श्रीमद्भागवत महापुराण- स्कन्ध: 10 अध्याय: 17-19
राजा परीक्षित ने शुकदेवजी से पूछा की कालिय नाग ने नागों के निवास स्थान रमणक द्वीप को क्यों छोड़ दिया था? और उसने अकेले गरुडजी का ऐसा कौन-सा अपराध किया था?
श्रीशुकदेवजी बताते हैं कि पहले गरुडजी के लिए यह नियम बना था कि हर महीने एक निश्चित वृक्ष के नीचे उन्हें एक सर्प भेंट किया जाएगा। इस नियम के अनुसार हर अमावस्या को सभी साँप अपनी रक्षा के लिए गरुडजी को एक-एक साँप की भेंट देते थे। उन्हीं साँपों में कद्रू का पुत्र कालिय नाग था। वह अपने विष और बल के घमंड में बहुत उन्मत्त हो गया था। उसने गरुडजी का अपमान किया। वह स्वयं तो बलि देता ही नहीं था, बल्कि जो दूसरे साँप गरुडजी को भेंट देने जाते, उन्हें भी खा जाता था।
यह सब सुनकर भगवान के प्रिय सेवक गरुडजी को बहुत क्रोध आया। उन्होंने कालिय नाग को मार डालने का निश्चय किया और वे तेज़ी से उस पर आक्रमण करने लगे। जब विषधर कालिय नाग ने देखा कि गरुडजी पूरे वेग से उस पर टूट पड़े हैं, तो उसने अपने एक सौ एक फण फैला दिए और उन्हें डसने के लिए झपट पड़ा। उसके पास हथियार के नाम पर केवल दाँत थे, इसलिए वह दाँतों से गरुडजी को डसने लगा। उस समय उसकी डरावनी जीभें फड़क रही थीं, साँस तेज़ चल रही थी और उसकी आँखें बहुत भयानक लग रही थीं।
गरुडजी विष्णु भगवन के वाहन हैं और उनका बल और पराक्रम अपार है। कालिय नाग की इस ढिठाई को देखकर उनका क्रोध और भी बढ़ गया। उन्होंने कालिय को अपने शरीर से झटककर दूर फेंक दिया और अपने सुनहले बाएँ पंख से उस पर ज़ोरदार प्रहार किया। गरुडजी के पंख की चोट से कालिय नाग बुरी तरह घायल हो गया। वह घबरा गया और वहाँ से भागकर यमुनाजी के उस कुण्ड में जा छिपा जो कुण्ड गरुडके लिये अगम्य था। साथ ही वह इतना गहरा था कि उसमें दूसरे लोग भी नहीं जा सकते थे।
इसी कुण्ड में एक बार भूखे गरुड ने तपस्वी सौभरिक मुनि के मना करने पर भी गरुडजी ने अपनी पसंद की एक मछली को ज़बरदस्ती पकड़कर खा लिया। अपने मुखिया मत्स्यराजके मारे जानेके कारण मछलियोंको बड़ा कष्ट हआ। वे अत्यन्त दीन और व्याकुल हो गयीं। उनकी यह दशा देखकर महर्षि सौभरिको बड़ी दया आयी। उन्होंने उस कुण्डमें रहनेवाले सब जीवोंकी भलाईके लिये गरुडको यह शाप दे दिया, ‘यदि गरुड फिर कभी इस कुण्डमें घुसकर मछलियोंको खायेंगे, तो उसी क्षण प्राणोंसे हाथ धो बैठेंगे।’
महर्षि सौभरिके इस शापकी बात कालिय नागके सिवा और कोई साँप नहीं जानता था। इसलिये वह गरुडके भयसे वहाँ रहने लगा था और अब भगवान् श्रीकृष्णने उसे निर्भय करके वहाँसे रमणक द्वीपमें भेज दिया।
इधर भगवान् श्रीकृष्ण दिव्य माला, गन्ध, वस्त्र, महामूल्य मणि और सुवर्णमय आभूषणोंसे विभूषित हो उस कुण्डसे बाहर निकले। उन्हें देखते ही सारे व्रजवासी ऐसे उठ खड़े हुए जैसे प्राण लौट आने पर इंद्रियाँ जाग जाती हैं। सभी गोप आनंद से भर गए और प्रेम से अपने कन्हैया को गले लगाने लगे।यशोदा मैया, रोहिणी मैया, नन्दबाबा, गोप और गोपियाँ, सब श्रीकृष्ण को पाकर होश में आए। बलरामजी तो भगवान की महिमा जानते ही थे। वे श्रीकृष्ण को गले लगाकर हँसने लगे। पर्वत, वृक्ष, गाय, बैल और बछड़े, सभी आनंदित हो गए।
गोपों के कुलगुरु ब्राह्मण अपनी पत्नियों के साथ नन्दबाबा के पास आए और बोले की नन्दजी, आपका बालक कालिय नाग के मुँह से बचकर लौट आया। यह बहुत बड़े सौभाग्य की बात है। इस शुभ अवसर पर ब्राह्मणों को दान दीजिए। यह सुनकर नन्दबाबा बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने ब्राह्मणों को बहुत सा सोना और गायें दान में दीं। परम सौभाग्यवती यशोदा मैया ने अपने काल से बचे हुए लाल को गोद में लेकर हृदय से लगा लिया। उनकी आँखों से आनंद के आँसू बार-बार बहने लगे।
उस दिन व्रजवासी और गायें बहुत थक गई थीं और भूख-प्यास भी लगी थी। इसलिए वे रात को व्रज नहीं लौटे और यमुनाजी के तट पर ही सो गए। गर्मी का समय था और वन सूखा हुआ था। आधी रात को जंगल में आग लग गई। आग ने सोए हुए व्रजवासियों को चारों ओर से घेर लिया।
आग की गर्मी से घबरा कर सब उठ बैठे और भगवान श्रीकृष्ण की शरण में गए। वे बोले, "प्रिय श्रीकृष्ण, श्यामसुन्दर, महाबली बलराम, तुम दोनों अनंत शक्तिशाली हो। यह भयंकर आग हमारे स्वजनों को जलाने आ गई है। हम तुम्हारे अपने हैं, इसलिए इस आग से हमारी रक्षा करो। हमें मृत्यु का भय नहीं है, पर हम तुम्हारे चरणों को छोड़ नहीं सकते।"
जब भगवान श्रीकृष्ण ने देखा कि उनके अपने इस तरह व्याकुल हैं, तो उन्होंने उस भयानक आग को पी लिया।
श्रीशुकदेवजी कहते हैं की अपने प्रियजनों से घिरे हुए श्रीकृष्ण गौशाला में लौट आए। वे ग्वालबाल का रूप धारण कर बलरामजी के साथ व्रज में बाल-लीलाएँ कर रहे थे। उस समय ग्रीष्म ऋतु थी, जो सामान्य प्राणियों को कष्ट देने वाली होती है। लेकिन वृन्दावन में सदा वसन्त जैसी शोभा बनी रहती थी, क्योंकि वहाँ श्रीकृष्ण और बलरामजी निवास करते थे। ऐसे सुंदर वन को देखकर श्रीकृष्ण और बलरामजी ने वहाँ विहार करने की इच्छा की। आगे-आगे गौएँ चलतीं, पीछे ग्वालबाल, और बीच में बलरामजी के साथ बाँसुरी बजाते हुए श्रीकृष्ण चलते।
देवता भी ग्वालबाल का रूप धारण करके वहाँ आते और श्रीकृष्ण-बलरामजी की स्तुति करते। कभी श्रीकृष्ण और बलराम हाथ पकड़कर घूमते, कभी ऊँची छलाँग लगाते, कभी रस्साकशी और कुश्ती करते। कभी वे गाते, कभी दूसरों की प्रशंसा करते। कभी आँख-मिचौनी, कभी दौड़, कभी पशु-पक्षियों की नकल करते। इस प्रकार वे वृन्दावन की नदियों, पर्वतों, वनों और सरोवरों में वही खेल खेलते थे, जो साधारण बच्चे खेलते हैं।
श्रीकृष्ण का सखा बन आया प्रलम्बासुर का वध
एक दिन जब श्रीकृष्ण और बलराम ग्वालबालों के साथ गौएँ चरा रहे थे, तब प्रलम्ब नाम का एक असुर ग्वालबाल का वेष बनाकर आया। वह श्रीकृष्ण और बलराम को हर ले जाना चाहता था। श्रीकृष्ण सब जानते थे। उन्होंने उसे पहचान लिया, फिर भी मित्रता स्वीकार की और मन-ही-मन उसके वध का उपाय सोचने लगे।
श्रीकृष्ण ने खेल का आयोजन किया और सबको दो दलों में बाँट दिया। एक दल श्रीकृष्ण का और दूसरा बलराम का। खेल यह था कि हारने वाले को जीतने वाले को पीठ पर उठाकर तय स्थान तक ले जाना होगा।
खेल में बलरामजी के दल की जीत हुई। तब श्रीकृष्ण के दल को उन्हें ढोना पड़ा। श्रीकृष्ण ने श्रीदामा को, भद्रसेन ने वृषभ को और प्रलम्ब ने बलरामजी को पीठ पर बैठाया। प्रलम्ब ने सोचा कि श्रीकृष्ण बहुत बलवान हैं, इसलिए वह बलरामजी को लेकर भाग गया और तय स्थान से आगे निकल गया। लेकिन बलरामजी पर्वत के समान भारी थे। वह अधिक दूर नहीं जा सका और तब उसने अपना भयानक दैत्य रूप धारण कर लिया।
उसका शरीर काला था, आँखें आग की तरह जल रही थीं, दाढ़ें भयानक थीं, बाल बिखरे हुए थे और वह आकाश में उड़ रहा था। पहले क्षण बलरामजी को आश्चर्य हुआ, फिर उन्हें अपने स्वरूप का स्मरण हो आया। उन्होंने क्रोध में आकर प्रलम्बासुर के सिर पर ज़ोरदार घूँसा मारा। उसी क्षण उसका सिर चूर-चूर हो गया। वह खून उगलता हुआ, भयानक आवाज़ करता हुआ पृथ्वी पर गिर पड़ा और मर गया।
ग्वालबाल यह देखकर चकित रह गए। वे “वाह-वाह” कहकर बलरामजी की प्रशंसा करने लगे, उन्हें गले लगाने लगे और मंगल कामनाएँ करने लगे। प्रलम्बासुर के मारे जाने से देवता आकाश से फूल बरसाए और बलरामजी की स्तुति की।
श्रीकृष्ण ने की गोपों और गायों की दावानल से रक्षा
श्रीशुकदेवजी परीक्षित को कहते हैं की उस समय ग्वालबाल खेल-कूद में इतने मग्न हो गए कि उनकी गौएँ बिना रोक-टोक चरती हुई बहुत दूर निकल गईं। हरी घास के लालच में वे घने जंगल में घुस गईं। गायें, बकरियाँ और भैंसें एक वन से दूसरे वन में जाती हुई आगे बढ़ती चली गईं। गर्मी के कारण वे बहुत थक गईं और प्यास से व्याकुल हो उठीं। अंत में वे डकराती हुई मुंजाटवी, यानी सरकंडों के घने वन में जा घुसीं।
जब श्रीकृष्ण, बलराम और ग्वालबालों ने देखा कि उनके पशु कहीं दिखाई नहीं दे रहे हैं, तो उन्हें अपने खेल पर पछतावा हुआ। उन्होंने बहुत खोज की, लेकिन गौओं का कोई पता नहीं चला।
गौएँ ही व्रजवासियों की जीवन-रेखा थीं। उनके न मिलने से सभी ग्वालबाल घबरा गए। अब वे जमीन पर बने खुरों के निशान और घास पर लगे दाँतों के चिन्ह देखकर आगे बढ़ने लगे।
आखिरकार उन्होंने देखा कि उनकी गौएँ मुंजाटवी में रास्ता भटककर डकरा रही हैं। उन्हें देखकर ग्वालबाल उन्हें वापस लाने लगे। लेकिन वे बहुत थक चुके थे और प्यास से बेहाल थे।
ग्वालबालों की यह दशा देखकर भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी गंभीर और मधुर वाणी में गायों को नाम लेकर पुकारा। अपने नाम की आवाज़ सुनते ही गौएँ बहुत प्रसन्न हुईं और उत्तर में हुंकार भरने लगीं।
भगवान अभी गायों को पुकार ही रहे थे कि अचानक उस वन में चारों ओर भयंकर दावाग्नि लग गई। तेज़ आँधी चलने लगी, जिससे आग और भी फैल गई। चारों ओर आग की ऊँची-ऊँची लपटें उठने लगीं और वह सब जीवों को जलाने लगी।
जब ग्वालबालों और गौओं ने देखा कि आग चारों ओर से उनकी ओर बढ़ रही है, तो वे बहुत डर गए। जैसे भय से घिरा हुआ प्राणी भगवान की शरण में जाता है, वैसे ही वे श्रीकृष्ण और बलरामजी की शरण में गए।
वे घबराकर बोले, “महावीर श्रीकृष्ण, प्यारे कन्हैया, बलशाली बलराम! हम तुम्हारी शरण में आए हैं। यह आग हमें जलाने आ रही है। तुम दोनों हमें इससे बचाओ।
श्यामसुन्दर, जिनके तुम ही सब कुछ हो, उन्हें कोई कष्ट नहीं होना चाहिए। तुम ही हमारे एकमात्र रक्षक हो। हमें केवल तुम पर ही भरोसा है।”
अपने मित्र ग्वालबालों की ये दीन भरी बातें सुनकर भगवान श्रीकृष्ण बोले, “डरो मत, तुम सब अपनी आँखें बंद कर लो।”
भगवान की आज्ञा सुनकर ग्वालबालों ने कहा “ठीक है” और अपनी आँखें बंद कर लीं। तब योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण ने उस भयंकर आग को अपने मुँह से पी लिया और सबको उस बड़े संकट से बचा लिया। कुछ समय बाद जब ग्वालबालों ने आँखें खोलीं, तो उन्होंने अपने आप को भाण्डीर वट के पास पाया। अपने और गौओं को सुरक्षित देखकर वे बहुत आश्चर्य में पड़ गए।
श्रीकृष्ण की इस अद्भुत शक्ति और दावानल से रक्षा देखकर ग्वालबालों ने मन ही मन यह मान लिया कि श्रीकृष्ण कोई साधारण बालक नहीं, बल्कि देवता हैं। शाम होने पर भगवान श्रीकृष्ण बलरामजी के साथ गौओं को लौटाते हुए वंशी बजाने लगे और व्रज की ओर चले। ग्वालबाल चलते-चलते उनकी स्तुति करते जा रहे थे। इधर व्रज में गोपियों को श्रीकृष्ण के बिना एक-एक क्षण सौ-सौ युग के समान लग रहा था। जब श्रीकृष्ण लौटे और गोपियों ने उनका दर्शन किया, तो वे परम आनंद में डूब गईं।
सारांश: JKYog India Online Class- श्रीमद् भागवत कथा [हिन्दी]- 19.12.2025