श्रीमद्भागवत महापुराण- स्कन्ध: 10 अध्याय: 20-21
ग्वालबाल घर पहुँचकर अपनी माताओं और बहनों को दावानल से रक्षा तथा प्रलम्बासुर के वध जैसी श्रीकृष्ण और बलराम की अद्भुत लीलाएँ सुनाते हैं। यह सुनकर वृद्ध गोप और गोपियाँ भी चकित हो जाते हैं और मानने लगते हैं कि व्रज में कोई महान देवता पधारे हैं।
इसके बाद वर्षा ऋतु आती है। आकाश में बादल घिर आते हैं, बिजली चमकती है और वर्षा होने लगती है। सूखी पृथ्वी फिर से हरी-भरी हो जाती है, नदियाँ भर जाती हैं, खेत अन्न से लहलहा उठते हैं। मोर नाचने लगते हैं, मेंढक बोल उठते हैं और पेड़-पौधे फिर से पत्तों, फूलों और फलों से भर जाते हैं। यह वर्षा सबके लिए कल्याणकारी होती है।
वृन्दावन में श्रीकृष्ण और बलराम ग्वालबालों और गौओं के साथ वन में विचरण करते हैं। कभी वृक्षों की छाया में, कभी गुफाओं में विश्राम करते हैं, साथ बैठकर भोजन करते हैं और खेलते रहते हैं। गौएँ हरी घास चरकर तृप्त हो जाती हैं।
वर्षा के पश्चात् शरद ऋतु आती है। आकाश निर्मल हो जाता है, जल स्वच्छ हो जाता है और मंद, शीतल वायु चलने लगती है। सरोवरों में कमल खिलते हैं और चन्द्रमा की शीतल किरणों से रात्रियाँ सुशोभित हो जाती हैं। प्रकृति शांत और संतुलित हो जाती है, जैसे भक्ति और ज्ञान से मन शुद्ध हो जाता है।
शरद ऋतु में फसल पक जाती है, उत्सव आरम्भ होते हैं और जो लोग वर्षा के कारण एक स्थान पर रुके थे, वे अपने-अपने कार्यों के लिए निकल पड़ते हैं। इस प्रकार श्रीकृष्ण और बलराम की उपस्थिति से व्रज और समस्त पृथ्वी अत्यंत शोभायमान और आनंद से भर जाती है।
श्रीशुकदेवजी परीक्षित् को कहते हैं की शरद् ऋतुके कारण वह वन बड़ा सुन्दर हो रहा था। जल निर्मल था और जलाशयोंमें खिले हए कमलोंकी सुगन्धसे सनकर वायु मन्द-मन्द चल रही थी। भगवान् श्रीकृष्णने गौओं और ग्वालबालोंके साथ उस वनमें प्रवेश किया।
सुंदर पुष्पों से भरी हरी-भरी वृक्ष-पंक्तियों में भौंरे मतवाले होकर गुनगुना रहे थे। तरह-तरह के पक्षी झुंडों में अलग-अलग स्वर में बोल रहे थे, जिससे पूरा वन, उसके सरोवर, नदियाँ और पर्वत गूँज उठे थे। उसी वन में श्रीकृष्ण बलरामजी और ग्वालबालों के साथ गौओं को चराते हुए अपनी बाँसुरी से अत्यंत मधुर तान छेड़ते हैं।
श्रीकृष्ण की वह वंशीध्वनि भगवान के प्रति प्रेम को जगाने वाली और उनके मिलन की इच्छा बढ़ाने वाली थी। उसे सुनकर गोपियों का हृदय प्रेम से भर गया। वे एकांत में अपनी सखियों से श्रीकृष्ण के रूप, गुण और वंशीध्वनि के प्रभाव का वर्णन करने लगीं।
परंतु जैसे ही वे वंशीध्वनि का वर्णन करना चाहतीं, वैसे ही उन्हें श्रीकृष्ण की मधुर चेष्टाएँ, प्रेमभरी दृष्टि, भौंहों के संकेत और मनोहर मुस्कान स्मरण हो आती। इससे उनके मिलन की आकांक्षा और भी तीव्र हो जाती। उनका मन उनके वश में नहीं रहता और वे मन ही मन वहीं पहुँच जातीं, जहाँ श्रीकृष्ण थे। उस अवस्था में वे कुछ कह भी नहीं पातीं, वर्णन करने में पूरी तरह असमर्थ हो जातीं।
बर्हापीडं नटवरवपुः कर्णयोः कर्णिकारं ।
बिभ्रद् वासः कनक-कपिशं वैजयन्तीं च मालाम् ।
रन्ध्रान् वेणो-रधर-सुधया-पूरयन् गोपवृन्दैः ।
वृन्दारण्यं स्वपदरमणं प्राविशद् गीतकीर्तिः ॥
(गोपियाँ मन-ही-मन देखने लगी कि) श्रीकृष्ण ग्वालबालोंके साथ वृन्दावनमें प्रवेश कर रहे हैं। उनके सिरपर मयूरपिच्छ है और कानोंपर कनेरके पीले-पीले पुष्प; शरीरपर सुनहला पीताम्बर और गलेमें पाँच प्रकारके सुगन्धित पुष्पोंकी बनी वैजयन्ती माला है। रंगमंचपर अभिनय करते हए श्रेष्ठ नटका-सा क्या ही सुन्दर वेष है। बाँसुरीके छिद्रोंको वे अपने अधरामृतसे भर रहे हैं। उनके पीछे-पीछे ग्वालबाल उनकी लोकपावन कीर्तिका गान कर रहे हैं। इस प्रकार वैकुण्ठसे भी श्रेष्ठ वह वृन्दावनधाम उनके चरणचिह्नोंसे और भी रमणीय बन गया है। (भागवत 10.21.5)
यह वंशीध्वनि जड, चेतन–समस्त भूतोंका मन चुरा लेती है।
मधुर-धुन, मुरली बजावत कान्ह।
धुनि सुनि विधि, हरि हर सब मोहे, छूट्यो ज्ञानि-जन ध्यान।
जंगम जीव, भए जड़ सिगरे, जड़ जंगम सुनि तान।
जो जैसेहीं, तैसेहीं उठि धाइ, गोपिन तजि कुल-कान।
नभ तारागन, चंद्रादिक कहँ, निज-निज गतिहिं भूलान।
एक कृपालुहिं, बच्यो जगत महँ, निश्चल शैल समान॥
गोपियोंने उसे सुना और सुनकर उसका वर्णन करने लगीं। वर्णन करते-करते वे तन्मय हो गयीं और श्रीकृष्णको पाकर आलिंगन करने लगीं।
गोपियाँ आपस में कहने लगीं:
सखी, हमें तो लगता है कि आँखों का होना तभी सफल है, जब वे श्यामसुंदर श्रीकृष्ण और बलराम को देखें। जब वे ग्वालबालों के साथ गायों को वन ले जाते या वापस लाते हैं, होंठों पर बाँसुरी रखते हैं और प्रेमभरी दृष्टि डालते हैं, तब उनकी मुख की मधुरता को देखते रहना ही जीवन का सबसे बड़ा सुख है।
जब श्रीकृष्ण और बलराम वन के फूल-पत्ते, मोरपंख और मालाएँ धारण करते हैं, एक पीत वस्त्र में और दूसरे नील वस्त्र में, तब वे ग्वालबालों के बीच बैठकर बाँसुरी बजाते हैं। उस समय ऐसा लगता है जैसे दो कुशल कलाकार मंच पर मधुर अभिनय कर रहे हों। उनकी शोभा शब्दों में नहीं कही जा सकती।
गोपियाँ कहती हैं की यह बाँसुरी तो हमसे भी अधिक भाग्यशाली है। यह सीधे श्रीकृष्ण के अधरों का रस पीती है, जो हमें नहीं मिल पाता। इसे सुनकर नदियाँ, वृक्ष और कमल तक पुलकित हो उठते हैं।
अलि! मुरली के बड़ भाग रे।
याने जाने कौन कियो तप, नित मोहन-मुख लाग रे।
निधरक पियत अधर-रस निशि-दिन, सरस प्रेम रस पाग रे।
वृन्दावन धन्य है, क्योंकि वह श्रीकृष्ण के चरणचिह्नों से पवित्र है। जब श्रीकृष्ण बाँसुरी बजाते हैं, मोर नाचने लगते हैं, पशु-पक्षी शांत होकर सुनते हैं। यहाँ तक कि हरिनियाँ भी अपने साथियों के साथ श्रीकृष्ण के पास आकर उन्हें प्रेम से देखने लगती हैं।
स्वर्ग की देवियाँ भी श्रीकृष्ण के रूप और बाँसुरी की ध्वनि सुनकर सुध-बुध खो बैठती हैं। उन्हें पता भी नहीं चलता कि उनके केशों के फूल गिर रहे हैं या वस्त्र सरक गए हैं।
गौएँ जब बाँसुरी सुनती हैं तो कान उठाकर उसी में डूब जाती हैं। आँखों से आँसू बहने लगते हैं। बछड़े दूध पीते-पीते रुक जाते हैं—न निगल पाते हैं, न छोड़ पाते हैं।
वृन्दावन के पक्षी भी साधारण नहीं हैं। सच पूछो तो उनमेंसे अधिकांश बड़े-बड़े ऋषि-मुनि हैं। वे वृक्षों पर बैठकर बिना पलक झपकाए श्रीकृष्ण को देखते और केवल उनकी बाँसुरी सुनते रहते हैं।
देवता, गौओं और पक्षियोंकी बात क्यों करती हो? वे तो चेतन हैं। इन जड नदियोंको नहीं देखतीं? इनमें जो भँवर दीख रहे हैं, उनसे इनके हृदयमें श्यामसुन्दरसे मिलनेकी तीव्र आकांक्षाका पता चलता है?
नदियाँ भी बाँसुरी सुनकर रुक-सी जाती हैं, जैसे श्रीकृष्ण के चरण पकड़ रही हों और कमल अर्पित कर रही हों। बादल भी प्रेम से उमड़ आते हैं। वे धूप से बचाने के लिए छाया करते हैं और हल्की वर्षा करके मानो पुष्प चढ़ाते हैं।
भीलनियाँ भी धन्य हैं। वे श्रीकृष्ण के चरणों के चंदन-कुमकुम को ब्रज के घास से उठाकर अपने हृदय से लगाती हैं और अपने प्रेम को शांत करती हैं।
यह गिरिराज गोवर्धन तो भगवान के भक्तों में सबसे श्रेष्ठ है। सचमुच इसके भाग्य धन्य हैं। देखो सखी, हमारे प्राणप्रिय श्रीकृष्ण और मनोहर बलराम के चरणकमलों का स्पर्श पाकर यह कितना आनंदित रहता है। इसके सौभाग्य का वर्णन कौन कर सकता है! यह श्रीकृष्ण, बलराम, ग्वालबाल और गौओं की पूरी सेवा करता है। स्नान के लिए झरनों का जल देता है, गौओं के लिए हरी-हरी घास देता है, विश्राम के लिए गुफाएँ देता है और भोजन के लिए कन्द, मूल और फल प्रदान करता है। सच में, गिरिराज गोवर्धन अत्यंत धन्य है।
सखी, इन साँवले और गोरे किशोरों की चाल ही निराली है। जब वे सिर पर रस्सी और कंधों पर फंदा रखकर ग्वालबालों के साथ गायों को एक वन से दूसरे वन में हाँकते हुए चलते हैं और साथ-साथ मधुर स्वर में गाते हुए बाँसुरी बजाते हैं, तब केवल मनुष्य ही नहीं, बल्कि चलने-फिरने वाले पशु-पक्षी और बहती नदियाँ तक ठहर जाती हैं। यहाँ तक कि स्थिर वृक्षों में भी पुलक का भाव आ जाता है। उस जादूभरी बाँसुरी के और क्या चमत्कार कहें!
सारांश: JKYog India Online Class- श्रीमद् भागवत कथा [हिन्दी]- 11.01.2026