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98- गोपियों ने बताया क्या है जीव का वास्तविक धर्म और श्रीमद्भागवतम् में श्रीराधा तत्त्व का प्रमाण

Jan 25th, 2026 | 10 Min Read
Blog Thumnail

Category: Bhagavat Purana

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Language: Hindi

श्रीमद्भागवत महापुराण- स्कन्ध: 10 अध्याय: 29-30

जब भगवान् श्रीकृष्ण ने देखा कि व्रज की अनुपम गोपियाँ उनके पास आ गई हैं, तब उन्होंने अपनी मधुर और हँसी से भरी वाणी से उन्हें और भी मोहित करते हुए बात कही। भूत, वर्तमान और भविष्य को जानने वाले जितने भी ज्ञानी हैं, उनमें भगवान् श्रीकृष्ण ही सबसे श्रेष्ठ हैं।
श्रीभगवानुवाच – 
स्वागतं वो महाभागाः प्रियं किं करवाणि वः ।
व्रजस्यानामयं कच्चिद् ब्रूतागमनकारणम् ॥ 
भगवान् श्रीकृष्णने कहा, “महाभाग्यवती गोपियो! तुम्हारा स्वागत है। बतलाओ, तुम्हें प्रसन्न करनेके लिये मैं कौन-सा काम करूँ? व्रजमें तो सब कुशल-मंगल है न? कहो, इस समय यहाँ आनेकी क्या आवश्यकता पड़ गयी?” (भागवत 10.29.18)

सुन्दरी गोपियो! रातका समय है, यह स्वयं ही बड़ा भयावना होता है और इसमें बड़े-बड़े डरावने जीव-जन्तु इधर-उधर घूमते रहते हैं। अतः तुम सब तुरंत व्रजमें लौट जाओ। रातके समय घोर जंगलमें स्त्रियोंको नहीं रुकना चाहिये। तुम्हें न देखकर तुम्हारे माँ-बाप, पति-पुत्र और भाई-बन्धु ढूँढ़ रहे होंगे। उन्हें भयमें न डालो।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले की तुम लोगों ने रंग-बिरंगे फूलों से भरा यह वन, पूर्णिमा के चन्द्रमा की कोमल किरणें, यमुना के जल को छूकर बहने वाली ठंडी हवा, यह सब देख लिया है, अब देर मत करो। जल्दी से व्रज लौट जाओ। तुम कुल की मर्यादा रखने वाली स्त्रियाँ हो। अपने पतियों की सेवा करो। तुम्हारे घरों में छोटे-छोटे बच्चे और गौओं के बछड़े रो रहे हैं। उन्हें दूध पिलाओ और गौओं को दुहो।

यदि मेरे प्रेम के कारण तुम यहाँ आई हो, तो इसमें कोई अनुचित बात भी नहीं है। यह तुम्हारे स्वभाव के अनुसार ही है। क्योंकि इस संसार में पशु और पक्षी भी मुझसे प्रेम करते हैं और मुझे देखकर प्रसन्न हो जाते हैं।
भर्तुः शुश्रूषणं स्त्रीणां परो धर्मो ह्यमायया ।
तद्‍बन्धूनां च कल्याणः प्रजानां चानुपोषणम् ॥
"स्त्रियों के लिए कपट-रहित होकर अपने पति की सेवा करना ही परम धर्म है। साथ ही पति के भाई-बन्धुओं का हित करना और सन्तान का पालन-पोषण करना भी उनका धर्म है।"(भागवत 10.29.24)

भगवान् श्रीकृष्ण बोले की जो स्त्रियाँ परलोक में उत्तम गति (स्वर्ग या सम्मान) चाहती हैं, उन्हें अपने पति का त्याग नहीं करना चाहिए चाहे वह पति बुरे स्वभाव का हो, भाग्यहीन हो, बूढ़ा हो, मूर्ख या मंदबुद्धि हो, रोगी हो या अत्यंत निर्धन ही क्यों न हो; बशर्ते वह 'पातकी' (शास्त्रों द्वारा वर्जित महापाप करने वाला) न हो।

कुल की मर्यादा रखने वाली स्त्रियों के लिए परपुरुष की सेवा करना निन्दनीय है। इससे परलोक बिगड़ जाता है, स्वर्ग नहीं मिलता और इस लोक में भी बदनामी होती है। यह कर्म स्वयं ही तुच्छ और क्षणिक है, और वर्तमान में भी केवल दुःख ही देता है। मोक्ष तो दूर की बात है, यह कर्म नरक का कारण बनता है।

हे गोपियो, मेरी लीलाओं को सुनने से, मेरे रूप के दर्शन से, मेरे नाम और गुणों के कीर्तन और ध्यान से जो अनन्य प्रेम मिलता है, वह पास रहने मात्र से नहीं मिलता। इसलिए तुम सब अभी अपने-अपने घर लौट जाओ।

गोपियों ने श्रीकृष्ण को बताया जीव का वास्तविक धर्म

श्रीशुकदेवजी कहते हैं की भगवान् श्रीकृष्ण के ये कठोर वचन सुनकर गोपियाँ बहुत उदास औरखिन्न हो गयीं। उनकी आशा टूट गयी। वे चिन्ताके अथाह समुद्र में डूबने-उतराने लगीं। शोकके कारण चलनेवाली लम्बी और गरम साँससे उनके होंठ सूख गये। उन्होंने अपना मुख नीचे झुका लिया और पैरों के नाखूनों से धरती कुरेदने लगीं। उनकी आँखों से आँसू बहने लगे। वे आँसू काजल के साथ बहकर उनके वक्ष पर गिर पड़े और वहाँ लगे केसर को धोने लगे। उनका हृदय दुःख से इतना भर गया कि वे कुछ बोल ही नहीं सकीं। वे चुपचाप वहीं खड़ी रह गईं।

उन्होंने किसी तरह धैर्य रखा, अपने आँसू पोंछे और फिर प्रेम से भरे क्रोध के साथ काँपती हुई वाणी में बोलने लगीं, “प्रिय श्रीकृष्ण, तुम सबके हृदय में रहने वाले हो। तुम हमारे मन की बात जानते हो। फिर भी तुम हमसे ऐसे कठोर वचन न कहो। हम सब कुछ छोड़कर केवल तुम्हारे चरणों में ही प्रेम करती हैं। यह सत्य है कि तुम स्वतन्त्र हो, हम तुम पर कोई अधिकार नहीं रखते। फिर भी जैसे आदिपुरुष भगवान् नारायण अपने भक्तों पर कृपा करते हैं, वैसे ही कृपा करके हमें स्वीकार करो। हमें छोड़ो मत।”
यत्पत्यपत्यसुहृदां अनुवृत्तिरङ्‌ग स्त्रीणां स्वधर्म इति धर्मविदा त्वयोक्तम् ।
अस्त्वेवमेतदुपदेशपदे त्वयीशे प्रेष्ठो भवांस्तनुभृतां किल बन्धुरात्मा ॥
“हे प्रभु! आपने जो यह कहा कि स्त्रियों का स्वधर्म अपने पति, संतान और मित्रों की सेवा करना है, वह धर्म के ज्ञाता के रूप में आपका उपदेश बिल्कुल सत्य है। यह हमें स्वीकार है। किंतु आप स्वयं ही समस्त देहधारियों के परम प्रियतम, बंधु और उनकी आत्मा हैं। इसलिए, आपकी सेवा करना ही वास्तव में उन सभी धर्मों का मूल उद्देश्य और उनकी पूर्णता है।” (भागवत 10.29.32)

गोपियाँ कहती हैं कि जो पति, पुत्र और सम्बन्धी नश्वर हैं और दुःख देने वाले भी हो सकते हैं, उनसे हमें क्या लेना। इसलिए प्रभु, हम पर कृपा करो और हमें स्वीकार करो। हमारी वर्षों से पाली हुई आशा को मत तोड़ो। अब तक हमारा मन घर के कामों में लगा रहता था। लेकिन तुमने बिना किसी प्रयास के हमारा मन अपनी ओर खींच लिया। अब हमारे पाँव तुम्हारे चरणों को छोड़कर कहीं जाने को तैयार नहीं हैं। फिर हम व्रज कैसे लौटें। वहाँ जाकर भी हम क्या करें।

प्रियतम, तुम्हारी मधुर मुसकान, स्नेह भरी दृष्टि और बाँसुरी की ध्वनि ने हमारे हृदय में तुम्हारे प्रेम की आग जला दी है। यदि तुम उसे शान्त नहीं करोगे, तो हम विरह की पीड़ा से अपने शरीर त्याग देंगी और ध्यान के द्वारा तुम्हारे चरणों को ही प्राप्त करेंगी।

जिन चरणों की धूल पाने के लिए बड़े-बड़े देवता तप करते हैं, उन्हीं चरणों की शरण में हम भी आई हैं। अब तक जिसने भी तुम्हारी शरण ली, उसके दुःख तुमने दूर किए। अब हम पर भी कृपा करो। हमें अपनी सेवा का अवसर दो। हम घर, गाँव और परिवार सब छोड़कर केवल तुम्हारी सेवा की इच्छा से तुम्हारे चरणों में आई हैं।

तुम्हारा सुन्दर मुख, तुम्हारे नेत्र, तुम्हारी मुसकान और तुम्हारा रूप देखकर हम सब तुम्हारी हो गई हैं। तीनों लोकों में ऐसी कौन-सी स्त्री होगी, जो तुम्हारी बाँसुरी की मधुर ध्वनि और तुम्हारे रूप को देखकर मोहित न हो जाए।

हम जानती हैं कि जैसे भगवान् नारायण देवताओं की रक्षा करते हैं, वैसे ही तुम व्रज के दुःख दूर करने के लिए प्रकट हुए हो। दीनों पर तुम्हारी बड़ी कृपा है। हम भी दुःखी हैं। मिलन की तड़प से हमारा हृदय जल रहा है। हे प्रियतम, अपनी कोमल हथेलियाँ हमारे सिर और हृदय पर रखकर हमें अपना लो और हमें जीवनदान दो।

श्रीशुकदेवजी कहते हैं की भगवान् श्रीकृष्ण सनक आदि योगियों और शिव जैसे महान योगेश्वरों के भी स्वामी हैं। जब उन्होंने गोपियों की दुःख और व्याकुलता से भरी बातें सुनीं, तो उनका हृदय करुणा से भर गया।

गोपियों का अभिमान और श्रीकृष्ण का अंतर्धान

यद्यपि भगवान् श्रीकृष्ण आत्माराम हैं, वे अपने आप में ही सन्तुष्ट रहते हैं और उन्हें किसी बाहरी वस्तु की आवश्यकता नहीं है, फिर भी गोपियों पर कृपा करके उन्होंने मुसकुराते हुए उनके साथ क्रीड़ा आरम्भ की।

भगवान् श्रीकृष्ण की स्नेह भरी दृष्टि और दर्शन से गोपियों के चेहरे खिल उठे। वे सब उन्हें चारों ओर से घेरकर खड़ी हो गईं। उस समय श्रीकृष्ण ऐसे शोभित हो रहे थे, जैसे तारों से घिरा चन्द्रमा। गोपियों के अनेक समूहों के बीच भगवान् श्रीकृष्ण वैजयन्ती माला धारण किए वृन्दावन में विचरण करने लगे। फिर भगवान् श्रीकृष्ण गोपियों के साथ यमुना के पवित्र तट पर पहुँचे। उस स्थान पर भगवान् ने गोपियों के साथ क्रीड़ा की।

वे प्रेम से हाथ बढ़ाते, आलिंगन करते, हँसी-विनोद करते और स्नेह भरी दृष्टि से देखते थे। इन सब से गोपियों का प्रेम और भी गहरा हो गया और वे अत्यन्त आनन्दित हुईं। जब भगवान् ने इस प्रकार गोपियों का मान बढ़ाया, तो उनके मन में यह भाव आ गया कि हम सबसे विशेष हैं। उनमें थोड़ा गर्व आ गया। यह देखकर भगवान् श्रीकृष्ण ने उनका गर्व दूर करने और उन्हें फिर से प्रसन्न करने के लिए, वहीं उनके बीच से अचानक अन्तर्धान हो गए।

जब गोपियों ने श्रीकृष्ण को नहीं देखा, तो उनकी दशा वैसी हो गई, जैसे अपने मुखिया के बिना हथिनियों की हो जाती है। उनका हृदय विरह की पीड़ा से जलने लगा। श्रीकृष्ण की चाल, उनकी मधुर मुसकान, स्नेह भरी दृष्टि, प्रेमपूर्ण बातें और उनकी लीलाओं ने गोपियों का मन पूरी तरह मोह लिया था। प्रेम में डूबी हुई वे गोपियाँ पूरी तरह श्रीकृष्ण में ही डूब गईं।
वे श्रीकृष्ण की चाल-ढाल, हँसी, बोलने के ढंग और भाव-भंगिमा का अनुकरण करने लगीं। धीरे-धीरे वे स्वयं को भूल गईं और श्रीकृष्ण के ही रंग में रंग गईं। उनकी गति, उनका भाव और उनका व्यवहार श्रीकृष्ण जैसा हो गया। इस अवस्था में वे उनकी लीलाओं का अभिनय करती हुई कहने लगीं, “मैं ही श्रीकृष्ण हूँ।”

गोपियाँ ऊँचे स्वर से उनका गुणगान करती हैं और वन-वन, लता-वृक्षों से उन्हें खोजती फिरती हैं। श्रीकृष्ण कहीं दूर नहीं हैं, वे सबके भीतर और बाहर सर्वत्र स्थित हैं, फिर भी प्रेमावेश में गोपियाँ उन्हें न देख पाकर पेड़-पौधों, लताओं, पृथ्वी और पशुओं से उनका पता पूछती हैं।
विरह और उत्कट प्रेम से व्याकुल होकर वे स्वयं श्रीकृष्ण की लीलाओं का अनुकरण करने लगती हैं- कहीं पूतना-वध, शकटासुर-वध, तृणावर्त-वध, बकासुर-वत्सासुर-वध, कहीं गोवर्धन-धारण, कालिय-दमन, बाँसुरी-वादन और यशोदा-लीला।

भागवत में 'अनयाराधितो' शब्द का असली अर्थ

इस प्रकार प्रेमोन्माद में डूबी गोपियाँ श्रीकृष्णमय हो जाती हैं और उनकी लीलाओं को जीते हुए उन्हें खोजती रहती हैं। इसी समय उन्होंने एक स्थानपर भगवान्के चरणचिह्न देखे। वे आपसमें कहने लगीं, "अवश्य ही ये चरणचिह्न श्यामसुन्दरके हैं; क्योंकि इनमें ध्वजा, कमल, वज्र, अंकुश और जौ आदिके चिह्न स्पष्ट ही दीख रहे हैं’।
तैस्तैः पदैस्तत्पदवीमन्विच्छन्त्योऽग्रतोऽबलाः ।
वध्वाः पदैः सुपृक्तानि विलोक्यार्ताः समब्रुवन् ॥
श्रीकृष्ण के पद-चिह्नों के सहारे उनके मार्ग को खोजती हुई वे विह्वल गोपियाँ जब आगे बढ़ीं, तब उन्होंने भगवान के पद-चिह्नों के साथ किसी वधू (विशेष गोपी) के पद-चिह्नों को मिले हुए देखा। यह देखकर वे दुःखित होकर आपस में कहने लगीं- (भागवत 10.30.26) 
  • वध्वाः- इसका अर्थ है "वधू के" या "उस विशेष प्रियतमा के"। पदैः- पैरों के निशानों (चरण-चिह्नों) के साथ। सुपृक्तानि- पूरी तरह से मिले हुए या जुड़े हुए।
गोपियाँ आपसमें कहने लगीं, "जैसे हथिनी अपने प्रियतम गजराजके साथ गयी हो, वैसे ही नन्दनन्दन श्यामसुन्दरके साथ उनके कंधेपर हाथ रखकर चलनेवाली किस बडभागिनीके ये चरणचिह्न हैं?"
अनयाराधितो नूनं भगवान् हरिरीश्वरः ।
यन्नो विहाय गोविन्दः प्रीतो यामनयद्रहः ॥
“निश्चित रूप से इस गोपी ने भगवान श्रीहरि की सर्वाधिक श्रेष्ठ आराधना की है। तभी तो भगवान गोविन्द ने प्रसन्न होकर हमें छोड़ दिया और वे इन्हें लेकर एकांत में चले गए हैं।” (भागवत 10.30.28)
  • यदि शुकदेव जी मुख से एक बार 'राधा' कह देते, तो वे छह महीने के लिए समाधि में चले जाते, और परीक्षित के पास केवल सात दिन थे। इसलिए उन्होंने 'अनयाराधितो' कहकर श्रीराधा के तरफ़ संकेत दिया।
  • यहाँ 'आराधना' का अर्थ कोई सामान्य कर्मकांड नहीं, बल्कि 'प्रेम की पराकाष्ठा' है। श्रीराधा श्रीकृष्ण की आदि-आराधिका हैं, जो कृष्ण से प्रेम करने वाले समस्त भक्तों में सर्वोच्च स्थान पर विराजमान हैं। वे स्वयं 'मादनाख्य महाभाव' स्वरूपा हैं, जो प्रेम की उच्चतम अवस्था है। अतः, 'अनयाराधितो' शब्द यह प्रमाणित करता है कि यह गोपी ने अवश्य ही श्रीकृष्ण की ‘विशेष आराधना’ की होगी जिनके के कारण श्री हरि उनको लेकर चले गए।
  • राधा जी कृष्ण की वह 'शक्ति' हैं जो 'शक्तिमान' (कृष्ण) को भी आनंद प्रदान करती हैं। इस श्लोक में 'प्रीतो' (प्रसन्न होना) शब्द प्रत्यक्ष रूप से श्रीराधा की ओर संकेत करता है, क्योंकि केवल श्रीराधा ही श्रीकृष्ण को पूर्णतः प्रसन्न कर सकती हैं। श्रीराधा, शक्तिमान श्रीकृष्ण की 'ह्लादिनी शक्ति' (आनंददायिनी शक्ति) हैं। इसी शक्ति के माध्यम से श्रीकृष्ण समस्त जीवों को आनंद प्रदान करते हैं और इसी शक्ति के द्वारा वे स्वयं भी आनंदित होते हैं। अतः 'प्रीतो' शब्द उस दिव्य स्थिति को दर्शाता है जहाँ आनंद के स्रोत श्रीकृष्ण स्वयं अपनी आनंद-स्वरूपा शक्ति श्रीराधा द्वारा वशीभूत हो रहे हैं।
  • 'यन्नो विहाय' (हमें छोड़कर): कृष्ण ने अरबों गोपियों को छोड़कर केवल एक को चुना। यह दर्शाता है कि वह गोपी कोई साधारण गोपी नहीं, बल्कि 'शिरोमणि' है।
  • 'रहः' (एकांत): भगवान का उन्हें एकांत में ले जाना यह सिद्ध करता है कि उनका और कृष्ण का संबंध 'नित्य' और 'स्वकीय' है। वे कृष्ण का अपना 'स्वरूप' हैं।
श्रीकृष्ण के चरण-चिह्नों को देखती हुई आगे बढ़रही गोपियाँ कहती हैं, “देखो, यहाँ उस गोपी के पद-चिह्न दिखाई नहीं दे रहे हैं। अवश्य ही श्यामसुन्दर ने यह सोचकर कि उसके कोमल पाँवों में घास चुभेगी, उसे अपने कंधे पर उठा लिया होगा।”

“यहाँ देखो! श्रीकृष्ण के चरणचिह्न बालू में बहुत गहरे धँसे हैं। लगता है, वे कोई भारी भार उठाकर चले हैं। निश्चय ही उन्होंने अपनी प्रियतम को कंधे पर बैठा लिया होगा।”

“देखो-देखो! यहाँ व्रजवल्लभ ने फूल चुनने के लिए अपनी प्रेयसी को नीचे उतारा है। उचक-उचककर फूल तोड़ते समय उनके पंजे धरती में गड़ गये हैं, एड़ी का तो निशान ही नहीं है।”

“और यहाँ तो परम प्रेमी श्रीकृष्ण ने अपनी प्रेयसी के केश सँवारे होंगे। लगता है, चुने हुए फूल उसकी चोटी में गूंथने के लिए वे यहीं बैठ गये होंगे।”

इस तरह गोपियाँ प्रेम में डूबी हुई, अपनी सुध-बुध खोकर, एक-दूसरे को भगवान् श्रीकृष्ण के चरणचिह्न दिखाती हुई वन-वन भटकने लगीं।

सारांश: JKYog India Online Class- श्रीमद् भागवत कथा [हिन्दी]- 23.01.2026