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99- गोपियों ने श्रीकृष्ण के विरह में गाया गोपी गीत

Jan 31st, 2026 | 7 Min Read
Blog Thumnail

Category: Bhagavat Purana

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Language: Hindi

श्रीमद्भागवत महापुराण- स्कन्ध: 10 अध्याय: 30-31

गोपियाँ प्रेम में डूबी हुई, अपनी सुध-बुध खोकर, एक-दूसरे को भगवान् श्रीकृष्ण के चरणचिह्न दिखाती हुई वन-वन भटकने लगीं। उधर भगवान् श्रीकृष्ण जिस एक भाग्यशाली गोपी (श्री राधा) को एकान्त में ले गए थे, उसके मन में यह भाव आ गया कि मैं ही सब गोपियों में सबसे श्रेष्ठ हूँ। इसी कारण हमारे प्रिय श्रीकृष्ण ने इतनी प्रेम करने वाली अन्य गोपियों को छोड़कर केवल मुझे ही चुना है और मुझे ही विशेष मान दे रहे हैं।

ऐसा भाव राधाजी में अभिमान के कारण नहीं आया था। जब श्री कृष्ण राधा जी को अकेले लेकर वन में गए, तब बाकी गोपियाँ विरह की आग में जल रही थीं। राधा जी 'करुणामयी' हैं; वे अपनी सखियों का दुख नहीं देख सकती थीं। उन्होंने सोचा, "यदि मैं कृष्ण के साथ इसी तरह रही, तो मेरी सखियाँ विरह में प्राण त्याग देंगी।"

इसलिए, उन्होंने जानबूझकर 'मान' का नाटक किया और कहा, "मैं थक गई हूँ, अब मुझे कंधे पर बिठाओ।"

जैसे ही श्रीराधा ने उनके कंधे पर चढ़ने के लिए हाथ बढ़ाया, वैसे ही भगवान श्री कृष्ण वहीं अंतर्ध्यान हो गए। इसके बाद वह वधू (श्रीराधा) विरह की अग्नि में जलने लगीं और पश्चाताप करने लगीं।
हा नाथ रमण प्रेष्ठ क्वासि क्वासि महाभुज ।
दास्यास्ते कृपणाया मे सखे दर्शय सन्निधिम् ॥ 
‘हा नाथ! हा रमण! हा प्रेष्ठ! हा महाभुज! तुम कहाँ हो! कहाँ हो!! मेरे सखा! मैं तुम्हारी दीन-हीन दासी हूँ। शीघ्र ही मुझे अपने सान्निध्यका अनुभव कराओ, मुझे दर्शन दो’ (भागवत 10.30.39)

उधर गोपियाँ श्रीकृष्ण के चरणचिह्नों के सहारे उनका रास्ता खोजती हुई वहाँ पहुँचीं। थोड़ी दूर से ही उन्होंने देखा कि उनकी एक सखी अपने प्रिय श्रीकृष्ण के वियोग में दुःखी होकर मूर्छित पड़ी है। उन्होंने उसे होश में लाया। तब उसने बताया कि भगवान् श्रीकृष्ण ने उसे कितना प्रेम और मान दिया था। उसने यह भी कहा, “मैंने अपने घमण्ड के कारण उनका अपमान कर दिया, इसी से वे अचानक चले गए।” यह सुनकर गोपियाँ बहुत आश्चर्य में पड़ गईं।

इसके बाद वे वन में वहाँ तक श्रीकृष्ण को ढूँढ़ती रहीं, जहाँ तक चन्द्रमा की चाँदनी फैल रही थी। आगे घना अन्धकार और घना जंगल देखकर उन्होंने सोचा कि और आगे जाने पर श्रीकृष्ण और भीतर चले जाएँगे। यह सोचकर वे लौट आईं।

उस समय गोपियों का मन पूरी तरह श्रीकृष्ण में डूब गया था। उनके मुँह से श्रीकृष्ण के अलावा और कोई बात नहीं निकलती थी। उनके शरीर से भी केवल श्रीकृष्ण से जुड़ी चेष्टाएँ ही हो रही थीं। उनका रोम-रोम और उनकी आत्मा श्रीकृष्ण में ही लगी हुई थी। वे केवल श्रीकृष्ण के गुणों और लीलाओं का गान कर रही थीं। वे इतनी तन्मय हो गई थीं कि उन्हें अपने शरीर का भी ध्यान नहीं रहा, फिर घर की याद कैसे आती।

गोपियों का हर रोम इस आशा में लगा था कि श्रीकृष्ण जल्दी लौट आएँ। श्रीकृष्ण के भाव में डूबी हुई वे सब यमुना के पवित्र तट पर, रमणरेती में आ गईं और वहाँ एक साथ मिलकर श्रीकृष्ण के गुणों का गान करने लगीं।
गोप्य ऊचुः
जयति तेऽधिकं जन्मना व्रजः श्रयत इन्दिरा शश्वदत्र हि
दयित दृश्यतां दिक्षु तावकाः स्त्वयि धृतासवः त्वां विचिन्वते॥
गोपियाँ विरहावेशमें गाने लगीं-‘प्यारे! तुम्हारे जन्मके कारण वैकुण्ठ आदि लोकोंसे भी व्रजकी महिमा बढ़ गयी है। तभी तो सौन्दर्य और मृदुलताकी देवी लक्ष्मीजी अपना निवासस्थान वैकुण्ठ छोड़कर यहाँ नित्य-निरन्तर निवास करने लगी हैं, इसकी सेवा करने लगी हैं। परन्तु प्रियतम! देखो तुम्हारी गोपियाँ जिन्होंने तुम्हारे चरणोंमें ही अपने प्राण समर्पित कर रखे हैं, वन-वनमें भटककर तुम्हें ढूँढ़ रही हैं। (भागवत 10.31.1)

हम स्वयं को तुम्हारी दासी मानती हैं। तुम्हारी दृष्टि ने हमारे हृदय को घायल कर दिया है और उसी से हमारा जीवन बँध गया है। तुम्हारे बिना हमारे प्राण टिक नहीं पाते।

हम जानती हैं कि तुमने विष, असुरों, वर्षा, आग और अनेक संकटों से बार-बार हमारी रक्षा की है। तुम केवल यशोदा के पुत्र नहीं हो, तुम सबके हृदय में रहने वाले अन्तर्यामी हो और संसार की रक्षा के लिए प्रकट हुए हो।

हे पुरुष शिरोमणि! आपने सर्वदा हमारी रक्षा की है। चाहे यमुना जी का विषाक्त जल हो, अघासुर रूपी अजगर हो, इंद्र की प्रलयंकारी वर्षा, आंधी, विद्युत या दावाग्नि हो, हर विपत्ति से आपने बार-बार हमें सुरक्षित किया है। तो अब इस विरह-भय से हमारी रक्षा क्यों नहीं करते? 

आप केवल यशोदा नंदन नहीं हैं, अपितु समस्त देहधारियों के हृदय में निवास करने वाले साक्षी और अंतर्यामी हैं। ब्रह्मा जी की प्रार्थना पर विश्व की रक्षा हेतु ही आप यदुवंश में अवतीर्ण हुए हैं।

हे यदुवंश शिरोमणि! जो जन संसार के जन्म-मृत्यु रूपी चक्र से भयभीत होकर आपके चरणों की शरण ग्रहण करते हैं, आप अपने कर-कमलों से उन्हें अभय प्रदान करते हैं। जिस कर-कमल से आपने लक्ष्मी जी का पाणिग्रहण किया है, वही वरद-हस्त हमारे मस्तक पर रख दीजिये।

हे व्रज के संताप हरने वाले श्यामसुंदर! आपकी मंद मुस्कान ही हमारे समस्त मान और मद को चूर्ण करने हेतु पर्याप्त है। हे सखा! हमसे रुष्ट न हों। हम आपकी सेविकाएं हैं, हमें अपना वह परम मनोहर श्याम-वर्ण मुख-कमल दिखाइये।

आपके चरण-कमल शरणागतों के पापों का विनाश करते हैं और स्वयं लक्ष्मी जी उनकी सेवा करती हैं। जिन कोमल चरणों को आप कालिया नाग के फनों पर स्थापित करते हैं, उन्हीं चरणों को हमारे वक्षस्थल (हृदय) पर रखकर हमें शीतलता प्रदान कीजिये, क्योंकि हमारा हृदय विरह-ग्नि में जल रहा है।

प्रभो! आपके वचनों का अमृत और आपकी दिव्य लीलाओं का वर्णन भौतिक संसार के दुखों से पीड़ित जीवों के लिए जीवन का सार है। विद्वानऋषिगण इन दिव्य ज्ञान से परिपूर्ण लीलाओं का सम्पूर्ण संसार में प्रचार करते हैं। जो इनका श्रवण करते हैं वे उनके पाप कर्मों को नष्ट कर, श्रोतागण को शाश्वत निधि प्रदान करती हैं। वास्तव में, जो भगवदीय दिव्य संदेश का प्रसार करते हैं, वे सबसे उदार और महान होते हैं।

प्रियतम! एक समय था जब हम आपकी प्रेमपूर्ण हंसी और विविध क्रीड़ाओं का ध्यान करके आनंद-मग्न हो जाया करती थीं। एकांत में आपने जो हृदयस्पर्शी विनोद (ठिठोली) और प्रेम की बातें की थीं, अब वे स्मृतियाँ हमारे मन को व्याकुल कर रही हैं।

हे स्वामी! आपके चरण कमल-पुष्प से भी अधिक सुकोमल हैं। जब आप गौओं को चराने हेतु वन में जाते हैं, तो यह विचार कर हमारा मन व्याकुल हो उठता है कि कहीं कंकड़, तृण और कुश-काँटे आपके चरणों को कष्ट न पहुँचा रहे हों।

जब दिन ढलने पर आप वन से लौटते हैं, तो हम देखती हैं कि आपके मुख-कमल पर घुंघराले केश लटक रहे हैं और गो-धूलि छायी हुई है। हे वीर! आप अपना वह सौंदर्य दिखाकर हमारे हृदय में मिलन की आकांक्षा उत्पन्न करते हैं।

प्रियतम! एकमात्र आप ही हमारे समस्त दुखों का निवारण करने वाले हैं। आपके चरण-कमल शरणागतों की समस्त अभिलाषाओं को पूर्ण करते हैं। हे कुंजबिहारी! अपने वे परम कल्याणकारी चरण हमारे वक्षस्थल पर रखकर हृदय की व्यथा शांत कर दीजिये।

आपका अधर-रस विरह-जन्य समस्त शोक-संताप को नष्ट करने वाला है। आपकी वेणु उसका पान करती रहती है। हे वीर! हमें भी वह अमृत वितरित कीजिये ताकि हम अन्य समस्त आसक्तियों का विस्मरण कर सकें।

जब आप दिन के समय वन में चले जाते हैं, तो एक क्षण भी हमारे लिए अनंत काल के समान प्रतीत होता है, क्योंकि हम आपके दर्शन नहीं कर पाते। और जब हमें आपके घुंघराले केशों से सुशोभित मनमोहक मुख को निहारने का अवसर मिलता है, तब भी हमारी प्रसन्नता उन पलकों के झपकने से बाधित हो जाती है, जिन्हें इस अविवेकी सृष्टिकर्ता (ब्रह्मा) ने बनाया है।


हे श्यामसुंदर! हम अपने पति, पुत्र, बंधु और कुल-परिवार का त्याग कर, उनकी आज्ञाओं का उल्लंघन कर आपके समीप आई हैं। हम आपके मधुर गान से मोहित होकर यहाँ आई हैं। हे कपटी! इस प्रकार रात्रि के समय आई हुई युवतियों को आपके अतिरिक्त और कौन त्याग सकता है?

प्यारे! एकांत में की गई आपकी प्रणय-चर्चा और वह विशाल वक्षस्थल जहाँ लक्ष्मी जी नित्य निवास करती हैं, उनका स्मरण करके हमारी आपसे मिलन की लालसा निरंतर बढ़ती ही जा रही है और हमारा मन अधिकाधिक मुग्ध होता जा रहा है।

प्रियतम! आपका अवतार विश्व का पूर्ण मंगल करने हेतु हुआ है। हमारा हृदय आपके प्रति लालसा से परिपूर्ण है। आप स्वयं ही वह 'औषधि' प्रदान कीजिये जो आपके निज जनों के इस हृदय-रोग को सर्वथा निर्मूल कर दे।
यत्ते सुजातचरणाम्बुरुहं स्तनेषु
भीताः शनैः प्रिय दधीमहि कर्कशेषु ।

तेनाटवीमटसि तद् व्यथते न किं स्वित्
कूर्पादिभिर्भ्रमति धीर्भवदायुषां नः ॥
तुम्हारे चरण कमलसे भी सुकुमार हैं। उन्हें हम अपने कठोर स्तनोंपर भी डरते-डरते बहुत धीरेसे रखती हैं कि कहीं उन्हें चोट न लग जाय। उन्हीं चरणोंसे तुम रात्रिके समय घोरजंगलमें छिपे-छिपे भटक रहे हो! क्या कंकड़, पत्थर आदिकी चोट लगनेसे उनमें पीड़ा नहीं होती? हमें तो इसकी सम्भावनामात्रसे ही चक्कर आ रहा है। हम अचेत होती जा रही हैं। श्रीकृष्ण! श्यामसुन्दर! प्राणनाथ! हमारा जीवन तुम्हारे लिये है, हम तुम्हारे लिये जी रही हैं, हम तुम्हारी हैं। (भागवत 10.31.19)

श्रीशुकदेवजी परीक्षित को कहते हैं की गोपियाँ विरह के दुःख में अलग-अलग तरह से गाने और बोलने लगीं। श्रीकृष्ण के दर्शन की तीव्र इच्छा से वे स्वयं को रोक न सकीं और करुण स्वर में फूट-फूटकर रोने लगीं।

सारांश: JKYog India Online Class- श्रीमद् भागवत कथा [हिन्दी]- 26.01.2026

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