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47- सूर्य, चंद्र, ग्रह, नक्षत्रों की गति एवं स्थिति तथा अतल से पाताल लोक तक का विस्तारपूर्ण वर्णन

Feb 7th, 2025 | 13 Min Read
Blog Thumnail

Category: Bhagavat Purana

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Language: Hindi

श्रीमद्भागवत महापुराण- स्कन्ध: 5 अध्याय: 21-24

श्रीशुकदेवजी कहते हैं, "राजन्! मैंने तुम्हें इस भूमण्डल का विस्तार बताया। इसी आधार पर विद्वान लोग धुलोक (स्वर्ग) का भी माप बताते हैं। जैसे चना या मटर के दाने के दो हिस्से होते हैं और एक भाग को जानकर दूसरे का अंदाजा लगाया जा सकता है, वैसे ही ज्ञानीजन कहते हैं कि भूर्लोक के माप से धुलोक का माप जाना जा सकता है। इन दोनों के बीच अन्तरिक्ष-लोक है, जो इनका संधि-स्थान है जहाँ ग्रह और नक्षत्रोंके अधिपति भगवान् सूर्य अपने ताप और प्रकाशसे तीनों लोकोंको तपाते और प्रकाशित करते रहते हैं।"

सूर्य की गति और मार्ग 

सूर्य की गति उत्तरायण, दक्षिणायन और विषुवत के अनुसार बदलती रहती है, जिससे दिन-रात छोटे-बड़े होते हैं। जब सूर्य मेष या तुला राशि में होते हैं, तब दिन-रात बराबर होते हैं, जबकि वृषभ से वृश्चिक तक की राशियों में क्रमशः दिन-रात की लंबाई बदलती रहती है। इस प्रकार पण्डितजन मानसोत्तर पर्वत (जो पुष्कर द्वीप पर अवस्थित है) पर सूर्यकी परिक्रमाका मार्ग 90,510,000 योजन (760,800,000 मील) बताते हैं। उस पर्वतपर मेरुके पूर्वकी ओर इन्द्रकी देवधानी, दक्षिणमें यमराजकी संयमनी, पश्चिममें वरुणकी निम्लोचनी और उत्तरमें चन्द्रमाकी विभावरी नामकी पुरियाँ हैं। इन पुरियों में मेरु पर्वत के चारों ओर समय-समय पर सूर्योदय, दोपहर, संध्या और अर्धरात्रि होते रहते हैं, और इन्हीं के कारण सभी जीवों की गतिविधियाँ चलती या रुकती हैं। 

सुमेरु पर्वत पर रहने वालों के लिए सूर्य हमेशा दोपहर के समय की तरह तपता रहता है। सूर्य जब अश्विनी आदि नक्षत्रों की ओर बढ़ता है, तो वह मेरु को अपनी बाईं ओर रखकर चलता है। लेकिन प्रवह वायु, जो लगातार दाईं ओर बहती है और पूरे ज्योतिर्मंडल को घुमाती है, उसके प्रभाव से सूर्य दाईं ओर घूमता हुआ प्रतीत होता है।

जब सूर्यदेव इन्द्र की पुरी से यमराज की पुरी की ओर जाते हैं, तो वे पंद्रह घड़ी (६ घण्टा) में करीब 23,775,000 (190,200,000 मील) योजन ज्यादा दूरी तय करते हैं। फिर इसी क्रम में वे वरुण और चंद्रमा की पुरियों को पार कर पुनः इन्द्र की पुरी में पहुँचते हैं। सूर्य के साथ-साथ चंद्रमा तथा अन्य नक्षत्र भी घूमते रहते हैं। 

सूर्य का रथकी गति, संरचना और उपासक गण

सूर्य का रथ एक मुहूर्त (48 मिनट) में 3,400,800 योजन चलता है। इस रथ का संवत्सर नाम का एक पहिया है जिसके बारह अरे (मास), छः नेम, छः ऋतु और तीन चौमासे हैं। इस रथ की एक धुरी मानसोत्तर पर्वत पर तथा दूसरा सिरा मेरु पर्वत पर स्थित है। इस रथ में बैठने का स्थान छत्तीस लाख योजन लम्बा है तथा अरुण नाम के सारथी इसे चलाते हैं। सात छंद इसके घोड़े हैं: गायत्री, वृहति, उष्णिक, जगती, त्रिष्टुप, अनुष्टुप और पंक्ति। भगवान् सूर्यके आगे अँगूठेके बराबर आकार वाले ६०,००० वालखिल्या ऋषि स्वस्तिवाचनके लिये नियुक्त हैं। वे उनकी स्तुति करते रहते हैं । इनके अतिरिक्त ऋषि, गन्धर्व, अप्सरा, नाग, यक्ष, राक्षस और देवता भी—जो कुल मिलाकर चौदह हैं, किन्तु जोडेसे रहनेके कारण सात गण कहे जाते हैं—प्रत्येक मासमें भिन्न-भिन्न नामोंवाले होकर अपने भिन्न-भिन्न कर्मोंसे प्रत्येक मासमें भिन्न-भिन्न नाम धारण करनेवाले आत्मस्वरूपभगवान् सूर्यको दो-दो मिलकर उपासना करते हैं। इस प्रकार भगवान् सूर्य भूमण्डलके 95,100,000 (760,800,000 मील) योजन लंबे घेरेमेंसे प्रत्येक क्षणमें 2,002 योजनकी (16,016 मील) दूरी पार कर लेते हैं ।

राजा परीक्षित प्रश्न करते हैं कि सूर्य जब राशियों की ओर जाते हैं, तो वे मेरु और ध्रुव को दायीं ओर रखते हुए घूमते दिखाई देते हैं, लेकिन वास्तव में उनकी गति दक्षिणावर्त (घड़ी की दिशा में) नहीं होती। इसे कैसे समझा जाए? श्री शुकदेवजी समझाते हैं कि यह ठीक वैसा ही है जैसे कुम्हार के घूमते हुए चाक पर एक चींटी घूमती है—उसकी गति चाक से भिन्न होती है। इसी प्रकार, सूर्य और ग्रहों की गति भी नक्षत्रों और राशियों की गति से भिन्न होती है। 

यह भगवान सूर्य समस्त लोकों के आत्मा हैं। वे आकाश मंडल में, जो द्युलोक (स्वर्ग) और पृथ्वी के बीच स्थित है, कालचक्र में गतिशील रहते हुए बारह मासों को भोगते हैं, जो संवत्सर (वर्ष) के अवयव (भाग) हैं और राशियों (मेष, वृषभ आदि) के नाम से प्रसिद्ध हैं। इनमेंसे प्रत्येक मास चन्द्रमानसे शुक्ल और कृष्ण दो पक्षका, पितृमानसे एक रात और एक दिनका तथा सौरमानसे सवा दो नक्षत्रका बताया जाता है। जब सूर्य संवत्सर (वर्ष) का छठा भाग भोगते हैं, तो उसे ‘ऋतु’ (मौसम) कहा जाता है, जो संवत्सर का ही एक अवयव है।

आकाश में भगवान सूर्य का जो मार्ग है, उसका आधा वे जितने समय में पार करते हैं, उसे एक 'अयन' कहा जाता है। साथ ही, जितने समय में भगवान सूर्य अपनी धीमी, तेज और समान गति से स्वर्ग और पृथ्वी समेत पूरे आकाश का चक्कर लगाते हैं, उसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है। ये नाम हैं: संवत्सर, परिवत्सर, इडावत्सर, अनुवत्सर एवं वत्सर

चंद्रमा, ग्रहों और नक्षत्रों, सप्तऋषि मंडल और ध्रुवलोक की गति एवं स्थिति 

सूर्य की किरणों से एक लाख योजन ऊपर चंद्रमा स्थित है। उसकी गति बहुत तेज है, इसलिये वह सभी नक्षत्रों से आगे रहता है। चंद्रमा सूर्य के एक वर्ष के मार्ग को एक महीने में, एक महीने के मार्ग को सवा दो दिनों में और एक पक्ष (पंद्रह दिन) के मार्ग को एक ही दिन में तय कर लेता है। चंद्रमा कृष्णपक्ष (अमावस्या) में घटती हुई कलाओं से पितृगणों के और शुक्लपक्ष (पूर्णिमा) में बढ़ती हुई कलाओं से देवताओं के दिन-रात का निर्धारण करता है। वह प्रत्येक दिन में 30-30 मुहूर्त में एक-एक नक्षत्र को पार करता है। चंद्रमा अन्नमय, अमृतमय और मनोमय होते हुए समस्त जीवों के प्राण और जीवन का आधार हैं। चन्द्रदेव सोलह कलाओं से युक्त, देवता, पितर, मनुष्य, भूत, पशु, पक्षी, सरीसृप और वृक्षादि सभी प्राणियों के प्राणों का पोषण करते हैं। इसलिए इन्हें 'सर्वमय' कहा जाता है।

चंद्रमा से तीन लाख योजन (24 लाख मील) ऊपर अभिजित नक्षत्र के साथ 28 नक्षत्र हैं। ये नक्षत्र मेरु पर्वत के चारों ओर दायीं दिशा में घूमते रहते हैं। इनसे दो लाख (16 लाख मील) योजन ऊपर शुक्र ग्रह है, जो सूर्य की गति के अनुसार कभी आगे, कभी पीछे और कभी साथ-साथ चलता है। यह वर्षा करने वाला ग्रह है, इसलिए यह प्रायः अनुकूल रहता है। इसकी गति से यह वर्षा रोकने वाले ग्रहों को शांत कर देता है।

शुक्र के अनुसार ही बुध ग्रह की गति भी समझी जाती है। बुध, शुक्र से दो लाख योजन ऊपर है। यह मंगलकारी होता है, लेकिन जब यह सूर्य की गति को उलटकर चलता है, तो यह आँधी, बादल और सूखा लाने का संकेत देता है। बुध से दो लाख योजन ऊपर मंगल ग्रह है, जो अगर वक्र गति से न चले, तो एक-एक राशि को तीन-तीन हिस्सों में पार करता है। यह अशुभ ग्रह है और आमतौर पर अमंगल का संकेत देता है।

मंगल से दो लाख योजन ऊपर बृहस्पति है। यह एक-एक राशि को एक-एक वर्ष में पार करता है और यह ब्राह्मणों के लिए अनुकूल रहता है। बृहस्पति से दो लाख योजन ऊपर शनैश्चर (शनि ग्रह) है, जो 30 महीने तक एक राशि में रहते हैं। इसे सभी राशियों को पार करने में 30 साल लगते हैं और यह अशांति पैदा करता है। ये सभी ग्रह अपने-अपने प्रभावों के अनुसार शुभ-अशुभ फल प्रदान करते हैं।

इनके सबके ऊपर ग्यारह लाख योजनकी (88 लाख मील) दूरीपर कश्यपादि सप्तर्षि (Big Dipper/ Ursa Major) दिखायी देते हैं। ये सब लोकोंकी मंगल-कामना करते हुए भगवान् विष्णुके परम पद ध्रुवलोककी प्रदक्षिणा किया करते हैं। सप्तर्षियों से तेरह लाख योजन (1 करोड़ 4 लाख मील) ऊपर ध्रुवलोक (Pole Star) है, जिसे भगवान विष्णु का परम पद कहा जाता है। यहाँ उत्तानपाद के पुत्र, परम भक्त ध्रुवजी विराजमान हैं। अग्नि, इन्द्र, प्रजापति कश्यप और धर्म-ये सब एक साथ अत्यन्त आदरपूर्वक इनकी प्रदक्षिणा करते रहते हैं। अब भी कल्पपर्यन्त रहनेवाले लोक इन्हींके आधार स्थित हैं।

जो ग्रह-नक्षत्र आदि ज्योतिर्मंडल लगातार चलते रहते हैं, उन्हें भगवान काल द्वारा संचालित किया जाता है। भगवान ने ध्रुवलोक को ही इन सभी ग्रहों और नक्षत्रों का आधार स्तम्भ बना दिया है। इस कारण यह स्थान हमेशा स्थिर और प्रकाशित रहता है। जिस प्रकार दाएँ चलाने के समय अनाज बांधने वाले पशु छोटी, मध्यम और बड़ी रस्सियों से बंधकर क्रमशः खंभे के निकट, मध्य और दूर रहकर उसके चारों ओर घूमते रहते हैं, उसी तरह सभी नक्षत्र और ग्रह भी अपने स्थानानुसार इस कालचक्र में बंधे रहते हैं। वे ध्रुवलोक को आधार बनाकर वायु की प्रेरणा से कल्प के अंत तक परिक्रमा करते रहते हैं। जिस प्रकार बादल और बाज जैसे पक्षी अपने कर्मों के अनुसार वायु के सहारे आकाश में उड़ते रहते हैं, उसी प्रकार ये ज्योतिर्मंडल के पिंड भी प्रकृति और पुरुष के संयोग से अपने-अपने कर्मों के अनुसार गतिमान रहते हैं और पृथ्वी पर नहीं गिरते।

शिशुमार रूप में ध्रुव, सप्तर्षि, ग्रहों एवं नक्षत्रों की स्थिति

कोई-कोई पुरुष भगवान्की योगमायाके आधारपर स्थित इस ज्योतिश्चक्र (तारों और ग्रहों का समूह)  का शिशुमार (Dolphin) के रूप में वर्णन करते हैं। यह शिशुमार कुण्डली मारे हुए है और इसका मुख नीचेकी ओर है। इसकी पूँछके सिरेपर ध्रुव स्थित है। पूंछके मध्यभागमें प्रजापति, अग्नि, इन्द्र और धर्म हैं। पूँछकी जड़में धाता और विधाता हैं।  इसके कटिप्रदेशमें सप्तर्षि हैं। यह शिशुमार दाहिनी ओरको सिकुडकर कुण्डली मारे हए है। 
शिशुमार का शरीर दाहिनी ओर सिकुड़ा हुआ है, जिसमें उत्तरायण के चौदह नक्षत्र दाहिने और दक्षिणायण के चौदह नक्षत्र बाएं भाग में होते हैं। इसकी पीठ में अजवीथी नक्षत्रों का समूह और उदर में आकाशगंगा है। इसके दाहिने और बाएं भागों में पुनर्वसु, पुष्य, आर्द्रा, आश्लेषा, अभिजित, और उत्तराषाढ़ा जैसे नक्षत्र हैं। इसके अन्य अंगों में सूर्य, चन्द्रमा, बृहस्पति, मंगल, शनि, और अन्य ग्रह स्थित हैं, जो ब्रह्मांड की व्यवस्था और संतुलन को दर्शाते हैं। श्रीशिकदेवजी परीक्षित को कहते हैं, “राजन्! यह शिशुमार भगवान् विष्णुका सर्वदेवमय स्वरूप है। इसका नित्यप्रति सायंकालके समय पवित्र और मौन होकर दर्शन करते हुए चिन्तन करना चाहिये की सम्पूर्ण ज्योतिर्गणोंके आश्रय, कालचक्रस्वरूप, सर्वदेवाधिपति परमपुरुष परमात्माका हम नमस्कार करते हैं।”

श्रीशुकदेवजी कहते हैं— परीक्षित! कुछ लोग मानते हैं कि राहु सूर्य से 10,000 योजन (80,000 मील) नीचे है और नक्षत्रों की तरह घूमता है। यह असुर होते हुए भी भगवान की कृपा से ग्रह बना। राहु का जन्म और कर्म आगे बताया जाएगा। सूर्य, चंद्रमा और राहु के मंडलों का विस्तार क्रमशः 10,000, 12,000 और 13,000 योजन है। अमृतपानके समय राहु देवताके वेषमें सूर्य और चन्द्रमाके बीचमें आकर बैठ गया था, उस समय सूर्य और चन्द्रमाने इसका भेद खोल दिया था; उस वैरको याद करके यह अमावास्या और पूर्णिमाके दिन उनपर आक्रमण करता है। यह देखकर भगवान्ने सूर्य और चन्द्रमाकी रक्षाके लिये उन दोनोंके पास अपने प्रिय आयुध सुदर्शन चक्रको नियुक्त कर दिया है। वह निरन्तर घूमता रहता है, इसलिये राह उसके असह्य तेजसे उद्विग्न और चकितचित्त होकर मुहर्तमात्र उनके सामने टिककर फिर सहसा लौट आता है। उसके उतनी देर उनके सामने ठहरनेको ही लोग ‘ग्रहण’ कहते हैं।

राहुसे दस हजार योजन नीचे सिद्ध, चारण और विद्याधर आदिके स्थान हैं। उनके नीचे जहाँतक वायुकी गति है और बादल दिखायी देते हैं, अन्तरिक्ष लोक है। यह यक्ष, राक्षस, पिशाच, प्रेत और भूतोंका विहारस्थल है। उससे नीचे सौ योजनकी (800 मील) दूरीपर यह पृथ्वी (भूलोक) है। जहाँतक हंस, गिद्ध, बाज और गरुड़ आदि प्रधान-प्रधान पक्षी उड़ सकते हैं, वहींतक इसकी सीमा है। 

अतल से पाताल तक: धरती के नीचे के लोक जहाँ है स्वर्ग से अधिक ऐश्वर्य

पृथ्वीके भी नीचे अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल और पाताल नामके सात भू-विवर (भूगर्भस्थित बिल या लोक) हैं। ये एकके नीचे एक दस-दस दजार योजनकी (80,000 मील) दूरीपर स्थित हैं और इनमेंसे प्रत्येककी लंबाई-चौड़ाई भी दस-दस हजार योजन ही है । यह लोक या बिल भी एक प्रकार के स्वर्ग ही मानी जाती हैं। इनमें स्वर्ग से भी अधिक विषयभोग, ऐश्वर्य, आनन्द, सन्तान सुख और धन-सम्पत्ति होती है। यहाँ के वैभवपूर्ण भवन, उद्यान और क्रीडास्थल में दैत्य, दानव और नाग तरह-तरह की मायामयी क्रीड़ाएँ करते हुए निवास करते हैं। वे सभी गार्हस्थ्य धर्म का पालन करने वाले होते हैं। उनके परिवार, जैसे स्त्री, पुत्र, बन्धु, बान्धव और सेवक उनसे अत्यधिक प्रेम करते हैं और सदा प्रसन्नचित्त रहते हैं। उनके भोगों में बाधा डालने की क्षमता इन्द्र जैसे देवता भी नहीं रखते। इन बिलों में मायावी मयदानवों द्वारा बनाई गई पुरियाँ जगमगाती हैं, जो मणियों से बने भवन, नगर द्वार, मन्दिर और आँगन से सुसज्जित हैं। इनकी भूमि पर नाग, असुर, और पक्षी किलोल करते हैं। पातालाधिपतियों के भव्य भवन इन पुरियों की शोभा बढ़ाते हैं। वहाँ के बगीचे दिव्य हैं, जिसमें फल-फूलों से लदी शाखाएँ और जलाशयों में मछलियाँ क्रीड़ा करती हैं। यहाँ सूर्य का प्रकाश नहीं जाता, इसलिए दिन-रात का कोई अंतर नहीं होता। यहाँ के निवासी दिव्य पदार्थों का सेवन करते हैं, जिससे वे हमेशा सुंदर, स्वस्थ और जवान रहते हैं। उन्हें कोई रोग या बुढ़ापा नहीं होता। उनकी मृत्यु केवल भगवान के तेज रूप सुदर्शन चक्र से होती है। सुदर्शन चक्र के आने से असुरों के गर्भपात हो जाते हैं। सम्पूर्ण अंधकार को नागों की मणियाँ दूर करती हैं।

अतल लोक

अतल लोकमें मयदानवका पुत्र असुर बल रहता है। उसने छियानबे प्रकारकी माया रची है। उनमेंसे कोई-कोई आज भी मायावी पुरुषोंमें पायी जाती हैं। उसने एक बार जम्हाई ली थी, उस समय उसके मुखसे स्वैरिणी (केवल अपने वर्णके पुरुषोंसे रमण करनेवाली), कामिनी (अन्य वर्गों के पुरुषोंसे भी समागम करनेवाली) और पुंश्चली (अत्यन्त चंचल स्वभाववाली)-तीन प्रकारकी स्त्रियाँ उत्पन्न हईं। ये उस लोकमें रहनेवाले पुरुषोंको हाटक नामका रस पिलाकर अपनी हावभावमयी चितवन, प्रेममयी मुसकान, प्रेमालाप और आलिंगनादिके द्वारा यथेष्ट रमण करती हैं। उस हाटक-रसको पीकर मनुष्य मदान्ध-सा हो जाता है और अपनेको दस हजार हाथियों के समान बलवान् समझकर ‘मैं ईश्वर हूँ, मैं सिद्ध हूँ,’ इस प्रकार बढ़-बढ़कर बातें करने लगता है।

वितल लोक

उसके नीचे वितल लोकमें भगवान् हाटकेश्वर नामक महादेवजी अपने पार्षद भूतगणोंके सहित रहते हैं। वे प्रजापतिकी सृष्टिकी वृद्धिके लिये भवानीके साथ विहार करते रहते हैं। उन दोनोंके तेजसे वहाँ हाटकी नामकी एक श्रेष्ठ नदी निकली है। उसके जलको अग्नि बड़े उत्साहसे पीता है और हाटक नामका सोना थूकता है, उससे बने हुए आभूषणोंको अन्तःपुरोंमें स्त्री-पुरुष सभी धारण करते हैं।

सुतल लोक

वितलके नीचे सुतल लोक है। उसमें विरोचनपुत्र बलि रहते हैं। भगवान्ने अदितिके गर्भसे वटु-वामनरूपमें अवतीर्ण होकर उनसे तीनों लोक छीन लिये थे। फिर भगवान्की कृपासे ही उनका इस लोकमें प्रवेश हुआ। यहाँ उन्हें जैसी उत्कृष्ट सम्पत्ति मिली हई है, वैसी इन्द्रादिके पास भी नहीं है। अतः वे उन्ही पूज्यतम प्रभुकी आराधना करते हुए यहाँ आज भी निर्भयतापूर्वक रहते हैं।

शुकदेवजी कहते हैं, “राजन्! सम्पूर्ण जीवोंके नियन्ता एवं आत्मस्वरूप परमात्मा भगवान् वासुदेव-जैसे पूज्यतम, पवीत्रतम पात्रके आनेपर उन्हें परम श्रद्धा और आदरके साथ स्थिर चित्तसे दिये हुए भूमिदानका यही कोई मुख्य फल नहीं है कि बलिको सुतल लोकका ऐश्वर्य प्राप्त हो गया। यह ऐश्वर्य तो अनित्य है। भगवान्का तो छींकने, गिरने और फिसलनेके समय विवश होकर एक बार नाम लेनेसे भी मनुष्य सहसा कर्म-बन्धनको काट देता है, जब कि मुमुक्षलोग इस कर्मबन्धनको योगसाधन आदि अन्य अनेकों उपायोंका आश्रय लेनेपर बड़े कष्टसे कहीं काट पाते हैं। अतएव अपने संयमी भक्त और ज्ञानियोंको स्वस्वरूप (सारूप्य मुक्ति) प्रदान करनेवाले और समस्त प्राणियोंके आत्मा श्रीभगवान्को आत्मभावसे किये हुए भूमिदानका यह फल नहीं हो सकता। भगवान्ने यदि बलिको उसके सर्वस्वदानके बदले अपनी विस्मृति करानेवाला यह मायामय भोग और ऐश्वर्य ही दिया तो उन्होंने उसपर यह कोई अनुग्रह नहीं किया।”

तलातल लोक

सुतललोकसे नीचे तलातल है। वहाँ त्रिपुराधिपति दानवराज मय रहता है। पहले तीनों लोकोंको शान्ति प्रदान करनेके लिये भगवान् शंकरने उसके तीनों पुर भस्म कर दिये थे। फिर उन्हींकी कृपासे उसे यह स्थान मिला। वह मायावियोंका परम गुरु है और महादेवजीके द्वारा सुरक्षित है, इसलिये उसे सुदर्शन चक्रसे भी कोई भय नहीं है। वहाँके निवासी उसका बहुत आदर करते हैं ।

महातल लोक

उसके नीचे महातलमें कद्रूसे उत्पन्न हुए अनेक सिरोंवाले सर्पों का क्रोधवश नामक एक समुदाय रहता है। उनमें कुहक, तक्षक, कालिय और सुषेण आदि प्रधान हैं। उनके बड़े-बड़े फन हैं। वे सदा भगवान्के वाहन पक्षिराज गरुडजीसे डरते रहते हैं; तो भी कभी-कभी अपने स्त्री, पुत्र, मित्र और कुटुम्बके संगसे प्रमत्त होकर विहार करने लगते हैं।

रसातल लोक

उसके नीचे रसातलमें पणि नामके दैत्य और दानव रहते हैं। ये निवातकवच, कालेय और हिरण्यपुरवासी भी कहलाते हैं। इनका देवताओंसे विरोध है। ये जन्मसे ही बड़े बलवान् और महान् साहसी होते हैं। किन्तु श्रीहरिके तेजसे बलाभिमान चूर्ण हो जानेके कारण ये सर्पोके समान लुक-छिपकर रहते हैं तथा इन्द्रकी दूती सरमाके कहे हुए मन्त्रवर्णरूप वाक्यके कारण सर्वदा इन्द्रसे डरते रहते हैं ।

पाताल लोक

रसातलके नीचे पाताल है। वहाँ शंख, कुलिक, महाशंख, श्वेत, धनंजय, धृतराष्ट्र, शंखचूड़, कम्बल, अश्वतर और देवदत्त आदि बड़े क्रोधी और बड़े-बड़े फनोंवाले नाग रहते हैं। इनमें वासुकि प्रधान हैं। उनमेंसे किसीके पाँच, किसीके सात, किसीके दस, किसीके सौ और किसीके हजार सिर हैं। उनके फनोंकी दमकती हुई मणियाँ अपने प्रकाशसे पाताल-लोकका सारा अन्धकार नष्ट कर देती हैं।

सारांश: JKYog India Online Class- श्रीमद् भागवत कथा [हिन्दी]- 03.02.2025