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97- श्रीकृष्ण लाए नन्दबाबा को वरुणलोक से वापस, गोपों को दिखाया दिव्य धाम और वंशी-नाद से किया महारास का आह्वान

Jan 21st, 2026 | 8 Min Read
Blog Thumnail

Category: Bhagavat Purana

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Language: Hindi

श्रीमद्भागवत महापुराण- स्कन्ध: 10 अध्याय: 28-29

श्रीशुकदेवजी परीक्षित को कहते हैं की एकबार नन्दबाबा ने कार्तिक शुक्ल एकादशी का व्रत रखा और भगवान् की पूजा की। उसी रात जब द्वादशी लगी, तो वे स्नान करने के लिए यमुना में उतर गए। नन्दबाबा को यह पता नहीं था कि रात का समय असुरों का माना जाता है। उसी समय वरुण के एक सेवक असुर ने उन्हें पकड़ लिया और अपने स्वामी के पास ले गया।

नन्दबाबा के न मिलने पर ब्रज के सभी गोप रोने लगे। वे कहने लगे, “श्रीकृष्ण, अब आप ही नन्दबाबा को ला सकते हो। बलराम, अब आपका ही सहारा है।”

श्रीकृष्ण सदा अपने भक्तों के भय को दूर करते हैं। जब उन्होंने ब्रजवासियों का रोना सुना और जाना कि पिताजी को वरुण का सेवक ले गया है, तब वे स्वयं वरुण के पास गए। जब लोकपाल वरुण ने देखा कि स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण उनके पास आए हैं, तो उन्होंने उनका आदर से स्वागत किया और पूजा की। भगवान् के दर्शन से वरुण अत्यन्त आनन्दित हुए।

वरुणदेव भगवान् की महिमा गाते हुए अपने सेवक के अपराध के लिए क्षमा माँगते हैं, जिसने अज्ञान में नन्दबाबा को पकड़ लिया था। वे भगवान् से निवेदन करते हैं कि अपने पिता नन्दबाबा को अपने साथ ले जाएँ और साथ ही उन पर भी कृपा करें। इसके बाद भगवान् श्रीकृष्ण अपने पिता नन्दबाबा को लेकर व्रज लौट आए। 

नन्दबाबा के लौटने से सभी व्रजवासी बहुत प्रसन्न हुए। नन्दबाबा ने वरुणलोक में वहाँ का अद्भुत वैभव और सुख देखा। उन्होंने यह भी देखा कि वहाँ के निवासी उनके पुत्र श्रीकृष्ण के चरणों में बार-बार प्रणाम कर रहे हैं। व्रज में आकर नन्दबाबा ने अपने गोप भाई-बन्धुओं को सारी बात बता दी। यह सुनकर भगवान् श्रीकृष्ण से प्रेम करने वाले गोप समझ गए कि श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् हैं। तब उनके मन में यह इच्छा जगी कि क्या कभी भगवान् श्रीकृष्ण उन्हें भी अपना वह दिव्य धाम दिखाएँगे, जहाँ केवल उनके भक्त ही जा सकते हैं।

भगवान् श्रीकृष्ण से कोई बात छिपी नहीं रहती। वे अपने प्रिय गोपों की मन की इच्छा जान गए। गोप यह देखना चाहते थे कि भगवान् का दिव्य धाम कैसा है। उनकी इच्छा पूरी करने के लिए भगवान् ने कृपा से विचार किया।

भगवान् ने सोचा कि इस संसार में जीव अज्ञान के कारण अपने को शरीर मान लेता है। वह अनेक इच्छाएँ करता है और उन्हें पूरा करने के लिए तरह-तरह के कर्म करता है। उन्हीं कर्मों के फल से वह देवता, मनुष्य, पशु और पक्षी जैसी अलग-अलग योनियों में जन्म लेता रहता है और अपने असली स्वरूप, आत्मा को नहीं पहचान पाता।

यह सोचकर दयालु भगवान् श्रीकृष्ण ने उन गोपों को माया के अन्धकार से ऊपर उठाकर अपना परमधाम दिखाने का निश्चय किया।

भगवान् पहले उन्हें उस ब्रह्म का अनुभव कराते हैं, जो सत्य, ज्ञान, अनन्त, सदा रहने वाला और प्रकाश स्वरूप है, जिसे केवल गहरे ध्यान में स्थित ज्ञानी ही देख पाते हैं। जिस जलाशयमें अक्रूरको भगवान्ने अपना स्वरूप दिखलाया था, उसी ब्रह्मस्वरूप ब्रह्मह्रदमें भगवान् उन गोपोंको ले गये। वहाँ उन लोगोंने उसमें डुबकी लगायी। वे ब्रह्मह्रदमें प्रवेश कर गये। तब भगवान्ने उसमेंसे उनको निकालकर अपने परमधामका दर्शन कराया ।

उस दिव्य भगवत्स्वरूप लोकको देखकर नन्द आदि गोप परमानन्दमें मग्न हो गये। वहाँ उन्होंने देखा कि सारे वेद मूर्तिमान् होकर भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति कर रहे हैं। यह देखकर वे सब-के-सब परम विस्मित हो गये ।

श्रीकृष्ण का महारास संकल्प और गोपियों का दिव्य आह्वान

श्रीशुक उवाच-
भगवान् अपि ता रात्रीः शरदोत्फुल्लमल्लिकाः ।
वीक्ष्य रन्तुं मनश्चक्रे योगमायामुपाश्रितः ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं- शरद् ऋतु थी। बेला और चमेली जैसे सुगन्धित फूल खिले हुए थे और चारों ओर सुगन्ध फैल रही थी। जिन रात्रियों का संकेत भगवान् श्रीकृष्ण ने चीरहरण के समय गोपियों को दिया था, वे सब एक होकर एक विशेष रात्रि के रूप में प्रकट हुईं। भगवानने उन्हें देखा, देखकर दिव्य बनाया। गोपियाँ तो चाहती ही थीं। अब भगवान्ने भी अपनी अचिन्त्य महाशक्ति योगमायाके सहारे उन्हें निमित्त बनाकर रसमयी रासक्रीडा करनेका संकल्प किया। अमना होनेपर भी उन्होंने अपने प्रेमियोंकी इच्छा पूर्ण करनेके लिये मन स्वीकार किया। (भागवत 10.29.1)

शब्द अर्थ:
भगवान् अपि- भगवान (श्रीकृष्ण) ने भी। ता रात्रीः- उन रात्रियों को। रन्तुं- रमण करने के लिए । मनश्चक्रे- मन बनाया या संकल्प किया। योगमायामुपाश्रितः-अपनी दिव्य शक्ति 'योगमाया' का सहारा लेकर।

यहाँ 'अपि' (भी) शब्द का प्रयोग यह दर्शाता है कि यद्यपि भगवान पूर्णकाम हैं और उन्हें किसी बाहरी आनंद की आवश्यकता नहीं है, फिर भी अपने भक्तों के प्रेम को पूर्ण करने के लिए उन्होंने अपनी अचिन्त्य 'योगमाया' शक्ति का सहारा लेकर रासलीला की। 

यहाँ अचिन्त्य शक्ति के दो अद्भुत कार्य दिखते हैं:
  • एक साथ कई रूप: भगवान ने एक ही समय में हज़ारों गोपियों के साथ अलग-अलग रूप धारण किए। यह तर्क से परे (अचिन्त्य) है।
  • काल का स्तंभन: कहा जाता है कि वह रात ब्रह्मा जी की कई रात्रियों के बराबर लंबी हो गई थी, लेकिन सांसारिक समय वैसा ही बना रहा।
भगवान् के संकल्प करते ही चन्द्रदेव उदय हुए। उनकी शीतल किरणों से पूर्व दिशा उज्ज्वल हो गई। दिन में शरद् ऋतु की तेज धूप से जो ताप बढ़ गया था, चन्द्रमा ने उसे दूर कर दिया। उस रात पूर्णिमा थी। चन्द्रमा पूरा गोल था। उसकी किरणें कोमल और उजली थीं। उनसे पूरा वन प्रकाश और शीतलता से भर गया। चारों ओर शान्ति और मधुरता फैल गई।

उस सुन्दर वातावरण को देखकर भगवान् श्रीकृष्ण ने अपनी बाँसुरी उठाई और मधुर स्वर छेड़ा। उनकी बाँसुरी की ध्वनि इतनी आकर्षक थी कि उसने व्रज की गोपियों के मन को खींच लिया।
उस वंशी-नाद ने गोपियों के मन में भगवान् से मिलने की तीव्र इच्छा जगा दी। उनके मन से भय, संकोच, धैर्य और मर्यादा सब दूर हो गए। बाँसुरी की ध्वनि सुनते ही वे जहाँ थीं, वहीं से चल पड़ीं।

किसी ने किसी को बताया नहीं। सब चुपचाप भगवान् श्रीकृष्ण की ओर चल दीं। वे इतनी तेजी से चलीं कि उनके कानों के कुण्डल हिलने लगे। बाँसुरी की ध्वनि सुनते ही जो गोपियाँ दूध दुह रही थीं, वे दूध दुहना छोड़कर चल पड़ीं। जो चूल्हे पर दूध उबाल रही थीं, वे उबलता हुआ दूध छोड़कर चल दीं। जो भोजन पका रही थीं, वे पकती हुई भोजन वैसे ही छोड़कर निकल पड़ीं।

जो भोजन परोस रही थीं, वे परोसना छोड़कर चल दीं। जो छोटे बच्चों को दूध पिला रही थीं, वे बच्चों को छोड़कर चल पड़ीं। जो अपने पतियों की सेवा कर रही थीं, वे सेवा छोड़कर निकल गईं। जो स्वयं भोजन कर रही थीं, वे भोजन अधूरा छोड़कर अपने प्रिय श्रीकृष्ण के पास चल दीं।

कुछ गोपियाँ अपने शरीर पर चन्दन और उबटन लगा रही थीं, कुछ आँखों में काजल लगा रही थीं। वे सब काम छोड़कर, अस्त-व्यस्त वस्त्र पहनकर ही श्रीकृष्ण के पास जाने के लिए चल पड़ीं। पिता, पति, भाई और सम्बन्धियों ने उन्हें रोकना चाहा, पर वे नहीं रुकीं। वे इतनी मोहित हो चुकी थीं कि रुकना उनके बस में नहीं था। क्योंकि श्रीकृष्ण ने उनका मन, प्राण और आत्मा सब अपने वश में कर लिया था।

उस समय कुछ गोपियाँ घर के भीतर ही रह गईं। उन्हें बाहर निकलने का मार्ग नहीं मिला। तब उन्होंने आँखें बन्द कर लीं और मन लगाकर श्रीकृष्ण के रूप, गुण और लीलाओं का ध्यान करने लगीं। अपने परम प्रियतम श्रीकृष्ण के दुसह विरह की तीव्र तपन में उन गोपियों के सारे 'अशुभ' (पाप) धुल गए। और उसी समय, ध्यान में अच्युत प्रभु के आलिंगन से प्राप्त होने वाले अपार आनंद में उनके सारे 'शुभ' (पुण्य) भी समाप्त हो गए।

शुकदेवजी कहते हैं की यद्यपि उन्होंने परमात्मा श्रीकृष्ण को केवल अपना प्रियतम भाव (जारबुद्ध्यापि) से भजा, फिर भी उस साक्षात् ईश्वर के संग से उनके समस्त सांसारिक बंधन तुरंत छिन्न-भिन्न हो गए। उन्होंने अपने त्रिगुणमयी भौतिक शरीरों को वहीं त्याग दिया और दिव्य भाव को प्राप्त कर लिया।
श्रीपरीक्षिदुवाच-
कृष्णं विदुः परं कान्तं न तु ब्रह्मतया मुने ।
गुणप्रवाहोपरमः तासां गुणधियां कथम् ॥
राजा परीक्षित ने पूछा की गोपियाँ श्रीकृष्ण को केवल अपना प्रियतम मानती थीं, वे उन्हें साक्षात् 'ब्रह्म' के रूप में नहीं जानती थीं। उनकी बुद्धि तो केवल उनके रूप और गुणों (प्राकृत गुणों) में ही रमी हुई थी। ऐसी स्थिति में, उन गोपियों की माया के गुणों के प्रवाह से मुक्ति कैसे हो गई? जिन्होंने उन्हें केवल एक मनुष्य के रूप में प्रेम किया, वे संसार के बंधनों से कैसे छूट गईं? (भागवत 10.29.12)

श्रीशुकदेवजी परीक्षित से बोले की मैं पहले ही बता चुका हूँ कि चेदिराज शिशुपाल भगवान् श्रीकृष्ण से द्वेष करता था, फिर भी वह अपना साधारण शरीर छोड़कर दिव्य शरीर पाकर भगवान् का पार्षद बना। जब द्वेष से भी यह फल मिल सकता है, तो जो गोपियाँ भगवान् श्रीकृष्ण से अनन्य प्रेम करती हैं और उन्हें सबसे अधिक प्रिय हैं, उनका भगवान् को प्राप्त होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है।

भगवान पर इस संसार के नियम लागू नहीं होते। वे न तो घटते हैं, न बढ़ते हैं और न ही नष्ट होते हैं। वे गुणों के भंडार हैं, लेकिन उनके गुण हमारे जैसे सांसारिक नहीं बल्कि दिव्य (अप्राकृत) हैं। उन्होंने यह जो शरीर धारण किया है और यह जो लीला कर रहे हैं, वह अपने लिए नहीं कर रहे। उन्होंने यह सब लीला केवल इसलिए रची है ताकि हम जैसे साधारण लोग उनकी कहानियों और रूप को याद करके अपना भला (कल्याण) कर सकें और जन्म-मृत्यु के चक्र से छूट सकें।
कामं क्रोधं भयं स्नेहं ऐक्यं सौहृदमेव च ।
नित्यं हरौ विदधतो यान्ति तन्मयतां हि ते ॥
इसलिए भगवान् से किसी न किसी रूप में सम्बन्ध बन जाना चाहिए। यह सम्बन्ध प्रेम का हो, भय का हो, क्रोध का हो या स्नेह और अपनापन का हो, इससे फर्क नहीं पड़ता। चाहे जिस भावसे भगवानमें नित्य-निरन्तर अपनी वृत्तियाँ जोड दी जायँ, वे भगवानसे ही जुड़ती हैं। इसलिये वृत्तियाँ भगवन्मय हो जाती हैं और उस जीवको भगवान्की ही प्राप्ति होती है। (भागवत 10.29.15)

श्रीशुकदेवजी परीक्षित से बोले की तुम जैसे परम भक्त को भगवान् श्रीकृष्ण के विषय में ऐसा सन्देह नहीं करना चाहिए। वे योगियों के भी ईश्वर हैं और स्वयं अजन्मा हैं। उनके लिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। केवल उनके संकल्प से, या भौंह के एक संकेत से, पूरे संसार का कल्याण हो सकता है।

सारांश: JKYog India Online Class- श्रीमद् भागवत कथा [हिन्दी]- 19.01.2026