श्रीमद्भागवत महापुराण- स्कन्ध: 10 अध्याय: 85-86
श्रीशुकदेवजी परीक्षित् को कहते हैं की एक दिन भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी प्रातःकालीन प्रणाम करनेके लिये माता-पिताके पास गये। वसुदेवजीने बड़ेबड़े ऋषियोंके मुँहसे भगवान्की महिमा सुनी थी तथा उनके ऐश्वर्यपूर्ण चरित्र भी देखे थे। इससे उन्हें इस बातका दृढ़ विश्वास हो गया था कि ये साधारण पुरुष नहीं, स्वयं भगवान हैं।
वे भगवान् की योगमाया को अचिन्त्य और उनकी लीलाओं को अनन्त मानकर बार-बार उनकी महिमा का गान करते हैं। वे उनकी शरण ग्रहण करते हैं और प्रार्थना करते हैं कि वे उनके देहाभिमान, मोह और संसारभय का नाश करें।
वसुदेवजी की स्तुति सुनकर भगवान् श्रीकृष्ण मुस्कराये और अत्यन्त विनम्रता से बोले, “पिताजी! हम तो आपके पुत्र ही हैं, और आपने जो ब्रह्मज्ञान का उपदेश दिया है, वह पूर्णतः युक्तियुक्त है।” श्रीकृष्ण ने वसुदेवजी की बात की पुष्टि करते हुए कहा कि इस दृष्टि से “जो मैं हूँ, वही सब हैं”, अतः सम्पूर्ण चराचर जगत् को ब्रह्मरूप ही समझना चाहिये।
देवकीजी वहाँ बैठी हुई थीं और पहले ही यह सुनकर अत्यन्त आश्चर्यचकित थीं कि श्रीकृष्ण और बलरामजी अपने गुरु सान्दीपनि मुनि के मृत पुत्र को यमलोक से वापस ले आये थे। तभी उन्हें अपने उन छह पुत्रों की याद आ गयी, जिन्हें कंस ने जन्म लेते ही मार डाला था। उनके स्मरण से उनका हृदय व्याकुल हो उठा और उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।
देवकीजीने कहा, "लोकाभिराम राम! योगेश्वरोंके भी ईश्वर, श्रीकृष्ण! मैं जानती हूँ कि तुम दोनों प्रजापतियोंके भी ईश्वर, आदिपुरुष नारायण हो। मैंने सुना है कि तुम्हारे गुरु सान्दीपनिजी को गुरुदक्षिणा देनेके लिये तुम दोनोंने उनके पुत्रको यमपुरीसे वापस ला दिया। इसलिये आज मेरी भी अभिलाषा पूर्ण करो। मैं चाहती हूँ कि तुम दोनों मेरे उन पुत्रोंको, जिन्हें कंसने मार डाला था, ला दो और उन्हें मैं भर आँख देख लूँ।"
माता देवकीजी की प्रार्थना सुनकर भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी योगमाया का आश्रय लेकर सुतल लोक पहुँचे, जहाँ देवकी के छह पुत्र निवास कर रहे थे। भगवान् को अपने लोक में पधारा देखकर दैत्यराज बलि अत्यन्त आनन्द से भर उठे। वे तुरंत अपने परिवार सहित उठकर भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी के चरणों में दण्डवत् प्रणाम करने लगे।
उन्होंने दोनों प्रभुओं को श्रेष्ठ आसन पर विराजमान किया, उनके चरण पखारे और उस पवित्र चरणामृत को अपने परिवार सहित सिर पर धारण किया। इसके बाद उन्होंने विविध उपहारों से भगवान् की पूजा, आराधना और स्तुति की।
भगवान् श्रीकृष्ण ने दैत्यराज बलि से कहा कि स्वायम्भुव मन्वन्तर में प्रजापति मरीचि और उनकी पत्नी ऊर्णा के छह पुत्र उत्पन्न हुए थे। वे सभी देवता थे। एक बार उन्होंने ब्रह्माजी को अपनी पुत्री के प्रति आकर्षित होते देखकर उनका उपहास कर दिया। इस अपराध के कारण ब्रह्माजी ने उन्हें शाप दे दिया।
उस शाप के फलस्वरूप वे हिरण्यकशिपु के पुत्रों के रूप में असुर-योनि में जन्मे। बाद में योगमाया उन्हें वहाँ से लाकर देवकी के गर्भ में ले आयी और जन्म लेते ही कंस ने उन छहों का वध कर दिया।
भगवान् ने बताया कि माता देवकी अपने उन पुत्रों के वियोग में अत्यन्त शोकाकुल हैं, इसलिए वे उन्हें वापस ले जाने आये हैं। इसके बाद वे छहों शाप से मुक्त होकर पुनः अपने दिव्य लोक को प्राप्त करेंगे।
उन छह पुत्रों के नाम थे: स्मर, उद्गीथ, परिष्वंग, पतंग, क्षुद्रभृत् और घृणि। भगवान् की कृपा से उन्हें पुनः सद्गति प्राप्त होने वाली थी।
भगवान् श्रीकृष्ण ने दैत्यराज बलि से उन छह पुत्रों को लेकर माता देवकी को सौंप दिया। अपने मृत पुत्रों को पुनः सामने देखकर देवकीजी का हृदय वात्सल्य से उमड़ पड़ा। वे उन्हें बार-बार गोद में लेतीं, हृदय से लगातीं और उनके सिर को प्रेमपूर्वक सूँघतीं।
भगवान् श्रीकृष्ण के स्पर्श से उन छहों पुत्रों को आत्मसाक्षात्कार हो गया और वे अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान गये। इसके बाद उन्होंने भगवान् श्रीकृष्ण, बलरामजी, माता देवकी और पिता वसुदेव को प्रणाम किया और सबके सामने ही शापमुक्त होकर देवलोक को प्रस्थान कर गये।
अपने मृत पुत्रों का पुनः आना और फिर दिव्य लोक को चले जाना देखकर देवकी अत्यन्त विस्मित हो गयीं और समझ गयीं कि यह सब भगवान् श्रीकृष्ण की अद्भुत दिव्य लीला ही है।
अर्जुन द्वारा सुभद्राजी का हरण
राजा परीक्षितने शुकदेवजी से पूछा, "भगवन्! मेरे दादा अर्जुनने भगवान श्रीकष्ण और बलरामजीकी बहिन सुभद्राजीसे, जो मेरी दादी थीं, किस प्रकार विवाह किया?"
तब शुकदेवजी ने कहा कि एक बार अर्जुन तीर्थयात्रा करते हुए प्रभासक्षेत्र पहुँचे। वहाँ उन्हें पता चला कि बलरामजी सुभद्रा का विवाह दुर्योधन से करना चाहते हैं, जबकि श्रीकृष्ण और वसुदेव इस प्रस्ताव से सहमत नहीं हैं। अब अर्जुनके मनमें सुभद्राको पानेकी लालसा जग आयी। वे त्रिदण्डी वैष्णवका वेष धारण करके द्वारका पहुँचे और वर्षाकालमें चार महीनेतक रहे। वहाँ पुरवासियों और बलरामजीने उनका खूब सम्मान किया। उन्हें यह पता न चला कि ये अर्जुन हैं ।
एक दिन बलरामजीने आतिथ्यके लिये उन्हें निमन्त्रित किया और उनको वे अपने घर ले आये। अर्जुनको बलरामजीने अत्यन्त श्रद्धाके साथ भोजन-सामग्री निवेदित की और उन्होंने बड़े प्रेमसे भोजन किया ।
भोजन के समय अर्जुन ने परम सुन्दरी, विवाहयोग्य सुभद्रा को देखा। उनके अनुपम सौन्दर्य ने अर्जुन का मन मोह लिया। वे प्रेम से अभिभूत हो उठे और उसी क्षण उन्हें पत्नी बनाने का दृढ़ निश्चय कर लिया।
उधर अर्जुन के रूप, व्यक्तित्व और वीरता को देखकर सुभद्रा भी उनसे प्रभावित हो गयीं। उन्होंने मन-ही-मन अर्जुन को अपना पति स्वीकार कर लिया और अपना हृदय उन्हें समर्पित कर दिया।
इसके बाद अर्जुन अवसर की प्रतीक्षा करने लगे।
एक बार सुभद्राजी देव-दर्शनके लिये रथपर सवार होकर द्वारका-दुर्गसे बाहर निकलीं। उसी समय अर्जुनने देवकी-वसुदेव और श्रीकृष्णकी अनुमतिसे सुभद्राका हरण कर लिया।
रथपर सवार होकर वीर अर्जुनने धनुष उठा लिया और जो सैनिक उन्हें रोकनेके लिये आये, उन्हें मार-पीटकर भगा दिया। सुभद्राके निज-जन रोते-चिल्लाते रह गये और अर्जुन सुभद्राको लेकर चल पड़े।
यह समाचार सुनकर बलरामजी अत्यन्त क्रोधित हुए, परन्तु श्रीकृष्ण तथा अन्य सहद-सम्बन्धियोंने उनके पैर पकड़कर उन्हें बहुत कुछ समझाया-बुझाया, तब वे शान्त हुए। अन्ततः बलरामजी प्रसन्न हुए और उन्होंने सुभद्रा एवं अर्जुन को बहुत-सा बहुमूल्य उपहार दहेज में भेजकर विवाह को स्वीकार कर लिया।
मिथिला के राजा बहुलाश्व और ब्राह्मण श्रुतदेव की कथा
मिथिला नगरी में श्रुतदेव नाम के एक गृहस्थ ब्राह्मण रहते थे, जो भगवान् श्रीकृष्ण के परम भक्त थे। वे केवल भगवद्भक्ति में ही पूर्ण सन्तोष, शान्ति, ज्ञान और वैराग्य प्राप्त कर चुके थे। गृहस्थ होने पर भी वे धन-संग्रह या किसी विशेष उपार्जन के लिए प्रयत्न नहीं करते थे।
प्रारब्धवश प्रतिदिन जितनी सामग्री जीवन-निर्वाह के लिए आवश्यक होती, उतनी ही उन्हें प्राप्त हो जाती थी, और वे उसी में पूर्णतः सन्तुष्ट रहते थे। वे अत्यन्त सरल, संतोषी और अनासक्त जीवन जीते हुए अपने वर्णाश्रम-धर्म का निष्ठापूर्वक पालन करते थे और अपना सम्पूर्ण जीवन भगवान् श्रीकृष्ण की भक्ति में समर्पित किये हुए थे।
उस देशके राजा भी ब्राह्मणके समान ही भक्तिमान थे। उन नरपतिका नाम था बहुलाश्व। उनमें अहंकारका लेश भी न था। श्रुतदेव और बहुलाश्व दोनों ही भगवान् श्रीकृष्णके प्यारे भक्त थे।
एक बार भगवान् श्रीकृष्ण अपने दो भक्तों, राजा बहुलाश्व और ब्राह्मण श्रुतदेव, पर कृपा करने के लिये दारुक द्वारा रथ मँगवाकर नारद, व्यास, परशुराम, अत्रि, वामदेव, मैत्रेय, च्यवन आदि अनेक महान् ऋषियों के साथ द्वारका से विदेह (मिथिला) की ओर प्रस्थान कर गये।
यात्रा के मार्ग में जहाँ-जहाँ भगवान् पहुँचे, वहाँ के नगरवासी और ग्रामवासी पूजन-सामग्री लेकर उनके दर्शन के लिये उमड़ पड़े। भगवान् के दर्शन मात्र से उनका अज्ञान दूर होने लगा और उन्हें आध्यात्मिक कल्याण तथा तत्त्वज्ञान की प्राप्ति होने लगी।
अन्ततः भगवान् श्रीकृष्ण विदेह देश पहुँचे। उनके आगमन का समाचार सुनकर नागरिक और ग्रामवासी अत्यन्त आनन्दित होकर विविध पूजन-सामग्रियाँ लेकर उनकी अगवानी के लिये आये।
मिथिला के राजा बहुलाश्व और ब्राह्मण श्रुतदेव ने समझ लिया भगवान् श्रीकृष्ण उन पर विशेष कृपा करने के लिये ही पधारे हैं। दोनों ने भगवान् के चरणों में गिरकर प्रणाम किया और हाथ जोड़कर भगवान् तथा उनके साथ आये मुनियों को अपने-अपने घर पधारकर आतिथ्य स्वीकार करने का निमन्त्रण दिया।
भगवान् श्रीकृष्ण ने दोनों भक्तों की प्रार्थना स्वीकार कर ली। दोनों को समान रूप से प्रसन्न करने के लिये उन्होंने अपनी योगमाया से एक ही समय में दो पृथक् रूप धारण किये और अलग-अलग बहुलाश्व तथा श्रुतदेव के घर पधारे। परंतु दोनों को यही अनुभव हुआ कि भगवान् केवल उनके ही घर पधारे हैं।
राजा बहुलाश्व ने जब देखा कि स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण और महान् ऋषि-मुनि उनके घर पधारे हैं, तो वे प्रेम और भक्ति से विह्वल हो उठे। उन्होंने भगवान् और मुनियों का विधिपूर्वक पूजा की।
भोजन के पश्चात् बहुलाश्व भगवान् श्रीकृष्ण के चरणों को अपनी गोद में रखकर प्रेमपूर्वक दबाते हुए उनकी स्तुति करने लगे। श्रीकृष्ण ने बहुलाश्व की प्रार्थना स्वीकार करते हुए कुछ दिनों तक मिथिला में रहकर वहाँ के नर-नारियों का कल्याण किया।
जैसे राजा बहुलाश्व भगवान् श्रीकृष्ण और मुनियों के आगमन से आनन्दमग्न हो गये थे, वैसे ही निर्धन ब्राह्मण श्रुतदेव भी उन्हें अपने घर आया देखकर प्रेम और आनन्द से विह्वल हो उठे। वे भगवान् को प्रणाम करके इतने आनन्दित हुए कि अपने वस्त्र उछाल-उछालकर नाचने लगे।
उन्होंने साधारण चटाई, पीढ़े और कुशासन बिछाकर भगवान् श्रीकृष्ण और ऋषियों को बैठाया तथा अपनी पत्नी के साथ उनके चरण पखारे। फिर उस चरणामृत को अपने घर और परिवार पर छिड़ककर स्वयं को परम धन्य मानने लगे। अपनी सामर्थ्य के अनुसार उन्होंने फल, सुगन्धित जल, तुलसी, कुश, कमल, सुगन्धित मिट्टी और सात्त्विक अन्न आदि सरल सामग्रियों से भगवान् और मुनियों की पूजा की।
श्रुतदेव मन-ही-मन आश्चर्य कर रहे थे कि “मैं तो गृहस्थी के अन्धे कुएँ में पड़ा एक साधारण और अभागा मनुष्य हूँ; फिर भी समस्त तीर्थों को पवित्र करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण और महान् ऋषियों का सान्निध्य मुझे कैसे प्राप्त हो गया?”
श्रुतदेव ने कहा, “हम आपके सेवक हैं। हमें आज्ञा दीजिये कि हम आपकी क्या सेवा करें? आपके दर्शन से ही जीवों के समस्त क्लेश समाप्त हो जाते हैं।”
श्रुतदेव की प्रार्थना सुनकर भगवान् श्रीकृष्ण ने प्रेमपूर्वक उनका हाथ पकड़ लिया और कहा कि ये महान् ऋषि-मुनि विशेष रूप से उन पर कृपा करने के लिये आये हैं। संत पुरुष अपने चरणों की धूल और केवल अपनी दृष्टि से ही लोगों तथा तीर्थों को पवित्र कर देते हैं।
जो लोग केवल मूर्तियों में ही पूजा देखते हैं और संतों का तिरस्कार करते हैं, वे वास्तविक तत्त्व को नहीं समझते। इसलिए भगवान् ने श्रुतदेव को आदेश दिया कि वे इन ब्रह्मर्षियों को भगवान् का ही स्वरूप मानकर श्रद्धापूर्वक उनकी पूजा करें। ऐसा करने से भगवान् की पूजा स्वतः हो जाती है।
भगवान् की आज्ञा पाकर श्रुतदेव ने भगवान् श्रीकृष्ण और ब्रह्मर्षियों की एकात्मभाव से पूजा की और उनकी कृपा से भगवत्स्वरूप को प्राप्त हो गये। राजा बहुलाश्व ने भी वही परम गति प्राप्त की। कुछ समय तक मिथिला में रहकर भगवान् ने दोनों भक्तों को साधु-मार्ग का उपदेश दिया और फिर द्वारका लौट गये।
सारांश: JKYog India Online Class- श्रीमद् भागवत कथा [हिन्दी]- 19.06.2026