श्रीमद्भागवत महापुराण- स्कन्ध: 10 अध्याय: 22-23
शुकदेवजी परीक्षित को कहते हैं कि गोपियाँ प्रतिदिन आपसमें श्रीकृष्णकी अनेक लीलाओं का वर्णन करतीं और तन्मय हो जातीं। अब हेमन्त ऋतु आयी। उसके पहले ही महीनेमें अर्थात् मार्गशीर्ष में व्रजकी कुमारियाँ कात्यायनी देवीकी पूजा और व्रत करने लगीं। वे केवल हविष्यान्न ही खाती थीं। वे कुमारी कन्याएँ पूर्व दिशाका क्षितिज लाल होते-होते यमुनाजलमें स्नान कर लेतीं और तटपर ही देवीकी बालुकामयी मूर्ति बनाकर सुगन्धित चन्दन, फूलोंके हार, भाँतिभाँतिके नैवेद्य, धूप-दीप, छोटी-बड़ी भेंटकी सामग्री, पल्लव, फल और चावल आदिसे उनकी पूजा करतीं।
कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि ।
नन्दगोपसुतं देवि पतिं मे कुरु ते नमः ।
इति मन्त्रं जपन्त्यस्ताः पूजां चक्रुः कुमारिकाः ॥
साथ ही ‘हे कात्यायनी! हे महामाये! हे महायोगिनी! हे सबकी एकमात्र स्वामिनी! आप नन्दनन्दन श्रीकृष्णको हमारा पति बना दीजिये। देवि! हम आपके चरणोंमें नमस्कार करती हैं।’ इस मन्त्रका जप करती हई वे कुमारियाँ देवीकी आराधना करतीं। (भागवत 10.22.4)
वे संयम से रहती थीं, नियमपूर्वक स्नान करती थीं और प्रतिदिन देवी की पूजा करती थीं। उनका उद्देश्य केवल श्रीकृष्ण की प्राप्ति था। इस तरह उन्होंने एक महीने तक कात्यायनी देवी की श्रद्धा से पूजा की। वे रोज़ भोर में एक-दूसरी सखियों को नाम लेकर बुलातीं, हाथ में हाथ डालकर ऊँचे स्वर में भगवान् श्रीकृष्ण के नाम और लीलाओं का गान करती हुई यमुना में स्नान करने जाती थीं।
एक दिन गोपियाँ रोज़ की तरह यमुना तट पर गईं और भगवान् श्रीकृष्ण के गुणों का स्मरण करते हुए आनंद से जल में क्रीड़ा करने लगीं। भगवान् श्रीकृष्ण सबके हृदय के भाव जानने वाले हैं। वे गोपियों की पवित्र अभिलाषा को समझ गए और उनकी साधना को पूर्ण करने के लिए यमुना तट पर आए और गोपियों के वस्त्र उठाकर कदम्ब के वृक्ष पर रख दिए और हँसी-मज़ाक करते हुए उनसे बात करने लगे।
श्रीकृष्ण की इस लीला से गोपियों के मन में संकोच तो हुआ, पर उनका हृदय प्रेम से भर गया। वे जल में ही खड़ी रहीं और उनसे विनती करने लगीं कि वे ठंड से काँप रही हैं, इसलिए उनके वस्त्र लौटा दें। उन्होंने कहा कि वे श्रीकृष्ण की दासी हैं और उनकी आज्ञा मानने को तैयार हैं। तब श्रीकृष्ण ने कहा कि यदि वे सच में उनकी आज्ञा मानना चाहती हैं, तो जल से बाहर आकर अपने वस्त्र ले लें। ठंड से काँपती हुई गोपियाँ लज्जा से अपने शरीर को ढँकती हुई बाहर आईं।
गोपियों के शुद्ध भाव और प्रेम को देखकर भगवान् प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा कि वस्त्रहीन होकर स्नान करना व्रत की मर्यादा के विरुद्ध था, इसलिए प्रायश्चित के रूप में यमुना और वरुण देव को प्रणाम करें। गोपियों ने ऐसा ही किया, क्योंकि वे जानती थीं कि श्रीकृष्ण को प्रणाम करने से ही सब दोष दूर हो जाते हैं।
जब श्रीकृष्ण ने देखा कि गोपियाँ उनकी आज्ञा का पालन कर रही हैं, तो करुणा से भरकर उन्होंने उनके वस्त्र लौटा दिए। गोपियाँ वस्त्र पहन चुकी थीं, पर उनका मन पूरी तरह श्रीकृष्ण में बँधा हुआ था। वे वहीं खड़ी होकर लज्जा और प्रेम से उनकी ओर निहारती रहीं।
तब श्रीकृष्ण ने कहा कि उन्होंने यह व्रत उन्हीं को पाने की इच्छा से किया है और उनका संकल्प अवश्य पूर्ण होगा। जिनका मन और प्राण भगवान् को समर्पित हो जाता है, उनकी इच्छाएँ उन्हें संसार के बंधन में नहीं बाँधतीं।
अंत में श्रीकृष्ण ने उन्हें अपने-अपने घर लौटने की आज्ञा दी और कहा कि आने वाली शरद् ऋतु की रात्रियों में वे उनके साथ विहार करेंगी। यही इस व्रत का उद्देश्य था।
श्रीशुकदेवजी परीक्षित् से कहते हैं की भगवान् की आज्ञा पाकर गोपियाँ मन से जाना नहीं चाहती थीं, फिर भी बड़ी कठिनाई से व्रज लौटीं। अब उनकी सारी कामनाएँ पूर्ण हो चुकी थीं।
श्रीकृष्ण ने सखाओं को भेजा ब्राह्मणों से भोजन मांगने
एक दिन श्रीकृष्ण बलरामजी और ग्वालबालों के साथ गौएँ चराते हुए वृन्दावन से बहुत दूर चले जाते हैं। ग्रीष्म ऋतु की तीव्र धूप में घने वृक्ष उन्हें छाया प्रदान करते हैं। यह देखकर श्रीकृष्ण ग्वालबालों से कहते हैं कि वृक्ष अत्यन्त भाग्यवान हैं, क्योंकि वे स्वयं कष्ट सहकर भी सदा दूसरों की रक्षा और भलाई करते हैं। उनके पत्ते, फल, फूल, छाया, लकड़ी आदि सभी प्राणियों के काम आते हैं।
श्रीकृष्ण बताते हैं कि जीवन की सच्ची सफलता यही है कि मनुष्य अपने साधनों, विवेक, वाणी और कर्मों से दूसरों का उपकार करे। इस प्रकार कहते हुए वे यमुना तट पर पहुँचते हैं। वहाँ गौओं को पहले जल पिलाया जाता है और फिर सभी स्वयं भी शीतल, मधुर और स्वच्छ जल का पान करते हैं।
उसी समय कुछ भूखे ग्वालोंने भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीके पास आकर यह बात बोले, "बलराम! तुम अत्यन्त पराक्रमी हो। श्यामसुन्दर! तुमने बड़े-बड़े दुष्टों का विनाश किया है। उन्हीं दुष्टों के समान यह भूख भी हमें बहुत कष्ट दे रही है। इसलिए तुम दोनों इस भूख को शान्त करने का भी कोई उपाय करो।"
ग्वालबालों की प्रार्थना सुनकर देवकीनन्दन श्रीकृष्ण अपनी भक्त ब्राह्मण-पत्नियों पर कृपा करने के उद्देश्य से एक उपाय बताते हैं। वे कहते हैं कि पास ही कुछ वेदवादी ब्राह्मण स्वर्ग की कामना से यज्ञ कर रहे हैं। ग्वालबाल उनसे श्रीबलराम और श्रीकृष्ण का नाम लेकर थोड़ा भोजन माँग आएँ।
श्रीकृष्ण को नहीं पहचाना कर्मकाण्ड में उलझे ब्राह्मणों ने
ग्वालबाल ब्राह्मणों की यज्ञशाला में जाकर दण्डवत् प्रणाम करते हैं और विनम्रता से बताते हैं कि श्रीकृष्ण और बलराम को भूख लगी है, इसलिए वे थोड़ा भात देने का निवेदन करते हैं। परन्तु ब्राह्मण स्वर्ग-फल की इच्छा और कर्मकाण्ड में इतने उलझे होते हैं कि वे इस निवेदन की उपेक्षा कर देते हैं। वे श्रीकृष्ण को साधारण मनुष्य समझ लेते हैं और उनका आदर नहीं करते। वास्तव में वही भगवान्, जो यज्ञ, देवता, यजमान और धर्म के रूप में सर्वत्र विद्यमान हैं, स्वयं भोजन माँग रहे होते हैं, पर अज्ञानवश ब्राह्मण उन्हें पहचान नहीं पाते।
जब उन ब्राह्मणोंने ‘हाँ’ या ‘ना’-कुछ नहीं कहा, तब ग्वालबालोंकी आशा टूट गयी; वे लौट आये और वहाँकी सब बात उन्होंने श्रीकृष्ण तथा बलरामसे कह दी।
उनकी बात सुनकर श्रीकृष्ण हँसने लगे। उन्होंने ग्वालबालोंको समझाया कि संसारमें असफलता तो बार-बार होती ही है, उससे निराश नहीं होना चाहिये; बार-बार प्रयत्न करते रहनेसे सफलता मिल ही जाती है।
ब्राह्मणों से अन्न न मिलने पर श्रीकृष्ण ग्वालबालों से कहते हैं कि वे अब ब्राह्मणों की पत्नियों के पास जाएँ और राम तथा श्याम का नाम लेकर भोजन माँगें, क्योंकि उनका हृदय श्रीकृष्ण में रमा हुआ है।
ब्राह्मण पत्नियों ने दिया श्रीकृष्ण को भोजन
ग्वालबाल ब्राह्मण-पत्नियों के पास जाकर विनम्रता से बताते हैं कि श्रीकृष्ण और बलराम दूर गौएँ चराते हुए आए हैं और उन्हें भूख लगी है। यह सुनते ही वे ब्राह्मणियाँ अत्यन्त प्रसन्न और व्याकुल हो जाती हैं, क्योंकि वे बहुत समय से श्रीकृष्ण की लीलाओं का श्रवण करती आई थीं और उनके दर्शन की आकांक्षा रखती थीं।
वे स्वादिष्ट भोजन लेकर, पति और परिजनों के रोकने पर भी, श्रीकृष्ण के पास चल पड़ती हैं। यमुना तट के वन में वे श्रीकृष्ण और बलराम को ग्वालबालों के साथ देखती हैं। पहले से ही मन में बसे श्रीकृष्ण को अब नेत्रों से पाकर वे भीतर-ही-भीतर तृप्त हो जाती हैं और उनके प्रेम में डूबकर अपने हृदय की व्याकुलता को शान्त करती हैं।
शुकदेवजी परीक्षित से कहते हैं कि भगवान् सबके हृदय की भावना और बुद्धि के साक्षी हैं। जब श्रीकृष्ण ने देखा कि ब्राह्मण-पत्नियाँ अपने पति, परिवार और सांसारिक बन्धनों को त्यागकर केवल उनके दर्शन की अभिलाषा से उनके पास आई हैं, तब वे प्रसन्न हुए और स्नेहपूर्वक उनसे बोले।
भगवान् ने कहा कि निष्काम और निष्कपट प्रेम ही सच्ची बुद्धि का लक्षण है। जो लोग अपनी वास्तविक भलाई को जानते हैं, वे भगवान् से उसी प्रकार प्रेम करते हैं, जैसे अपने प्रियतम से, बिना किसी कामना, भय या संकोच के। क्योंकि प्राण, मन, बुद्धि और संसार की सभी प्रिय वस्तुएँ परमात्मा के कारण ही प्रिय लगती हैं, इसलिए भगवान् से बढ़कर और कोई प्रिय नहीं हो सकता।
भगवान् उनके प्रेम की सराहना करते हैं, पर उन्हें यह भी समझाते हैं कि अब दर्शन हो चुके हैं, इसलिए वे अपनी यज्ञशालाओं में लौट जाएँ, क्योंकि गृहस्थ ब्राह्मण अपने पत्नियों के साथ मिलकर ही यज्ञ को पूर्ण कर सकते हैं।
ब्राह्मण पत्नियोंने कहा, "अन्तर्यामी श्यामसुन्दर! आपकी यह बात निष्ठुरतासे पूर्ण है। आपको ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये। श्रुतियाँ कहती हैं कि जो एक बार भगवान्को प्राप्त हो जाता है, उसे फिर संसारमें नहीं लौटना पड़ता।"
वे बताती हैं कि वे सभी सांसारिक सम्बन्धों और आज्ञाओं को त्यागकर केवल श्रीकृष्ण के चरणों की शरण में आई हैं। अब उनके पति, परिवार और स्वजन उन्हें स्वीकार नहीं करेंगे। इसलिए वे स्वयं को पूर्ण रूप से श्रीकृष्ण को समर्पित कर चुकी हैं और उनसे प्रार्थना करती हैं कि वे ऐसी व्यवस्था करें कि उन्हें फिर किसी और की शरण न लेनी पड़े, क्योंकि अब उनके लिए श्रीकृष्ण के अतिरिक्त और कोई आश्रय नहीं है।
भगवान् श्रीकृष्णने कहा, "देवियो! तुम्हारे पति-पुत्र, माता-पिता, भाई-बन्धुकोई भी तुम्हारा तिरस्कार नहीं करेंगे। उनकी तो बात ही क्या, सारा संसार तुम्हारा सम्मान करेगा। इसका कारण है। अब तुम मेरी हो गयी हो, मुझसे युक्त हो गयी हो। देखो न, ये देवता मेरी बातका अनुमोदन कर रहे हैं।"
श्रीकृष्ण बताते हैं कि उनकी सच्ची प्राप्ति देह-सान्निध्य से नहीं, बल्कि मन के पूर्ण समर्पण से होती है। इसलिए वे उन्हें लौटकर मन को भगवान् में स्थिर करने का उपदेश देते हैं और शीघ्र ही उनकी प्राप्ति का वचन देते हैं।
शुकदेवजी कहते हैं कि भगवान् की आज्ञा पाकर ब्राह्मण-पत्नियाँ यज्ञशाला लौट जाती हैं। ब्राह्मण अपनी पत्नियों में कोई दोष नहीं देखते और उनके साथ मिलकर यज्ञ पूर्ण करते हैं। एक ब्राह्मण-पत्नी को उसके पति ने बलपूर्वक आने से रोक लिया था। वह मन ही मन श्रीकृष्ण के उसी स्वरूप का ध्यान करती है, जिसके गुण और लीलाएँ वह पहले से सुनती आई थी। गहन ध्यान में लीन होकर वह भगवान् का मानसिक आलिंगन करती है और इस प्रकार दिव्य अवस्था को प्राप्त हो जाती है।
श्रीकृष्ण की आज्ञा की उपेक्षा करने पर ब्राह्मणों को होता है पश्चाताप
उधर श्रीकृष्ण ब्राह्मण-पत्नियों द्वारा लाए गए भोजन से पहले ग्वालबालों को तृप्त करते हैं और फिर स्वयं भोजन करते हैं। इस प्रकार वे मनुष्य के समान लीला करते हुए अपने सौन्दर्य, माधुर्य, वाणी और कर्मों से गौओं, ग्वालबालों और गोपियों को आनन्द देते हैं और स्वयं भी उनके प्रेमरस का आस्वादन करते हैं।
बाद में जब ब्राह्मणों को ज्ञात होता है कि श्रीकृष्ण और बलराम स्वयं भगवान् हैं, तब उन्हें गहरा पश्चाताप होता है। वे समझते हैं कि भगवान् की आज्ञा की उपेक्षा कर उन्होंने भारी भूल की है। अपनी पत्नियों के हृदय में भगवान् के प्रेम को देखकर और स्वयं को उससे रिक्त पाकर वे आत्मग्लानि से भर उठते हैं।
धिग्जन्म नः त्रिवृत् विद्यां धिग् व्रतं धिग् बहुज्ञताम् ।
धिक्कुलं धिक् क्रियादाक्ष्यं विमुखा ये त्वधोक्षजे ॥
वे कहने लगे हाय! हम भगवान् श्रीकृष्णसे विमुख हैं। बड़े ऊँचे कुलमें हमारा जन्म हुआ, गायत्री ग्रहण करके हम द्विजाति हुए, वेदाध्ययन करके हमने बड़े-बड़े यज्ञकिये; परन्तु वह सब किस कामका? धिक्कार है! धिक्कार है!! हमारी विद्या व्यर्थ गयी, हमारे व्रत बुरे सिद्ध हुए। हमारी इस बहुज्ञताको धिक्कार है! ऊँचे वंशमें जन्म लेना, कर्मकाण्डमें निपुण होना किसी काम न आया। इन्हें बार-बार धिक्कार है। (भागवत 10.22.39)
ब्राह्मण आत्मचिन्तन करने लगते हैं और स्वीकार करते हैं कि भगवान् की माया बड़े-बड़े ज्ञानी और योगियों को भी मोहित कर देती है। स्वयं को गुरु और ब्राह्मण मानने के बावजूद वे अपने सच्चे कल्याण को भूल गए थे।
आश्चर्य की बात यह है कि जिन ब्राह्मण-पत्नियों के पास न विशेष संस्कार थे, न तपस्या, न शास्त्रीय ज्ञान, फिर भी उनके हृदय में श्रीकृष्ण के प्रति दृढ़ और निष्काम प्रेम था, जिसके बल पर उन्होंने गृहस्थी के बन्धन को भी पार कर लिया।
इसके विपरीत, ब्राह्मणों ने सभी संस्कार, अध्ययन और कर्म किए, फिर भी उनके हृदय में भगवान् के प्रति प्रेम नहीं जागा। वे सांसारिक कार्यों में उलझकर अपने हित-अहित को भूल चुके थे। वे इसे भगवान् की कृपा मानते हैं कि उन्होंने ग्वालबालों को भेजकर उन्हें चेताया और स्मरण कराया।
ब्राह्मण यह भी स्वीकार करते हैं कि भगवान् पूर्णकाम हैं, उन्हें किसी से कुछ माँगने की आवश्यकता नहीं थी। समस्त यज्ञ, कर्म, साधन, देवता और धर्म स्वयं भगवान् के ही स्वरूप हैं, और वही भगवान् श्रीकृष्ण के रूप में अवतरित हुए थे, जिन्हें वे पहचान नहीं सके।
अन्त में वे अपने अज्ञान पर पश्चाताप करते हुए भगवान् से क्षमा याचना करते हैं और यह स्वीकार करते हैं कि उनकी बुद्धि भगवान् की माया से मोहित थी। वे स्वयं को सौभाग्यशाली मानते हैं कि उन्हें ऐसी भक्त पत्नियाँ प्राप्त हुईं, जिनकी भक्ति से अब उनकी बुद्धि भी भगवान् श्रीकृष्ण के अविचल प्रेम की ओर उन्मुख हो गई है।
शुकदेवजी परीक्षित् से कहते हैं कि उन ब्राह्मणोंने श्रीकृष्णका तिरस्कार किया था। अतः उन्हें अपने अपराधकी स्स्मृतिसे बड़ा पश्चात्ताप हआ और उनके हृदयमें श्रीकृष्ण-बलरामके दर्शनकी बड़ी इच्छा भी हुई; परन्तु कंसके डरके मारे वे उनका दर्शन करने न जा सके।
सारांश: JKYog India Online Class- श्रीमद् भागवत कथा [हिन्दी]- 12.01.2026