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96- गोवर्धन लीला: इन्द्र यज्ञ भंग और श्रीकृष्ण को गोविन्द नाम क्यों मिला

Jan 18th, 2026 | 10 Min Read
Blog Thumnail

Category: Bhagavat Purana

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Language: Hindi

श्रीमद्भागवत महापुराण- स्कन्ध: 10 अध्याय: 24-27

श्रीशुकदेवजी कहते हैं कि वृन्दावन में रहते हुए भगवान श्रीकृष्ण बलरामजी के साथ अनेक लीलाएँ कर रहे थे। एक दिन उन्होंने देखा कि व्रज के गोप इन्द्र-यज्ञ की तैयारी कर रहे हैं। तब श्रीकृष्ण ने विनयपूर्वक नन्दबाबा से पूछा कि यह यज्ञ क्यों किया जाता है, इसका फल क्या है और इसका उद्देश्य क्या है।

नन्दबाबा ने बताया कि इन्द्र वर्षा के स्वामी हैं। उन्हीं की कृपा से वर्षा होती है, अन्न उत्पन्न होता है और सबका जीवन चलता है। यह परम्परा पुरानी है, इसलिए हम इन्द्र-यज्ञ करते हैं। यह सुनकर श्रीकृष्ण ने कर्म का सिद्धान्त समझाया। उन्होंने कहा कि प्रत्येक प्राणी अपने कर्म के अनुसार सुख-दुःख पाता है। यदि सब कुछ कर्म से ही होता है, तो इन्द्र जैसे देवता स्वतंत्र रूप से फल नहीं दे सकते। मनुष्य को अपने स्वभाव, वर्ण और आश्रम के अनुसार कर्म करना चाहिए। जिसकी आजीविका जिससे चलती है, वही उसके लिए पूज्य है।

गोपों की आजीविका गौओं से है। वे वनवासी हैं, पहाड़ और वन ही उनका घर हैं। इसलिए उन्हें गौ, ब्राह्मण और गिरिराज गोवर्धन की पूजा करनी चाहिए, न कि इन्द्र की। श्रीकृष्ण ने सुझाव दिया कि इन्द्र-यज्ञ की सारी सामग्री से गिरिराज-यज्ञ किया जाए।

नन्दबाबा और व्रजवासियों ने यह बात स्वीकार कर ली। विधिपूर्वक ब्राह्मणों का पूजन हुआ, गौओं को चारा दिया गया और गिरिराज गोवर्धन की परिक्रमा की गई। सबने प्रसाद ग्रहण किया और उत्सव मनाया।

गोपों के विश्वास के लिए श्रीकृष्ण स्वयं गिरिराज के रूप में प्रकट हुए और सारी सामग्री स्वीकार की। इस प्रकार व्रजवासियों ने गौ, ब्राह्मण और गिरिराज का पूजन किया और श्रीकृष्ण के साथ आनन्दपूर्वक व्रज लौट आए। 

इन्द्र का अहंकार और व्रज में प्रलयकारी वर्षा

श्रीशुकदेवजी कहते हैं कि जब इन्द्र को ज्ञात हुआ कि व्रज में उनकी पूजा बंद कर दी गई है, तो वे बहुत क्रोधित हुए। इन्द्र को अपने पद का बहुत घमण्ड था। वे स्वयं को त्रिलोकी का स्वामी मानते थे। जब उन्होंने देखा कि व्रज में उनकी पूजा बंद हो गई है, तो वे क्रोध से भर गए। क्रोध में आकर उन्होंने प्रलय लाने वाले सांवर्तक मेघों को व्रज पर आक्रमण करने की आज्ञा दी।

इन्द्र ने कहा, “अरे, इन वनवासी ग्वालों में इतना अभिमान कैसे आ गया! यह सब धन के मद का परिणाम है। देखो तो सही, एक साधारण मनुष्य कृष्ण के सहारे इन्होंने मुझ देवराज का अपमान कर दिया है। जैसे संसार में कुछ लोग सच्चे ज्ञान को छोड़कर केवल कर्मकाण्ड के सहारे संसार-सागर पार करना चाहते हैं, वैसे ही ये भी भ्रम में पड़े हुए हैं। 

कृष्ण स्वयं को बड़ा ज्ञानी समझता है, जबकि वह नादान और अभिमानी है। वह स्वयं नश्वर है, फिर भी उसी पर भरोसा करके इन अहीरों ने मेरी अवहेलना की है। ये पहले से ही धन के मद में डूबे थे, ऊपर से कृष्ण ने उनका घमण्ड और बढ़ा दिया है।

अब तुम जाकर इनके इस धन और अभिमान को पूरी तरह नष्ट कर दो और इनके पशुओं का संहार कर डालो। मैं स्वयं ऐरावत हाथी पर सवार होकर शक्तिशाली मरुद्गणों के साथ नन्द के व्रज को नष्ट करने आ रहा हूँ।”

इन्द्र की आज्ञा से घने बादल व्रज पर छा गए। मूसलधार वर्षा होने लगी, बिजली चमकने लगी, बादल गरजने लगे और तेज आँधी के साथ बड़े-बड़े ओले गिरने लगे। चारों ओर जल भर गया। भूमि की ऊँच-नीच पहचान में नहीं आ रही थी। गौएँ, ग्वाल, गोपियाँ और बच्चे ठंड और भय से काँपने लगे।

इस संकट में सब लोग अपने बच्चों और गोधन को बचाते हुए भगवान् श्रीकृष्ण की शरण में पहुँचे। काँपते हुए उन्होंने कहा कि अब केवल श्रीकृष्ण ही उनके रक्षक हैं और वही इन्द्र के क्रोध से उनकी रक्षा कर सकते हैं।
भगवान् श्रीकृष्ण ने देखा कि व्रजवासी अत्यन्त पीड़ा में हैं। वे समझ गए कि यह सब इन्द्र के क्रोध का परिणाम है। उन्होंने मन ही मन निश्चय किया कि वे अपने आश्रितों की रक्षा करेंगे और इन्द्र के अहंकार को दूर करेंगे, क्योंकि भक्तों की रक्षा करना उनका व्रत है।

श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उठाकर व्रजवासियों की रक्षा की

यह सोचकर भगवान् श्रीकृष्ण ने सहज भाव से अपने बाएँ हाथ की छोटी उँगली के नाखून पर गिरिराज गोवर्धन को उखाड़ लिया और उसे छाते की तरह उठा लिया। फिर उन्होंने गोपों से कहा कि वे अपनी गौओं, बच्चों और सभी लोगों के साथ पर्वत के नीचे आ जाएँ और किसी प्रकार का भय न करें।

सब व्रजवासी अपने-अपने गोधन और परिवार सहित गोवर्धन के नीचे आ गए। भगवान् श्रीकृष्ण सात दिनों तक बिना रुके, बिना थके, उसी स्थान पर खड़े रहकर पर्वत को धारण किए रहे। उनके हाथ से पर्वत तनिक भी नहीं डगमगाया।

भगवान् की इस योगमाया को देखकर इन्द्र का गर्व टूट गया। उनका उद्देश्य पूरा नहीं हुआ, इसलिए उन्होंने मेघों को वर्षा रोकने की आज्ञा दी। धीरे-धीरे आँधी और वर्षा थम गई, बादल छँट गए और सूर्य दिखाई देने लगा।

जब श्रीकृष्ण ने देखा कि संकट समाप्त हो गया है, तब उन्होंने व्रजवासियों से कहा कि अब वे निडर होकर बाहर आ जाएँ। सब लोग अपने बच्चों, स्त्रियों, वृद्धों और गोधन के साथ बाहर निकल आए।

इसके बाद भगवान् श्रीकृष्ण ने सबके सामने सहज भाव से गिरिराज को उसके पूर्व स्थान पर रख दिया। यह देखकर व्रजवासी प्रेम से भर गए। वे दौड़कर श्रीकृष्ण के पास आए। किसी ने उन्हें गले लगाया, किसी ने चूमा। गोपियों ने मंगल-तिलक किया और आशीर्वाद दिए। यशोदा, नन्दबाबा, रोहिणी और बलरामजी ने भी स्नेहपूर्वक श्रीकृष्ण को आशीर्वाद दिया।

उस समय आकाश में देवता, सिद्ध, गन्धर्व और अन्य दिव्य जन भगवान् की स्तुति करते हुए पुष्पवर्षा करने लगे। स्वर्ग में वाद्य बजने लगे और भगवान् की लीला का गान होने लगा। अन्त में भगवान् श्रीकृष्ण बलरामजी, ग्वालबालों और गोपियों के साथ आनन्दपूर्वक व्रज लौट आए। 

श्रीशुकदेवजी कहते हैं कि व्रज के गोप भगवान् श्रीकृष्ण के अलौकिक कार्य देखकर बहुत आश्चर्य में पड़ गए। वे उनकी अनन्त शक्ति को नहीं जानते थे। सब गोप इकट्ठा होकर कहने लगे कि यह बालक साधारण नहीं है। छोटी सी आयु में एक हाथ से गिरिराज गोवर्धन को उठाकर सात दिनों तक धारण करना किसी सामान्य मनुष्य के लिए संभव नहीं है।

गोपों ने स्मरण किया कि इसी बालक ने पूतना राक्षसी का वध किया था, तृणावर्त दैत्य को मारा था, शकट को उलट दिया था और यमलार्जुन वृक्षों को गिरा दिया था। बकासुर और वत्सासुर जैसे दैत्यों का वध भी इसी ने किया था। धेनुकासुर और उसके साथियों का नाश किया, प्रलम्बासुर का वध कराया और दावानल से व्रज की रक्षा की। कालियनाग का दमन कर यमुनाजी को विषरहित किया। इतने कार्य एक बालक कैसे कर सकता है, यह सोचकर गोपों को संदेह होने लगा।

नन्दबाबाने कहा की गोपो! तुमलोग सावधान होकर मेरी बात सुनो। मेरे बालकके विषयमें तुम्हारी शंका दूर हो जाय। क्योंकि महर्षि गर्गने इस बालकको देखकर कहा था कि यह बालक प्रत्येक युग में अवतार लेता है और इस युग में कृष्णवर्ण है। यह पहले वसुदेव के घर भी उत्पन्न हुआ था, इसलिए इसका नाम वासुदेव भी है। इसके अनेक नाम और रूप हैं। यह व्रज और गौओं का कल्याण करेगा और बड़ी-बड़ी विपत्तियों से रक्षा करेगा। जो इससे प्रेम करते हैं, उनका कोई शत्रु कुछ नहीं बिगाड़ सकता। गुण, ऐश्वर्य, प्रभाव और कीर्ति में यह नारायण के समान है। नन्दबाबा ने कहा कि गर्गाचार्य के वचन सुनकर वे स्वयं भी इसे भगवान् नारायण का अंश मानते हैं। 

जब व्रजवासियोंने नन्दबाबाके मुखसे गर्गजीकी यह बात सुनी, तब उनका विस्मय जाता रहा। क्योंकि अब वे अमित तेजस्वी श्रीकृष्णके प्रभावको पूर्णरूपसे देख और सुन चुके थे। आनन्दमें भरकर उन्होंने नन्दबाबा और श्रीकृष्णकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। 

इन्द्र का अभिमान टूटा और श्रीकृष्ण से क्षमा माँगी

श्रीशुकदेवजी कहते हैं कि जब भगवान श्रीकृष्ण ने गिरिराज गोवर्धन को उठाकर व्रज को मूसलधार वर्षा से बचा लिया, तब इन्द्र अपने घमण्ड के कारण बहुत लज्जित हुए। वे एकान्त में भगवान श्रीकृष्ण के पास गए और अपने मुकुट से उनके चरणों का स्पर्श किया। भगवान के प्रभाव को देखकर उनका यह अहंकार नष्ट हो गया कि वे ही त्रिलोकी के स्वामी हैं। तब उन्होंने हाथ जोड़कर भगवान की स्तुति की।

इन्द्र ने कहा, “भगवन्! आपका स्वरूप अत्यन्त शान्त और ज्ञानमय है। आप रज और तम गुण से परे, शुद्ध सत्त्वस्वरूप हैं। यह संसार जो गुणों के प्रभाव से भिन्न-भिन्न रूपों में दिखाई देता है, वह अज्ञान के कारण ही प्रतीत होता है। आपके वास्तविक स्वरूप को न जानने से ही यह भेद दिखता है।

आपका अज्ञान या देह से कोई सम्बन्ध नहीं है, इसलिए लोभ, क्रोध जैसे दोष आपमें हो ही नहीं सकते। ये दोष अज्ञान से उत्पन्न होते हैं। फिर भी आप धर्म की रक्षा और दुष्टों के नाश के लिए अवतार लेते हैं और उचित दण्ड तथा कृपा करते हैं।

आप जगतके पिता, गुरु और स्वामी हैं। आप जगतका नियन्त्रण करनेके लिये दण्ड धारण किये हुए दुस्तर काल हैं। आप अपने भक्तोंकी लालसा पूर्ण करनेके लिये स्वच्छन्दतासे लीला-शरीर प्रकट करते हैं और जो लोग हमारी तरह अपनेको ईश्वर मान बैठते हैं, उनका मान मर्दन करते हुए अनेकों प्रकारकी लीलाएँ करते हैं।

प्रभो! मैंने ऐश्वर्य के मद में आकर आपका अपराध किया, क्योंकि मैं आपकी शक्ति को नहीं जानता था। कृपा करके मेरा अपराध क्षमा करें और मुझे फिर ऐसे अज्ञान में न पड़ने दें। आपका अवतार दुष्टों के भार को हटाने और भक्तों की रक्षा के लिए होता है। आप सर्वान्तर्यामी वासुदेव, पुरुषोत्तम और भक्तवत्सल हैं। मैं आपको बार-बार नमस्कार करता हूँ। आप कर्म के कारण नहीं, अपनी इच्छा से शरीर धारण करते हैं। आपका शरीर भी शुद्ध ज्ञानस्वरूप है। आप ही सबके कारण और सबके आत्मा हैं।

प्रभो! मेरे भीतर घमण्ड और क्रोध बहुत प्रबल थे। यज्ञ भंग होने पर मैंने क्रोध में व्रज का नाश करना चाहा। परन्तु आपने मुझ पर कृपा की और मेरा घमण्ड नष्ट कर दिया। आप ही मेरे स्वामी, गुरु और आत्मा हैं। मैं आपकी शरण में हूँ।”

श्रीशुकदेवजी कहते हैं कि इन्द्र की यह स्तुति सुनकर भगवान श्रीकृष्ण ने मुसकराते हुए कहा कि इन्द्र, तुम ऐश्वर्य और धन के मद में डूब गए थे। इसलिए तुम पर कृपा करके ही मैंने तुम्हारा यज्ञ भंग किया, ताकि अब तुम सदा मुझे स्मरण रख सको।
मामैश्वर्यश्रीमदान्धो दण्डपाणिं न पश्यति ।
तं भ्रंशयामि सम्पद्‍भ्यो यस्य चेच्छाम्यनुग्रहम् ॥
जो ऐश्वर्य और धन-सम्पत्तिके मदसे अंधा हो जाता है, वह यह नहीं देखता कि मैं कालरूप परमेश्वर हाथमें दण्ड लेकर उसके सिरपर सवार हूँ। मैं जिसपर अनुग्रह करना चाहता हूँ, उसे ऐश्वर्यभ्रष्ट कर देता हूँ। (भागवत 10.27.16)

श्रीकृष्ण ने हाका, “इन्द्र! तुम्हारा मंगल हो। अब तुम अपनी राजधानी अमरावतीमें जाओ और मेरी आज्ञाका पालन करो। अब कभी घमंड न करना। नित्य-निरन्तर मेरी सन्निधिका, मेरे संयोगका अनुभव करते रहना और अपने अधिकारके अनुसार उचित रीतिसे मर्यादाका पालन करना।”

भगवान् श्रीकृष्ण अभी इन्द्र को आज्ञा दे ही रहे थे कि उसी समय कामधेनु अपनी संतानों के साथ वहाँ आईं। उन्होंने गोपवेष में स्थित परमेश्वर श्रीकृष्ण की वन्दना की और उनसे कहा, “सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीकृष्ण! आप महायोगी और योगेश्वर हैं। आप ही यह सम्पूर्ण विश्व हैं और आप ही इसके मूल कारण हैं। आप अच्युत हैं। सम्पूर्ण जगत के स्वामी होकर आपने हमें अपना रक्षक स्वीकार किया है, इसलिए हम सनाथ हो गई हैं।

आप पूरे जगत के स्वामी हैं, पर हमारे लिए आप ही परम आराध्यदेव हैं। इन्द्र देवताओं के इन्द्र हो सकते हैं, पर हमारे इन्द्र तो आप ही हैं। इसलिए आप ही गौ, ब्राह्मण, देवता और साधुजनों की रक्षा करने वाले हमारे इन्द्र बनें।

ब्रह्माजी की प्रेरणा से हम गौएँ आपको अपना इन्द्र मानकर आपका अभिषेक करेंगी। हे विश्वात्मन्! आपने पृथ्वी का भार उतारने के लिए ही यह अवतार धारण किया है।”

श्रीकृष्ण को मिला गोविन्द नाम, इंद्र और कामधेनु ने किया अभिषेक 

श्रीशुकदेवजी कहते हैं कि इसके बाद कामधेनु ने अपने दूध से और देवराज इन्द्र ने ऐरावत की सूंड से लाए गए दिव्य जल से देवर्षियों के साथ भगवान् श्रीकृष्ण का अभिषेक किया। उसी समय भगवान् को ‘गोविन्द’ नाम दिया गया।

उस समय वहाँ नारद, तुम्बुरु आदि गन्धर्व, विद्याधर, सिद्ध और चारण पहलेसे ही आ गये थे। वे समस्त संसारके पाप-तापको मिटा देनेवाले भगवान्के यशका गान करने लगे और अप्सराएँ आनन्दसे भरकर नृत्य करने लगीं।

मुख्य-मुख्य देवता भगवान्की स्तुति करके उनपर नन्दनवनके दिव्य पुष्पोंकी वर्षा करने लगे। तीनों लोकोंमें परमानन्दकी बाढ़ आ गयी। नदियोंमें विविध रसोंकी बाढ़ आ गयी। बिना जोते-बोये पृथ्वीमें अनेकों प्रकारकी ओषधियाँ, अन्न पैदा हो गये। पर्वतोंमें छिपे हुए मणि-माणिक्य स्वयं ही बाहर निकल आये। जो जीव स्वभावसे ही क्रूर हैं, वे भी वैरहीन हो गये, उनमें भी परस्पर मित्रता हो गयी ।

इन्द्रने इस प्रकार गौ और गोकुलके स्वामी श्रीगोविन्दका अभिषेक किया और उनसे अनुमति प्राप्त होनेपर देवता, गन्धर्व आदिके साथ स्वर्गकी यात्रा की।

सारांश: JKYog India Online Class- श्रीमद् भागवत कथा [हिन्दी]- 16.01.2026