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100- महारास लीला: परीक्षित का संदेह और शुकदेवजी का उत्तर

Feb 5th, 2026 | 13 Min Read
Blog Thumnail

Category: Bhagavat Purana

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Language: Hindi

श्रीमद्भागवत महापुराण- स्कन्ध: 10 अध्याय: 32-33

श्रीशुकदेवजी परीक्षित से कहते हैं कि गोपियाँ विरह की अवस्था में गोपी-गीत गाते हुए अलग-अलग प्रकार से करुण स्वर में श्रीकृष्ण को पुकारने लगीं। श्रीकृष्ण के दर्शन की तीव्र लालसा के कारण वे अपने को रोक न सकीं और फूट-फूटकर विलाप करने लगीं। 

गोपियों की इस करुण अवस्था को देखकर, उसी समय उनके बीच भगवान् श्रीकृष्ण प्रकट हो गए। उनके मुख पर हल्की मुसकान थी। गले में वनमाला थी और वे पीताम्बर धारण किए हुए थे। उनका रूप इतना मनोहर था कि वह सबके मन को मोहित कर रहा था।

अपने प्राणप्रिय श्यामसुन्दर को सामने देखकर गोपियों की आँखें प्रेम और आनन्द से खिल उठती हैं। क्षण भर पहले जो देह विरह से शिथिल पड़ी थी, वह सहसा जीवित हो उठती है, जैसे निर्जीव शरीर में एकाएक प्राणों का संचार हो गया हो। वे सब एक साथ उठ खड़ी होती हैं और प्रत्येक अंग में नई चेतना, नई शक्ति प्रवाहित होने लगती है।

एक गोपी प्रेमातुर होकर श्रीकृष्ण के करकमलों को अपने हाथों में लेकर उन्हें सहलाने लगती है, मानो स्पर्श से ही अपने हृदय का समस्त ताप शान्त करना चाहती हो। दूसरी गोपी उनकी चन्दन-सुगन्धित भुजा को अपने कंधे पर रख लेती है और उस क्षण को अनन्त बना लेना चाहती है। तीसरी, सेवा-भाव से भरकर, उनका पान अपने हाथ में ले लेती है। चौथी, जो विरह की ज्वाला से अत्यन्त व्याकुल हो चुकी है, वहीं बैठ जाती है और उनके चरणकमलों को अपने वक्षस्थल पर रखकर पूर्ण शरण में चली जाती है।

पाँचवीं गोपी प्रेम से भरे मान के साथ भौंहें चढ़ाकर, होंठ दबाकर, उनकी ओर देखती है, मानो कह रही हो, “इतनी देर कहाँ लगे श्याम?” छठी गोपी बिना पलक झपकाए उनके मुखमण्डल की मधुरता को निहारती रहती है, फिर भी नेत्र और मन दोनों तृप्त नहीं होते। सातवीं गोपी भगवान् को नेत्रों के मार्ग से अपने हृदय में बसा लेती है और आँखें बन्द कर लेती है। मन ही मन उनका आलिंगन करते हुए उसका सम्पूर्ण शरीर रोमांच से भर उठता है और वह गहरे, मौन आनन्द में डूब जाती है।

श्रीशुकदेवजी परीक्षित से कहते हैं की जैसे मोक्ष के अभिलाषी जीव किसी परम ज्ञानी महापुरुष को प्राप्त करके संसार के समस्त तापों से मुक्त हो जाते हैं, वैसे ही गोपीयाँ भगवान् श्रीकृष्ण के दर्शन मात्र से परम आनन्द और उल्लास से परिपूर्ण हो गईं। विरह के कारण जो दुःख उनके हृदय में संचित हो गया था, वह उसी क्षण नष्ट हो गया।

भगवान् श्रीकृष्ण सदा अच्युत हैं, एकरस हैं। उनका सौन्दर्य और माधुर्य कभी घटता नहीं। फिर भी जब गोपियाँ विरह-बन्धन से मुक्त हुईं, तब उनके मध्य स्थित श्रीकृष्ण की शोभा और अधिक बढ़ गई। जैसे परमेश्वर अपनी नित्य शक्तियों से सेवित होकर और भी शोभायमान हो जाते हैं, वैसे ही उस समय गोपियों के प्रेम से घिरे हुए श्रीकृष्ण अत्यन्त दिव्य प्रतीत हो रहे थे।
इसके पश्चात् भगवान् श्रीकृष्ण उन व्रजसुन्दरियों को साथ लेकर यमुना के तट पर पहुँचे। वहाँ कुन्द और मन्दार के खिले हुए पुष्पों की सुगन्ध से युक्त शीतल समीर बह रही थी। उसकी मधुर गन्ध से भौंरे मतवाले होकर मँडरा रहे थे।

शरद् पूर्णिमा की चन्द्रिका चारों ओर फैल रही थी। रात्रि का अन्धकार कहीं भी दृष्टिगोचर नहीं होता था। सम्पूर्ण वातावरण आनन्द और मंगल से परिपूर्ण हो गया था। यमुना ने अपनी मन्द लहरों से मानो भगवान् की लीला के लिए रेत का कोमल मंच स्वयं सुसज्जित कर दिया हो।
तब गोपियों ने अपनी ओढ़नियाँ बिछाकर अपने प्रिय श्रीकृष्ण के लिए आसन बनाया। 

जिन भगवान् को बड़े-बड़े योगी अपने शुद्ध हृदय में भी स्थिर नहीं कर पाते, वही सर्वशक्तिमान् भगवान् यमुना की रेत पर गोपियों की ओढ़नियों पर विराजमान हो गए। असंख्य गोपियों के मध्य पूजित होकर वे अत्यन्त शोभायमान हो रहे थे।

तीनों लोकों और तीनों कालों में जहाँ कहीं भी जो कुछ सौन्दर्य दिखाई देता है, वह भगवान् श्रीकृष्ण के सौन्दर्य का केवल एक अंश मात्र है। वे ही समस्त सौन्दर्य के आधार हैं, स्वयं सौन्दर्यस्वरूप हैं।

भगवान् श्रीकृष्ण अपने दिव्य सौन्दर्य से गोपियों के प्रेम और मिलन की अभिलाषा को और भी प्रबल कर रहे थे। गोपियाँ अपनी मन्द मुसकान, प्रेमपूर्ण दृष्टि और तिरछी भौंहों के संकेतों से उनका सत्कार कर रही थीं। किसी गोपी ने उनके चरण अपनी गोद में रख लिए, तो किसी ने उनके करकमल थाम लिए।

वे उनके स्पर्श का रस अनुभव करती हुई बार-बार कह उठीं, “अहो! ये चरण कितने कोमल हैं, ये करकमल कितने मधुर हैं।”

गोपियों ने पूछा कृष्ण से- तुम कैसे प्रेमी हो?

श्रीशुकदेवजी कहते हैं की भगवान् श्रीकृष्ण के दर्शन पाकर गोपियाँ यद्यपि परम आनन्द से भर गई थीं, तथापि उनके मन में श्रीकृष्ण के छिप जाने की पूर्व लीला स्मरण हो आई। उस स्मृति से उनके हृदय में मान का सूक्ष्म भाव जाग उठा। वे भीतर-ही-भीतर किंचित् रूठ गईं और चाहने लगीं कि श्रीकृष्ण स्वयं अपने मुख से अपने आचरण का कारण प्रकट करें। उसी भाव से उन्होंने उनसे मधुर किन्तु गूढ़ वाणी में संवाद आरम्भ किया।

गोपियाँ बोलीं, “हे नटनागर! इस संसार में कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो केवल उन्हीं से प्रेम करते हैं, जो उनसे प्रेम करते हैं। कुछ ऐसे होते हैं, जो प्रेम न करने वालों से भी प्रेम करते हैं। और कुछ ऐसे भी होते हैं, जो किसी से भी प्रेम नहीं करते। प्रिय! इनमें से कौन से हो?”

भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा, “हे प्रिय सखियो! जो लोग केवल प्रेम के प्रत्युत्तर में प्रेम करते हैं, उनका व्यवहार स्वार्थ से युक्त होता है। वे प्रेम को लेन-देन की वस्तु बना लेते हैं। ऐसे प्रेम में न तो सच्चा स्नेह होता है और न ही धर्म का आधार।

जो लोग प्रेम न करने वालों से भी प्रेम करते हैं, जैसे माता-पिता या करुणाशील सज्जन, उनका हृदय निष्कपट स्नेह से परिपूर्ण होता है। उनके आचरण में छल नहीं होता। वही प्रेम वास्तव में धर्मस्वरूप है। ऐसा प्रेम वास्तव में केवल गुरु एवं महापुरुष ही कर सकता है।
और हे गोपियो! कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो प्रेम करने वालों से भी प्रेम नहीं करते। ऐसे लोग चार प्रकार के होते हैं:
  1. पहले वे, जो अपने ही आत्मस्वरूप में लीन रहते हैं। उन्हें न किसी से भेद का अनुभव होता है, न अभेद का। वे आत्माराम, परमहंस, समाधि में स्थित होते हैं।
  2. दूसरे वे, जिन्हें भेद का बोध तो होता है, किन्तु वे पूर्णकाम हो चुके होते हैं। उन्हें किसी से कोई अपेक्षा नहीं रहती। वे आप्तकाम, हंसस्वरूप होते हैं।
  3. तीसरे वे, जो यह समझ ही नहीं पाते कि कौन उनसे प्रेम करता है। वे अकृतज्ञ होते हैं।
  4. और चौथे वे गुरुद्रुहः, जो जान-बूझकर अपने हितैषी, परोपकारी, गुरुतुल्य जनों से भी द्रोह करते हैं। उनका अन्तःकरण इतना मलिन और पापपूर्ण होता है कि वे किसी से प्रेम करने में समर्थ ही नहीं होते।
हे गोपियो! मैं भी कभी-कभी प्रेम करने वालों के साथ वैसा व्यवहार नहीं करता, जैसा सामान्य दृष्टि से उचित प्रतीत होता है। जो मेरा भजन करते हैं, मैं बाहर से उनका भजन नहीं करता, अपितु उलटा आचरण करता हुआ प्रतीत होता हूँ।

मैं ऐसा इसीलिये करता हूँ कि उनका मन और अधिक मुझमें ही स्थित हो जाए। जैसे किसी निर्धन पुरुष को सहसा महान् धन प्राप्त हो जाए और फिर वह धन नष्ट हो जाए, तो उसका चित्त उसी धन में निरन्तर लगा रहता है।

तुम्हारा मन कहीं और न भटके, अपने सौन्दर्य, मान या अहंकार में न उलझे, अपितु सदा मुझमें ही अवस्थित रहे इसी हेतु मैंने प्रेम करते हुए भी स्वयं को छिपा लिया था। इसलिए मेरे प्रेम में दोष मत देखो। हे व्रजसुन्दरियो! तुम सब मुझे अत्यन्त प्रिय हो और मैं तुम सबका ही प्रिय हूँ।”
न पारयेऽहं निरवद्यसंयुजां  स्वसाधुकृत्यं विबुधायुषापि वः ।
या माभजन् दुर्जरगेहशृङ्‌खलाः संवृश्च्य तद् वः प्रतियातु साधुना ॥
“मेरी प्यारी गोपियों! तुमने मेरे लिये घर-गृहस्थीकी उन बेड़ियोंको तोड़ डाला है, जिन्हें बड़े-बड़े योगी-यति भी नहीं तोड़ पाते। मुझसे तुम्हारा यह मिलन, यह आत्मिक संयोग सर्वथा निर्मल और सर्वथा निर्दोष है। मैं देवताओं की चिरंतन आयु प्राप्त करके भी तुम्हारे प्रेममयी सेवा के ऋण से उऋण नहीं हो सकता। मैं जन्म-जन्मके लिये तुम्हारा ऋणी हूँ। तुम अपने सौम्य स्वभावसे और प्रेमसे मुझे उऋण करना चाहो तो कर सकती हो। परन्तु मैं तो सदैव तुम्हारा ऋणी हूँ।” (भागवत 10.32.22)

श्रीशुकदेवजी कहते हैं की भगवान् श्रीकृष्ण की यह प्रेम से भरी मधुर वाणी सुनकर गोपियों के हृदय में जो थोड़ा-बहुत विरह का दुःख शेष रह गया था, वह भी पूरी तरह मिट गया। अपने प्राणप्रिय, सौन्दर्य और माधुर्य के भण्डार श्रीकृष्ण के अंग-संग से वे पूर्ण तृप्त हो गईं और उनका मन पूरी तरह संतुष्ट हो गया।

महारास आरम्भ हुआ

भगवान् श्रीकृष्ण की प्रिय सेविकाएँ गोपियाँ एक-दूसरे की बाँहों में बाँह डालकर खड़ी हो गईं। उन श्रेष्ठ स्त्रियों के साथ यमुना के तट पर भगवान् श्रीकृष्ण ने अपनी आनन्दमयी रासक्रीड़ा आरम्भ की।
रासोत्सवः सम्प्रवृत्तो गोपीमण्डलमण्डितः ।
योगेश्वरेण कृष्णेन तासां मध्ये द्वयोर्द्वयोः ॥


प्रविष्टेन गृहीतानां कण्ठे स्वनिकटं स्त्रियः ।
यं मन्येरन् नभस्तावद् विमानशतसङ्‌कुलम् ॥
तदनंतर गोपियों के मंडल (गोलाकार समूह) से सुशोभित वह दिव्य 'रास-उत्सव' प्रारम्भ हुआ। योगेश्वरों के भी ईश्वर भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी अचिन्त्य योगमाया शक्ति से स्वयं को अनेक रूपों में प्रकट किया और वे दो-दो गोपियों के बीच में एक-एक कृष्ण बनकर प्रविष्ट हो गए। उन्होंने उन गोपियों के गले में अपने भुजाएँ डाल दिए। उस समय वहाँ उपस्थित प्रत्येक गोपी को यही अनुभव हो रहा था कि श्रीकृष्ण केवल 'मेरे ही पास' हैं। इस अलौकिक दृश्य को देखने के लिए आकाश देवताओं के सैकड़ों विमानों से भर गया। (भागवत 10.33.3-4)

जब रासलीला का शुभ क्षण उपस्थित हुआ, तब स्वर्गलोक में मंगलध्वनियाँ गूँज उठीं। देवताओं ने आनन्द से पुष्प-वर्षा की और गन्धर्वगण मधुर स्वर में भगवान् श्रीकृष्ण का यशगान करने लगे। यमुना की रमणीय रेत पर असंख्य व्रजदेवियाँ श्यामसुन्दर के साथ गान और नृत्य में लीन हो गईं।

गोपियों के आभूषणों की मधुर झंकार, उनकी भावपूर्ण गतियाँ और स्नेह से भरी मुस्कानें सम्पूर्ण रासमण्डल को दिव्य शोभा से आलोकित कर रही थीं। उन गोपियों के उज्ज्वल, गौरवर्ण सौन्दर्य के मध्य मेघश्याम श्रीकृष्ण की श्यामल काया ऐसी शोभायमान हो रही थी, मानो घनघोर वर्षा-मेघ के भीतर बिजली चमक उठी हो। उस दृश्य की शोभा अवर्णनीय हो जाती थी।

प्रेम और आनन्द में डूबी हुई गोपियाँ ऊँचे स्वर में गातीं, नृत्य करतीं और भगवान् के सान्निध्य से और भी उल्लसित हो उठती थीं। रास का यह दिव्य संगीत और सौन्दर्य मानो सम्पूर्ण जगत् में प्रतिध्वनित होने लगा।

गोपियों का सौभाग्य लक्ष्मीजी से भी बढ़कर है, क्योंकि उन्हें भगवान् श्रीकृष्ण अपने परम प्रियतम के रूप में प्राप्त हुए। रासमण्डल में गोपियाँ गान करती हुई श्रीकृष्ण के साथ विहार कर रही थीं। उनके आभूषण, बिखरी हुई अलकें और श्रम से उत्पन्न स्वेद-बिन्दु उनकी दिव्य शोभा को और अधिक बढ़ा रहे थे।

भगवान् श्रीकृष्ण कभी गोपियों को हृदय से लगा लेते, कभी स्नेहपूर्ण स्पर्श से और कभी तिरछी, मधुर चितवन से उन्हें आनन्दित करते। भगवान् के संस्पर्श से गोपियाँ प्रेम में विह्वल हो उठती थीं। उनके केश और आभूषण अस्त-व्यस्त हो जाते थे, फिर भी वे और अधिक शोभायमान प्रतीत होती थीं।

इस अलौकिक रासक्रीडा को देखकर देवांगनाएँ भी मोहित हो गईं। चन्द्रमा तथा ग्रह-नक्षत्र विस्मय में स्थिर हो गए, मानो समय भी उस क्षण ठहर गया हो। यद्यपि भगवान् श्रीकृष्ण आत्माराम हैं, पूर्णकाम हैं, तथापि करुणावश वे प्रत्येक गोपी के लिए पृथक्-पृथक् रूप धारण करके उनके साथ प्रेमपूर्वक विहार करते हैं। 

गान और नृत्य से थक जाने पर वे अपने कोमल करकमलों से स्नेहपूर्वक गोपियों का मुख पोंछते हैं। इससे गोपियाँ अपार आनन्द से भर जाती हैं और मधुर मुस्कान तथा प्रेमपूर्ण दृष्टि से भगवान् का गुणगान करने लगती हैं।

इसके पश्चात् भगवान् श्रीकृष्ण गोपियों के साथ यमुना में जलविहार करते हैं। गोपियाँ हँसती हुई एक-दूसरे पर जल की बौछारें डालती हैं। देवता पुनः पुष्प-वर्षा करते हैं और सम्पूर्ण दृश्य अलौकिक रस से परिपूर्ण हो जाता है।

फिर भगवान् श्रीकृष्ण गोपियों के साथ यमुनातट के सुगन्धित उपवनों में विचरण करते हैं, जहाँ रात्रि, चन्द्रिका, प्रेम और लीला सब एकरस होकर परम आनन्द का रूप धारण कर लेते हैं।

श्रीकृष्ण ने धर्म की मर्यादा का उल्लंघन करते हुए परस्त्रियों का स्पर्श क्यों किया?

श्रीशुकदेवजी महाराज इस प्रकार जब महारास का वर्णन कर रहे थे, तभी महाराज परीक्षित के मन में एक संदेह उत्पन्न हुआ। महाराज परीक्षित ने शुकदेवजी से कहा, “हे ब्रह्मचारी मुनिवर! भगवान् श्रीकृष्ण सम्पूर्ण जगत् के एकमात्र स्वामी हैं। वे अपने अंश श्रीबलरामजी के साथ पूर्ण अवतार लेकर इस पृथ्वी पर प्रकट हुए थे। उनके अवतार का प्रयोजन धर्म की स्थापना करना और अधर्म का विनाश करना था।

वे स्वयं धर्म की मर्यादा को रचने वाले हैं, उसका उपदेश देने वाले हैं और उसी धर्म के रक्षक भी हैं। फिर ऐसा कैसे हुआ कि उन्होंने धर्म की मर्यादा का उल्लंघन करते हुए परस्त्रियों का स्पर्श किया?

मैं यह भी जानता हूँ कि भगवान् श्रीकृष्ण पूर्णकाम हैं। उन्हें किसी वस्तु की कामना नहीं है, न किसी सुख की अभिलाषा है। फिर भी उन्होंने ऐसा कर्म किस उद्देश्य से किया?

हे महाभाग मुनिवर! यह बात मेरे चित्त को अत्यन्त व्याकुल कर रही है। कृपा करके मेरे इस सन्देह का निवारण कीजिए और मुझे धर्म का यथार्थ तत्त्व समझाइए।”
श्रीशुक उवाच – 
धर्मव्यतिक्रमो दृष्ट ईश्वराणां च साहसम् ।
तेजीयसां न दोषाय वह्नेः सर्वभुजो यथा ॥
श्री शुकदेव जी कहते हैं: "प्रायः (ब्रह्मा, शिव, इंद्र आदि) समर्थ ईश्वरों के द्वारा धर्म-मर्यादा का उल्लंघन और लोकाचार के विरुद्ध अत्यंत साहसिक कार्य देखे जाते हैं। किंतु उन महापुरुषों को इसका कोई दोष (पाप) नहीं लगता, ठीक वैसे ही जैसे 'सर्वभक्षी' अग्नि शुभ-अशुभ सब कुछ जलाने पर भी दूषित नहीं होती, अपितु सब कुछ पवित्र कर देती है।(भागवत 10.33.30)

यहाँ समर्थ से अभिप्राय उन से है, जो ईश्वरस्वरूप हों या ऐसे महापुरुष हों जो माया के अधीन नहीं रहते। जिनका चित्त अहंकार, कामना और कर्मफल की आसक्ति से सर्वथा मुक्त हो चुका हो। जो समर्थ नहीं है अर्थात् जो अभी माया के अधीन हैं, उन्हें ऐसी बात का मन में भी चिन्तन नहीं करना चाहिए, शरीर से उसका आचरण करना तो अत्यन्त दूर की बात है। यदि कोई अज्ञानी मूर्खता से ऐसा आचरण कर ले, तो उसका निश्चय ही विनाश हो जाता है।

जिस प्रकार भगवान् शंकर ने लोक-कल्याण के लिए हलाहल विष का पान किया, किन्तु यदि कोई अन्य सामान्य जीव वही विष पी ले, तो वह तत्काल भस्म हो जाएगा। इसलिए ईश्वरतुल्य पुरुषों के विषय में यह दृढ़तापूर्वक समझना चाहिए कि उनके उपदेश को जीवन में धारण करना चाहिए, न कि प्रत्येक स्थान पर उनके आचरण का अनुकरण। उनके कुछ आचरण विशेष प्रयोजन से, लोक-हित के लिए होते हैं। बुद्धिमान् पुरुष वही कर्म अपनाता है, जो उनके उपदेश के अनुरूप हो।

शुकदेवजी आगे परीक्षित को कहते हैं की जो वास्तव में समर्थ होते हैं, उनमें अहंकार का लेश भी नहीं होता। शुभ कर्म करने में उनका कोई स्वार्थ नहीं होता और अशुभ कर्म से उन्हें कोई हानि नहीं होती, क्योंकि वे लाभ और हानि इन दोनों से ऊपर उठ चुके होते हैं। धर्म-अधर्म, पाप-पुण्य तो मायाधीन जीवों के लिए है। 

जब ऐसे सामर्थ्यवान् पुरुषों के विषय में भी यह बात कही जाती है, तब जो भगवान् सभी पशु, पक्षी, मनुष्य, देवता और सम्पूर्ण चराचर जगत् के एकमात्र स्वामी हैं, उनके कर्मों को मनुष्यों के शुभ-अशुभ के माप से कैसे बाँधा जा सकता है। जिनके चरणों की धूल से भक्त तृप्त हो जाते हैं, जिनके साथ योग का सम्बन्ध होने से योगी अपने सभी कर्म-बन्धन काट डालते हैं, और जिनके तत्त्व का ज्ञान पाकर ज्ञानी सभी बन्धनों से मुक्त हो जाते हैं, वही भगवान् अपने भक्तों की इच्छा से अपना दिव्य स्वरूप प्रकट करते हैं। ऐसे भगवान् में कर्म-बन्धन की कल्पना ही कैसे की जा सकती है।
गोपीनां तत्पतीनां च सर्वेषामेव देहिनाम् ।
योऽन्तश्चरति सोऽध्यक्षः क्रीडनेनेह देहभाक् ॥
जो परमात्मा, गोपियों उनके पतियों और समस्त देहधारियों प्राणियों के अंतःकरण में निवास करते हैं और उनके साक्षी हैं, वही परमेश्वर इस जगत में केवल लीला (क्रीड़ा) करने के लिए ही शरीर धारण करके प्रकट हुए हैं। (भागवत 10.33.36)
अनुग्रहाय भूतानां मानुषं देहमास्थितः । 
भजते तादृशीः क्रीड याः श्रुत्वा तत्परो भवेत् ॥
भगवान प्राणियों पर अनुग्रह (कृपा) करने के लिए ही मनुष्य शरीर धारण करते हैं और ऐसी दिव्य लीलाएँ करते हैं, जिन्हें सुनकर मनुष्य भगवान की भक्ति में तल्लीन (तत्पर) हो जाए। (भागवत 10.33.37)

व्रजवासी गोपोंने भगवान् श्रीकृष्णमें तनिक भी दोषबुद्धि नहीं की। वे उनकी योगमायासे मोहित होकर ऐसा समझ रहे थे कि हमारी पत्नियाँ हमारे पास ही हैं। ब्रह्माकी रात्रिके बराबर वह रात्रि बीत गयी। ब्राह्ममुहूर्त आया। गोपियाँ अपने घर लौटना नहीं चाहती थीं, फिर भी भगवान् श्रीकृष्ण की आज्ञा मानकर वे अपने-अपने घर चली गईं, क्योंकि उनका हर कार्य और हर विचार केवल भगवान् को प्रसन्न करने के लिए ही होता था।

शुकदेवजी कहते है, “हे परीक्षित! जो धैर्यवान् पुरुष श्रद्धा के साथ भगवान् श्रीकृष्ण की इस दिव्य रासलीला का बार-बार श्रवण और वर्णन करता है, उसे भगवान् के चरणों में दृढ़ भक्ति प्राप्त होती है। वह शीघ्र ही हृदय के रोग, अर्थात् कामविकार से मुक्त हो जाता है और उसका कामभाव सदा के लिए नष्ट हो जाता है।”

सारांश: JKYog India Online Class- श्रीमद् भागवत कथा [हिन्दी]- 02.02.2026