरणों की वन्दना करते होंगे। देखो, गौओं के खुरों से उड़ी धूल उनकी वनमाला पर जम गई है। वे दिनभर घूमकर थक गए हैं, फिर भी उनका रूप हमारे नेत्रों को कितना आनन्द देता है। देखो सखी, व्रज के आभूषण श्यामसुन्दर हमारी ओर आ रहे हैं, जैसे चन्द्रमा विरह से तपे हुए हृदयों को शान्त करने के लिए उदय होता है।”
श्रीशुकदेवजी कहते हैं, "गोपियों का मन सदा श्रीकृष्ण में ही लगा रहता था। दिन में जब भगवान् श्रीकृष्ण गौओं को चराने के लिए वन चले जाते, तब गोपियाँ उनका ही स्मरण करती रहतीं। वे अपनी-अपनी सखियों के साथ बैठकर श्रीकृष्ण की अलग-अलग लीलाओं का गान करतीं और उसी में आनन्द पातीं। इसी प्रकार उनका पूरा दिन बीत जाता।”
सारांश: JKYog India Online Class- श्रीमद् भागवत कथा [हिन्दी]- 06.02.2026