श्रीमद्भागवत महापुराण- स्कन्ध: 10 अध्याय: 45
श्रीशुकदेवजी परीक्षित से कहते हैं की भगवान श्रीकृष्ण ने देखा कि माता-पिता को अब मेरे ऐश्वर्य और भगवत्ता का ज्ञान हो गया है। परन्तु यह ज्ञान इनके लिए ठीक नहीं है, क्योंकि इससे ये पुत्र के स्नेह का सुख नहीं ले सकेंगे। ऐसा सोचकर उन्होंने उन पर अपनी योगमाया फैला दी, जो उनके अपने लोगों को मोहित रखकर उनकी लीलाओं में सहायक होती है।
श्रीकृष्ण बड़े भाई बलरामजी के साथ अपने माता-पिता के पास गए। उन्होंने आदर और विनय से झुककर कहा, “मेरी माँ, मेरे पिताजी! हम आपके पुत्र हैं। आप हमारे लिए हमेशा चिन्तित रहे, फिर भी आप हमारे बाल्य, पौगण्ड और किशोर अवस्था का सुख नहीं पा सके।
“दुर्भाग्य से हमें आपके पास रहने का अवसर ही नहीं मिला। पिता और माता ही इस शरीर को जन्म देते हैं और उसका पालन-पोषण करते हैं। तभी यह शरीर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्राप्त करने का साधन बनता है। यदि कोई मनुष्य सौ वर्ष तक जीकर माता-पिता की सेवा करे, तब भी वह उनके उपकार से मुक्त नहीं हो सकता।
“जो पुत्र समर्थ होते हुए भी अपने माता-पिता की शरीर और धन से सेवा नहीं करता, मरने के बाद यमदूत उसे उसके अपने शरीर का मांस खिलाते हैं। जो मनुष्य समर्थ होकर भी अपने बूढ़े माता-पिता, पतिव्रता पत्नी, छोटे बच्चों, गुरु, ब्राह्मण और शरण में आए हुए व्यक्ति का पालन-पोषण नहीं करता, वह जीते हुए भी मरे हुए के समान है। पिताजी! हमारे इतने दिन व्यर्थ बीत गए, क्योंकि कंस के भय से हम सदा चिन्ता में रहे और आपकी सेवा नहीं कर सके। मेरी माँ और मेरे पिताजी! आप हमें क्षमा करें। दुष्ट कंस ने आपको बहुत कष्ट दिए, पर हम उसके अधीन रहने के कारण आपकी सेवा नहीं कर सके।”
श्रीशुकदेवजी कहते हैं की श्रीहरि की इन बातों से देवकी और वसुदेव मोहित हो गए। उन्होंने दोनों पुत्रों को गोद में उठा लिया और हृदय से लगाकर बहुत आनन्द पाया। वे स्नेह में इतने डूब गए कि आँसू बहाने लगे। आँसुओं के कारण उनका गला भर आया और वे कुछ बोल भी न सके।
देवकीनन्दन भगवान श्रीकृष्ण ने इस प्रकार अपने माता-पिता को सान्त्वना दी और फिर अपने नाना उग्रसेन को यदुवंश का राजा बना दिया। उन्होंने उग्रसेन से कहा, “महाराज! हम आपकी प्रजा हैं, आप हम पर शासन कीजिए। राजा ययाति के शाप के कारण यदुवंशी राजसिंहासन पर नहीं बैठ सकते। पर मेरी इच्छा है कि आप ही राजा बनें, इसलिए आपको कोई दोष नहीं लगेगा। जब मैं सेवक बनकर आपकी सेवा करूँगा, तब बड़े-बड़े देवता भी सिर झुकाकर आपको भेंट देंगे। फिर दूसरे राजाओं की तो बात ही क्या है।”
जो यदु, वृष्णि, अन्धक, मधु, दाशार्ह और कुकुर आदि वंशों के लोग कंस के भय से इधर-उधर भाग गए थे, भगवान ने उन्हें ढूँढ़-ढूँढ़कर बुलवाया। घर से दूर रहने के कारण उन्हें बहुत कष्ट सहना पड़ा था। भगवान ने उनका आदर किया, उन्हें ढाढ़स दिया और बहुत धन देकर फिर से उनके अपने-अपने घरों में बसाया।
अब सारे-के-सारे यदुवंशी भगवान् श्रीकृष्ण तथा बलरामजीके बाहुबलसे सुरक्षित थे। उनकी कृपासे उन्हें किसी प्रकारकी व्यथा नहीं थी, दुःख नहीं था। उनके सारे मनोरथ सफल हो गये थे। वे कृतार्थ हो गये थे। अब वे अपने-अपने घरोंमें आनन्दसे विहार करने लगे।
भगवान् श्रीकृष्ण आनन्द सदन है। वह नित्य प्रफुल्लित, कभी न कुम्हलानेवाला कमल है। उसका सौन्दर्य अपार है। यदुवंशी दिन-प्रतिदिन उसका दर्शन करके आनन्दमग्न रहते। मथुराके वृद्ध पुरुष भी युवकोंके समान अत्यन्त बलवान् और उत्साही हो गये थे; क्योंकि वे अपने नेत्रोंके दोनोंसे बारंबार भगवान्के मुखारविन्दका अमृतमय मकरन्द-रस पान करते रहते थे।
कृष्ण ने नन्दबाबा और गोपों को मथुरा से विदा किया
अब देवकीनन्दन भगवान श्रीकृष्ण और बलरामजी नन्दबाबा के पास आए। गले मिलने के बाद उन्होंने उनसे कहा, “बाबा! आपने और यशोदा मैया ने बड़े स्नेह और दुलार से हमारा पालन-पोषण किया है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि माता-पिता अपनी सन्तान से अपने शरीर से भी अधिक प्रेम करते हैं। जिन बच्चों को उनके अपने लोग पालन-पोषण न कर पाने के कारण छोड़ देते हैं, उन्हें जो लोग अपने पुत्र की तरह स्नेह से पालते हैं, वही वास्तव में उनके माता-पिता होते हैं। बाबा! अब आप लोग व्रज लौट जाइए। हमारे बिना स्नेह के कारण आपको दुःख अवश्य होगा। यहाँ के अपने लोगों को सुखी करके हम भी आपसे मिलने व्रज आएँगे।”
इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण ने नन्दबाबा और दूसरे व्रजवासियों को समझाया। फिर उन्होंने आदर के साथ उन्हें वस्त्र, आभूषण और अनेक धातुओं के बने बरतन देकर उनका सत्कार किया। भगवान की बातें सुनकर नन्दबाबा प्रेम से भर गए। उन्होंने दोनों भाइयों को गले लगा लिया। उनकी आँखों में आँसू आ गए और फिर वे गोपों के साथ व्रज के लिए चल पड़े।
कृष्ण-बलराम का यज्ञोपवीत
इसके बाद वसुदेवजी ने अपने पुरोहित गर्गाचार्य और अन्य ब्राह्मणों से दोनों पुत्रों का विधि के अनुसार यज्ञोपवीत संस्कार कराया। उन्होंने ब्राह्मणों का आदर करके उन्हें बहुत-सी दक्षिणा दी और बछड़ों वाली गौएँ भी दान में दीं। वसुदेवजी ने पहले ही मन में संकल्प करके भगवान श्रीकृष्ण और बलरामजी के जन्म-नक्षत्र के समय ब्राह्मणों को जितनी गौएँ देने का निश्चय किया था, उन्हें कंस ने अन्याय से छीन लिया था। अब उन्हें याद करके उन्होंने वही गौएँ फिर से ब्राह्मणों को दे दीं।
इस प्रकार यदुवंश के आचार्य गर्गजी से संस्कार कराकर बलरामजी और भगवान श्रीकृष्ण द्विज बने। उनका ब्रह्मचर्य व्रत पहले से ही दृढ़ था, अब उन्होंने गायत्री मंत्र के साथ विधि से अध्ययन आरम्भ किया।
श्रीकृष्ण और बलराम संसार के स्वामी हैं। वे सब कुछ जानने वाले हैं और सभी विद्याएँ उन्हीं से निकली हैं। उनका ज्ञान स्वाभाविक और पूर्ण है। फिर भी उन्होंने मनुष्य की लीला करते हुए उसे छिपा रखा था।
कृष्ण-बलराम गए गुरुकुल
अब वे दोनों गुरुकुल में शिक्षा लेने की इच्छा से काश्यप गोत्र के सान्दीपनि मुनि के पास गए, जो अवन्तीपुर (उज्जैन) में रहते थे। दोनों भाई विधि के अनुसार गुरुजी के आश्रम में रहने लगे। उस समय वे बहुत संयम से रहते थे और अपने आचरण को पूरी तरह नियम में रखते थे। गुरुजी उनका आदर करते थे। भगवान श्रीकृष्ण और बलरामजी भी लोगों के सामने यह आदर्श रखते थे कि गुरु की सेवा कैसे करनी चाहिए। वे बड़ी श्रद्धा से अपने इष्टदेव के समान गुरुजी की सेवा करते थे।
गुरु सान्दीपनि मुनि उनकी सच्ची भावना से की गई सेवा से बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने दोनों भाइयों को वेदों की शिक्षा दी, साथ ही वेदों के छहों अंग और उपनिषद भी पढ़ाए। इसके अतिरिक्त उन्होंने मंत्र और देवताओं का ज्ञान, धनुर्वेद, मनुस्मृति आदि धर्मशास्त्र, मीमांसा जैसे वेदों का अर्थ समझाने वाले शास्त्र, और तर्कविद्या (न्यायशास्त्र) भी सिखाई। साथ ही सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्वैध और आश्रय—इन छह प्रकारों वाली राजनीति की शिक्षा भी दी।
शुकदेवजी परीक्षित को कहते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण और बलराम सभी विद्याओं के मूल हैं। फिर भी उस समय वे श्रेष्ठ मनुष्य की तरह आचरण करते हुए शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। उन्होंने गुरुजी के केवल एक बार बताने पर ही सारी विद्याएँ सीख लीं। सिर्फ चौंसठ दिन और रातों में ही उन दोनों संयमी भाइयों ने चौंसठों कलाओं का ज्ञान प्राप्त कर लिया।
अध्ययन पूरा होने पर उन्होंने सान्दीपनि मुनि से विनयपूर्वक कहा, “गुरुदेव! आपकी जो इच्छा हो, आप हमसे गुरुदक्षिणा माँगें।”
सान्दीपनि मुनिने उनकी अद्भुत महिमा और अलौकिक बुद्धिका अनुभव कर लिया था। इसलिये उन्होंने अपनी पत्नीसे सलाह करके यह गुरुदक्षिणा माँगी कि ‘प्रभासक्षेत्रमें हमारा बालक समुद्रमें डूबकर मर गया था, उसे तुमलोग ला दो’।
कृष्ण-बलराम यमलोक से गुरु-पुत्र को वापस ले आए
बलरामजी और श्रीकृष्णका पराक्रम अनन्त हैं। दोनों ही महारथी हैं। उन्होंने ‘बहुत अच्छा’ कहकर गुरुजीकी आज्ञा स्वीकार की और रथपर सवार होकर प्रभासक्षेत्रमें गये। वे समुद्र के किनारे जाकर थोड़ी देर बैठे। यह जानकर कि वे स्वयं परमेश्वर हैं, समुद्र अनेक प्रकार की पूजा-सामग्री लेकर उनके सामने आया। भगवान ने समुद्र से कहा, “समुद्र! तुम्हारी बड़ी तरंगें हमारे गुरु के पुत्र को यहाँ से बहा ले गई थीं। उसे शीघ्र हमारे पास लाकर दो।”
मनुष्य के रूप में आए समुद्र ने कहा, “देवाधिदेव श्रीकृष्ण! मैंने उस बालक को नहीं लिया। मेरे जल में पंचजन नाम का एक दैत्य शंख के रूप में रहता है। सम्भव है उसी ने उस बालक को ले लिया हो।”
समुद्र की बात सुनकर भगवान तुरंत जल में उतर गए और उस दैत्य शंखासुर को मार दिया। परन्तु वह बालक उसके पेट में नहीं मिला। तब भगवान उसके शरीर से बना शंख लेकर रथ पर लौट आए। वहाँ से श्रीकृष्ण बलरामजी के साथ यमराज की नगरी संयमनी गए और वहाँ अपना शंख बजाया।
शंख की ध्वनि सुनकर यमराज स्वयं उनका स्वागत करने आए। उन्होंने श्रद्धा से उनकी विधि के अनुसार पूजा की और नम्र होकर बोले, “सर्वव्यापक परमेश्वर! मैं आपकी क्या सेवा करूँ?
भगवान ने कहा, “यमराज! मेरा गुरुपुत्र यहाँ लाया गया है। मेरी आज्ञा मानकर उसे हमारे पास ले आओ और उसके कर्मों पर ध्यान मत दो।”
यमराज ने कहा, “जैसी आज्ञा,” और भगवान का आदेश मानकर गुरु के पुत्र को ले आए। तब श्रीकृष्ण और बलराम उस बालक को लेकर उज्जैन लौटे और गुरु को सौंप दिया। उन्होंने कहा, “गुरुदेव! यदि आप और कुछ चाहें तो माँग लें।”
गुरुजी बोले, “बेटा! तुम दोनों ने अच्छी गुरुदक्षिणा दी है। अब मुझे और क्या चाहिए? वीरो! अब तुम अपने घर जाओ। तुम्हें संसार को पवित्र करने वाली कीर्ति प्राप्त हो।”
श्रीशुकदेवजी कहते हैं, “परीक्षित! गुरुजी से आज्ञा लेकर दोनों भाई मथुरा लौट आए। मथुरा के लोग बहुत दिनों से श्रीकृष्ण और बलराम को नहीं देख पाए थे, इसलिए वे बहुत दुःखी थे। अब उन्हें लौटता देखकर सब बहुत आनन्दित हो गए, जैसे किसी को अपना खोया हुआ धन मिल गया हो।”
सारांश: JKYog India Online Class- श्रीमद् भागवत कथा [हिन्दी]- 09.03.2026